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Golendra Gyan

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Monday, 28 September 2026

शिक्षा से होगा उद्धार || बहुजन मुख्यधारा की कविता || अर्जक कविता

शिक्षा से होगा उद्धार

मृत्यु स्वीकार है, दोस्त!
पर दासता स्वीकार नहीं करूँगा।
ईश्वर के आगे शीश झुकाकर
अपने विवेक की हत्या नहीं करूँगा!

तथागत बुद्ध से तर्क-प्रज्ञा का दीपक पाया,
करुणा, मैत्री, समता का मानवीय पथ अपनाया।
अशोक से सीखा—धम्म मनुष्य के कल्याण में हो,
सत्ता का हर निर्णय जनहित, न्याय और संविधान में हो।

रैदास ने मनुष्य-मनुष्य की समता का स्वप्न सजाया,
कबीर ने पाखंडों पर निर्भय प्रहार करना सिखाया।
तुकाराम की वाणी में श्रमशील जन की पीड़ा है,
बसवन्ना ने श्रम-सम्मान को जीवन की रीति कहा है।

अंधविश्वास के आगे
अपनी बुद्धि नहीं झुकाऊँगा,
जन्माधारित श्रेष्ठता के आगे
अपना आत्मसम्मान नहीं गँवाऊँगा!

ज्योतिबा फुले ने शिक्षा से अज्ञान का अंधकार मिटाया,
सावित्रीबाई ने स्त्री को ज्ञान और स्वाभिमान का अधिकार दिलाया।
शाहूजी ने सामाजिक न्याय का प्रश्न उठाया,
बाबा साहेब ने संविधान से समता का मार्ग दिखाया।

पेरियार ने तर्क की मशाल जलाकर रूढ़ियों को ललकारा,
रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक चेतना से शोषण को नकारा।
इन पुरखों की वैज्ञानिक चेतना लेकर चलता हूँ,
जहाँ प्रश्न उठता है, वहीं प्रश्न करता हूँ।

किसी शास्त्र, सत्ता या परंपरा के नाम पर
विवेक नहीं बेचूँगा,
किसी धार्मिक पहचान के दबाव में
अपने प्रश्न नहीं छोड़ूँगा।

नक्षत्रों को देव नहीं,
प्रकृति के नियमों में पढ़ता हूँ;
बिजली को देव-कोप नहीं,
भौतिक विज्ञान की भाषा में समझता हूँ।

रोग को पाप का फल कहकर
रोगी को नहीं सताऊँगा;
प्रमाण और परीक्षण जहाँ उपलब्ध हों,
वहीं अपना मत बनाऊँगा।

ग्रहण को राहु-केतु का खेल नहीं बताऊँगा,
खगोलीय घटना को विज्ञान की दृष्टि से समझूँगा।
प्रकृति के रहस्यों को प्रश्नों से परखूँगा,
प्रयोग, प्रमाण और तर्क से सत्य को खोजूँगा।

भाग्य के भरोसे बैठकर
श्रम का अपमान नहीं करूँगा,
मानव-निर्मित संकटों को
दैवी विधान नहीं कहूँगा।

अंधकार कितना भी गहरा हो,
तर्क का दीप जलाऊँगा;
अपने विवेक की हत्या
कभी नहीं करूँगा!

माना देवालयों में मिल सकते हैं
अवसर, पद और सम्मान अनेक,
पर अपनी कलम की कीमत लगाकर
नहीं लिखूँगा कोई झूठा लेख।

सत्य जानते हुए झूठ के पक्ष में
अपनी भाषा नहीं मोड़ूँगा,
सुविधा के लिए अपने विचारों से
कभी समझौता नहीं करूँगा।

जाति के आगे शीश झुकाना
मेरी रीति नहीं होगी,
जन्म से कोई ऊँचा-नीचा हो,
ऐसी मान्यता नहीं होगी।

मनुष्य की गरिमा
जन्म से निर्धारित नहीं होगी;
हर व्यक्ति को समान मानवाधिकार मिले,
यही सभ्यता की कसौटी होगी।

न जाति पूछूँगा, न धर्म 
न कुल का प्रमाण माँगूँगा,
न जन्माधारित श्रेष्ठता का
कोई विधान मानूँगा।

मनुष्य को मनुष्य समझना
मेरी पहली नैतिकता होगी;
मानवीय गरिमा से बड़ा
कोई जन्म-प्रमाण नहीं होगा!

