कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं
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कुछ लड़ाइयाँ अटल और अनिवार्य होती हैं
जिन्हें हमारे पुरखे
या तो हारे होते हैं
या लड़े नहीं होते
वे मृत्यु की तरह अटल और अनिवार्य होती हैं
घृणा और बदले के सिंहासन पर बैठी सरकारें
अपनी कारुणिक विनम्रता में भी
क़त्लेआम की शांति-व्याख्याओं की हद तक निर्मम होती हैं
फिर यहाँ तो सामूहिक हत्याओं को भी
सदी के विकास-क्रम का अनिवार्य चरण बताया जाता है
मुसोलिनी और हिटलर, इदी अमीन और पॉल पॉट
बहुत कम हत्यारों को राज करने का दुयोग होता है
पर जब होता है तो देश को मक़तल में बदलते देर नहीं लगती
तब सड़कों , आँगनों और दिमागों में
खेतों , जंगलों और विश्वविद्यालयों में
संसदीय नीति-पत्रों और पुस्तकालयों में
चारो तरफ खून ही खून पसर जाता है
सभ्यता के कोढ़ की तरह जन्मे हत्यारों को देशभक्त के तमगे से नवाजा जाता है
शांति-दूतों की तस्वीरों से पुर्नहत्या का किया जाता है अभ्यास
तब मानवद्रोहिता और अमानुषिकता की एक प्रतियोगिता शुरू होती है
जिसमें बहुत बड़ी आबादी निकृष्टतम होने के लिए गिरती चली जाती है
पर इसी बीच कुछ जिंदा ज़ेहन लोग निकलते हैं अपनी अपनी देह से बाहर
और सरकार की गोली खाकर मरी संतान की ताजी चिता से उठा लाते हैं मुठ्ठी भर आग
सीने में छिपा लेते हैं प्रमथ्युस की विरासत
और आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाते हैं
दोस्तों ! बहुत काम की चीज होती है आग
जाति का ज़हर ज़ेहन में चढ़ जाए तो
लगा दी जाती हैं चमारों की बस्तियों में
बलात्कारियों के हत्थे चढ़ जाए तो
फूँक दी जाती है चीखती हुई औरत
यह धर्म-शास्त्रों में शस्त्र की तरह फैलती है
और राख हो जाता है मुहल्ला , पुरवा, प्रदेश
आग का प्रयोगधर्मी हत्यारा यदि हो जाए प्रधानमंत्री
तो धू-धू कर जलने लगता है पूरा देश
तब आग जंगल की तरफ से नहीं संसद की तरफ से फैलती है
पर नहीं दोस्तो!
आग रोटी भी पकाती है
अच्छे दिनों की तमन्ना
दुर्दिन में आग बनकर उभरती है और इंसान को बेख़ौफ़ कर देती है
तब आग को जिलाए रखने के मुहावरे से बाहर लाकर
मनुष्य ललकार कर लड़ जाता है हत्यारों से , सरकारों से
फिर वह हक़ और हुकूत के लिए जिरह नहीं करता
सामने से आती हुई सरकार की गोली को चूम लेता है
क़ैदखानों में यारों के साथ मुक्ति-गीत गाता है
तानाशाह की बौखलाहट पर हँसता है
और हँसते हुए फाँसी तक चढ़ जाता है
वह बहुत अच्छे से जानता है कि
यह लड़ाई वह नहीं लड़ेगा तो उसकी आने वाली पीढ़ियों को लड़नी होगी
और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी
वह बहुत अच्छे से जानता है कि
कुछ लड़ाइयाँ मृत्यु की तरह अटल और अनिर्वाय होती हैं ।
१७.
इसी देश में रहेंगे
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इसी धरती के गर्भ का जल बदन में लहू बनकर दौड़ता है
इसी खेत का उपजा अन्न माँस-मज्जा बनकर बढ़ता है
कभी काम के कोल्हू से बँधी माँ ने उतारा तो
इसी धरती की गोद में बेफिक्र पसर गए
अपने घावों पर इसकी मिट्टी का थाप दिया और सब ठीक हो जाने के भरोसे से जिंदा रहे
पर धर्म की घृणाएँ कत्लेआम से भी नहीं जातीं
वो अजन्मी पीढ़ियों तक का पीछा करती हैं
अब जब संगठित घृणा-वंशज हमसे बाशिंदगी का सबूत माँगते हैं
तब मैं एक ऐसे लैब को ढूँढता फिर रहा हूँ जो मेरी रूह का एक्सरे कर सके
पर नहीं
नागरिकता रूह नहीं जिस्म का मसअला है
और जिस्म को गोली मारी जा सकती है
सरकार की गोली , घृणा का बारूद बेशक हमें खत्म कर सकता है
पर हम लड़ेंगे , थकेंगे , टूटेंगे , रो पड़ेंगे
अपनी कब्र खोदेंगे और पुरखों के बगल में जा सो पड़ेंगे
पर हम कहीं नहीं जाएंगे
इसी देश में जन्मे थे इसी देश में मरेंगे
यहीं अपनी देह ,अपने देश में रहेंगे ।
१८.
