खोट-खाट बथुआ
लाया घर!
चीख-चाख कहा हुआ
साग!
साग-भात खाने
काग!
और आ रहा सुआ
बाग-बात गाने
कपकपी भगाने
चुल्हे के पास
कुछ चावल चूर्ण चुन पाई है
जब तुम्हें गया था जगाने
जुठार न दे कितना करीब रूका है
आज पीने का पानी जुठार चुका है
माड़ में सने साग-भात को मूली के संग
खाने में बहुत मस्त लग रहा है : पिताजी
वत्स! इसमें कुछ खास घास :
बथुआ-पालक सरसों के पत्तें हैं
क्योंकि इसे आइरन पूर्ति औषधि रूप में
आपको खिलाना और खुद खाना चाहता हूँ
प्रमुख प्रख्यात संजीवनी जड़ी-बूटी है : बथुआ
पेशाब रोग के लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ
पता चला लाल वाला अधिक लाभदाई है
जिसे माता सीता ने लव-कूश के जन्म से पूर्व
वही बथुआ चील कहलाई और औरतों के लिए
अद्भुत पीलिया रोग नाशक औषधीय आशीर्वाद
कि गेहूँ और जौ के बुआ को , एक खेत में
शंकर ने पार्वती के कहने पर कृषक चेत में
जिसे मैं स्वयं खाता हूँ इस घास का अनुराग
अद्भुत है जो ऊँच कुली या सूत है बाग-बाग
उनका स्वास्थ्य-मस्तिष्कीय और जो अन्य हैं
जीवन के सत्य का रहस्य संन्यासी के वन्य हैं
कल पुनः बथुआ लाऊँगा हर्षित होकर
पूर्णकथा सुनाऊँगा भूख का रोटी पोकर
रचना : ०९-०१-२०२०
-गोलेन्द्र पटेल

No comments:
Post a Comment