Golendra Gyan

Wednesday, 11 March 2026

कथा-सम्राट के आलोक में : ‘प्रेमचंदनामा’ की ग्यारह कविताओं की वैचारिक और काव्यात्मक समीक्षा

कथा-सम्राट के आलोक में : ‘प्रेमचंदनामा’ की ग्यारह कविताओं की वैचारिक और काव्यात्मक समीक्षा

Munshi Premchand आधुनिक हिंदी-उर्दू साहित्य के ऐसे युगनिर्माता लेखक हैं जिन्होंने कथा-साहित्य को जनजीवन की वास्तविकताओं से जोड़ा। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को Lamhi गाँव (निकट Varanasi) में हुआ और उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। साधारण परिवार में जन्म लेने के कारण उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक विघ्नों और सामाजिक विषमताओं के बीच बीता। यही जीवनानुभव आगे चलकर उनके साहित्य की संवेदनात्मक शक्ति और सामाजिक दृष्टि का आधार बने।

प्रेमचंद ने प्रारंभ में उर्दू में “नवाब राय” नाम से लेखन आरम्भ किया, किंतु औपनिवेशिक शासन द्वारा उनकी देशभक्तिपरक कृति Soz-e-Watan पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उन्होंने “प्रेमचंद” नाम अपनाया और हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं में सृजन किया। शिक्षक और शिक्षा विभाग के अधिकारी के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1921 में Mahatma Gandhi के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर सरकारी नौकरी त्याग दी और साहित्य को ही अपना मुख्य कर्मक्षेत्र बना लिया।

उनकी रचनाओं में भारतीय समाज का बहुआयामी यथार्थ दिखाई देता है। किसान-जीवन की दयनीयता, जातिगत भेदभाव, स्त्री-पीड़ा, दहेज-प्रथा, जमींदारी शोषण और औपनिवेशिक व्यवस्था की विसंगतियाँ उनके कथा-साहित्य के प्रमुख विषय रहे। इस कारण उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद का महत्वपूर्ण प्रवर्तक माना जाता है। उनकी भाषा सहज, संवादपूर्ण और लोकानुभव से संपृक्त है, जिससे उनकी रचनाएँ व्यापक पाठक-समाज तक पहुँचीं।

प्रेमचंद ने लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास और तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनके महत्वपूर्ण उपन्यासों में Sevasadan, Rangbhumi, Nirmala, Gaban, Karmabhumi और विशेष रूप से Godaan उल्लेखनीय हैं। वहीं “कफन”, “पूस की रात”, “ईदगाह” और “दो बैलों की कथा” जैसी कहानियाँ हिंदी कहानी परंपरा की अमर धरोहर मानी जाती हैं।

8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया, किंतु उनका साहित्य आज भी भारतीय समाज के इतिहास और संवेदना का जीवंत दस्तावेज माना जाता है। प्रेमचंद की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने साहित्य को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और परिवर्तन की शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसी कारण हिंदी कथा-साहित्य के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत ऊँचा और स्थायी माना जाता है।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित काव्य–श्रृंखला “प्रेमचंदनामा” में प्रस्तुत ये ग्यारह कविताएँ हिंदी कथा–परंपरा के महान यथार्थवादी लेखक मुंशी प्रेमचंद को समर्पित एक विशिष्ट काव्यात्मक आलोचना के रूप में सामने आती हैं। यह केवल श्रद्धांजलि या स्तुतिगान नहीं है, बल्कि साहित्य, समाज और इतिहास के त्रिकोण में खड़े प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व का संवेदनात्मक पुनर्पाठ भी है। इन कविताओं में कवि ने प्रेमचंद के साहित्यिक संसार, उनके पात्रों, उनके विचार और उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को इस तरह समेटा है कि कविता आलोचना का रूप धारण कर लेती है और आलोचना कविता का।


1. प्रेमचंद की परंपरा का काव्यात्मक पुनर्पाठ

“प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना” कविता पूरी श्रृंखला का वैचारिक द्वार खोलती है। यहाँ कवि प्रेमचंद को केवल एक लेखक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखता है। प्रेमचंद के वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव को संबोधित करते हुए कवि उनसे संवाद करता है।

