Tuesday, 10 February 2026

सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना — गोलेन्द्र पटेल

 सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना

भारतीय समाज की संरचना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी हुई है। यहाँ शब्द भी तटस्थ नहीं होते—वे सत्ता के औज़ार होते हैं। ऐसा ही एक शब्द है “सवर्ण”, जिसे सामान्यतः सम्मानसूचक माना जाता है, लेकिन वस्तुतः यह एक रणनीतिक अवधारणा के रूप में विकसित हुआ है। यह शब्द केवल पहचान नहीं देता, बल्कि सामाजिक शक्ति-संतुलन को नियंत्रित करने का माध्यम भी बनता है।
परंपरागत वर्ण-व्यवस्था में चार वर्गों की चर्चा होती है, किंतु व्यवहार में “सवर्ण” शब्द के प्रयोग से श्रम-आधारित समुदायों को स्वतः बाहर कर दिया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द समावेशन के लिए नहीं, बल्कि चयनात्मक एकजुटता के लिए गढ़ा गया। जिन समुदायों के पास युद्ध-कौशल था, उन्हें शासक वर्ग में स्थान मिला; जिनके पास व्यापारिक दक्षता थी, वे आर्थिक मध्यस्थ बने; और शेष समाज श्रम-इकाई में बदल दिया गया। जो इस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए, वे सामाजिक सीढ़ी से और नीचे धकेल दिए गए।
यह पूरी संरचना किसी दैवी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सुनियोजित सामाजिक गणित का नतीजा है। एक सीमित जनसंख्या वाला वर्ग यह भली-भाँति समझता रहा है कि केवल संख्या के बल पर वह शासन नहीं कर सकता। इसलिए उसने पहले समान हित वाले वर्गों को प्रतीकात्मक एकता में जोड़ा, फिर उससे भी बड़े सामाजिक समूहों को धार्मिक पहचान के नाम पर अपने साथ खड़ा किया। इस प्रकार सामाजिक बहुलता को राजनीतिक बहुमत में बदला गया।
लेकिन जैसे-जैसे इतिहास के दबे हुए पन्ने खुलने लगे और वंचित समुदायों में चेतना का विस्तार हुआ, सत्ता-संरचना ने नए उपकरणों का सहारा लिया। अब मतदाता की भूमिका सीमित कर दी गई है और नीतियाँ ऐसे ढंग से बनाई जा रही हैं कि लाभ हमेशा ऊपर की ओर प्रवाहित हो। एक ओर आरक्षण और प्रतिनिधित्व का विरोध किया जाता है, दूसरी ओर विशेषाधिकारों को “योग्यता” के नाम पर सुरक्षित रखा जाता है।
योग्यता की यह परिभाषा भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। यदि बुद्धि और कार्यकुशलता के साथ नैतिकता का अभाव हो, तो वही योग्यता समाज के लिए सबसे अधिक घातक सिद्ध होती है। ऐसी दक्षता, जो ईमानदारी से शून्य हो, वह विकास नहीं, बल्कि शोषण को जन्म देती है।
वंचित और श्रमशील समाज की सबसे बड़ी समस्या उसकी आंतरिक विखंडन है। हज़ारों जातियों, उपजातियों और पहचानों में बँटा यह समाज अक्सर अपने वास्तविक शोषकों को पहचानने के बजाय आपस में ही उलझा रहता है। राजनीतिक दल और संगठन इस विखंडन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि विभाजित समाज को नियंत्रित करना आसान होता है।
इस परिस्थिति से निकलने का एकमात्र रास्ता व्यापक सामाजिक एकजुटता है—ऐसी एकजुटता जो किसी लिखित समझौते पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, साझी पीड़ा और साझा भविष्य की समझ पर आधारित हो। जब समाज स्वयं भ्रामक नेतृत्व और विभाजनकारी राजनीति का बहिष्कार करेगा, तभी एक नया सामाजिक संतुलन संभव हो सकेगा।
यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जनसंख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद वंचित वर्ग सत्ता, संपत्ति और निर्णय-प्रणालियों में अल्पसंख्यक बना हुआ है। यदि देश का एक बड़ा हिस्सा किसी सामाजिक वर्ग से आता है, तो शासन, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था में उसकी समान भागीदारी क्यों नहीं दिखती? इसका उत्तर केवल तभी बदलेगा, जब यह वर्ग अपनी संख्या को राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए संगठित संघर्ष करेगा।
इतिहास साक्षी है कि सामाजिक न्याय की प्रत्येक पहल का विरोध उन्हीं शक्तियों ने किया है, जिन्हें परिवर्तन से अपने विशेषाधिकारों के छिनने का भय था। इसलिए आज सबसे ज़रूरी है—स्पष्ट पहचान। यह समझ कि मित्र कौन है और बाधक कौन। यही पहचान आगे की दिशा तय करेगी।
समाज को अब भ्रम से बाहर आना होगा। गाँव-गाँव, घर-घर संवाद की आवश्यकता है। जब बहुजन समाज अपने सामूहिक अस्तित्व और शक्ति को पहचान लेगा, तभी लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में जनतांत्रिक बन सकेगा।


