हिंदी कविता में स्तन
—गोलेन्द्र पटेल
भारतीय साहित्य में मानव-शरीर का चित्रण केवल जैविक या दृश्य यथार्थ का प्रतिरूप नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक स्मृति, सौंदर्यबोध, दार्शनिक चिंतन और भाव-अनुभूति का एक महत्त्वपूर्ण आधार भी है। वैदिक ऋचाओं से लेकर संस्कृत महाकाव्यों, नाटकों, पुराणों, आयुर्वेद, भक्तिकाव्य, रीतिकाव्य तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य तक शरीर के प्रत्येक अंग को किसी न किसी प्रतीकात्मक अर्थ से जोड़ा गया है। स्त्री-शरीर के संदर्भ में 'स्तन' ऐसा ही एक बिंब है, जिसने समय, समाज और साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार निरंतर नए अर्थ ग्रहण किए हैं। कभी वह मातृत्व और जीवन-पोषण का स्रोत बनकर सामने आता है, कभी यौवन और सौंदर्य का प्रतीक बनता है, कभी वैराग्य और यथार्थ-बोध का माध्यम, तो कभी स्त्री-अस्तित्व, प्रतिरोध और सामाजिक विमर्श की सशक्त अभिव्यक्ति। संस्कृत भाषा में 'स्तन' के लिए केवल एक शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। कवियों और आचार्यों ने प्रसंगानुसार पयोधर, कुच, उरोज, वक्षोज, स्तनकलश, उरसिज, पयोघर आदि अनेक पर्यायों का प्रयोग किया। इन शब्दों की विविधता यह संकेत करती है कि भारतीय काव्य-परंपरा में किसी अंग का वर्णन मात्र दृश्यात्मक नहीं था, बल्कि उसके साथ भाव, रस और सांस्कृतिक अर्थ भी जुड़े हुए थे। 'पयोधर' शब्द में जहाँ दूध धारण करने की क्षमता का बोध है, वहीं 'उरोज' वक्षस्थल पर उत्पन्न होने की स्थिति का संकेत देता है और 'कुच' शास्त्रीय काव्य की अलंकारिक परंपरा का प्रिय शब्द बन जाता है। भारतीय साहित्य में स्तन का सर्वप्रथम उल्लेख काम या शृंगार के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-पोषण के प्रतीक के रूप में प्राप्त होता है। ऋग्वेद में सरस्वती की स्तुति करते हुए ऋषि प्रार्थना करता है—
“यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि।
यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः सरस्वति तमिह धातवे कः॥”
(ऋग्वेद १.१६४.४९)

यहाँ देवी के स्तन को समस्त जगत का पालन करने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। वह केवल मातृत्व का नहीं, ज्ञान, समृद्धि और जीवन-ऊर्जा का भी प्रतीक है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय चिंतन में स्तन का मूल अर्थ पोषण, संरक्षण और सृजन से जुड़ा रहा है। शास्त्रीय संस्कृत काव्य में प्रवेश करते ही यह बिंब सौंदर्यशास्त्र का महत्त्वपूर्ण अवयव बन जाता है। नख-शिख वर्णन की परंपरा में कवियों ने स्त्री-सौंदर्य का सूक्ष्म, कलात्मक और सांकेतिक निरूपण किया। इस वर्णन का उद्देश्य देह का स्थूल चित्रण नहीं था, बल्कि रसोत्पत्ति और सौंदर्यानुभूति का निर्माण करना था। इसी कारण स्तनों की तुलना कभी कनक-कलश से, कभी कमल-मुकुल से, कभी श्रीफल से, कभी गजकुम्भ से और कभी चक्रवाक-युगल से की गई। इन उपमानों में आकार की अपेक्षा पूर्णता, सममिति, कोमलता, सौभाग्य और जीवन-समृद्धि का बोध अधिक महत्त्वपूर्ण है। महाकवि कालिदास इस परंपरा के सर्वाधिक संतुलित और कलात्मक प्रतिनिधि हैं। उनके यहाँ स्त्री-सौंदर्य कभी अश्लील या उद्दीपक नहीं बनता, बल्कि प्रकृति के साथ एक गहरे सामंजस्य में विकसित होता है। कुमारसंभव में पार्वती के यौवनारंभ का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं—
“अन्यामवस्थां प्रथमा प्रपन्ना
स्तनद्वयेनातिभरानतेन॥”
यहाँ कवि का ध्यान किसी मांसल विवरण पर नहीं, बल्कि किशोरावस्था से यौवन में प्रवेश करने वाली स्त्री के स्वाभाविक रूपांतरण पर है। उन्नत वक्षस्थल के भार से उत्पन्न हल्का झुकाव लज्जा, विनय और यौवन की प्रथम आहट का कलात्मक संकेत बन जाता है। इसी महाकाव्य में पार्वती के स्तनों की निकटता का वर्णन करते हुए कालिदास कहते हैं—
“मृणालसूत्रान्तरमप्यलभ्यम्।”
अर्थात् दोनों के मध्य इतना भी स्थान नहीं था कि कमल-नाल का एक सूक्ष्म तंतु भी समा सके। यहाँ उपमा शरीर की उत्तेजक प्रस्तुति नहीं, बल्कि प्रकृति और सौंदर्य के सूक्ष्म सामंजस्य का उदाहरण है। यही कारण है कि कालिदास की काव्य-दृष्टि भारतीय सौंदर्यशास्त्र में आदर्श मानी जाती है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी शकुन्तला का सौंदर्य वन की सहजता और निष्कलुषता के साथ जुड़ा हुआ है। जब वह वल्कल धारण कर आश्रम के वृक्षों का सिंचन करती है, तब दुष्यन्त के मन में विचार आता है—
“पयोधराभ्यान्तरवर्ति वल्कलम्...”