कविता में प्रेमचंद की रचनाओं और पात्रों की लंबी सूची केवल स्मरण नहीं है; वह एक सांस्कृतिक मानचित्र है। गोदान, गबन, रंगभूमि, सेवासदन और निर्मला जैसे ग्रंथों के माध्यम से कवि यह दिखाता है कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज का जीवंत अभिलेख है।

यहाँ कविता एक तरह से यह स्थापित करती है कि प्रेमचंद का साहित्य केवल कथाओं का संग्रह नहीं बल्कि सामाजिक इतिहास का संवेदनात्मक दस्तावेज है।


2. यथार्थवाद की वैचारिक प्रतिष्ठा

दूसरी कविता “यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद” में कवि प्रेमचंद को आधुनिक भारतीय यथार्थवाद का अर्जुन घोषित करता है। यहाँ प्रेमचंद को सामाजिक संघर्ष के योद्धा के रूप में देखा गया है।

कवि के अनुसार प्रेमचंद सामंती मानसिकता और महाजनी सभ्यता के विरुद्ध एक साहित्यिक युद्ध हैं। यह विचार प्रेमचंद के प्रगतिशील साहित्यिक दृष्टिकोण से मेल खाता है, जिसे आगे चलकर प्रगतिशील लेखक आंदोलन ने भी विकसित किया।

कविता में प्रेमचंद को “आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाला व्यास” कहा जाना उनके रचनात्मक महत्त्व को मिथकीय ऊँचाई प्रदान करता है।


3. साहित्यिक आस्था का मंत्र

तीसरी कविता “ॐ प्रेमचंदाय नमः” में कवि प्रेमचंद को एक साहित्यिक देवता की तरह स्मरण करता है। यहाँ आस्था का स्वर है, पर यह आस्था अंधभक्ति नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों की आस्था है।

कवि गाँव के जीवन, खेत, किसान और प्रकृति के दृश्य के माध्यम से यह दिखाता है कि प्रेमचंद की रचनात्मक चेतना ग्रामीण भारत से गहराई से जुड़ी हुई है। यह वही दुनिया है जिसमें होरी, हल्कू, गोबर, धनिया जैसे पात्र जन्म लेते हैं।


4. करुणा और प्रतिरोध की कथा

“प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद” कविता प्रेमचंद के साहित्य की केंद्रीय शक्ति—करुणा—को रेखांकित करती है।

सद्गति का दुखी चमार, कफन के घीसू-माधव, और ठाकुर का कुआँ की गंगी जैसे पात्रों के माध्यम से कवि यह दिखाता है कि प्रेमचंद का साहित्य शोषित समाज की आवाज है।

कवि का यह कथन कि “कर्ज वह कीड़ा है जो एक बार काट ले तो मृत्यु निश्चित है” दरअसल प्रेमचंद के किसान–जीवन की त्रासदी का सार है।


5. किसान जीवन का महाकाव्यात्मक चित्र

“होरी का चरित्र चित्रण” कविता में कवि ने प्रेमचंद के अमर पात्र होरी का पुनर्सृजन किया है।

यहाँ होरी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि भारतीय किसान की सामूहिक नियति है। उसकी गरीबी, उसकी मर्यादा, उसका श्रम और उसकी करुणा—ये सब मिलकर किसान जीवन की महागाथा रचते हैं।

कवि की दृष्टि में होरी का चरित्र भारतीय कृषि–संस्कृति की नैतिक आत्मा है।


6–7. लमही का अनुभव और प्रतीकात्मकता

कविताएँ “मैं लमही में हूँ” और “फटे जूते का जादू” अत्यंत सूक्ष्म और व्यंग्यात्मक हैं।

यहाँ लमही केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति है। कवि कहता है कि लोग प्रेमचंद के घर तो जाते हैं, पर उनके पात्रों के घर नहीं जाते।

यह कथन साहित्य के वास्तविक उद्देश्य की ओर संकेत करता है—लेखक की पूजा नहीं, बल्कि उसके पात्रों की पीड़ा को समझना।


8. सामाजिक विडंबना का तीखा व्यंग्य

“हल्कू का कर्ज” कविता अत्यंत छोटी होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है।