सवर्ण की परछाईं में

यह जो एक शब्द है
“सवर्ण”
यह शब्द नहीं
एक ढाल है
ढाल
जिसके पीछे
तीन प्रतिशत की देह
पंद्रह प्रतिशत का भ्रम ओढ़ लेती है
और भ्रम
सत्ता में बदल जाता है।
वर्ण चार थे
पर नाम तीन के लिए गढ़ा गया
श्रम बाहर कर दिया गया
पसीने को
शब्दकोश से बेदख़ल कर दिया गया
जो लड़े—वे क्षत्रिय कहलाए
जो सौदे समझे—वे वैश्य बने
जो दोनों से वंचित रहे
वे शूद्र लिख दिए गए
और जो इस लिखावट से इनकार कर बैठे
उन्हें इतिहास के हाशिए पर
अतिशूद्र करार दे दिया गया।
यह कोई भूल नहीं थी
यह गणित था
तीन दशमलव पाँच
अपने बल पर
राज नहीं कर सकता
यह सच
उन्हें सबसे पहले पता था
इसलिए
संख्या को शब्दों से बढ़ाया गया
और शब्दों को
धर्म का लिबास पहनाया गया
फिर कहा गया
हम सब एक हैं
और “एक” के नाम पर
बहुजन की पीठ पर
सीढ़ी रख दी गई।
जब इतिहास बोलने लगा
जब ओबीसी सवाल करने लगे
जब स्मृति लौटने लगी
तो मशीनें आ गईं
अब उँगलियों की ज़रूरत नहीं
अब केवल
बटन काफ़ी है
अब
क्षत्रिय आतंकवादी है
वैश्य बेरोज़गार है
ओबीसी कानून का बोझ है
और
ईमानदारी
सबसे बड़ी अयोग्यता।
वे कहते हैं
मेरिट चाहिए
हाँ,
बुद्धि है
क्षमता है
पर
सच नहीं है
और जिस बुद्धि में
ईमानदारी नहीं होती
वह देश का नहीं
देश के ख़िलाफ़ काम करती है।
हज़ारों साल की लूट
किसी डकैती से नहीं हुई
वह एक ग्रंथ से हुई
जिसे संविधान कहा गया
पर
वह मनुष्यता का नहीं था
हम पढ़ते रहे
लड़ते रहे
आपस में
छह हज़ार से ज़्यादा टुकड़ों में
बँटे रहे
और साँप
हमारी ही आस्तीन में पलते रहे।
अब वक़्त है
काग़ज़ नहीं
कसम की
फीस नहीं
फिर से जुड़ने की
एक आवाज़
हर घर से
“मूलनिवासी नारा है,
भारत देश हमारा है।”
जो बाँटे
उन्हें बहिष्कार
जो भ्रम फैलाएँ
उनसे सावधान
क्योंकि
जब बहुजन
ख़ुद को पहचान लेता है
तो
सिस्टम अपने आप
हिलने लगता है।
आज
हर दूसरा नागरिक
ओबीसी है
पर सत्ता में
हर दूसरा क्यों नहीं?
यह सवाल
सड़क माँगता है
गिनती माँगता है
हिस्सेदारी माँगता है
इतिहास गवाह है
आरक्षण का विरोध
हमेशा ऊपर से आया
मूर्तियाँ
हमेशा ऊपर से टूटीं
और परिवर्तन
हमेशा नीचे से उगा
इसलिए
दोस्त और दुश्मन
पहचानो
जो तुम्हारे हक़ का विरोध करे
उसकी विशेषाधिकार की चुप्पी तोड़ो।
गाँव-गाँव जाओ
सच बाँटो
डरो मत
अब तुम अकेले नहीं हो
पीछे
पूरा समाज खड़ा है
और याद रखो
संख्या से नहीं
चेतना से क्रांति होती है।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Monday, 9 February 2026

