आजादी के बाद हिंदी कविता में झमेले बहुतेरे हैं | एक खास तरह की विचारधारात्मक प्रवृत्ति का ग्रहण जैसे अब तक उस पर लगा हुआ है | भावक,पाठक दूर जा रहे कविता से | उम्मीद है कि इस ग्रहण से निराकरण का कोई मार्ग वे सुझायेगें | क्योंकि बाएं रहकर कविता रचने, आलोचने की इतिश्री तो बहुतेरे कर ही रहे हैं |
-जगन्नाथ दुबे ,Kumar Mangalam ,डॉक्टर सर्वेश्वर सिंह , Golendra Gyan ,etc.
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-श्रीप्रकाश शुक्ल
कवि एवं आचार्य
हिंदी विभाग, बीएचयू, वाराणसी
02 जुलाई 2020, शाम 5 बजे
श्रीप्रकाश शुक्ल इलाहाबाद विश्विद्यालय से एम. ए(हिन्दी) व पीएचडी हैं. उन्होंने हिन्दी कविता की आंतरिक लय के दायरे में अपनी कविता में लोकधर्मी परंपरा का विस्तार किया है जहां लोक रूढ़ न होकर एक गतिशील अवधारणा है।एक कवि के रूप में वे हिंदी कविता की प्रतिरोधी परंपरा के महत्वपूर्ण कवि हैं।शास्त्र से लेकर लोक तक में उनकी गहरी रुचि है और उनकी कई कविताओं में अनेक देशज शब्द प्रयुक्त होकर नया अर्थ प्रकट करते हैं।अभी अभी 'वागर्थ' जुलाई,2020 के अंक में प्रकाशित अपने एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि 'कवि कविता की संसद का स्थायी प्रतिपक्ष होता है'।
”अपनी तरह के लोग”,”जहाँ सब शहर नहीं होता” ,”बोली बात” ,”रेत में आकृतियाँ”, ”ओरहन और अन्य कवितायेँ ”. "कवि ने कहा" .
'क्षीरसागर में नींद' .
”साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौन्दर्य “ और “नामवर की धरती “ .
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