Golendra Gyan

Monday, 9 February 2026

कहानी:: वर्ण से आगे || लेखक:: गोलेन्द्र पटेल

कहानी:: वर्ण से आगे
लेखक:: गोलेन्द्र पटेल


पहला अंक: सभा में बोला गया नाम (एक समकालीन वैदिक कथा)

हस्तिनापुर के बाहरी भाग में स्थित था निक्षेप-गृह “धनवेध”।
यज्ञ नहीं होते थे वहाँ,
पर लेन–देन की अग्नि दिन-रात जलती रहती थी।
उस दिन सभा असामान्य रूप से भरी हुई थी।
काउंटर के पीछे बैठी थी शिखंडी राठौरी—
युवती, शिक्षित, संयमी।
वह वर्षों से धनवेध में कार्यरत थी।
सामने खड़े थे श्रुतकीर्ति त्रिपाठी—
माथे पर तिलक, वाणी में अधीरता।
उनके साथ थीं उनकी पत्नी सावित्री त्रिपाठी,
जो उसी निक्षेप-गृह की लेखाकार थीं
और आज उनका अंतिम कार्य-दिवस था।
“त्याग-पत्र की प्रक्रिया इतनी विलंबित क्यों?”
श्रुतकीर्ति का स्वर प्रश्न नहीं, आदेश था।
शिखंडी ने शांति से कहा—
“प्रविष्टि शेष है, आर्य। नियम सबके लिए समान हैं।”
श्रुतकीर्ति हँसे—
“नियम? हम वे हैं जो नियम समझाते हैं।”
सभा में खड़े लोग चुप रहे।
चुप्पी—सदैव की तरह—सत्ता के पक्ष में थी।
सावित्री ने धीरे से कहा—
“स्वामी, छोड़ दीजिए… मुझे देर नहीं।”
पर अहंकार को विराम कहाँ।
श्रुतकीर्ति का स्वर तीखा हुआ—
“कुछ लोग अपनी मर्यादा भूल जाते हैं।”
यही वह क्षण था
जब शिखंडी ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“मर्यादा वाणी की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
श्रुतकीर्ति ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
सभा में सन्नाटा छा गया।
शिखंडी ने उत्तर दिया—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
क्षण भर की नीरवता।
फिर उसने कहा—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
बस इतना।
न कोई गर्जना,
न कोई धमकी।
पर जैसे किसी ने
सभा के भीतर छिपे दोहरे नियमों को उजागर कर दिया हो।
श्रुतकीर्ति हँसे—
“तभी यह साहस।”
शिखंडी का स्वर स्थिर रहा—
“साहस नहीं—अनुभव।”
“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो छात्रवृत्ति नहीं।
गुरुकुल गई—तो सर्वोच्च मापदंड।
सेवा हेतु आवेदन किया—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में खड़े एक वृद्ध ने कहा—
“यदि पहचान पूछी जाती है हर द्वार पर,
तो उसे बोलना अपराध कैसे?”
श्रुतकीर्ति मौन थे।
पर कथा वहाँ समाप्त नहीं हुई।
★★★


कट टू: जनसभा–ए–डिजिटल
किसी ने आधे संवाद का अंश
ताम्र-पट पर अंकित कर प्रसारित कर दिया।
संदर्भ गायब था।
निर्णय तैयार।
घोषणाएँ गूँजने लगीं—
“अहंकार!”
“दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“इस युग में वर्ण नहीं”—
आज वही सबसे ऊँची आवाज़ थे।
कोई बोला—
“यदि उसने कहा होता—‘मैं वंचित हूँ’—तो साहस होता।”
कोई बोला—
“यदि कहा होता—‘संविधान की संतान’—तो सम्मान।”
पर उसने कहा था बस—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
और यही असह्य ठहरा।
★★★