कहानी:: वर्ण से आगे || लेखक:: गोलेन्द्र पटेल

कहानी:: वर्ण से आगे
लेखक:: गोलेन्द्र पटेल


पहला अंक: सभा में बोला गया नाम (एक समकालीन वैदिक कथा)

हस्तिनापुर के बाहरी भाग में स्थित था निक्षेप-गृह “धनवेध”।
यज्ञ नहीं होते थे वहाँ,
पर लेन–देन की अग्नि दिन-रात जलती रहती थी।
उस दिन सभा असामान्य रूप से भरी हुई थी।
काउंटर के पीछे बैठी थी शिखंडी राठौरी—
युवती, शिक्षित, संयमी।
वह वर्षों से धनवेध में कार्यरत थी।
सामने खड़े थे श्रुतकीर्ति त्रिपाठी—
माथे पर तिलक, वाणी में अधीरता।
उनके साथ थीं उनकी पत्नी सावित्री त्रिपाठी,
जो उसी निक्षेप-गृह की लेखाकार थीं
और आज उनका अंतिम कार्य-दिवस था।
“त्याग-पत्र की प्रक्रिया इतनी विलंबित क्यों?”
श्रुतकीर्ति का स्वर प्रश्न नहीं, आदेश था।
शिखंडी ने शांति से कहा—
“प्रविष्टि शेष है, आर्य। नियम सबके लिए समान हैं।”
श्रुतकीर्ति हँसे—
“नियम? हम वे हैं जो नियम समझाते हैं।”
सभा में खड़े लोग चुप रहे।
चुप्पी—सदैव की तरह—सत्ता के पक्ष में थी।
सावित्री ने धीरे से कहा—
“स्वामी, छोड़ दीजिए… मुझे देर नहीं।”
पर अहंकार को विराम कहाँ।
श्रुतकीर्ति का स्वर तीखा हुआ—
“कुछ लोग अपनी मर्यादा भूल जाते हैं।”
यही वह क्षण था
जब शिखंडी ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“मर्यादा वाणी की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
श्रुतकीर्ति ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
सभा में सन्नाटा छा गया।
शिखंडी ने उत्तर दिया—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
क्षण भर की नीरवता।
फिर उसने कहा—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
बस इतना।
न कोई गर्जना,
न कोई धमकी।
पर जैसे किसी ने
सभा के भीतर छिपे दोहरे नियमों को उजागर कर दिया हो।
श्रुतकीर्ति हँसे—
“तभी यह साहस।”
शिखंडी का स्वर स्थिर रहा—
“साहस नहीं—अनुभव।”
“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो छात्रवृत्ति नहीं।
गुरुकुल गई—तो सर्वोच्च मापदंड।
सेवा हेतु आवेदन किया—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में खड़े एक वृद्ध ने कहा—
“यदि पहचान पूछी जाती है हर द्वार पर,
तो उसे बोलना अपराध कैसे?”
श्रुतकीर्ति मौन थे।
पर कथा वहाँ समाप्त नहीं हुई।
★★★


कट टू: जनसभा–ए–डिजिटल
किसी ने आधे संवाद का अंश
ताम्र-पट पर अंकित कर प्रसारित कर दिया।
संदर्भ गायब था।
निर्णय तैयार।
घोषणाएँ गूँजने लगीं—
“अहंकार!”
“दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“इस युग में वर्ण नहीं”—
आज वही सबसे ऊँची आवाज़ थे।
कोई बोला—
“यदि उसने कहा होता—‘मैं वंचित हूँ’—तो साहस होता।”
कोई बोला—
“यदि कहा होता—‘संविधान की संतान’—तो सम्मान।”
पर उसने कहा था बस—
“मैं क्षत्राणी हूँ।”
और यही असह्य ठहरा।
★★★