वल्कल की कठोरता और शरीर की कोमलता के बीच उत्पन्न यह विरोधाभास ही दृश्य का सौंदर्य रचता है। यहाँ स्त्री-देह का वर्णन किसी भोगवादी दृष्टि से नहीं, बल्कि प्रकृति, सरलता और यौवन के सम्मिलित बिंब के रूप में किया गया है। कालिदास के अतिरिक्त संस्कृत साहित्य में अनेक कवियों ने स्तनों को सौंदर्य का उपमान बनाया, किन्तु भर्तृहरि ने उसी परंपरा के भीतर उसका दार्शनिक पुनर्मूल्यांकन किया। वैराग्यशतक का प्रसिद्ध श्लोक—
“स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशावित्युपमितौ।”

भारतीय काव्य-परंपरा के आत्मालोचन का उत्कृष्ट उदाहरण है। भर्तृहरि कहते हैं कि जिन्हें कवि स्वर्ण-कलश कहकर अलंकृत करते हैं, वे वस्तुतः मांस की ग्रंथियाँ ही हैं। यह कथन सौंदर्य का निषेध नहीं, बल्कि मनुष्य को मोह और आसक्ति से ऊपर उठाकर यथार्थ की ओर ले जाने का प्रयास है। इस प्रकार एक ही प्रतीक कालिदास के यहाँ सौंदर्य का, तो भर्तृहरि के यहाँ वैराग्य का माध्यम बन जाता है। संस्कृत साहित्य में स्तन का अर्थ केवल यौवन और शृंगार तक सीमित नहीं रहता। मातृत्व और वात्सल्य के प्रसंगों में वही बिंब पूर्णतः भिन्न अर्थ ग्रहण करता है। रघुवंश में नंदिनी गौ के थनों से प्रवाहित दूध को जीवनदायी करुणा और मातृ-स्नेह का रूप माना गया है। भागवत पुराण में बालकृष्ण का यशोदा के स्तनों से दुग्धपान करना वात्सल्य-रस का सर्वोच्च उत्कर्ष बन जाता है। वहाँ स्तन शारीरिक सौंदर्य का नहीं, प्रेम, पोषण और आत्मीयता का अक्षय स्रोत है। इसी कारण भारतीय परंपरा में 'पयोधर' शब्द विशेष अर्थपूर्ण है, क्योंकि उसमें पोषण की अवधारणा अंतर्निहित है। संस्कृत साहित्य के समानांतर आयुर्वेद ने भी स्तनों का वर्णन वैज्ञानिक दृष्टि से किया। चरकसंहिता और सुश्रुतसंहिता में स्तन्य, स्तन-रचना तथा स्तन-रोगों का विशद विवेचन मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा में स्तन केवल काव्य का विषय नहीं, चिकित्सा-विज्ञान का भी महत्त्वपूर्ण अंग था। इसी प्रकार गरुड़पुराण में स्त्री के शुभ-लक्षणों का वर्णन करते हुए कहा गया है—"अरोमशौ स्तनौ पीनौ घनौ अविषमौ शुभौ।" यहाँ सौंदर्य का संबंध संतुलन और स्वास्थ्य से जोड़ा गया है।

संस्कृत की यह बहुआयामी परंपरा आगे चलकर भारतीय भाषाओं के साहित्य में नए अर्थों के साथ विकसित हुई। तमिल महाकाव्य शिलप्पदिकारम् में कण्णगी अपने निर्दोष पति की हत्या पर क्रुद्ध होकर अपना बायाँ स्तन उखाड़कर मदुरै पर फेंक देती है और नगर के विनाश का शाप देती है। यहाँ स्तन न सौंदर्य का प्रतीक है, न मातृत्व का; वह न्याय, सतीत्व और प्रतिरोध की ज्वाला का रूप ग्रहण कर लेता है। संगमकालीन पुरनानूरु की एक प्रसिद्ध कविता में वीर-माता यह घोषणा करती है कि यदि उसका पुत्र युद्धभूमि से पीठ दिखाकर भागा होगा तो वह उन स्तनों को काट देगी जिन्होंने उसे दूध पिलाया है। जब उसे ज्ञात होता है कि पुत्र के वक्ष पर वीरगति का घाव है, तब वही स्तन गौरव और मातृ-स्वाभिमान के प्रतीक बन जाते हैं। बांग्ला साहित्य में मध्यकालीन वैष्णव कवियों चंडीदास और विद्यापति ने राधा के यौवन और दिव्य शृंगार के प्रसंगों में स्तनों की तुलना कनक-शिखरों और श्रीफल से की, जबकि आधुनिक युग में महाश्वेता देवी की प्रसिद्ध कहानी ‘स्तनदायिनी’ ने इसी बिंब को सामाजिक शोषण की करुण कथा में रूपांतरित कर दिया। जशोदा नामक पात्र अपने स्तनों के माध्यम से अनेक बच्चों का पालन करती है और अंततः उसी प्रक्रिया का शिकार होकर स्तन-कैंसर से मृत्यु को प्राप्त होती है। यहाँ स्तन स्त्री-देह के आर्थिक दोहन और मातृत्व के बाजारीकरण का प्रतीक बन जाता है। मराठी संत साहित्य में यह बिंब पुनः वात्सल्य और भक्ति की ओर लौटता है। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम विठ्ठल को 'माऊली' अर्थात् माँ कहकर संबोधित करते हैं। जिस प्रकार माता शिशु को स्तनपान कराकर तृप्त करती है, उसी प्रकार ईश्वर अपने भक्तों को कृपा और प्रेम से पोषित करता है। दूसरी ओर केरल की नंगेली की ऐतिहासिक-लोककथा स्तन को सामाजिक विद्रोह का प्रतीक बना देती है। 'मुलक्करम्' अर्थात् स्तन-कर के विरोध में अपने स्तनों का बलिदान देने वाली नंगेली भारतीय सामाजिक इतिहास में देह-अधिकार और मानवीय गरिमा की अद्वितीय मिसाल बन गई। कन्नड़ वचन-साहित्य की महान संत अक्का महादेवी ने स्त्री-देह को पुरुष-दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति का तीखा प्रतिरोध किया। उनके वचनों में स्तन शरीर की पहचान नहीं, बल्कि उस सामाजिक दृष्टि पर प्रश्नचिह्न हैं जो स्त्री को केवल देह तक सीमित कर देती है। उनके लिए आध्यात्मिक प्रेम देह की सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक है।

हिंदी साहित्य ने संस्कृत की इस परंपरा को ग्रहण करते हुए उसे अपने युगानुकूल अर्थ प्रदान किए। भक्तिकाल में सूरदास के यहाँ यशोदा का स्तनपान वात्सल्य-रस की चरम अभिव्यक्ति बनता है। रीतिकाल में बिहारी, देव, घनानंद और अन्य कवियों ने नख-शिख वर्णन की परंपरा में कुच, उरोज और पयोधर के लिए कनक-कलश, श्रीफल और गजकुम्भ जैसे उपमानों का प्रयोग किया। आधुनिक हिंदी कविता में यह दृष्टि बदलती है। अब स्तन केवल सौंदर्य का नहीं, स्त्री-अनुभव, मातृत्व, बीमारी, स्मृति और अस्तित्व का प्रतीक बन जाता है। पवन करण की कविता 'स्तन' स्तन-कैंसर के अनुभव के माध्यम से प्रेम, वियोग और देह की असुरक्षा को व्यक्त करती है, जबकि समकालीन कवयित्रियाँ स्त्री-देह को पुरुष-केंद्रित दृष्टि से मुक्त कर उसकी आत्मानुभूति और स्वायत्तता पर बल देती हैं। इस प्रकार भारतीय साहित्य की दीर्घ परंपरा यह प्रमाणित करती है कि 'स्तन' का साहित्यिक अर्थ किसी एक रस, विचार या दृष्टिकोण तक सीमित नहीं है। वैदिक साहित्य में वह जीवन-पोषण का प्रतीक है; संस्कृत महाकाव्यों में सौंदर्य और यौवन का; भर्तृहरि के यहाँ वैराग्य का; पुराणों और भक्तिकाव्य में मातृत्व का; तमिल साहित्य में न्याय और प्रतिरोध का; आधुनिक भारतीय भाषाओं में स्त्री-अस्तित्व, सामाजिक यथार्थ और देह-राजनीति का। यही बहुआयामी अर्थ-समृद्धि भारतीय साहित्य को अद्वितीय बनाती है, जहाँ एक ही प्रतीक विभिन्न युगों में बदलते हुए समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का दर्पण बन जाता है।