झूठे गौरव के आगे
अपनी गरिमा नहीं गँवाऊँगा,
घृणा का उत्तर घृणा से नहीं,
तर्क और संवाद से दूँगा।

ईश्वर! आपके सम्मुख
मुझको कोई आसन नहीं चाहिए,
मंदिरों से मिला हुआ
झूठा अभिनंदन नहीं चाहिए।

चाटुकारिता के बदले
कोई सम्मान नहीं लूँगा,
सत्ता के सम्मुख सत्य कहने से
कभी नहीं झुकूँगा।

मेरी आवाज़ असफलता से डरकर
मौन नहीं होगी,
मेरी चेतना किसी ग्रंथ की
दासी नहीं होगी।

कलम अगर जनता की पीड़ा
लिखने से रुक जाए,
तो ऐसी रचना
मेरे किसी काम की नहीं होगी।

मैं बुद्ध की प्रज्ञा और करुणा
साथ लिए चलता हूँ,
अशोक के धम्म को
मानव-कल्याण में पढ़ता हूँ।

रैदास-कबीर की निर्भीकता
मेरी आवाज बने,
तुकाराम-बसवन्ना का श्रम-सम्मान
मेरे कर्म का आधार बने।

फुले-सावित्री की शिक्षा
मेरी मशाल रहे,
शाहूजी का सामाजिक न्याय
मेरे विचारों का विस्तार रहे।

बाबा साहेब का संविधान
समान अधिकारों की ढाल रहे,
पेरियार का तर्क
मेरी चेतना का सवाल रहे।

रामस्वरूप वर्मा की अर्जक चेतना से
मैं भी प्रेरणा लेता हूँ;
इसलिए प्रश्न करूँगा,
तर्क करूँगा,
प्रमाण माँगूँगा,
अन्याय से लड़ूँगा;
पर अंधविश्वास के आगे
अपना विवेक नहीं दूँगा!

जिस दिन मानव-मानव में
जन्म का भेद नहीं रह जाएगा,
श्रम को सम्मान और
सबको समान अधिकार मिल जाएगा;

जिस दिन स्त्री और पुरुष
दोनों निर्भय होकर जी पाएँगे,
जिस दिन बच्चे प्रश्न करेंगे
और उत्तर स्वयं खोज पाएँगे;

जिस दिन ज्ञान पर
किसी का एकाधिकार नहीं होगा,
जिस दिन मनुष्य की गरिमा
जन्म से नहीं, मानवता से आँकी जाएगी—

उस दिन मनुष्य
सचमुच स्वतंत्र कहलाएगा,
विज्ञान अंधविश्वास पर
विजय पाएगा।

उस दिन मेरे पुरखों का
समतामूलक स्वप्न साकार होगा
और मानव-मुक्ति का
नया अध्याय तैयार होगा।

तब तक प्रश्न उठाता रहूँगा,
तब तक तर्क सिखाता रहूँगा;
अंधविश्वास के विरुद्ध
विज्ञान का दीप जलाता रहूँगा।

मृत्यु स्वीकार है, दोस्त!
पर दासता स्वीकार नहीं करूँगा।
किसी अदृश्य सत्ता के भय में
अपने विवेक की हत्या नहीं करूँगा!

अंधविश्वास चाहे जितना प्रबल हो,
तर्क से समझूँगा,
प्रमाण से मानूँगा;
प्रमाण न हो तो
विश्वास को तथ्य नहीं बताऊँगा।

मनुष्य से प्रेम करूँगा,
जीव-जगत के प्रति करुणा रखूँगा,
पर किसी अदृश्य सत्ता की
चरण-वंदना नहीं करूँगा!

मेरा महानायक—मानवीय विचार।
मेरी शक्ति—शिक्षा और वैज्ञानिक विचार।
मेरा पथ—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।
मेरी साधना—मित्रता।
मेरा संकल्प—मानव-मुक्ति।

शिक्षा से होगा उद्धार।
तर्क से होगा अंधविश्वास पर प्रहार।
विज्ञान से होगा मानवता का विस्तार।
★★★


रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



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