अवैमत्य
अफ़वाह का आवाज़
अनन्त आकाश में
नहीं
आदमी से आदमी के भीतर
अविराम उड़ता रहा
अविस्मरणीय
अश्लथ
अस्त्र बन!
शिक्षित व अशिक्षित के मनःखेत में
सनसनीखेज़ ख़बर का है
जो आतंक के आतिथ्य का वृक्ष होगा
एक दिन
तो ताकता रहेगा तकदीर नयन में लिये नीर
वे घिन
समय के चेतना को चीर
गिन हीन एक-दो-तीन
तिन के तलवार से
मनुष्य के मनुष्यता को जब मार दिया जाएगा
तब कर्षित पराधीन पत्नी बेटी माँ
या दोहरे शोषित :
दलित स्त्री
तपती धूप में चौंधिया कर गीर पडे़ मृग के भांति
या भयंकर रेगिस्तान में फसें प्यासे असहायों के
रूढ़िवादिता के पितृसत्तात्मक भट्ठी में जल रही हैं औरतें
इस आग से हृदय और मन जलना कलम से कविता रचना है :
अहम के विरुद्ध
या पुरुषार्थ के प्रशस्ति गान के
हाथ में हाशिए के हँसुए लें सीना तान के
लड़ाना चहती हैं स्त्रियाँ : आत्मसम्मान के लिए
जब हम जीताएंगे अपने घर के स्त्रियों को
जीताना ही होगा पूर्ण पुरुष होने के लिए
स्त्री को विजयी भवः बोल
नहीं तो
वो खुद जीत जाएंगी पुरुष को पराजित कर
एक दिन!...
सितंबर,2019
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