हे स्त्री!
मैं पुरुष हूँ
मेरे पैरों में
बाँधो घुँघरू ;
क्योंकि
मुझ में
पुरुषत्व नहीं!
विकल्प
न ही कोई
संकल्प ;
न ही कोई
संवेदना
न ही कोई
चेतना।
चौंधियाई आँखों से
रूप पर पडे़ धूप देख
एक नदी कहती
समुद्र के भीतर समन्वय है
तरंग और उमंग का
स्वप्न और संघर्ष का
रंग और जंग का
धन्य और अन्य का....
उन युवतीयों के नयन नीर का
जो सदियों से
दो रूप में रोती हैं :
विरहिणी या विधवा
विरहाग्नि से खौलते अदहन में
मैंने पकाना-खाना जाना
वक्त से पहले बन दिवाना
अब आह उह का स्वर
सुबह दोपहर शाम आधी रात
या आठों पहर में जहर
लगने लगे हैं : सामाजिकता के विरुद्ध
बस परिवर्तन का रोग है खाँसना
स्पर्श शब्द से नफ़रत है हँसना
चुंबन के चंगुल में नहीं फँसना
समय का सच्चा प्यार है या न्याय
मेरी आँखें लग थीं : पुनः दोहराओ अपनी बात
बस कुछ संकेत करता हूँ
समय के अभाव में
अपने बच्चों के पेट में उठी दर्द का शंखनाद देख-सून
और तुम्हारे गर्भ में भूख से तड़पते भावी बच्चे को भी
एक मैं हूँ अकेला नदी के तीरे तीरे
जलीय जीवों के तलाश में भटकता
न मच्छली न घोंघा न सीप न अन्य
कुछ भी नहीं पकड़ पाया काव्यसरिता में
कर्षित प्रेम कविता में
"अकाल और उसके बाद" में एक उम्मीद थी
पर "कोरोना और उसके बाद" में केवल ख़ौफ़
जो भयंकर डर ,भय ,त्रासदी ,सन्नाटा.....आदि को
जीवन के विरुद्ध जन्म दे रहा है इन दिनों
**कोरोना और उसके बाद** से
मौत का तांडव,

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