शिखंडी का पक्ष
शिखंडी ने सभा के बाहर कहा—
“जिस राज्य में
हर दस्तावेज़ में वर्ण पूछा जाता है,
हर अवसर पर पहचान माँगी जाती है,
वहाँ अपने नाम के साथ
अपना वर्ण कहना अपराध कैसे हो गया?
मुझे बार-बार बताया गया
कि मैं कौन हूँ।
आज यदि मैंने स्वयं कह दिया—
तो यह अहंकार कैसे?”
★★★


अंतिम दृश्य
धनवेध के अधिपति की मेज़ पर ताम्र-पत्र रखा गया।
“जाँच होगी।”
शिखंडी ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“मेरी नहीं—
उस व्यवस्था की जाँच होनी चाहिए
जो वर्ण से लाभ लेती है
और सत्य से भय खाती है।”
द्वार बंद हुआ।
बाहर लोग थे—
कुछ समर्थन में,
कुछ विरोध में।
पर निष्कर्ष स्पष्ट था—
यह युद्ध ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय का नहीं।
यह युद्ध है—
चयनात्मक नैतिकता
और
सुविधाजनक आक्रोश
के बीच।
और इस युग का सबसे बड़ा अपराध—
अपने नाम के साथ सच बोल देना।
★★★


दूसरा अंक : “वर्ण का उच्चारण”(ब्राह्मण बनाम ठाकुर)

1. सभा-गृह “अर्थनिधि”

हस्तिनापुर के दक्षिणी छोर पर स्थित था
अर्थनिधि सभा-गृह—
जहाँ धन नहीं,
विश्वास जमा किया जाता था।
काष्ठ-स्तंभों के बीच बैठी थी
वीरजा सिंहदत्ता।
क्षत्रिय कुल में जन्मी,
पर वर्षों से उसने अपने वर्ण से अधिक
अपने कर्म पर भरोसा किया था।
सामने खड़े थे
देवव्रत उपाध्याय—
श्रुतियों के ज्ञाता,
वाणी में शास्त्र,
और व्यवहार में अधीरता।
उनकी पत्नी शारदा उपाध्याय
उसी सभा-गृह की गणनाकार थीं।
आज उनका अंतिम दिवस था।
★★★


2. टकराव
“गणना-पत्र अब तक पूर्ण क्यों नहीं?”
देवव्रत ने पूछा।
वीरजा ने शांति से कहा—
“नियमों के अनुसार प्रक्रिया चल रही है, आर्य।”
देवव्रत मुस्कराए—
“नियम?
हमने ही तो नियम गढ़े हैं।”
सभा में बैठे लोग चुप रहे।
ब्राह्मण की वाणी—अक्सर प्रश्न नहीं होती,
निर्णय होती है।
शारदा ने धीरे से कहा—
“स्वामी, विवाद न बढ़ाइए…”
पर देवव्रत का स्वर तीखा हो गया—
“कुछ लोग अपनी सीमा भूल जाते हैं।”
वीरजा ने लेख-पट्ट से दृष्टि उठाई।
“सीमा कर्म की होती है,”
उसने कहा,
“जन्म की नहीं।”
देवव्रत ने तिरस्कार से पूछा—
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ?”
★★★


3. नाम का उच्चारण

क्षण भर का सन्नाटा।
फिर वीरजा बोली—
“और आप जानते हैं—मैं कौन हूँ?”
सभा सिमट आई।
“मैं ठाकुर हूँ।
क्षत्राणी।”
बस इतना।
न ललकार।
न धमकी।
पर जैसे सभा-गृह में
पुराने समीकरण हिल गए हों।
देवव्रत हँस पड़े—
“तभी यह अकड़।”
वीरजा का स्वर स्थिर था—
“इसे अकड़ मत कहिए।
इसे हिसाब कहिए।”
★★★

4. क्षत्रिय का हिसाब

“जन्म लिया—तो राज्य की योजनाओं से बाहर।
आश्रम में पढ़ी—तो सहायता नहीं।
गुरुकुल पहुँची—तो सबसे ऊँचा मापदंड।
सेवा-पत्र भरा—तो सबसे अधिक शुल्क।”
सभा में एक वृद्ध क्षत्रिय बोला—
“जब हर द्वार पर वर्ण पूछा जाता है,
तो उसे बोल देना अपराध कैसे?”
देवव्रत चुप थे।
पर मौन भी एक पक्ष होता है।
★★★