साहित्य, संगीत, सिनेमा और ललित कलाओं में स्तनों के प्रति सम्मानपूर्ण एवं संवेदनशील दृष्टि विकसित करना आवश्यक है। स्तन केवल स्त्री-शरीर का एक अंग नहीं हैं; वे स्त्रीत्व, मातृत्व, ममता, स्नेह, प्रेम, प्रजनन, पोषण और अस्मिता के बहुआयामी प्रतीक हैं। भारतीय साहित्यिक परंपरा ने उन्हें सृजनात्मक शक्ति, जीवन-ऊर्जा और सौंदर्य-बोध के रूप में भी प्रतिष्ठित किया है। यही कारण है कि विभिन्न युगों और साहित्यिक प्रवृत्तियों में उनका स्वरूप बदलता रहा है, कहीं वे वात्सल्य और करुणा के आलोक में चित्रित हुए हैं, तो कहीं श्रृंगार और काम-भावना की अभिव्यक्ति के माध्यम बने हैं। प्रेम का वास्तविक स्वरूप सदैव मौन, गंभीर और आत्मानुभूतिपरक होता है। वह जितना कोमल है, उतना ही दृढ़; जितना सूक्ष्म है, उतना ही विराट। अपनी उदात्तता में प्रेम अहंकार का विसर्जन और आत्मा का विस्तार है। आज प्रेम की चर्चा तो बहुत है, परंतु उसके जीवन-मूल्य क्रमशः क्षीण होते प्रतीत होते हैं। प्रेम बाह्य प्रदर्शन का विषय नहीं, बल्कि अंतःकरण की अनुभूति है। उसका संबंध केवल देह से नहीं, मन और आत्मा से है। आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा में वही प्रेम भक्ति का रूप धारण कर लेता है। उसमें ऐसी रूपांतरणकारी शक्ति निहित है, जो अवगुणों को गुण तथा असुंदर को सुंदर बना देती है। इसलिए प्रेम व्यक्ति से अधिक उसके व्यक्तित्व का आलोक है। कवि मूलतः मानवीय सौंदर्य का उपासक होता है। वह शरीर में भी आत्मा की झलक खोजता है और रूप में भी भाव का आलोक देखता है। संस्कृत साहित्य की यह उदात्त सौंदर्य-दृष्टि हिंदी कविता में भी निरंतर प्रतिध्वनित होती रही है। इस परंपरा के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि महाकवि कालिदास हैं। हिंदी कविता में स्तनों की साहित्यिक उपस्थिति को समझने के लिए कालिदास से बेहतर प्रारंभ-बिंदु दूसरा नहीं हो सकता। मेघदूत में वे लिखते हैं—
“छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रै-
स्त्वय्यारूढे शिखरमचलः स्निग्धवेणीसवर्णे।
नूनं यास्यत्यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्थां
मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः॥”
इस अनुपम उपमा में कालिदास ने प्रकृति का मानवीकरण किया है। वर्षा-मेघ से आच्छादित पर्वत-शिखर उन्हें पृथ्वी के श्यामल स्तन के समान प्रतीत होता है, जबकि उसके चारों ओर फैला हुआ पीताभ भूभाग स्तन के परिवेश का बिंब निर्मित करता है। यहाँ 'स्तन' किसी कामोत्तेजक संकेत के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति की जीवंतता, उर्वरता और सौंदर्य के कलात्मक प्रतीक के रूप में उपस्थित है। कालिदास की काव्य-दृष्टि की यही विशिष्टता है कि वे मानवीय शरीर और प्रकृति के बीच अद्भुत सामंजस्य स्थापित कर देते हैं। कविता में स्तनों की चर्चा का अर्थ केवल मांसलता का वर्णन नहीं है, बल्कि मानवीय सौंदर्य-बोध, प्रेमानुभूति और सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या भी है। हिंदी साहित्य की प्रारंभिक प्रेमधारा, विशेषतः आदिकालीन प्रेमाख्यानों में, शरीर-सौंदर्य का वर्णन प्रेम की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में मिलता है। अनेक प्रेमकाव्यों में नायिका के उरोजों और अन्य अंगों का वर्णन अलंकारिक एवं सौंदर्यपरक शैली में किया गया है। इन वर्णनों का उद्देश्य तत्कालीन काव्य-परंपरा के अनुरूप प्रेम, आकर्षण और श्रृंगार-रस की अनुभूति का सृजन करना था। अतः उन्हें केवल दैहिक उद्दीपन के रूप में नहीं, बल्कि अपने समय के सौंदर्यशास्त्र, काव्य-रूढ़ियों और रस-सिद्धांत के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना अधिक समीचीन होगा। जीवन का प्रेम और सौंदर्य से अविच्छिन्न संबंध है। प्रेम के रंग और सौंदर्य की सुगंध ही जीवन के वास्तविक रंग और गंध हैं। देह प्रेम की प्रथम अनुभूति का आधार है; प्रेम और सौंदर्य की आरंभिक अभिव्यक्तियाँ इसी के माध्यम से आकार ग्रहण करती हैं। मानवीय संवेदनाएँ, आकर्षण, अनुराग और सौंदर्य-बोध शरीर से ही अपनी पहली भाषा पाते हैं। देह में वासना के अंकुर भी फूटते हैं और आत्मीयता के पुष्प भी खिलते हैं। इसी से भावावेगों को उद्दीप्त करने वाली प्रेम-कविताएँ जन्म लेती हैं और मानवीय संबंधों का सौंदर्य अपना काव्यात्मक रूप ग्रहण करता है। यदि प्रेम देवत्व का रूप है, तो स्त्री-देह उसके सौंदर्य का पावन मंदिर है। उसकी आभा पुरुष के भीतर यौवन, आकर्षण और जीवनानंद की अनुभूति जगाती है। संभवतः इसी कारण प्रेम का सच्चा कवि आयु से नहीं, संवेदना से सदैव युवा बना रहता है। रीतिकालीन काव्यधारा में केशवदास का व्यक्तित्व इसका रोचक उदाहरण प्रस्तुत करता है। पाण्डित्य और अलंकार-वैभव के बीच भी उनका रसिक मन वृद्धावस्था को सहज स्वीकार नहीं कर पाता। जब युवतियाँ उन्हें 'बाबा' कहकर संबोधित करती हैं, तब वे विनोदपूर्ण व्यथा के साथ कहते हैं—
“केसव केसनि अस करी बैरिहु जस न कराहिं।
चंद्रबदन मृगलोचनी 'बाबा' कहि-कहि जाहिं।।”