तीन रुपये के कर्ज से पीड़ित हल्कू का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि हमने प्रेमचंद को तीस रुपये की माला पहना दी। यह आधुनिक समाज की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है—हम लेखक का सम्मान करते हैं, पर उसकी बातों को जीवन में नहीं उतारते।


9. पाठक और लेखक का संबंध

“लेखक का घर पाठक का हृदय है” कविता अत्यंत दार्शनिक है।

यहाँ कवि यह स्थापित करता है कि किसी लेखक का वास्तविक घर उसकी कृतियों में नहीं बल्कि उसके पाठकों के हृदय में होता है।

इस संदर्भ में संत परंपरा के महान कवि कबीर की पंक्ति “मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे…” का संकेत देकर कवि गुरु-शिष्य परंपरा को भी जोड़ देता है।


10. पात्रों की अमरता

“पात्र जीवित हैं” कविता प्रेमचंद की रचनात्मक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण प्रस्तुत करती है।

कवि का कथन कि “प्रेमचंद का दुर्भाग्य है कि उनके पात्र जीवित हैं” एक गहरी साहित्यिक सच्चाई को व्यक्त करता है—जब तक समाज में वही अन्याय और विषमता मौजूद है, तब तक प्रेमचंद के पात्र भी जीवित रहेंगे।


11. आलोचना और पुनर्पाठ

अंतिम कविता “प्रकाशस्तंभ हैं प्रेमचंद” समकालीन आलोचना की बहसों को सामने लाती है।

यह कविता बताती है कि प्रेमचंद पर लगातार नए दृष्टिकोणों से बहस हो रही है—दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और अन्य आलोचनात्मक दृष्टियों के माध्यम से।

कवि का निष्कर्ष यह है कि बहसें प्रेमचंद को छोटा नहीं करतीं; बल्कि उनके कद को और ऊँचा करती हैं।


समग्र मूल्यांकन

इन ग्यारह कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे प्रेमचंद को केवल स्मरण नहीं करतीं, बल्कि उन्हें वर्तमान में पुनर्जीवित करती हैं।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल ने यहाँ तीन स्तरों पर काम किया है—

  1. साहित्यिक पुनर्पाठ – प्रेमचंद की रचनाओं और पात्रों का पुनर्मूल्यांकन।
  2. सामाजिक आलोचना – शोषण, जाति और गरीबी की संरचनाओं का उद्घाटन।
  3. काव्यात्मक श्रद्धांजलि – प्रेमचंद की मानवीय चेतना को सम्मान।

भाषा के स्तर पर कविताएँ मुक्तछंद में होते हुए भी लयात्मक हैं। उनमें प्रतीक, रूपक और व्यंग्य का सुंदर संयोजन है।


निष्कर्ष

“प्रेमचंदनामा” की ये ग्यारह कविताएँ हिंदी साहित्य में एक अनूठा प्रयोग हैं। यहाँ कविता, आलोचना और स्मृति एक साथ मिलकर एक नई साहित्यिक विधा का रूप लेती हैं।

कवि ने यह सिद्ध किया है कि मुंशी प्रेमचंद केवल अतीत के लेखक नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भी मार्गदर्शक हैं। उनके पात्र, उनकी करुणा और उनका यथार्थ आज भी भारतीय समाज की धड़कन में मौजूद है।

इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि प्रेमचंदनामा प्रेमचंद की परंपरा का काव्यात्मक पुनर्जन्म है—जहाँ साहित्य, समाज और मनुष्यता एक ही प्रकाश में दिखाई देते हैं।


समग्र रूप से देखा जाए तो ‘प्रेमचंदनामा’ की ये कविताएँ श्रद्धा, आलोचना और संवाद—इन तीनों तत्वों का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत करती हैं। इन रचनाओं में प्रेमचंद केवल अतीत के लेखक नहीं हैं; वे आज भी सामाजिक न्याय, मानवीय समानता और साहित्यिक प्रतिबद्धता के प्रकाशस्तंभ के रूप में उपस्थित हैं।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे प्रेमचंद को किसी दैवीय महापुरुष की तरह नहीं, बल्कि जनता के लेखक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि में प्रेमचंद का साहित्य खेतों की गंध, श्रम की गरिमा और मनुष्य की गरिमा का साहित्य है। यही कारण है कि ये कविताएँ केवल स्मरण नहीं, बल्कि समकालीन समाज को उसकी नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाने वाली रचनाएँ बन जाती हैं।