5. ब्राह्मण का प्रतिवाद

देवव्रत ने कहा—
“वर्ण बोलना नहीं,
वर्ण का रौब दिखाना दोष है।”
वीरजा ने उत्तर दिया—
“और वर्ण का लाभ लेना?
वह दोष नहीं?”
“आप कहते हैं—
देश में वर्ण नहीं।
पर हर दस्तावेज़ में
पहला प्रश्न यही है—
‘तुम कौन हो?’”
सभा में फुसफुसाहट फैल गई।
★★★


6. अधूरी कथा

उसी समय
किसी ने सभा का अधूरा संवाद
ताम्र-पट पर उतार लिया।
बस इतना लिखा गया—
“मैं ठाकुर हूँ।”
बाक़ी सब—
हटा दिया गया।
अगले ही दिन
जनसभा में घोषणाएँ होने लगीं—
“सामंती अहंकार!”
“क्षत्रिय दबंगई!”
जो कल तक कहते थे—
“वर्ण कहना गर्व है”—
आज वही बोले—
“यह ज़हर है।”
★★★


7. अंतिम दृश्य

अर्थनिधि के अधिपति ने कहा—
“जाँच होगी।”
वीरजा ने द्वार से बाहर जाते हुए कहा—
“यह जाँच मेरी नहीं,
उस व्यवस्था की हो
जो ब्राह्मण को ‘परंपरा’ कहकर
और ठाकुर को ‘अहंकार’ कहकर
एक ही शब्द को
दो अलग अर्थ देती है।”
द्वार बंद हुआ।
★★★


8. निष्कर्ष

यह युद्ध
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का था—
पर तलवारों का नहीं।
यह युद्ध था—
वर्ण बोलने की आज़ादी
बनाम
वर्ण से लाभ लेने की चुप्पी
और इस युग में
सबसे बड़ा अपराध यही है—
अपने नाम के साथ
सच का उच्चारण।
★★★


तीसरा अंक : “बहुजन का प्रश्न”(ब्राह्मण, ठाकुर बनाम बहुजन दृष्टि)
1. जब बहस ऊँचाई पर अटक जाती है
नगर-सभा में फिर भीड़ थी।
मंच पर दो ध्रुव साफ़ थे—
एक ओर
देवव्रत उपाध्याय—
शास्त्र, परंपरा और मर्यादा की बात करते हुए।
दूसरी ओर
वीरजा सिंहदत्ता—
सम्मान, कर्म और समान अवसर की भाषा में।
सभा तालियों और आरोपों में बँटी हुई थी।
पर भीड़ के पीछे,
जहाँ कोई मंच नहीं होता,
वहाँ खड़ा था
कालू नायक।
ना शास्त्री।
ना क्षत्रिय।
बहुजन।
★★★


2. बहुजन का प्रवेश

कालू धीरे-धीरे आगे आया।
न उसकी आवाज़ ऊँची थी,
न शब्द सजावटी।
उसने पूछा—
“क्या मैं भी कुछ कह सकता हूँ?”
सभा रुकी।
पहली बार यह प्रश्न
किसी ब्राह्मण या ठाकुर ने नहीं,
बहुजन ने पूछा था।
★★★


3. सवाल जो असहज करते हैं

कालू बोला—
“आप दोनों लड़ रहे हैं
कि वर्ण बोलना सही है या ग़लत।
पर मेरा प्रश्न अलग है—
जिस वर्ण को बोलने की ताक़त भी नहीं,
उसका क्या?”
लोग चुप।
“जब ब्राह्मण कहता है—
‘वर्ण हमारी पहचान है’
तो उसे संस्कृति कहते हैं।
जब ठाकुर कहता है—
‘वर्ण मेरी गरिमा है’
तो उसे अहंकार कहते हैं।
और जब बहुजन कुछ कहे—
तो उसे
‘राजनीति’
या ‘आरक्षण का लालच’ कह दिया जाता है।”
★★★


4. बहुजन का यथार्थ

“मैं उस समाज से हूँ,”
कालू ने कहा,
“जहाँ—
नाम से पहले जाति लगाओ, तो अपमान
नाम से जाति हटाओ, तो पहचान गुम
आगे बढ़ो, तो ‘कोटा’
पीछे रहो, तो ‘कर्मफल’”
उसने दोनों की ओर देखा—
“आप दोनों का संघर्ष
ऊपर की सीढ़ियों पर है।
हम तो
सीढ़ी बनाने वालों में हैं—
जिनका नाम कहीं लिखा नहीं।”
★★★