शिखंडी का पक्ष
शिखंडी ने सभा के बाहर कहा—
“जिस राज्य में
हर दस्तावेज़ में वर्ण पूछा जाता है,
हर अवसर पर पहचान माँगी जाती है,
वहाँ अपने नाम के साथ
अपना वर्ण कहना अपराध कैसे हो गया?
मुझे बार-बार बताया गया
कि मैं कौन हूँ।
आज यदि मैंने स्वयं कह दिया—
तो यह अहंकार कैसे?”
★★★


अंतिम दृश्य
धनवेध के अधिपति की मेज़ पर ताम्र-पत्र रखा गया।
“जाँच होगी।”
शिखंडी ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“मेरी नहीं—
उस व्यवस्था की जाँच होनी चाहिए
जो वर्ण से लाभ लेती है
और सत्य से भय खाती है।”
द्वार बंद हुआ।
बाहर लोग थे—
कुछ समर्थन में,
कुछ विरोध में।
पर निष्कर्ष स्पष्ट था—
यह युद्ध ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय का नहीं।
यह युद्ध है—
चयनात्मक नैतिकता
और
सुविधाजनक आक्रोश
के बीच।
और इस युग का सबसे बड़ा अपराध—
अपने नाम के साथ सच बोल देना।
★★★


दूसरा अंक : “वर्ण का उच्चारण”(ब्राह्मण बनाम ठाकुर)

1. सभा-गृह “अर्थनिधि”

हस्तिनापुर के दक्षिणी छोर पर स्थित था
अर्थनिधि सभा-गृह—
जहाँ धन नहीं,
विश्वास जमा किया जाता था।
काष्ठ-स्तंभों के बीच बैठी थी
वीरजा सिंहदत्ता।
क्षत्रिय कुल में जन्मी,
पर वर्षों से उसने अपने वर्ण से अधिक
अपने कर्म पर भरोसा किया था।
सामने खड़े थे
देवव्रत उपाध्याय—
श्रुतियों के ज्ञाता,
वाणी में शास्त्र,
और व्यवहार में अधीरता।
उनकी पत्नी शारदा उपाध्याय
उसी सभा-गृह की गणनाकार थीं।
आज उनका अंतिम दिवस था।
★★★


2. टकराव
“गणना-पत्र अब तक पूर्ण क्यों नहीं?”
देवव्रत ने पूछा।
वीरजा ने शांति से कहा—
“नियमों के अनुसार प्रक्रिया चल रही है, आर्य।”
देवव्रत मुस्कराए—
“नियम?
हमने ही तो नियम गढ़े हैं।”
सभा में बैठे लोग चुप रहे।
ब्राह्मण की वाणी—अक्सर प्रश्न नहीं होती,
निर्णय होती है।
शारदा ने धीरे से कहा—
“स्वामी, विवाद न बढ़ाइए…”
पर देवव्रत का स्वर तीखा हो गया—
“कुछ लोग अपनी सीमा भूल जाते हैं।”
वीरजा ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“सीमा कर्म की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
देवव्रत ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
★★★


3. नाम का उच्चारण

क्षण भर का सन्नाटा।
फिर वीरजा बोली—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
सभा सिमट आई।
“मैं ठाकुर हूँ।
क्षत्राणी।”
बस इतना।
न ललकार।
न धमकी।
पर जैसे सभा-गृह में
पुराने समीकरण हिल गए हों।
देवव्रत हँस पड़े—
“तभी यह अकड़।”
वीरजा का स्वर स्थिर था—
“इसे अकड़ मत कहिए।
इसे हिसाब कहिए।”
★★★

4. क्षत्रिय का हिसाब

“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो सहायता नहीं।
गुरुकुल पहुँची—तो सबसे ऊँचा मापदंड।
सेवा-पत्र भरा—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में एक वृद्ध क्षत्रिय बोला—
“जब हर द्वार पर वर्ण पूछा जाता है,
तो उसे बोल देना अपराध कैसे?”
देवव्रत चुप थे।
पर मौन भी एक पक्ष होता है।
★★★


