सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना
भारतीय समाज की संरचना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी हुई है। यहाँ शब्द भी तटस्थ नहीं होते—वे सत्ता के औज़ार होते हैं। ऐसा ही एक शब्द है “सवर्ण”, जिसे सामान्यतः सम्मानसूचक माना जाता है, लेकिन वस्तुतः यह एक रणनीतिक अवधारणा के रूप में विकसित हुआ है। यह शब्द केवल पहचान नहीं देता, बल्कि सामाजिक शक्ति-संतुलन को नियंत्रित करने का माध्यम भी बनता है।परंपरागत वर्ण-व्यवस्था में चार वर्गों की चर्चा होती है, किंतु व्यवहार में “सवर्ण” शब्द के प्रयोग से श्रम-आधारित समुदायों को स्वतः बाहर कर दिया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द समावेशन के लिए नहीं, बल्कि चयनात्मक एकजुटता के लिए गढ़ा गया। जिन समुदायों के पास युद्ध-कौशल था, उन्हें शासक वर्ग में स्थान मिला; जिनके पास व्यापारिक दक्षता थी, वे आर्थिक मध्यस्थ बने; और शेष समाज श्रम-इकाई में बदल दिया गया। जो इस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए, वे सामाजिक सीढ़ी से और नीचे धकेल दिए गए।
यह पूरी संरचना किसी दैवी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सुनियोजित सामाजिक गणित का नतीजा है। एक सीमित जनसंख्या वाला वर्ग यह भली-भाँति समझता रहा है कि केवल संख्या के बल पर वह शासन नहीं कर सकता। इसलिए उसने पहले समान हित वाले वर्गों को प्रतीकात्मक एकता में जोड़ा, फिर उससे भी बड़े सामाजिक समूहों को धार्मिक पहचान के नाम पर अपने साथ खड़ा किया। इस प्रकार सामाजिक बहुलता को राजनीतिक बहुमत में बदला गया।
लेकिन जैसे-जैसे इतिहास के दबे हुए पन्ने खुलने लगे और वंचित समुदायों में चेतना का विस्तार हुआ, सत्ता-संरचना ने नए उपकरणों का सहारा लिया। अब मतदाता की भूमिका सीमित कर दी गई है और नीतियाँ ऐसे ढंग से बनाई जा रही हैं कि लाभ हमेशा ऊपर की ओर प्रवाहित हो। एक ओर आरक्षण और प्रतिनिधित्व का विरोध किया जाता है, दूसरी ओर विशेषाधिकारों को “योग्यता” के नाम पर सुरक्षित रखा जाता है।
योग्यता की यह परिभाषा भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। यदि बुद्धि और कार्यकुशलता के साथ नैतिकता का अभाव हो, तो वही योग्यता समाज के लिए सबसे अधिक घातक सिद्ध होती है। ऐसी दक्षता, जो ईमानदारी से शून्य हो, वह विकास नहीं, बल्कि शोषण को जन्म देती है।
वंचित और श्रमशील समाज की सबसे बड़ी समस्या उसकी आंतरिक विखंडन है। हज़ारों जातियों, उपजातियों और पहचानों में बँटा यह समाज अक्सर अपने वास्तविक शोषकों को पहचानने के बजाय आपस में ही उलझा रहता है। राजनीतिक दल और संगठन इस विखंडन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि विभाजित समाज को नियंत्रित करना आसान होता है।
इस परिस्थिति से निकलने का एकमात्र रास्ता व्यापक सामाजिक एकजुटता है—ऐसी एकजुटता जो किसी लिखित समझौते पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, साझी पीड़ा और साझा भविष्य की समझ पर आधारित हो। जब समाज स्वयं भ्रामक नेतृत्व और विभाजनकारी राजनीति का बहिष्कार करेगा, तभी एक नया सामाजिक संतुलन संभव हो सकेगा।
यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जनसंख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद वंचित वर्ग सत्ता, संपत्ति और निर्णय-प्रणालियों में अल्पसंख्यक बना हुआ है। यदि देश का एक बड़ा हिस्सा किसी सामाजिक वर्ग से आता है, तो शासन, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था में उसकी समान भागीदारी क्यों नहीं दिखती? इसका उत्तर केवल तभी बदलेगा, जब यह वर्ग अपनी संख्या को राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए संगठित संघर्ष करेगा।
इतिहास साक्षी है कि सामाजिक न्याय की प्रत्येक पहल का विरोध उन्हीं शक्तियों ने किया है, जिन्हें परिवर्तन से अपने विशेषाधिकारों के छिनने का भय था। इसलिए आज सबसे ज़रूरी है—स्पष्ट पहचान। यह समझ कि मित्र कौन है और बाधक कौन। यही पहचान आगे की दिशा तय करेगी।
समाज को अब भ्रम से बाहर आना होगा। गाँव-गाँव, घर-घर संवाद की आवश्यकता है। जब बहुजन समाज अपने सामूहिक अस्तित्व और शक्ति को पहचान लेगा, तभी लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में जनतांत्रिक बन सकेगा।
सवर्ण की परछाईं में
यह जो एक शब्द है
“सवर्ण”
यह शब्द नहीं
एक ढाल है
ढाल
जिसके पीछे
तीन प्रतिशत की देह
पंद्रह प्रतिशत का भ्रम ओढ़ लेती है
और भ्रम
सत्ता में बदल जाता है।
वर्ण चार थे
पर नाम तीन के लिए गढ़ा गया
श्रम बाहर कर दिया गया
पसीने को
शब्दकोश से बेदख़ल कर दिया गया
जो लड़े—वे क्षत्रिय कहलाए
जो सौदे समझे—वे वैश्य बने
जो दोनों से वंचित रहे
वे शूद्र लिख दिए गए
और जो इस लिखावट से इनकार कर बैठे
उन्हें इतिहास के हाशिए पर
अतिशूद्र करार दे दिया गया।
यह कोई भूल नहीं थी
यह गणित था
तीन दशमलव पाँच
अपने बल पर
राज नहीं कर सकता
यह सच
उन्हें सबसे पहले पता था
इसलिए
संख्या को शब्दों से बढ़ाया गया
और शब्दों को
धर्म का लिबास पहनाया गया
फिर कहा गया
हम सब एक हैं
और “एक” के नाम पर
बहुजन की पीठ पर
सीढ़ी रख दी गई।
जब इतिहास बोलने लगा
जब ओबीसी सवाल करने लगे
जब स्मृति लौटने लगी
तो मशीनें आ गईं
अब उँगलियों की ज़रूरत नहीं
अब केवल
बटन काफ़ी है
अब
क्षत्रिय आतंकवादी है
वैश्य बेरोज़गार है
ओबीसी कानून का बोझ है
और
ईमानदारी
सबसे बड़ी अयोग्यता।
वे कहते हैं
मेरिट चाहिए
हाँ,
बुद्धि है
क्षमता है
पर
सच नहीं है
और जिस बुद्धि में
ईमानदारी नहीं होती
वह देश का नहीं
देश के ख़िलाफ़ काम करती है।
हज़ारों साल की लूट
किसी डकैती से नहीं हुई
वह एक ग्रंथ से हुई
जिसे संविधान कहा गया
पर
वह मनुष्यता का नहीं था
हम पढ़ते रहे
लड़ते रहे
आपस में
छह हज़ार से ज़्यादा टुकड़ों में
बँटे रहे
और साँप
हमारी ही आस्तीन में पलते रहे।
अब वक़्त है
काग़ज़ नहीं
कसम की
फीस नहीं
फिर से जुड़ने की
एक आवाज़
हर घर से
“मूलनिवासी नारा है,
भारत देश हमारा है।”
जो बाँटे
उन्हें बहिष्कार
जो भ्रम फैलाएँ
उनसे सावधान
क्योंकि
जब बहुजन
ख़ुद को पहचान लेता है
तो
सिस्टम अपने आप
हिलने लगता है।
आज
हर दूसरा नागरिक
ओबीसी है
पर सत्ता में
हर दूसरा क्यों नहीं?
यह सवाल
सड़क माँगता है
गिनती माँगता है
हिस्सेदारी माँगता है
इतिहास गवाह है
आरक्षण का विरोध
हमेशा ऊपर से आया
मूर्तियाँ
हमेशा ऊपर से टूटीं
और परिवर्तन
हमेशा नीचे से उगा
इसलिए
दोस्त और दुश्मन
पहचानो
जो तुम्हारे हक़ का विरोध करे
उसकी विशेषाधिकार की चुप्पी तोड़ो।
गाँव-गाँव जाओ
सच बाँटो
डरो मत
अब तुम अकेले नहीं हो
पीछे
पूरा समाज खड़ा है
और याद रखो
संख्या से नहीं
चेतना से क्रांति होती है।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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