करुणा के कंठ में स्मृतियों की लाश बाँध
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वर्षों पहले जो तुमने उपहार में दिया
मेरी कलाई उसी घड़ी के लिए बनी थी
मेरे पाँव बने थे
तुम्हें पाने की अंतहीन यात्राओं के लिए
मेरा गला बना था
करुणा के कंठ में स्मृतियों की लाश बाँध
पुकारते रहने के लिए तुम्हें
जंगल-जंगल , रेती - रेती , बस्ती-बस्ती
बदन में दौड़ता मेरा गाढ़ा रक्त बना था
तुम्हारे पाँव में महावर लगाने के लिए
मैं तो बना था सभ्यता के उस विषण्य दुर्गंधयुक्त कुँए को पाटने के लिए
जिसमें भूख और शोषण से लड़ते हुए मर गए
मेरे पुरखों की असंख्य लाशें पड़ी हैं
पर मेरा मन !
मेरा मन बना था तुम्हें प्यार करने के लिए
और उम्र भर अपनी पीठ पर बँधुआ मजूर सा
तुम्हारा बिछोह ढोने के लिए
तुम्हारी चाह रोने के लिए ।
१९.
रक्तबीज
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कौन नहीं जानता कि इतिहास और गाथाएँ उनकी होती हैं
जिनके एक हाथ में कलम
और दूसरे हाथ में विरोधियों का कटा हुआ सिर होता है
ऐसे में रक्त-चूसकों की कथाएँ क्यों बताएंगी कि रक्तबीज कौन था
और इतिहास के किस पन्ने पर छटपटा रहा है उसका कटा हुआ सिर
कथा कहती है रक्तबीज को वरदान था कि
उसके लहू का एक भी कतरा अगरचे गिरता है धरती की कोख पर
तो उतना ही विराट , उतना ही विस्तृत दूसरा रक्तबीज पैदा हो जाएगा वहीं , उसी दम
यानि कि रक्त की हजार बूंदे हजार रक्तबीज को जन्म देती रहेंगी
रक्त-चूषकों , आततायी बुर्जुआ देवताओं की नौकरानी हुईं दुर्गा
जब नहीं कर पायीं रक्तबीज का सामना
तब काली चंडिका की क्रूर विभत्स माया को रच डाला और काली पी गयी रक्तबीज का आखिरी कतरा-कतरा खून
यह कथा यहीं पर उसकी हो जाती है जिसके एक हाथ में कलम और दूसरे में रक्तबीज का कटा हुआ सिर है
पर सच की आदत है
वह सदियों , भाषाओं और सभ्यताओं को पार कर चुपचाप
किसी रोज उभरता है जिद्दी दूब और बेहया के फूल सा
रक्तबीज का एक आखिरी कतरा लहू
चण्डिका की आत्मा से होते हुए जमीन पर गिर पड़ा था
मैं उसी रक्तबीज का वंशज हूँ
तब से लेकर आज तक दुनिया में जो कहीं भी , कभी भी
रक्तचूषक , आततायी , अन्यायी की आँखों में आँखें डालकर
अधिकार , न्याय और समानता के लिए
बेधड़क लड़ जाता है
रक्तखोरों के खिलाफ सदियों पार से जुलूस जुटाकर
राजमार्ग की तरफ बढ़ जाता है
प्राण को अपनी देह के हरेक कतरे में बाँटकर
बुर्जुआ देवताओं की छाती पर चढ़ जाता है
वह रक्तबीज का वंशज है
कथा को ऐसे भी समझें कि
रक्तबीज देह की नहीं रक्त की सवारी करता है
जिनके पुरखे किसी अन्याय और शोषण के विरुद्ध लड़ते हुए क़त्ल हुए
उनके नवके उस लड़ाई को लड़ते रहे
कथा के इसी अर्थात में
मेरे बाबा रक्तबीज के वंशज थे
मैं रक्तबीज का वंशज हूँ
मेरी पीढ़ी रक्तबीज की वंशज होगी ।
२०.