5. ब्राह्मण का प्रतिवाद

देवव्रत ने कहा—
“वर्ण बोलना नहीं,
वर्ण का रौब दिखाना दोष है।”
वीरजा ने उत्तर दिया—
“और वर्ण का लाभ लेना?
वह दोष नहीं?”
“आप कहते हैं—
देश में वर्ण नहीं।
पर हर दस्तावेज़ में
पहला प्रश्न यही है—
‘तुम कौन हो?’”
सभा में फुसफुसाहट फैल गई।
★★★


6. अधूरी कथा

उसी समय
किसी ने सभा का अधूरा संवाद
ताम्र-पट पर उतार लिया।
बस इतना लिखा गया—
“मैं ठाकुर हूँ।”
बाक़ी सब—
हटा दिया गया।
अगले ही दिन
जनसभा में घोषणाएँ होने लगीं—
“सामंती अहंकार!”
“क्षत्रिय दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“वर्ण कहना गर्व है”—
आज वही बोले—
“यह ज़हर है।”
★★★


7. अंतिम दृश्य

अर्थनिधि के अधिपति ने कहा—
“जाँच होगी।”
वीरजा ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“यह जाँच मेरी नहीं,
उस व्यवस्था की हो
जो ब्राह्मण को ‘परंपरा’ कहकर
और ठाकुर को ‘अहंकार’ कहकर
एक ही शब्द को
दो अलग अर्थ देती है।”
द्वार बंद हुआ।
★★★


8. निष्कर्ष

यह युद्ध
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का था—
पर तलवारों का नहीं।
यह युद्ध था—
वर्ण बोलने की आज़ादी
बनाम
वर्ण से लाभ लेने की चुप्पी
और इस युग में
सबसे बड़ा अपराध यही है—
अपने नाम के साथ
सच का उच्चारण।
★★★


तीसरा अंक : “बहुजन का प्रश्न”(ब्राह्मण, ठाकुर बनाम बहुजन दृष्टि)
1. जब बहस ऊँचाई पर अटक जाती है
नगर-सभा में फिर भीड़ थी।
मंच पर दो ध्रुव साफ़ थे—
एक ओर
देवव्रत उपाध्याय—
शास्त्र, परंपरा और मर्यादा की बात करते हुए।
दूसरी ओर
वीरजा सिंहदत्ता—
सम्मान, कर्म और समान अवसर की भाषा में।
सभा तालियों और आरोपों में बँटी हुई थी।
पर भीड़ के पीछे,
जहाँ कोई मंच नहीं होता,
वहाँ खड़ा था
कालू नायक।
ना शास्त्री।
ना क्षत्रिय।
बहुजन।
★★★


2. बहुजन का प्रवेश

कालू धीरे-धीरे आगे आया।
न उसकी आवाज़ ऊँची थी,
न शब्द सजावटी।
उसने पूछा—
“क्या मैं भी कुछ कह सकता हूँ?”
सभा रुकी।
पहली बार यह प्रश्न
किसी ब्राह्मण या ठाकुर ने नहीं,
बहुजन ने पूछा था।
★★★


3. सवाल जो असहज करते हैं

कालू बोला—
“आप दोनों लड़ रहे हैं
कि वर्ण बोलना सही है या ग़लत।
पर मेरा प्रश्न अलग है—
जिस वर्ण को बोलने की ताक़त भी नहीं,
उसका क्या?”
लोग चुप।
“जब ब्राह्मण कहता है—
‘वर्ण हमारी पहचान है’
तो उसे संस्कृति कहते हैं।
जब ठाकुर कहता है—
‘वर्ण मेरी गरिमा है’
तो उसे अहंकार कहते हैं।
और जब बहुजन कुछ कहे—
तो उसे
‘राजनीति’
या ‘आरक्षण का लालच’ कह दिया जाता है।”
★★★


