अंबर में
बिन डोर के
पतंग-ताव का
तनना
दाहती है
तन!
बिन पतवार के
भाव-नाव का
तैरना
डाहती है
मन!
सोचकर
वो
जलीय-पौधा
जो
दो सप्ताह में
दोगुना होती।
जमी जलकुंभी
भागीरथीनाव
बनना
चाहती है
जन!
आती उमंग
गीत मति से
गाती तरंग
तट तक
जाती तरंग
जलीय संग।
जलकुंभीनाव से
सैर कर
लौट आयी
किनारे
कवि की कविता।
के पुकारने पर
पर कुछ
नई चेतना
और
नई संवेदना
के साथ
आयी।
नई कविता का
नई सरिता में
और
नये समाज में।।



Nice bro.
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