हमारे चेहरों पर चीखों के धब्बे हैं
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पिछली चौबीस रातों से मेरे स्वप्न में आने वाला
नालंदा के राजगीर पहाड़ी पर बलत्कृत स्त्री के यौनांग से रिसता खून
और छह पुरुषों के लिंग से बहता सभ्यता का वीर्य
मेरे मष्तिष्क में मवाद की तरह जम रहा है
इतिहास हत्यारों के दलाल की तरह सच छुपाने का आदी है
वह कभी नहीं कहेगा कि आशीर्वाद से और खीर खाकर गर्भवती हुईं स्त्रियाँ
वस्तुतः उन गलीज़ आत्माओं वाले महात्माओं और ऋषिओं द्वारा बलत्कृत औरतें हैं
त्रिशूलधारी त्रिपुंडमण्डित रक्तखोर इतिहास से मुझे उम्मीद भी नहीं
वह तो सदियों से नालंदा के राजगीर पर्वत पर बह रहे छः पुरुषों का वीर्य पोछने में लगा हुआ है
तो क्या राजगीर के पत्थरों पर एक बलत्कृत स्त्री और उसके असहाय प्रेमी को छोड़कर हम चाँद पर चढ़ जाएं ?
फिर इतिहास हमें हत्यारों का दलाल कहेगा !
अरे भाड़ में जाए इतिहास
भाड़ में जायें हत्यारे
और भाड़ में जाएँ उसके दलाल
सवाल एक बलत्कृत स्त्री और क्षत-विक्षत हुई सभ्यता का है
सवाल ये है कि
इसे लेकर हम किस अस्तपताल में जा सकते हैं
किस रसायन से धुल सकता है हमारे सूख चुके रक्त की शक्ल का पत्थरों पर पड़ा यह सदियों पुराना दाग
किस भाषा में , दुनिया की किस अदालत में दायर किया जा सकता है ये मुकदमा ?
अब समय आ गया है कि
सृष्टि के सभी प्राणियों , जंगलों , पर्वतों और नदियों की सामूहिक पंचायत से यह तय कर लिया जाए कि
इस दुनिया में पुरुष रहेगा कि मनुष्य
मैं चौबीस दिनों से सुन रहा हूँ कि वह लड़की
मुझे कातर आवाज लगाए जा रही है
इतिहास के चंगुलों में फँसा उसका प्रेमी
मुझे मेरे मनुष्य होने का वास्ता दे रहा है
स्वप्न और स्वप्न से बाहर
ये आवाजें दिन रात मेरा पीछा करती हैं
इन दिनों मेरा बदन
क्रोध , हताशा , चिंता और शर्म से अक्सर थरथराने लगता है
और बारहा मैं महसूस करता हूँ कि ये आवाजें
सिर्फ चौबीस दिन से नहीं
बल्कि सदियों से मेरा पीछा कर रही हैं ।
- 19 अक्टूबर 2019
२१.
वे सारे मेरे अपने हैं
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जो सभ्यता के इतिहास में अवर्णित रहे
जिनका होना , न होने से बिल्कुल भी अलग नहीं रहा
जो हवा और पानी की तरह चुपचाप अपने काम पर गए
और वापस लौटकर गुम हो गए ब्रह्माण्ड के किसी कोने में
जिनका उल्लेख भाषा में कहीं भी नहीं पाया जा सकता
इतिहास जिनके नामों के पीठ पर लदकर हम तक आता है
वे उनके सिपाही हुए
हरक्यूलिसों और अशोकों की निर्मम महानता के लिए
उनकी हवस के लिए
लड़े और बेनाम दफ़्न हो गए युद्धभूमि की कोख में
वे सारे मेरे अपने हैं
जिनकी मृत्यु का मुआवजा अदद दो आँसू की मेहरबानी के लिए तरसता रहा
इतिहास जिन्हें विराट शौर्यजीवी योद्धा कहता है
उनकी जमीन की तरफ देखिये
वे मेरे पुरखों की लाशों की ढेर पर खड़े हैं
साफ और सम्मानजनक प्यास को घाव भरे पीठ पर लादकर वे जीवन भर भटकते रहे
बैलों की तरह जुतते रहे बैलों के साथ
और बैलों से कम मजूरी मिली जिन्हें
बैलों के गोबरों से जिन्होंने रोटियाँ बनायीं
जो ताजमहल बनाए और क़त्ल हो गए
जो भूख भरी थाली को बगल खिसका
किसी पुरवासी का छप्पर उठाने के लिए दौड़ गए बेशर्त
वे सभ्यता की सड़ चुकी लाश को कंधे पर लाद गाथाओं की मुर्दहिया तक पहुँचाते रहे
वे सारे मेरे अपने हैं
वे ज्यादातर श्यामवर्णी मेहनतकश बलिष्ठ हुए
इतिहास ने उन्हें राक्षस कहा और वध किया
पहाड़ की मानिन्द जीवट और रुई की तरह मुलायम
पूँजी के अभाव में सीने में पल रहे मृत्यु को छिपा ले गए
और पीढ़ी की पहली स्कूल जाती बेटी की लाल चोटी पर फिदा होकर बिफर पड़े
वे किसी की महानताओं के लिए झंडा उठाते रहे
सभा में झाड़ू लगाते रहे
पुल के लिए लोहा काटते रहे
सड़क के लिए गिट्टी तोड़ते रहे
पानी के लिए जमीन खोदते रहे
वे किसी भी वर्णन के आदि-आदि हुए
सभ्यताएं जिनके पसीने को सोखकर हरी होती रहीं
महानताएँ जिनके रक्त से ऐश्वर्य पाती रहीं
गाथाएँ जिन्हें राक्षस कहती रहीं
वे सारे के सारे मेरे अपने हैं।
२२.