इस प्रकार ‘प्रेमचंदनामा’ की ये ग्यारह कविताएँ प्रेमचंद की रचनात्मक परंपरा को नए संदर्भों में समझने का सार्थक प्रयास हैं। इनमें श्रद्धा की ऊष्मा, आलोचना की दृष्टि और मानवीय करुणा का गहरा स्वर मौजूद है—और यही इनकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।


—भागीरथी सिंह 

चंदौली, उत्तर प्रदेश।


Thursday, 5 March 2026

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत || गोलेन्द्र पटेल

 क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत

❝जो व्यक्ति राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के संघर्ष और विचारों से अनभिज्ञ है, उसके साथ जीवन साझा करने से बेहतर है कि हम अकेले रहना स्वीकार करें।❞ — गोलेन्द्र पटेल


भारतीय समाज में यह एक गंभीर प्रश्न है कि कितने लोग, विशेषतः अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग, यह जानते हैं कि भारत की प्रथम महिला शिक्षिका कौन थीं। यह तथ्य अक्सर भुला दिया जाता है कि भारत की पहली महिला शिक्षिका किसी उच्च वर्ण से नहीं, बल्कि समाज के वंचित तबकों से आईं। वे थीं क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने शिक्षा और समानता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा दी।

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ। उनके पिता खंडोजी नैवसे और माता लक्ष्मीबाई थीं। किशोरावस्था में उनका विवाह समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव ने उन्हें शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया और यही शिक्षा आगे चलकर एक बड़े सामाजिक आंदोलन का आधार बनी। सावित्रीबाई ने 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय प्रारम्भ किया और स्वयं उसकी शिक्षिका बनीं। इस प्रकार वे भारतीय इतिहास में पहली महिला शिक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।

उनका संघर्ष केवल विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-उद्धार, जाति-भेद के विरोध और मानवीय समानता के लिए निरंतर काम किया। समाज में व्याप्त कुरीतियों—बाल विवाह, छुआछूत, स्त्री-अशिक्षा और विधवाओं के उत्पीड़न—के विरुद्ध उन्होंने खुलकर आवाज उठाई। फुले दंपती ने ऐसे आश्रय-गृह भी स्थापित किए जहाँ असहाय महिलाओं और नवजात शिशुओं को सुरक्षा और देखभाल मिल सके।

सावित्रीबाई ने महिलाओं को संगठित करने के लिए महिला मंडलों का निर्माण किया, जहाँ अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वाभिमान जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए समान अधिकार की भावना को व्यवहार में उतारा—यहाँ तक कि अपने घर का कुआँ भी सभी जातियों के लिए खोल दिया, जो उस समय सामाजिक समानता का साहसिक कदम था।

वे केवल समाजसेवी ही नहीं, बल्कि साहित्यकार भी थीं। वे मराठी की पहली कवयित्री हैं, उनकी कृतियों में शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के विचार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनकी लेखनी सरल भाषा में समाज के वंचित वर्गों को जागरूक करने का माध्यम बनी।

1897 में पुणे में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने रोगियों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। एक बीमार बच्चे को उपचार के लिए ले जाते समय वे स्वयं संक्रमण का शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उनका जीवन सेवा, साहस और समर्पण की अद्वितीय मिसाल बन गया।

सावित्रीबाई फुले की विरासत आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा है। स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की जो मशाल उन्होंने जलाई, वह आज भी संघर्ष और परिवर्तन की राह को प्रकाशमान करती है। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति का सबसे सशक्त साधन है।

सावित्री ज्ञान-ज्योति


सावित्री के ज्ञान से, जो जन अब भी दूर।
ऐसे अज्ञानित संग से, रहना अच्छा दूर॥
तीन जनवरी जन्म दिन, उन्नीसवीं सदी भोर।
ज्ञान-ज्योति बन जल उठीं, जन-मन के हर छोर॥

खंदोजी की संतति थीं, लक्ष्मी माँ की लोर।
संघर्षों की गोद में, पला क्रांति का जोर॥
भारत की प्रथम शिक्षिका, ब्राह्मण कुल की नाहिं।
ओबीसी की बेटी थी, सावित्री की चाहिं॥

