-©गोलेन्द्र पटेल
"जब दुनिया के / तमाम पन्नों पर/लिखे जा रहे थे/पुरुषार्थ के प्रशस्ति गान / तब / समाज ने हासिये पर/लिखा दिया तुम्हारा नाम/तब भी तुम रचती रही./हसिये से समाज /सृजन के गर्भ से/जन्म देना चाहती रही/एक समतामूलक समाज" आज भी समाज में स्त्रियाँ 'देह दशा दोहरे दर्द' को ; दो दिवारों के बीच से अपने चीख के प्रतिध्वनि को किस प्रकार खुले आँगन तक पहुँचा रही हैं। यह इस कविता के संवेदना का सुगंध है जिसे एक सहृदय ही सूँघ सकता है।
"पकते हुए चावल के साथ-साथ / पकती है तुम्हारी उम्र/जैसे कोई फल हो/ अब गिरे... तब गिरे../ मेरी संतोषी/भात के पकने तक/ तुम्हें रखना होगा धैर्य / रोटी की लड़ाई में /पानी को बनना पड़ता है /भोजन का विकल्प/बार -बार / बदहजमी/और भूख मिटाने वाली दवा के बीच /एक अदद पेट है/जो लड़ता है रोटी से/मुझे सपने में दिखाई देते हैं/भूख से तड़पते बच्चे /मैं पकाना चाहती हूं /कटोरी भर भात
भूख के विरुद्ध"
श्रमिकों के पसीने से लिखे गए इतिहास को पढ़ते वक्त उन्हें कितना याद किया जाता है यह आप सभी जानते हैं।उनके प्रति प्रेम का आवाहन करती और शोषित मजदूरों के दर्द का दर्शन करती हुई कवयित्री कहती है
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"जब तुम प्रेम और युद्ध के द्वंद में फंसे थे /कोई लिख रहा था/ उस वक्त अपने पसीने से /"परिश्रम"/ तुम्हारे महलों के दरवाजे पर/ टांग दिया गया था उसका स्वप्न/उसे चेतावनी दी गई थी कि /वह आगे से ना देखे कोई स्वप्न /न सोते होते हुए / न जागते हुए....जब तुम चांद पर जाने की तैयारी में थे /कोई दे रहा था हाशिए से आवाज/ अंततः जब तुमने चुन लिया युद्ध /कोई करना चाहता था तुमसे प्रेम /सिर्फ प्रेम।"
वे ऐसे लौट रहे हैं /जैसे किसी तूफान के उठने से पहले/ पंछी लौट जाना चाहते हैं /अपने घोसले में/वे लौट रहे हैं /अपनी जिंदगी की सारी कमाई/ गठ्ठरी में बांधे /नंगे पांव /लहूलुहान है उनके पैर /सड़कें खून से रंग गयी हैं/समय की आग से/ झुलस गए हैं उनके चेहरे /जिन्होंने सभ्यता के विकास में /अपना श्रम और पसीना दिया है /आज उनसे उनका लहू भी
मांगा जा रहा है/वे लहू भी देने को तैयार हैं क्योंकि-
वह जानते हैं /लोकतंत्र में " मजदूरी" का पर्याय "मजबूरी" होता है / वे मजबूर हैं/ जिन सडको को बनाया है उन्होंने /वही सड़के/उनके खून की प्यासी हो गई हैं /रेल की पटरियों के आगोश में /समा चुकी है कई जिंदगियां /धरती अपने अक्ष से हिल गई है /मानो वह कह रही हो/ यह विस्थापित युग है /निर्वासित युग हैं/ इस "भेड़तंत्र" में /जन प्रतिनिधि को /जनता ने "विधाता" की संज्ञा दी है/और उसी "विधाता"ने उनके/भाग्य में लिख दिया है /"निर्वासन","पलायन" ,"दमन"और "शोषण"/वे बार-बार अपनी "जन्म कुंडली" टटोलकर देखते हैं ,/और निराश हो जाते हैं/वे लौट रहे हैं क्योंकि/ उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है/ इससे पहले कि वह दूसरे/शोषण के शिकार हो/वे लौट जाना चाहते हैं /अपने गांव/इसी वादे के साथ कि /अब वे दोबारा लौट कर नहीं जाएंगे।"
कविताओं की भी होती है हत्या/कवि के गर्भ में /भूख से तड़पते पेट में...मैंने देखा है /दम तोड़ती कविता को /हर वर्ष कत्ल भी की जाती हैं सैकड़ों कविताएं...विश्वविद्यालय के मंच पर जो हुआ था
वह कत्ल ही थी/विश्वविद्यालयों के भेंट चढ़ जाती हैं अनेकों कविताएँ/कवि सम्मेलन और गोष्ठियों से
कर दी जाती है निष्कासित /अच्छी कविताएं/और अच्छे कवि उपेक्षित...
उस पन्ने पर दर्ज की जाएंगी असहमतियाँ/ पूछे जाएंगे सवाल/ जिरह के लिए भी छोड़ना एक पन्ना/क्योंकि कविता का मतलब/ तानाशाही नहीं होता।
"कंधे से कंधा /और कदम से कदम मिलाने में/ फर्क है मेरे मित्र/ जब तुम कदम से कदम/ मिलाने को
राजी होते हो तो / तुम साथ चलने को होते हो राजी/ लेकिन जब कंधा मिलाकर /चलने की करते बात/तो जन्म लेती है एक प्रतिस्पर्धा /तुम्हें अच्छा नहीं लगता कि/मेरा कंधा तुम्हारे कंधे से हो ऊँचा/यही होड/ अंततः संघर्ष के जन्म देती है ।
©गोलेन्द्र पटेल
【बीएचयू】
रचना : २१-०६-२०२०
नोट : कम से कम शब्दों में समेटा हूँ
💐आत्मीय धन्यवाद!