4. बहुजन का यथार्थ

“मैं उस समाज से हूँ,”
कालू ने कहा,
“जहाँ—
नाम से पहले जाति लगाओ, तो अपमान
नाम से जाति हटाओ, तो पहचान गुम
आगे बढ़ो, तो ‘कोटा’
पीछे रहो, तो ‘कर्मफल’”
उसने दोनों की ओर देखा—
“आप दोनों का संघर्ष
ऊपर की सीढ़ियों पर है।
हम तो
सीढ़ी बनाने वालों में हैं—
जिनका नाम कहीं लिखा नहीं।”
★★★


5. पहली दरार

वीरजा ने सिर झुकाया।
देवव्रत की उँगलियाँ थम गईं।
कालू ने कहा—
“समस्या यह नहीं कि
ब्राह्मण या ठाकुर कौन है।
समस्या यह है कि
निर्णय हमेशा वही करते हैं,
और कीमत हमेशा बहुजन चुकाता है।”
★★★


6. समरसता का अर्थ

“सामाजिक समरसता,”
कालू बोला,
“मतलब यह नहीं कि
हम सब एक जैसे बन जाएँ।
मतलब यह है कि—
कोई भी जन्म से बड़ा या छोटा न हो
अवसर वर्ण से नहीं, योग्यता से मिले
और इतिहास सिर्फ़ विजेताओं का न हो”
उसने साफ़ कहा—
“जब तक ब्राह्मण और ठाकुर
आपस में तय करेंगे
कि बहुजन को कितना दिया जाए—
तब तक बराबरी एक भाषण ही रहेगी।”
★★★


7. परिवर्तन की शुरुआत

देवव्रत ने पहली बार कहा—
“शायद शास्त्रों को
समय के प्रश्नों से
फिर पढ़ना होगा।”
वीरजा बोली—
“और सत्ता को
अपनी चुप्पियों का
हिसाब देना होगा।”
कालू ने सिर हिलाया—
“और बहुजन को
ख़ुद को ‘अनुग्रह’ नहीं,
अधिकार समझना होगा।”
★★★


8. नया संकल्प

सभा-गृह में एक प्रस्ताव रखा गया—
निर्णय समितियों में
बहुजन की बराबर भागीदारी
शिक्षा और सेवा में
समान मापदंड
और सबसे ज़रूरी—
सम्मान की भाषा
यह कोई क्रांति नहीं थी।
यह संतुलन था।
★★★


9. अंतिम दृश्य

सभा विसर्जित हुई।
कालू बाहर निकलते हुए बोला—
“आज आपने
ब्राह्मण बनाम ठाकुर से आगे
सोचना शुरू किया है।
यही समता की पहली सीढ़ी है।”
वीरजा और देवव्रत
दोनों ने पहली बार
एक साथ सिर हिलाया।
★★★


समापन

यह कथा किसी एक वर्ण की जीत नहीं है।
यह उस समाज की संभावना है—
जहाँ
ब्राह्मण ज्ञान के लिए सम्मानित हो,
ठाकुर जिम्मेदारी के लिए,
और बहुजन—
मनुष्य होने के लिए।
यहीं से
समतामूलक समाज शुरू होता है।

★★★

चौथा अंक : “जाति है—कि जाती नहीं”

1. आधुनिक भवन, प्राचीन मन

शहर के मध्य में खड़ा था
नवीनतम तकनीक से सुसज्जित
निजी वित्त संस्थान—
“आर्यावर्त कैपिटल बैंक”।

काँच की दीवारें थीं,
पर भीतर बैठे मन
अब भी पत्थर के थे।

काउंटर पर थी
सुचिता सामंती—
तेज़, प्रशिक्षित, समय की पाबंद।

आज उसका सामना था
रुचि त्रिपाठी से—
वरिष्ठ अधिकारी,
जिनका त्याग-पत्र
औपचारिकताओं में अटका था।
★★★

2. प्रक्रिया बनाम प्रभुत्व

“इतनी देर क्यों?”
रुचि का स्वर ऊँचा था।

सुचिता ने सुजाता से कहा—
“प्रक्रिया पूर्ण होते ही स्वीकृति मिलेगी, मैडम।”

शब्द सामान्य थे,
पर अर्थ को
अहंकार ने खींच लिया।

रुचि का चेहरा कठोर हुआ—
“तुम जानती हो, मैं कौन हूँ?”

