हे मौन शूर
महामजदूर!
घरेलू घूर
फेंकते दूर।
कर्षित हूर
भरपूर
अमचूर
खाती घूर।
नयननीर-क्षीर
फटीं चीर
नदी तीर
ताकती नूर
शाम को जाती है
वापस चुल्हे का दर्द देख
नदीतट पर धूप सोखने
उम्मीद उमंग तरंग की तरह
रह-रह कर मजदूरीन में
विद्रोही आवाज़ भरती
धुएँ की तरह सड़क से संसद तक
भूख के अदहन का भाप!
जानते हो आप??
चुनाव का नाव
डगमगा जाती नदी बीच।
इतना सब कुछ सुनने के बाद भी
चुप्पी साधे बैठें हो नाथ
क्यों?बताओ प्रियतम!
कुछ तो बताओ....
पिछला पति
इसलिए आपके गति में मेरा गति
उठो! जागो! ऊँचा बलो! चलो!
बच्चों के लिए ,अपने बच्चों के लिए।



Very nice poem
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