5. पहली दरार

वीरजा ने सिर झुकाया।
देवव्रत की उँगलियाँ थम गईं।
कालू ने कहा—
“समस्या यह नहीं कि
ब्राह्मण या ठाकुर कौन है।
समस्या यह है कि
निर्णय हमेशा वही करते हैं,
और कीमत हमेशा बहुजन चुकाता है।”
★★★


6. समरसता का अर्थ

“सामाजिक समरसता,”
कालू बोला,
“मतलब यह नहीं कि
हम सब एक जैसे बन जाएँ।
मतलब यह है कि—
कोई भी जन्म से बड़ा या छोटा न हो
अवसर वर्ण से नहीं, योग्यता से मिले
और इतिहास सिर्फ़ विजेताओं का न हो”
उसने साफ़ कहा—
“जब तक ब्राह्मण और ठाकुर
आपस में तय करेंगे
कि बहुजन को कितना दिया जाए—
तब तक बराबरी एक भाषण ही रहेगी।”
★★★


7. परिवर्तन की शुरुआत

देवव्रत ने पहली बार कहा—
“शायद शास्त्रों को
समय के प्रश्नों से
फिर पढ़ना होगा।”
वीरजा बोली—
“और सत्ता को
अपनी चुप्पियों का
हिसाब देना होगा।”
कालू ने सिर हिलाया—
“और बहुजन को
ख़ुद को ‘अनुग्रह’ नहीं,
अधिकार समझना होगा।”
★★★


8. नया संकल्प

सभा-गृह में एक प्रस्ताव रखा गया—
निर्णय समितियों में
बहुजन की बराबर भागीदारी
शिक्षा और सेवा में
समान मापदंड
और सबसे ज़रूरी—
सम्मान की भाषा
यह कोई क्रांति नहीं थी।
यह संतुलन था।
★★★


9. अंतिम दृश्य

सभा विसर्जित हुई।
कालू बाहर निकलते हुए बोला—
“आज आपने
ब्राह्मण बनाम ठाकुर से आगे
सोचना शुरू किया है।
यही समता की पहली सीढ़ी है।”
वीरजा और देवव्रत
दोनों ने पहली बार
एक साथ सिर हिलाया।
★★★


समापन

यह कथा किसी एक वर्ण की जीत नहीं है।
यह उस समाज की संभावना है—
जहाँ
ब्राह्मण ज्ञान के लिए सम्मानित हो,
ठाकुर जिम्मेदारी के लिए,
और बहुजन—
मनुष्य होने के लिए।
यहीं से
समतामूलक समाज शुरू होता है।

★★★

चौथा अंक : “जाति है—कि जाती नहीं”

1. आधुनिक भवन, प्राचीन मन

शहर के मध्य में खड़ा था
नवीनतम तकनीक से सुसज्जित
निजी वित्त संस्थान—
“आर्यावर्त कैपिटल बैंक”।

काँच की दीवारें थीं,
पर भीतर बैठे मन
अब भी पत्थर के थे।

काउंटर पर थी
सुचिता सामंती—
तेज़, प्रशिक्षित, समय की पाबंद।

आज उसका सामना था
रुचि त्रिपाठी से—
वरिष्ठ अधिकारी,
जिनका त्याग-पत्र
औपचारिकताओं में अटका था।
★★★

2. प्रक्रिया बनाम प्रभुत्व

“इतनी देर क्यों?”
रुचि का स्वर ऊँचा था।

सुचिता ने सुजाता से कहा—
“प्रक्रिया पूर्ण होते ही स्वीकृति मिलेगी, मैडम।”

शब्द सामान्य थे,
पर अर्थ को
अहंकार ने खींच लिया।

रुचि का चेहरा कठोर हुआ—
“तुम जानती हो, मैं कौन हूँ?”

बैंक-हॉल में
वही पुराना प्रश्न गूँजा
जो सदियों से गूँजता आया है।
★★★

3. पहचान का टकराव

सुचिता ने सिर उठाया—
“और आप जानती हैं,
मैं कौन हूँ?”

