लाचार
कुंभकार
पहुँच
लोहटिया बाज़ार
लोटा-गिलास
बाल्टी के पास
गया प्यास।
दूर दूर भटकते
रेगिस्तान में
वैसे वह भटक
रहा है विचार
आत्मसम्मान में
यह जान कर
ऐसे कहा सेब
सहृदय नर
मालिक! मालिक!
एक मनुष्य
पिपासा है।
एकसाथ पेरकर ,उसे दो
आदमी पिया जो
पानी चाहता रो
इंसानियत का वृक्ष बो
सेब बना कविता
पेरनेवाला कवि।।
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : १७-०१-२०२०


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