यहाँ कवि के लिए वृद्धावस्था का सबसे बड़ा संकेत शारीरिक जर्जरता नहीं, बल्कि प्रेम-दृष्टि से वंचित हो जाना है। इसीलिए यह दोहा केवल हास्य नहीं, बल्कि मानवीय मनोविज्ञान का भी सूक्ष्म उद्घाटन है। भारतीय काव्य-परंपरा में स्त्री की सत्ता केवल उसके रूप तक सीमित नहीं रही; वह प्रेम, प्रेरणा, सृजन और जीवन-सौंदर्य की केंद्रस्थ शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है। फिर भी विभिन्न युगों के साहित्य में तत्कालीन सौंदर्य-बोध के अनुरूप स्त्री-अंगों के विविध आदर्श निर्मित हुए। अपभ्रंश साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि हेमचंद्र के यहाँ एक रोचक प्रसंग मिलता है। उनकी नायिका अपने अल्प-विकसित स्तनों के कारण स्वयं को प्रिय के प्रेम से वंचित अनुभव करती है। अनेक प्रयत्नों के उपरांत जब उसके स्तन अत्यंत उन्नत हो जाते हैं, तब वही उसके मिलन में बाधा बनने लगते हैं और वह अपने ही अंगों को उलाहना देती है—
“अइ तुगत्तणु जंग थणहं, सो छेदउ, न हु लाहु।
सहि जइ केम्वइ, तुडि-वसेण अहरि पहुच्चइ नाहु।।”
यह प्रसंग वस्तुतः तत्कालीन सौंदर्य-कल्पना की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रवृत्ति का परिचायक है, जहाँ शारीरिक सौंदर्य को काव्यात्मक विस्तार देने के लिए कल्पना अपनी चरम सीमा तक पहुँच जाती है। प्रेम और सौंदर्य का संबंध शाश्वत है। सौंदर्य प्रेम का प्राण है और मनुष्यता उसकी आत्मा। दोनों मिलकर मानवीय चेतना के ऐसे उज्ज्वल आयाम निर्मित करते हैं, जिनसे साहित्य की संवेदनात्मक भूमि उर्वर होती है। प्रेम और रूप-सौंदर्य के अद्वितीय चितेरे मैथिल-कोकिल विद्यापति ने नायिका के अंग-सौंदर्य का वर्णन करते हुए उसके पीन पयोधरों को प्रकृति के विराट बिंबों से जोड़ दिया है। वे लिखते हैं—
“पीन पयोधर दूबरि गता।
मेरू उपजल कतक-लता।।
ए कान्हु ए कान्हु तोरि दोहाई।
अति अपूरूप देखलि साईं।।”
यहाँ दुबली-पतली नायिका के उन्नत स्तनों की तुलना मेरु पर्वत पर उगी हुई लता से की गई है। इस उपमा में शरीर की मांसलता से अधिक उसकी सौष्ठवपूर्ण संरचना और सौंदर्य का काव्यात्मक विस्तार निहित है। विद्यापति सद्यःस्नाता नायिका के सौंदर्य-वर्णन में विशेष सिद्धहस्त माने जाते हैं। स्नान से अभी-अभी निकली नायिका के रूप का चित्रण करते हुए वे लिखते हैं—
“कामिनि करत सनाने। हेरितहि हृदय हनय पंचबाने।।
चिकुर गरए जलधारा। जनि मुख ससि डर रोअए अंधकारा।।
कुचजग चारु चकेवा। निज कुल मिलि आन कौन देवा।।
ते शंका भुज पासे। बांधि धएल उडि जाएत अकासे।।”
इस चित्रण में भी कवि का उद्देश्य स्थूल देह-वर्णन नहीं, बल्कि स्नान के उपरांत प्रकृति और नायिका के रूप के बीच अद्भुत सामंजस्य स्थापित करना है। जल से भीगे केश, चंद्रमुख, चक्रवाक-युगल की उपमा से विभूषित कुच और उन्हें बाँहों में समेट लेने की कल्पना। ये सभी मिलकर शृंगार-रस की ऐसी सौंदर्यपरक संरचना निर्मित करते हैं, जिसमें प्रकृति, प्रेम और मानवीय रूप एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यही विद्यापति की काव्य-कला की विशिष्टता है कि उनके यहाँ रूप-वर्णन केवल दृश्य नहीं रहता, बल्कि संवेदना, संगीत और सौंदर्य का समन्वित अनुभव बन जाता है। प्रेमानुभूति से आलोकित नेत्रों में प्रिय का रूप सदैव असाधारण दीप्ति के साथ उभरता है। प्रेम जब काव्य बनता है, तब सौंदर्य केवल दृश्य नहीं रहता, बल्कि अनुभूति का विस्तार बन जाता है। भक्तिकाल के महान सूफ़ी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत में पद्मावती के नख-शिख वर्णन के माध्यम से इसी सौंदर्य-दृष्टि का अत्यंत कलात्मक निर्वाह किया है। उनके यहाँ नायिका के उन्नत वक्षस्थल का चित्रण प्रत्यक्षता से अधिक उपमानों और रूपकों के सहारे सम्पन्न होता है। वे पद्मावती के कुचों की तुलना कभी अनार और अंगूर की सुषमा से करते हैं, तो कभी उन्हें हृदयरूपी थाल में रखे स्वर्ण-लड्डुओं के समान कल्पित करते हैं—
“हिया थार कुच कंचन लाडू।
कनक कचोर उठे करि चाडू॥”

इस उपमा में देह-वर्णन से अधिक मध्यकालीन काव्य-सौंदर्य की कल्पनाशीलता और अलंकारिक वैभव का परिचय मिलता है। भारतीय काव्य-परंपरा में नख-शिख वर्णन केवल शारीरिक संरचना का विवरण नहीं, बल्कि सौंदर्यशास्त्रीय अभिव्यक्ति की एक विशिष्ट विधा है। विभिन्न भाषाओं के कवियों ने अपनी-अपनी काव्य-दृष्टि और सांस्कृतिक संवेदना के अनुरूप नायिका के केश, ललाट, नेत्र, अधर, बाहु, वक्षस्थल, त्रिवली, नाभि, रोमावली, नितम्ब, जंघा, चरण तथा अन्य अंगों का चित्रण किया है। इनमें वक्षस्थल विशेष रूप से आकर्षण, यौवन और स्त्री-सौंदर्य का प्रमुख बिंब बनकर उभरता है। संभवतः इसी कारण भारतीय काव्य-परंपरा में स्तनों को स्त्री-सौंदर्य की पूर्णता और गरिमा के महत्त्वपूर्ण प्रतीकों में गिना गया है। रीतिकालीन काव्य का अध्ययन करते हुए मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ है कि उस युग की नायिकाएँ यथार्थ से अधिक कल्पना की सृष्टि हैं। अतिशयोक्ति वहाँ केवल अलंकार नहीं, बल्कि काव्य-शिल्प का स्वाभाविक उपकरण है। विरह में वे इतनी क्षीण हो जाती हैं कि उनकी उँगली की अँगूठी बाँह से सरकती हुई कमर तक पहुँच जाती है; श्वासों के उतार-चढ़ाव से उनका शरीर कई हाथ आगे-पीछे होता हुआ प्रतीत होता है। दूसरी ओर संयोग अथवा यौवन-वर्णन में वही नायिकाएँ ऐसी दीप्तिमयी दिखाई देती हैं कि उनके अंग-अंग से मानो प्रकाश फूट रहा हो। इस प्रकार रीतिकालीन कविता में देह केवल शरीर नहीं, बल्कि कल्पना के आलोक से प्रकाशित एक सौंदर्य-बिंब है। घनानंद ने प्रेम की तीव्रता और यौवन की आभा को जिस भाव-सघनता से चित्रित किया है, वह रीतिकालीन काव्य की विशिष्ट उपलब्धि है। उनके यहाँ छलकते यौवन का उल्लेख केवल रूप-वर्णन नहीं, बल्कि प्रेम की आंतरिक व्याकुलता का भी संकेत है। किंतु यदि स्तनों के कलात्मक चित्रण की बात की जाए, तो बिहारी का स्थान निःसंदेह अद्वितीय है। जहाँ फ़ारसी और उर्दू काव्य में वक्षस्थल के लिए 'गुंबद' जैसे उपमान मिलते हैं, वहीं बिहारी उसे पर्वत-शिखरों की ऊँचाई और गरिमा से जोड़ते हैं। उनका प्रसिद्ध दोहा है—