क्षण भर की नीरवता।

“मैं क्षत्रिय परिवार से हूँ,”
उसने कहा—
न गर्व में,
न धमकी में—
सिर्फ़ तथ्य की तरह।

यहीं से
संवाद फिसल गया।
★★★

4. पुरुष की मध्यस्थता—या साज़िश

घटना यहीं समाप्त हो सकती थी।
पर रुचि के पति
ऋषभ तिवारी 
ने इसे
सोशल माध्यमों पर
“जातीय अपमान”
शीर्षक से डाल दिया।

संवाद काटे गए।
संदर्भ हटाए गए।
और कथा
वायरल हो गई।

अब यह
दो स्त्रियों का टकराव नहीं,
“बाभन बनाम ठाकुर”
घोषित कर दी गई।
★★★

5. मानवतावादी हस्तक्षेप

उसी शाम
एक ऑनलाइन परिचर्चा में
एक आवाज़ उभरी—
नीलम नायक की।

न ऊँची,
न उत्तेजित।

उसने कहा—

“आप दोनों
अपनी-अपनी जाति की बात कर रही हैं।
पर क्या आपने
यह पूछा कि—

इस व्यवस्था में
स्त्री की जाति क्या है?”

लोग चुप।

“मनुस्मृति में
ब्राह्मण स्त्री भी
स्वतंत्र नहीं थी।
क्षत्रिय स्त्री भी
उत्तराधिकार से वंचित थी।

आप दोनों
जिस व्यवस्था पर गर्व कर रही हैं,
वहाँ आप
पूर्ण मनुष्य नहीं थीं।”
★★★

6. बाबासाहेब की याद

नीलम बोली—

“यदि आज
आप बैंक में बैठी हैं,
वेतन पा रही हैं,
निर्णय ले रही हैं—
तो वह
वर्ण व्यवस्था की देन नहीं।

वह देन है
डॉ. अंबेडकर की—
जिन्होंने
स्त्री को
धर्म से नहीं,
अधिकार से जोड़ा।”

हॉल में खामोशी थी।
★★★

7. असली प्रश्न

“असली सवाल यह नहीं,”
नीलम ने कहा,
“कि किसने
कौन-सी जाति बोली।

असली सवाल यह है—

जब बैंक का फॉर्म
आज भी जाति पूछता है,
जब समाज
आज भी जाति से आँकता है—
तो फिर
जाति बोलने पर
नैतिकता क्यों जागती है?”
★★★

8. निष्कर्ष

यह संघर्ष
ब्राह्मण बनाम ठाकुर का नहीं था।

यह संघर्ष था—

जाति पर गर्व
बनाम
जाति से मुक्ति का।

और मानवतावादी दृष्टि
साफ़ कहती है—

जब तक
जाति पहचान का स्रोत रहेगी,
तब तक
स्त्री, श्रमिक और बहुजन
सिर्फ़ मोहरे रहेंगे।

जाति को
न गौरव चाहिए,
न गाली—
उसे चाहिए
विदाई।
★★★

9. अंतिम पंक्ति

नीलम ने कहा—

“जाति पूछने वाली व्यवस्था में
जाति बोलना अपराध नहीं।

अपराध है—
उस व्यवस्था को
हमेशा के लिए
बनाए रखना।”

और यहीं
कथा
वर्ण से आगे
वास्तव में
कदम रखती है।
★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 3 February 2026

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक || गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप — गोलेन्द्र पटेल

बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक

बहुजन आंदोलन किसी एक काल या व्यक्ति की उपज नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे उस प्रतिरोध की निरंतरता है, जो बुद्ध की करुणा से शुरू होकर कबीर–रविदास की निर्भीक वाणी, फुले–सावित्रीबाई की शिक्षा-दृष्टि, शाहू की सामाजिक न्याय नीति और डॉ. अंबेडकर के संवैधानिक संघर्ष तक विकसित हुआ। पेरियार और कांशीराम ने इसे वैचारिक और राजनीतिक धार दी—जहाँ आत्मसम्मान, शिक्षा और सत्ता बहुजन मुक्ति के केंद्रीय औज़ार बने।

इसी ऐतिहासिक परंपरा में गोल्डेन दास एक समकालीन हस्तक्षेप के रूप में सामने आते हैं। वे बिहार में सक्रिय उस बहुजन नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सड़क, थाना और अदालत—तीनों स्तरों पर व्यवस्था से सीधा संवाद करता है। अनेक मुकदमे, बार-बार की जेल यात्राएँ और निरंतर विवाद—दरअसल उनके संघर्ष की सामाजिक कीमत हैं। गोल्डेन दास का नेतृत्व बहुजन समाज के उस आक्रोश को स्वर देता है, जो पुलिसिया दमन, जातिवादी अन्याय और संस्थागत चुप्पी के विरुद्ध खड़ा है।

