मैं दस वर्षों तक
छिला हूँ घास
गऊ माता के लिए।
वे मेरे गाँव
खजूरगाँव
आ
किसी से पूछ सकते हैं।
मुझसे भी अधिक
मेरे अन्य बड़े भाई
काटें हैं घास।
बहुत कम काटा घासा
क्योंकि उस वक्त मैं
बरसिंग-चरी का खेती
करना सिख चुका था।
भी एक से चार हो चुका था
चारों का खेती करना जरुरी था
जैसे इस वक्त करता हूँ।
घास काटने वाला
खास दिन स्मरण हुआ।
सुबह खुरपा लें
जब पहुँचा खेत
दूब छिलने : छिलने के बाद।
हम और हमारे मित्रगण
एक गोला बना बीच में
दूब रख कुछ दूरी से
खुरपा फेंक निसाना लगाते थे।
घास का स्वयंबर खेल
मेरे मित्र मुझसे बड़े थे
सब सबने जीत लिए
आखिरी के दो-तीन
मुट्ठी दूब वाले खेल में
चुक गया, खुरपा आ
मेरे पैर में हलका सा
धस गया रक्त बहा
मेरे घास मेरे मित्र
वापस दें दिए।।
अक्सर ओसारा के पास
मैदान का आकर्षक घास
जिसमें होता अद्भुत भास
हिन्दुओं के पूजा में खास
जिसे सोहने में गया ऊब
धान के खेत में खेतिहर
उसे खुरपी से छिल घर
गाय खाती बछड़ा खाता
लगता चौपायों को प्रिय
अनेक रोग का औषधीय
मेहरारू का गर्भपात रुकता
उचित मात्रा में उपयोग से
आयुर्वेद के प्रयोग से
लाभकारी गुण दूब का
इसकी अन्य नाम से संबंधित
एक किंवदंती कही जाती है
माँ लक्ष्मी-पार्वती के पैर
एकसाथ जब पड़े इसपर
तब से भार्गवी कहलाती है।
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