“कुचगिरि चढ़ि अति थकित ह्वै चली डीठि मुँह चाड़।
फिरि न टरी, परि रहि गई, परी चिबुक की गाड़।।”
यहाँ कवि ने दृष्टि को मानवीकृत करते हुए उसे स्तनरूपी पर्वत पर चढ़ने वाली पथिका के रूप में चित्रित किया है, जो थककर अंततः ठोड़ी के समीप ठहर जाती है। यह रीतिकालीन अलंकार-योजना और कल्पना-वैभव का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। ऐसे काव्य-वर्णनों का अपना ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सौंदर्यशास्त्रीय संदर्भ है। उन्हें उनके समय और काव्य-परंपरा के भीतर समझना आवश्यक है। फिर भी एक शोधार्थी और पाठक के रूप में मेरे मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। जब विद्यार्थी—विशेषकर छात्राएँ—इन वर्णनों का अध्ययन करती होंगी, तब वे इन्हें किस दृष्टि से ग्रहण करती होंगी? क्या वे इन्हें केवल काव्य-सौंदर्य के रूप में पढ़ती हैं, या इनके भीतर निहित पुरुष-केंद्रित दृष्टि पर भी विचार करती हैं? क्या हमारे पाठ्यक्रमों के निर्माण में महिला विदुषियों और अध्यापिकाओं की पर्याप्त सहभागिता सुनिश्चित होती है? क्या काव्यशास्त्रीय परंपरा के साथ-साथ स्त्री-दृष्टि, आधुनिक आलोचना और समकालीन संवेदनाओं को भी समान महत्त्व दिया जाता है? ऐसे प्रश्न किसी साहित्यिक विरासत को अस्वीकार करने के लिए नहीं, बल्कि उसे अधिक व्यापक, बहुआयामी और समावेशी दृष्टि से समझने के लिए आवश्यक हैं। साहित्य का दायित्व केवल परंपरा का संरक्षण नहीं, बल्कि समयानुकूल पुनर्पाठ की संभावनाओं को भी जीवित रखना है। नायिकाओं के गोपनीय अंगों का बार-बार किया गया वर्णन पाठक की कल्पना में उनकी दृश्यात्मक उपस्थिति निर्मित करता है। साहित्य-मनोविज्ञान की दृष्टि से यह स्वाभाविक है कि शब्दों से निर्मित बिंब पाठक के मानस पर प्रभाव डालते हैं। इसी कारण मैं ऐसे अनेक वर्णनों को 'पोर्नोग्राफिक इमेजरी' की श्रेणी में रखता हूँ, जहाँ स्त्री का व्यक्तित्व पीछे छूट जाता है और उसका शरीर ही दृष्टि का केंद्र बनकर रह जाता है। ऐसे पाठों को पढ़ते समय अनेक बार यह अनुभव होता है कि बाज़ारवादी संस्कृति ने स्त्री को मनुष्य से अधिक उपभोग की वस्तु में रूपांतरित कर दिया है। साहित्यिक कल्पना के साथ-साथ समकालीन दृश्य-संस्कृति की अनेक छवियाँ भी अनायास स्मृति में उभर आती हैं, जहाँ लोकप्रियता और त्वरित प्रसिद्धि की आकांक्षा में स्त्री-देह का प्रदर्शन एक सांस्कृतिक प्रवृत्ति का रूप ले चुका है।
व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसे वर्णनों से यथासंभव दूरी बनाए रखना पसंद करता हूँ। संभव है, मेरी यह दृष्टि कुछ लोगों को अत्यधिक संवेदनशील अथवा एकांगी प्रतीत हो; किन्तु मुझे वह सौंदर्य अधिक आकर्षित करता है जो संकेत, मर्यादा और आंतरिक गरिमा से निर्मित हो। उदाहरण के लिए, वर्षा में भीगी हुई किसी नायिका का ऐसा चित्रण, जिसमें उसके अंतरंग अंगों को अनावश्यक रूप से उभारकर प्रस्तुत किया जाए, मुझे कलात्मक सौंदर्य की अपेक्षा देह-केंद्रित आकर्षण का उपकरण अधिक प्रतीत होता है। साहित्य की छवियाँ केवल पृष्ठों तक सीमित नहीं रहतीं; वे पाठक की स्मृति और कल्पना में भी लंबे समय तक जीवित रहती हैं। इसी संदर्भ को आगे प्रगतिवादी कवि केदारनाथ अग्रवाल के काव्य के माध्यम से समझा जा सकता है। स्वकीय और परकीय प्रेम की अनुभूतियों को प्रत्येक युग के कवियों ने अपनी-अपनी संवेदना और काव्य-दृष्टि के अनुरूप व्यक्त किया है। केदारनाथ अग्रवाल रूप-सौंदर्य और प्रकृति के अनन्य उपासक कवि हैं। उनकी कविता में स्त्री का शारीरिक सौंदर्य अनेक स्थलों पर अत्यंत सजीव और मांसल रूप में व्यक्त हुआ है—
“जहाँ कुएँ की जगत पर
मेरे घर के सामने
पानी भरने आती थीं
गोरी-साँवरि नारि अनेकों
गोरी रूप कमान समान तने तनवाली
प्रबल प्रेम की करती दृढ़ टंकार थी
और जहाँ मैं रात में
सपने के संसार में
दिन में जिन्हें कुमारी कहता और रात में प्रेमिका
जिन्हें अकेला सोता पाकर
मैं बाहों में कस लेता था
ओठों और कपोलों पर चुम्बन लेता था
अपना नाम कुचों पर जिनके
मीठे चुम्बन से लिखता था
जिनकी छाती बड़े से धक्-धक् करने लग जाती थी।”
इन पंक्तियों में प्रेम की निजी अनुभूति, स्मृति और शारीरिक आकर्षण का घनिष्ठ मेल दिखाई देता है। निस्संदेह, इनका सौंदर्यबोध अनेक पाठकों को प्रभावित कर सकता है; किंतु साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि जब ऐसे पाठ विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों के समक्ष रखे जाते हैं, तब उनकी ग्रहण-प्रक्रिया किन मानसिक और सांस्कृतिक प्रभावों से होकर गुजरती होगी। यह प्रश्न साहित्य की अभिव्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके अध्यापन और पाठकीय संदर्भ पर भी विचार करने की अपेक्षा रखता है। इसी प्रकार नब्बे के दशक के प्रकृतिप्रेमी कवि निलय उपाध्याय अपनी कविता 'ताजमहल' में बेड़न स्त्रियों के स्तनों की तुलना गुंबद से करते हुए लिखते हैं—
“गुंबदों के निर्माण में दक्ष कारीगर,
टर्की... बेड़न औरतों के स्तन पर बाहर से पड़ी नज़र,
अब तक रचित गुंबद नक्काशी में छोटे हो चुके थे।”