बैंक-हॉल में
वही पुराना प्रश्न गूँजा
जो सदियों से गूँजता आया है।
★★★

3. पहचान का टकराव

सुचिता ने सिर उठाया—
“और आप जानती हैं,
मैं कौन हूँ?”

क्षण भर की नीरवता।

“मैं क्षत्रिय परिवार से हूँ,”
उसने कहा—
न गर्व में,
न धमकी में—
सिर्फ़ तथ्य की तरह।

यहीं से
संवाद फिसल गया।
★★★

4. पुरुष की मध्यस्थता—या साज़िश

घटना यहीं समाप्त हो सकती थी।
पर रुचि के पति
ऋषभ तिवारी 
ने इसे
सोशल माध्यमों पर
“जातीय अपमान”
शीर्षक से डाल दिया।

संवाद काटे गए।
संदर्भ हटाए गए।
और कथा
वायरल हो गई।

अब यह
दो स्त्रियों का टकराव नहीं,
“बाभन बनाम ठाकुर”
घोषित कर दी गई।
★★★

5. मानवतावादी हस्तक्षेप

उसी शाम
एक ऑनलाइन परिचर्चा में
एक आवाज़ उभरी—
नीलम नायक की।

न ऊँची,
न उत्तेजित।

उसने कहा—

“आप दोनों
अपनी-अपनी जाति की बात कर रही हैं।
पर क्या आपने
यह पूछा कि—

इस व्यवस्था में
स्त्री की जाति क्या है?”

लोग चुप।

“मनुस्मृति में
ब्राह्मण स्त्री भी
स्वतंत्र नहीं थी।
क्षत्रिय स्त्री भी
उत्तराधिकार से वंचित थी।

आप दोनों
जिस व्यवस्था पर गर्व कर रही हैं,
वहाँ आप
पूर्ण मनुष्य नहीं थीं।”
★★★

6. बाबासाहेब की याद

नीलम बोली—

“यदि आज
आप बैंक में बैठी हैं,
वेतन पा रही हैं,
निर्णय ले रही हैं—
तो वह
वर्ण व्यवस्था की देन नहीं।

वह देन है
डॉ. अंबेडकर की—
जिन्होंने
स्त्री को
धर्म से नहीं,
अधिकार से जोड़ा।”

हॉल में खामोशी थी।
★★★

7. असली प्रश्न

“असली सवाल यह नहीं,”
नीलम ने कहा,
“कि किसने
कौन-सी जाति बोली।

असली सवाल यह है—

जब बैंक का फॉर्म
आज भी जाति पूछता है,
जब समाज
आज भी जाति से आँकता है—
तो फिर
जाति बोलने पर
नैतिकता क्यों जागती है?”
★★★

8. निष्कर्ष

यह संघर्ष
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का नहीं था।

यह संघर्ष था—

जाति पर गर्व
बनाम
जाति से मुक्ति का।

और मानवतावादी दृष्टि
साफ़ कहती है—

जब तक
जाति पहचान का स्रोत रहेगी,
तब तक
स्त्री, श्रमिक और बहुजन
सिर्फ़ मोहरे रहेंगे।

जाति को
न गौरव चाहिए,
न गाली—
उसे चाहिए
विदाई।
★★★

9. अंतिम पंक्ति

नीलम ने कहा—

“जाति पूछने वाली व्यवस्था में
जाति बोलना अपराध नहीं।

अपराध है—
उस व्यवस्था को
हमेशा के लिए
बनाए रखना।”

और यहीं
कथा
वर्ण से आगे
वास्तव में
कदम रखती है।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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