ज्योतिराव संग बंध गया, जीवन का अभियान।
शिक्षा, समता, स्वाभिमान, बन गया पहचान॥
भिड़े वाड़ा के द्वार से, खुला नया इतिहास।
बालिकाओं की पाठशाला, तोड़ा अंधा त्रास॥

काँटे, पत्थर, तिरस्कार, सहती रहीं निडर।
ज्ञान-पथ पर बढ़ चलीं, बनकर दीप प्रखर॥
अठारह विद्यालय से, फैला शिक्षा-धाम।
नारी, शूद्र, अनाथ सब, पाए नव-अभिराम॥

मुस्लिम मित्रों ने दिया, घर-आँगन का साथ।
लहुजी की पहरेदरी, बनी संघर्ष की थात॥
कुएँ का जल खोलकर, तोड़ी जाति दीवार।
प्यासे होंठों तक पहुँचा, मानवता का प्यार॥

विधवा-पीड़ा देख कर, खोला आश्रय-द्वार।
ममता से पाले शिशु को, दिया नया संसार॥
सत्यशोधक विवाह से, टूटी रूढ़ि-कमान।
बिना पुरोहित बंध गए, समता के अरमान॥

‘काव्यफुले’ की पंक्तियाँ, जगा रहीं स्वाभिमान।
‘रत्नाकर’ में गूँजता, शिक्षा-समता गान॥
स्त्री स्वर बन मंच पर, बोली निर्भय बात।
घर की सीमाएँ तोड़कर, बदली जग की जात॥

जाति, वर्ग, जेंडर सभी, देखे एक ही साथ।
सावित्री की दृष्टि में, मानवता की बात॥
प्लेग-काल में कंध पर, रोगी बालक लाय।
सेवा-पथ में प्राण दे, अमर कथा बन जाय॥

दस मार्च अठारह सौ, सत्तानबे का दिन।
सेवा में बलिदान से, अमर हुआ वह क्षण॥
विद्यालय, मंडल, गृह, जल— रचना दी समाज।
संघर्षों की यह धरोहर, बदले युग का आज॥

नारी यदि शिक्षित हुई, जागे घर परिवार।
ज्ञान-सूर्य से मिट गया, अज्ञानों का अँधियार॥
सावित्री की राह पर, जो भी बढ़ता जाय।
समता, शिक्षा, मानवता, जीवन में फल पाय॥



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Monday, 2 March 2026

लघु कथा: चंदन की होली

 

चंदन की होली : गोलेन्द्र पटेल 

होली आने वाली थी और गाँव में रंगों की धूम मची थी।
गोलेन्द्र ने चौपाल पर खड़े होकर गंभीर स्वर में घोषणा की, “मित्रों! मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप दिया है कि मैं प्रेमिका के अलावा किसी के साथ होली नहीं खेल सकता। और कृपया, कोई भी कृत्रिम रंग, अबीर-गुलाल लेकर मेरे पास न आए। मेंहदी या चंदन ही स्वीकार्य है!”
लोग पहले तो चौंके, फिर मुस्कुरा उठे।
उधर मन ही मन गोलेन्द्र को याद आया कि कुछ दिन पहले महर्षि अगस्त्य ने आशीर्वाद दिया था, “वत्स! शीघ्र ही तुम्हारी GF से भेंट होगी।”
गोलेन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था, “भगवन्! मुझे किसी God Father से नहीं मिलना, आप ही मेरे पथप्रदर्शक हैं। मैं आपका ही गोलेन्द्र हूँ!”
होली के दिन सब लोग चमकीले रंगों से सराबोर थे, पर गोलेन्द्र सफेद कुर्ते में शांत खड़ा था। तभी एक बालिका आई, हाथ में चंदन लिए। उसने मुस्कुराकर उसके माथे पर तिलक लगाया और बोली, “सच्चा रंग वही है जो मन को रंग दे।”
गोलेन्द्र समझ गया, श्राप रंगों का नहीं, अहंकार का था। प्रेमिका कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि निर्मल प्रेम की अनुभूति थी।
उस दिन उसने जाना कि होली बाहर नहीं, भीतर खेली जाती है।

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (चंदौली, उत्तर प्रदेश।)