यह उपमा स्थापत्य और स्त्री-शरीर के बीच एक कलात्मक संबंध स्थापित करने का प्रयास करती है, किंतु इसके साथ यह प्रश्न भी जुड़ता है कि क्या स्त्री की देह को बार-बार उपमानों और रूपकों का विषय बना देना उसकी मानवीय अस्मिता को पर्याप्त स्थान देता है? समकालीन साहित्यिक आलोचना विशेषतः स्त्रीवादी विमर्श इसी प्रश्न को गंभीरता से उठाता है। वस्तुतः स्तनों का साहित्यिक वर्णन भारतीय काव्य-परंपरा में दो प्रमुख प्रवृत्तियों के रूप में विकसित हुआ है। एक ओर वात्सल्य, मातृत्व और जीवन-पोषण का भाव, तो दूसरी ओर शृंगार और देह-सौंदर्य का आलंबन। समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ शृंगार की अभिव्यक्ति स्त्री के व्यक्तित्व को विस्मृत कर केवल उसके शरीर तक सीमित हो जाती है। ऐसी स्थिति में सौंदर्य का उत्सव धीरे-धीरे वस्तुकरण की प्रक्रिया में परिवर्तित होने लगता है। यही कारण है कि आधुनिक नारीवादी आलोचना केवल रीतिकालीन कवियों की ही नहीं, बल्कि उन समकालीन रचनाकारों की भी समीक्षा करती है, जिनकी रचनाओं में स्त्री-देह का चित्रण उसकी चेतना, अनुभव और स्वायत्त अस्तित्व की अपेक्षा अधिक प्रमुख होकर उपस्थित होता है। साहित्य का उद्देश्य यदि मनुष्य की गरिमा का विस्तार है, तो स्त्री-सौंदर्य का चित्रण भी उसी गरिमा, संवेदनशीलता और मानवीय सम्मान के साथ किया जाना चाहिए। छायावाद मूलतः प्रेम, करुणा, वेदना और आत्मानुभूति का काव्य है। इस युग के कवियों ने शृंगार को स्थूल देह-चित्रण के स्थान पर सूक्ष्म भाव-जगत और आध्यात्मिक संवेदना से जोड़ने का प्रयास किया। फिर भी, जहाँ-जहाँ नारी-सौंदर्य का चित्रण हुआ है, वहाँ उसकी देह भी सांकेतिक रूप से उपस्थित हुई है। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी के 'श्रद्धा' सर्ग में श्रद्धा के सौंदर्य का चित्र उपस्थित करते हुए लिखा है—
“नील परिधान बीच सुकुमार,
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल,
मेघवन बीच गुलाबी रंग।।”
इन पंक्तियों की अनेक व्याख्याएँ संभव हैं। छायावादी काव्य की सांकेतिकता को ध्यान में रखते हुए इसे केवल देह-वर्णन मान लेना उचित नहीं होगा; फिर भी अभिधात्मक स्तर पर यह नायिका के आंशिक रूप से उद्घाटित सुकुमार अंगों का बिंब उपस्थित करता है। यही वह बिंदु है जहाँ कविता पाठक की कल्पना को सक्रिय करती है। प्रत्येक पाठक अपनी संवेदना, संस्कार और सौंदर्य-दृष्टि के अनुरूप इन पंक्तियों का अर्थ ग्रहण करता है। साहित्य की शक्ति भी इसी में निहित है कि वह प्रत्यक्ष से अधिक अप्रत्यक्ष और संकेत से अधिक अनुभूति का संसार रचता है। प्रसाद की इस अभिव्यक्ति की तुलना यदि रीतिकालीन कवि पद्माकर की इन पंक्तियों से की जाए—
“अधखुली कंचुकी उरोज अध-आधे खुले,
अधखुले वेष नख-रेखन के झलकैं।”
—तो दोनों युगों की काव्य-दृष्टि का स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। पद्माकर का वर्णन प्रत्यक्ष, देहप्रधान और मांसल है, जबकि प्रसाद का चित्रण ध्वन्यात्मक, सांकेतिक और सौंदर्यबोध से अनुप्राणित है। दोनों कवि नारी-सौंदर्य का चित्रण करते हैं, किन्तु उनकी काव्य-भाषा और अभिव्यक्ति की प्रकृति भिन्न है। भारतीय काव्य-परंपरा में नायिका के सौंदर्य और उसके यौवन के साथ उरोजों का उल्लेख प्रायः जुड़ा रहा है। यौवनारूढ़ नायिका के उन्नत वक्षस्थल को रूप-माधुर्य और आकर्षण का संकेत माना गया, जबकि आयु के परिवर्तन के साथ वही सौंदर्य समय की स्वाभाविक गति के अधीन रूपांतरित होता है। वस्तुतः रूप का आकर्षण भी मनुष्य के जीवनानुभवों के साथ बदलता है। परिपक्वता के साथ सौंदर्य की अवधारणा बाह्य रूप से आगे बढ़कर व्यक्तित्व, संवेदना और आत्मिक गुणों तक पहुँचती है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में यही परिवर्तन आसक्ति से विरक्ति और भोग से बोध की यात्रा के रूप में भी देखा गया है। विश्व-साहित्य की भाँति हिंदी साहित्य में भी नायिका की विविध अवस्थाओं के अनुरूप उसके रूप-वर्णन की समृद्ध परंपरा रही है। आदिकाल में विद्यापति ने यौवन और प्रेम के सौंदर्य को अत्यंत कलात्मक ढंग से व्यक्त किया, जबकि रीतिकाल में बिहारी ने मुक्तक काव्य के माध्यम से नारी-सौंदर्य के अनेक सूक्ष्म बिंब रचे। इसी संदर्भ में एक विद्यार्थी ने मुझसे विनोदपूर्ण ढंग से प्रश्न किया था—“बिहारी की कविता में कितने प्रकार के स्तनों का वर्णन मिलता है?” पहली दृष्टि में यह प्रश्न हास्यपूर्ण प्रतीत होता है, किंतु साहित्यिक दृष्टि से यह विचारणीय भी है। भारतीय काव्यशास्त्र ने नायिका के अनेक भेद निर्धारित किए हैं। नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने वासकसज्जा, विरहोत्कंठिता, स्वाधीनपतिका, कलहांतरिता, खंडिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका और अभिसारिका—ये आठ प्रकार बताए हैं। अग्निपुराण में स्वकीया, परकीया, पुनर्भू और सामान्या आदि भेदों का उल्लेख मिलता है। ये वर्गीकरण नायिका की मनःस्थिति, सामाजिक स्थिति और व्यवहारगत विशेषताओं पर आधारित हैं; इनमें उसके शरीर के अंगों का पृथक् वर्गीकरण नहीं किया गया है। हाँ, आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान और शरीर-विज्ञान स्तनों की बनावट एवं आकार के आधार पर विभिन्न प्रकारों का उल्लेख अवश्य करते हैं, किंतु वह साहित्यिक नहीं, चिकित्सकीय वर्गीकरण है। अतः उसे काव्यशास्त्रीय विमर्श से जोड़ना उचित नहीं होगा।
