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सखी!
गर्भ में
सृष्टि का सृजन
ढोना
संकेत का क्षण
होना
अदृश्य भारत-
भूख-ए-भविष्य!
महानगर में ; महामजदूर-
हिन्दुस्तान-ए-हविष्य!
लौट रहे हैं
आँख में आँसू-
आँत में अकड़न ले
पाथेय ;
रेल के पटरियों पर-
पैदल पैदल...!
बहुत-सी सूखी छाती चुचकी चाम से
चमचमाती घाम में ;
चल रही हैं निरंतर
शांत शोषित सड़क पर
निराश निशब्द निःसहाय निरोपाय
अपने घर की ओर!
जिस पर पड़े सारे गिट्टी पैर का प्रश्न-ए-पीर ;
नदी बन गयी
और औरतें दोहरे दर्द-ए-देह!!-१
जहाँ न भोजन न ज्ञान है
फिर भी हम कहते हैं ;
हमारा पहचान हिन्दुस्तान है!
कभी चूल्हा रोता है ;
कभी पेट भरा होता है
कभी भूखे पेट सोता है
अंत में कड़ाही पोंछ कर सूखी रोटी खाकर पानी पीती है ,
अपने एक दो तीन चार पाँच वर्षीय बच्चों के लिए
और गर्भ में पलने वाले पति के अंतिम प्रेम के लिए ;
अब वे इस दुनिया में नहीं रहे!
अनेक पथिकों के चिता को विसर्जित करते देख रहा हूँ ;
अनेक कवियों द्वारा मुक्ति का मंत्र भी सून रहा हूँ
बच्चें नदी बीच पंडित के वक्तव्य जो दोहरा रहे हैं उसे भी!
अपनी क्षीरदाई जननी को
जो भूख का चादर ओढ़ सो गई है सदा के लिए ;
अपने हाथों से खाना खिला रहा है सान सान!
एक माँ की बेटी घर के पथ पर चलते चलते स्वर्ग चली गई!
लॉकडाउन में श्रवण कुमार-सा धर्म निभाई
जिसे एक स्त्री अपने कथा कहानी कविता गीत-प्रगीत में
कहर-ए-कंठ से कोयल-सी स्वर दे रही हैं!
अनुभूति स्त्रियों का घर है ;
पुरुष उन्हें जब खोजते हैं देह में
तब नहीं मिलती हैं वे अंत तक उन्हें
लौटना आना चाहता है बार बार युवावस्था में
जैसे लौटना चाहते हैं फँसे मजदूर अपने घर!
क्या कोई विधुर एकाकी होता है?
या कोई नायक नायिका के विरह में?
एक मर्द अपने मंजिल के द्वार पर जा गिरा
एक वीर वन के बाहर
वीर पति पुत्र पिता में से कोई एक हो सकता है ;
और उनकी यही रुदन संवेदना के सुमनवाटिका में
सुगंध बिखेरने लगती है
हवा में फैली गंधपथ धर भौंरें चले आ रहे हैं
रुदनरस को चूसने!
कुछ रंगों के मोह में भटकते हैं फूलों पर
कुछ अधखिले कलियों को देखते आँखें फार
पर भूखे काले भौंरें दोपहर में भी दिखते हैं
अलग अलग फूलों पर मँडराते हुए!
धूप के विरुद्ध ,
मालिन सोहती नेरती सिंचती कर्षित क्यारी को
जो आकर्षित करती भ्रमरी बेचारी को
खेतहरीन सूरजमुखी पर कपड़े बाँध रही होती हैं ;
वह दुःखी हो पहुँची मजदूरों के समाधि स्थल
वहाँ बैठ स्त्रियों के समाधि लेख पढ़ रही होती है
कि कोरोना से पीड़ित हो मरी स्त्री का शव आता है
वरिष्ठ अधिकारियों के देख रेख में कफ़न दे कर
फिर भी कबरिस्तान के आत्मा उसे वहाँ
दफ़नाने से रोक रहे हैं....!
जो दो वर्ष पूर्व ही कब्र में जा उसकी प्रतिक्षा कर रहे हैं
शव वहाँ से लौट जाती है उसी सरकारी गाड़ी में
पति की आत्मा विरोधी आत्माओं से हार
मेरी प्रियतम को मत ले जाओ मुझसे दूर
हे ख़ुदा! रहम करो रहम करो मुझ पर रहम करो!
इश्क-ए-हकिकी में बदल दिया
कब्र में माँ का तस्वीर-ए-मोहब्बत दफ़ना
आशीर्वाद दे कबरिस्तान से आधीरात घर भेज दिए उसे
भ्रमरी इस घटना को सार्वजनिक करने के लिए
घटना सार्वजनिक हो गयी कानो-कान
कोरोना ने जब ले लिया मुल्क-ए-जान!!-२...
- https://www.youtube.com/channel/UCcfTgcf0LR5be5x7pdqb5AA

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