रुलाई
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वह कभी भी आ सकती है
कहीं भी किसी भी बात पर
किसी को भी
बैठे - बिठाए अचानक से वर्षों पुरानी कोई बात
आँख में पानी की तरह चमक सकती है
उदास शाम की टेक लेकर
चौराहे पर सिग्नल खुलने के इंतजार में खड़े
या पुश्तैनी पीड़ाओं के संग्रहालय , गाँव में अपने
अधिया खेत से काटकर लाते हुए बरसिम
माँ की दशकों पुरानी थकान का अंदाजा लगा
आ सकती है रुलाई
पहले दिन के स्कूल से लौटती हुई
दो हाथ के अमलतास के फूल सी बेटी को देख
छलछला सकती हैं आँखे
या मुठ्ठीभर भात की भूख को हत्या की भीख में बदलते देश की
अय्यास और निर्मम संपन्नता देख
वह आ सकती है
होलिका दहन में शामिल होते हुए
हॉस्टल के कमरे में बैठे हुए बीहड़ अकेले को ओढ़
दोस्त को देते हुए प्रेम-विवाह की बधाईयाँ
मनरेगा से लौटे हुए बासठ बरस के बाबा का धुलाते हुए हाथ
कालीन पर लेटे हुए कालीन बीनते दिनों को याद कर
अपनी ही किसी कविता का करते हुए पाठ
(आवाज थरथरा सकती है , आँखे भरभरा सकती हैं)
मेट्रो में चढ़ते ही
वर्षों पहले गुजर गए भाई की शक्ल का कोई लड़का देख
हवाई जहाज में उड़ते हुए बहन के विवाह की चिंता में
पहाड़ पर चढ़ते हुए
जंगल में घूमते हुए
नदी में तैरते हुए
मॉल में टहलते हुए
चाँद पर उतरते हुए
रुलाई कहीं भी , कभी भी और किसी को भी आ सकती है
कई बार वह नहीं आती है
जैसा होना है उसका आना , वैसे नहीं आती है
पिछले बरस चौंतीस की उम्र में चाचा जब मरे
तब दादा नहीं रोये
भीड़ को छाँट-छाँट बीच-बीच मे देख जाते रहे
दरवाजे पर नीम नीचे पड़ी जवान बेटे की लाश
वे बस चुप रहे , हमेशा के लिए चुप रहे
जब सब रोकर अपने जीवन में लौट आए
तब भी वे चुप ही रहे
भव्य अतीत के जर्जर खण्डहर मानिंद
कभी - कभी राह चलते गिर जाते हैं और खुद उठ नहीं पाते
कहने को कहा जा सकता है कि वे नहीं रोये
पर मेरे दोस्त
सच किसी गद्दार के दिल में
पचपन बर्छियों का छेद करता है
हम रोने के लिए कन्धा चुनते हैं
और इधर निर्लज्जता के नए नए प्रतिमान
कोई कंधे के लिए किसी का रोना चुनता है
हमारे आँसू तक गिरवी रखे जा चुके हैं
पड़ोसी की हत्या कर
सांत्वना बँधाकर
लाश को कन्धा देकर
करुणानिधि और प्रिय बना जा सकता है
भाषा को बेगार खटाने के लिए माफ़ी चाहूँगा दोस्त
कहता तो बस इतना भर था कि
वह तो रुलाई है
वह कभी भी आ सकती है
कहीं भी , किसी भी बात पर
पर अपने ही क़त्ल के लिए
क़ातिल की कृतज्ञता पर रुलाई कभी नहीं आती ।
© Vihag vaibhav
कवि परिचय : -
विहाग वैभव अभी बीएचयू से हिंदी विषय में पीएचडी कर रहे हैं।
इन्हें 'भारत भूषण अग्रवाल सम्मान -2018' से सम्मानित किया गया है।
संपादक परिचय :-
नाम : गोलेन्द्र पटेल {बीएचयू ~ बी.ए.}
संपर्क सूत्र : 8429249326
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