बिहारी जैसे मुक्तक-कवि का उद्देश्य भी किसी शारीरिक वर्गीकरण का प्रतिपादन नहीं था। वे नायिका के मनोभाव, यौवन, संकोच, अनुराग और रूप-सौंदर्य को अलंकारिक भाषा में व्यक्त करते हैं। उनके दोहों में उरोजों का स्वरूप किसी निश्चित श्रेणी का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि प्रत्येक प्रसंग में वह नायिका की तत्कालीन अवस्था, भाव-दशा और काव्य-परिस्थिति के अनुरूप रूपायित होता है। इसीलिए बिहारी की कविता को शरीर-विज्ञान की कसौटी पर नहीं, बल्कि काव्य-सौंदर्य, ध्वनि, रस और अलंकार की दृष्टि से पढ़ना अधिक उपयुक्त है। स्त्री और पुरुष दोनों अपनी-अपनी अपूर्णताओं में एक-दूसरे के पूरक हैं। यही अपूर्णता उन्हें परस्पर आकर्षित करती है और उनके संबंधों को अर्थवत्ता प्रदान करती है। स्त्री अपने व्यक्तित्व की संभावनाओं को पुरुष के सहचर्य में विस्तृत करती है, तो पुरुष भी स्त्री की संवेदना, करुणा और सृजनात्मक ऊर्जा से अपने अस्तित्व को अधिक पूर्ण अनुभव करता है। इस प्रकार प्रेम केवल दो व्यक्तियों का भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि परस्पर पूरकता की वह प्रक्रिया है, जो परिणय के पथ पर दोनों को व्यापक मानवीय पूर्णता की ओर अग्रसर करती है। विडंबना यह है कि दीर्घकाल तक पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री के बहुआयामी व्यक्तित्व को उसकी देह तक सीमित कर दिया। परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि, संवेदना, सृजनशीलता और वैचारिक सामर्थ्य की अपेक्षा उसके शारीरिक रूप पर अधिक बल दिया गया। अलंकार जिस प्रकार स्त्री को सुशोभित करते हैं, उसी प्रकार उसकी देह, विशेषतः वक्षस्थल, पुरुष-कवि की दृष्टि का प्रमुख केंद्र बन गया। यही कारण है कि पुरुष-प्रधान साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला और चलचित्रों में स्त्री-देह का चित्रण बार-बार दिखाई देता है। अनेक रचनाओं में स्तन केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि यौवन, आकर्षण, मातृत्व और भाव-संचार के बहुस्तरीय प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। आदर्श प्रेम का मूल स्वर त्याग और समर्पण है। सौंदर्य का सच्चा उपासक केवल देह का नहीं, उसके भीतर स्पंदित आत्मीयता का भी साधक होता है। प्रेम अपनी रागात्मक ऊर्जा से जीवन और सृष्टि दोनों को सींचता है। वह स्वभावतः मुक्त है; उसमें बंधन की अपेक्षा विश्वास और स्वीकृति का अधिक स्थान है। लौकिक प्रेम का प्रारंभ भले ही देह से होता हो, पर उसकी पूर्णता आत्मिक संवाद में निहित रहती है। इसलिए देह प्रेम का अंतिम लक्ष्य नहीं, उसके अनुभव का प्रारंभिक माध्यम है। भारतीय कथा-साहित्य, नाटक और उपन्यासों में भी प्रेम की इस यात्रा को विविध रूपों में अभिव्यक्ति मिली है। अनेक रचनाकारों ने स्त्री-सौंदर्य के वर्णन में वक्षस्थल को आकर्षण, लज्जा, आत्मविश्वास और प्रेम के संकेतक के रूप में रूपायित किया है। यह रूपक कभी नायक के आकर्षण का कारण बनता है, तो कभी मानवीय संबंधों की जटिलता का। इतिहास और साहित्य दोनों इस तथ्य के साक्षी हैं कि स्त्री-सौंदर्य ने केवल प्रेम-कथाओं को ही नहीं, अनेक संघर्षों और त्रासदियों को भी जन्म दिया है। अतः सौंदर्य यहाँ मात्र रूप का विषय नहीं, बल्कि मानवीय इतिहास और मनोविज्ञान का भी एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इसी संदर्भ में कन्नड़ के सुप्रसिद्ध नाटककार गिरीश कारनाड के नाटक हयवदन का एक गीत उल्लेखनीय है—
“दोनों स्तनों पर एक-एक शीश,
दोनों आँखों के लिए एक-एक पुतली।
दोनों बाँहों से दोनों का
अलग-अलग आलिंगन,
जिसकी मुझे न लज्जा है, न चिंता।
धरती के अंतर में रक्त बरसता है,
आकाश में गीत की कोंपलें फूटती हैं।”
यह गीत केवल देह का चित्रण नहीं करता, बल्कि प्रेम, इच्छा, स्वामित्व, पहचान और मानवीय द्वंद्व की जटिलताओं को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करता है। हयवदन का पूरा कथानक इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान शरीर में है, बुद्धि में है या संवेदना में। प्रेम-काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रेम के अनेक स्तरों को अभिव्यक्त करता है। कहीं वह उन्मुक्त यौवन का उत्सव है, कहीं वैयक्तिक अनुभूतियों का मधुर संगीत और कहीं आत्मा की गहन साधना। जब यही प्रेम अपनी सीमित देहात्मकता का अतिक्रमण कर श्रद्धा और समर्पण का रूप धारण करता है, तब वह भक्ति में परिणत हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह प्रसिद्ध कथन—“श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है”—भारतीय काव्य-परंपरा के इसी रूपांतरण की ओर संकेत करता है। सूरदास, रसखान और मीराबाई का काव्य इस सत्य का सशक्त प्रमाण है, जहाँ प्रेम अंततः आध्यात्मिक अनुभव का पर्याय बन जाता है। लौकिक प्रेम की जटिलताओं को हयवदन जैसे नाटकों में भी गहन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। देवदत्त, कपिल और पद्मिनी का त्रिकोणात्मक संबंध केवल प्रणय-कथा नहीं, बल्कि शरीर, बुद्धि और मन के अंतर्विरोधों का रूपक है। प्रेम यहाँ आकर्षण जितना ही आत्मविनाश की संभावना भी बन जाता है। दूसरी ओर इतिहास ऐसे प्रसंगों का भी साक्षी है, जहाँ स्त्री ने अपनी देह को ही प्रतिरोध का माध्यम बनाया। केरल की नंगेली का प्रसंग इसका मार्मिक उदाहरण है। उन्नीसवीं शताब्दी में त्रावणकोर की अमानवीय 'स्तन-कर' व्यवस्था के विरोध में उन्होंने अपने स्तनों का बलिदान देकर मानवीय गरिमा और स्त्री-अधिकार की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की, जो भारतीय सामाजिक इतिहास में प्रतिरोध का अमिट प्रतीक बन चुकी है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में स्तनों का संबंध मुख्यतः दो प्रमुख आयामों से जोड़ा गया है—प्रेम और मातृत्व। प्रेम में वे आत्मीय निकटता का प्रतीक हैं, जबकि मातृत्व में जीवन-पोषण और वात्सल्य का। साहित्य ने इन दोनों आयामों को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त किया है। आधुनिक हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह ने इस संवेदना को अत्यंत सूक्ष्म और कलात्मक बिंबों में रूपायित किया है—
“आँखें अनझिप
खुलीं
वक्ष में।
स्तन
पुलक बन
उठते और
मुँदते।”
इसी प्रकार उनकी कविता 'गीली मुलायम लटें' में स्त्री-देह और प्रकृति का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है—
“गीली मुलायम लटें,
आकाश,
साँवलापन रात का गहरा सलोना,
स्तनों के बिंबित उभार लिए
हवा में बादल
सरकते चले जाते हैं,
मिटाते हुए
जाने कौन-से कवि को...”
शमशेर की इन पंक्तियों में देह का चित्रण स्थूल या उद्दीपक नहीं, बल्कि प्रकृति और मानवीय संवेदना के गहन सामंजस्य का सौंदर्यपूर्ण रूपक है। यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक कविता स्त्री-शरीर को मात्र आकर्षण का विषय न बनाकर अनुभूति, सौंदर्य और कलात्मक प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। वात्सल्य की भूमि पर पहुँचते ही ‘स्तन’ का अर्थ और उसका सांस्कृतिक आशय एकदम बदल जाता है। यहाँ वह न सौंदर्य का विषय रह जाता है, न शृंगार का; वह जीवन-पोषण, करुणा और मातृत्व का सबसे मार्मिक प्रतीक बन उठता है। मेरा आग्रह उन स्तनों की ओर है जो दारिद्र्य की कठोर मार से उघड़े, सूखे और समय से पहले मुरझा गए हैं; जो छाती पर त्वचा की ढीली थैली-से लटकते दिखाई देते हैं, फिर भी अपनी समस्त रिक्तता के भीतर एक भूखे शिशु के लिए असीम स्नेह सँजोए रहते हैं। उनमें दूध भले न बचा हो, किंतु ममता कभी समाप्त नहीं होती। ऐसी माँ अपने नवजात को दूध से अधिक सांत्वना पिलाती है; वह उसे अपनी छाती से लगाकर भूख से लड़ने का साहस देती है, और अंततः शिशु उसी ममता की गोद में भूखा ही सो जाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने निर्धन भारतीय मातृत्व की इसी करुण यथार्थ-छवि को अत्यंत मार्मिक शब्द दिए हैं—
“पर, शिशु का क्या हाल, सीख पाया न अभी जो आँसू पीना?
चूस-चूस सुखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना।”
इन पंक्तियों में स्तन केवल जैविक अंग नहीं, बल्कि अभाव और करुणा के बीच झूलते मातृत्व का जीवंत प्रतीक बन जाता है। माँ की असहायता और शिशु की निरीह भूख का यह चित्र हिंदी कविता के सबसे मर्मस्पर्शी बिंबों में गिना जा सकता है। वास्तव में श्रमशील और निर्धन माताएँ ही इस देश की जीवन-रेखा हैं। वे अपने श्रम, त्याग और वात्सल्य से समाज का भविष्य गढ़ती हैं। संसार की प्रत्येक माँ अपनी संतान के लिए समान रूप से पूजनीय है, क्योंकि शिशु को देखते ही उसके हृदय में ममता की नदी उमड़ पड़ती है। उसके स्तनों से केवल दूध ही नहीं, जीवन, विश्वास और प्रेम का अमृत प्रवाहित होता है। इसलिए भारतीय संस्कृति ने मातृत्व को देवत्व का दर्जा दिया है। माँ रूप-रंग में कैसी भी हो सकती है, किंतु उसका मातृत्व कभी कुरूप नहीं होता। इसी भाव को लोक में यह उक्ति व्यक्त करती है कि माता कुमाता नहीं होती। रामायण की कैकेयी भी अंततः राम की दृष्टि में माँ ही रहती हैं, घृणा की पात्र नहीं। प्रकृति और कोमल मानवीय संवेदनाओं के कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता ‘अप्सरा’ में मातृत्व की इसी दिव्यता को अत्यंत मधुर शब्दों में अंकित किया है—
“शैशव की तुम परिचित सहचरि,
जग से चिर अनजान।
नव-शिशु के संग छिप-छिप रहती,
तुम, माँ का अनुमान;
डाल अँगूठा शिशु के मुँह में
देती मधु-स्तन-दान,
छिपी थपक से उसे सुलाती,
गा-गा नीरव-गान।”
यहाँ ‘मधु-स्तन-दान’ केवल स्तनपान का उल्लेख नहीं है; वह माँ के निष्काम समर्पण और जीवनदायिनी करुणा का काव्यात्मक रूपक है। पंत के लिए मातृत्व प्रकृति की सबसे पवित्र और मौन अभिव्यक्ति है। यदि हिंदी साहित्य में वात्सल्य रस की पराकाष्ठा किसी कवि के यहाँ दिखाई देती है, तो वे सूरदास हैं। उनके काव्य में माता यशोदा और बालकृष्ण का संबंध केवल माता-पुत्र का नहीं, बल्कि अनंत प्रेम का शाश्वत प्रतीक बन जाता है। यशोदा अपने आँचल की ओट में कृष्ण को स्तनपान कराती हैं; इस दृश्य में मातृत्व, संरक्षण और आत्मीयता एकाकार हो उठते हैं—
“किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।।
मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबैं धावत॥
कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरने चाहत।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति।।
बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति॥”

इस दृश्य में स्तन मातृत्व का परम पवित्र प्रतीक बनकर उपस्थित है। यशोदा का आँचल केवल शरीर नहीं ढँकता, वह वात्सल्य की मर्यादा, सुरक्षा और स्नेह का भी आवरण है। सूरदास की दृष्टि में स्तनपान जैविक क्रिया नहीं, बल्कि प्रेम का वह अद्वितीय संस्कार है जिसके माध्यम से माँ अपने अस्तित्व का अंश शिशु में प्रवाहित करती है। इसी कारण वात्सल्य-काव्य में स्तन का बिंब शृंगार से सर्वथा पृथक होकर करुणा, पोषण और जीवन के उत्सव का प्रतीक बन जाता है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्य में ‘स्तन’ का बिंब केवल शारीरिक सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि समय, समाज और साहित्यिक दृष्टियों के परिवर्तन का सशक्त सांस्कृतिक संकेतक है। वैदिक साहित्य में यह पोषण और मातृत्व, संस्कृत तथा रीतिकाव्य में सौंदर्य और शृंगार, भक्ति साहित्य में वात्सल्य, आधुनिक साहित्य में स्त्री-अस्मिता, श्रम, पीड़ा और प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरता है। अतः इसका मूल्यांकन किसी एक दृष्टि से नहीं किया जा सकता। साहित्य की मानवीय कसौटी यही है कि वह स्त्री को केवल देह नहीं, बल्कि संवेदना, सृजन, आत्मसम्मान और जीवनदायिनी चेतना के रूप में प्रतिष्ठित करे। यही भारतीय साहित्य की व्यापक मानवीय दृष्टि और उसकी स्थायी सांस्कृतिक उपलब्धि है।
★★★
निबंधकार: गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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