बहुजन आंदोलन का लक्ष्य आज भी वही है—सामाजिक समानता, राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक प्राप्ति। यह आंदोलन न तो स्मृति है, न नारा; यह एक जीवित संघर्ष है, जो नए समय में नए रूप लेकर सामने आ रहा है। गोल्डेन दास जैसे युवा नेता, सामाजिक योद्धा इसी परिवर्तनशील बहुजन चेतना के समकालीन संकेत हैं।

गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप

यह कोई एक नाम की कथा नहीं है
यह सदियों की चलती हुई पदचाप है
जिसमें तथागत की मौन करुणा है
और कबीर की आँखों में जलता प्रश्न।

रैदास ने सपने को
चर्मकार की झोपड़ी से उठाया
तुकाराम ने भक्ति को
ब्राह्मणवाद की कैद से छुड़ाया
फुले ने इतिहास को
पहली बार
शूद्र की आँख से पढ़ा
और सावित्रीबाई ने
ज्ञान को
स्त्री के हाथों में सौंप दिया।

शाहू ने सत्ता को
नीचे झुकना सिखाया
अंबेडकर ने संविधान में
बहुजन का हस्ताक्षर दर्ज किया
पेरियार ने ईश्वर से सवाल किया
कांशीराम ने कहा,
सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म है।

यह परंपरा
किसी मंदिर में नहीं ठहरी
यह सड़क पर उतरी
थानों में दाख़िल हुई
और अदालतों से आँख मिलाकर बोली।

इसी परंपरा में
एक नाम और जुड़ता है
गोल्डेन दास।

वे किताब नहीं हैं
वे फ़ाइल भी नहीं
वे एफआईआर के पन्नों में
लिखा हुआ प्रतिरोध हैं
सत्तर मुक़दमे
दरअसल सत्तर बार
सिस्टम से की गई पूछताछ हैं
बीस जेल यात्राएँ
दरअसल बीस बार
अन्याय को दी गई चुनौती हैं।

वे थाने में जाते हैं
डर के साथ नहीं
संविधान लेकर
वे पूछते हैं
कानून किसके लिए है?
और जवाब न मिले तो
आवाज़ को और ऊँचा कर देते हैं।

बिहार की गलियों में
जब उनका नाम गूँजता है
तो दलित स्त्री की आँख
थोड़ी कम डरी होती है
पिछड़े मज़दूर की पीठ
थोड़ी कम झुकी होती है
अल्पसंख्यक बच्चे
थोड़ा सीधा चलते हैं।

वे विवाद हैं
क्योंकि अन्याय को
शांति पसंद नहीं आती
वे आक्रामक हैं
क्योंकि सदियों का अपमान
नरमी से नहीं टूटता।

बहुजन आंदोलन
कोई बीता हुआ अध्याय नहीं
यह वर्तमान का खुला घाव है
जो शिक्षा माँगता है
सम्मान माँगता है
और सत्ता में हिस्सेदारी माँगता है।

यह आंदोलन कहता है
हम 85 प्रतिशत हैं
फिर भी हाशिए पर क्यों?
यह आंदोलन कहता है
बहुजन हिताय
अब सिर्फ नारा नहीं
बहुजन सुखाय
अब नीति बनेगा।

इसलिए गोल्डेन दास
कोई अकेला व्यक्ति नहीं
वे एक निरंतरता हैं
बुद्ध से अंबेडकर तक
और अंबेडकर से
आज की सड़क तक।

यह क्रांतिकारी आवाज़ 
किसी महिमा का गीत नहीं
यह एक घोषणा है
कि बहुजन
अब इतिहास में नहीं
इतिहास के केंद्र में
खड़े होने आ रहे हैं

और यह यात्रा
अब लौटने वाली नहीं।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





Monday, 2 February 2026

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना — गोलेन्द्र पटेल

राजकुमार यादव : बहुजन बिरहा की समकालीन चेतना


राजकुमार यादव आज के समय में बिरहा को केवल लोकगायन नहीं, बल्कि बहुजन समाज की वैचारिक आवाज़ में रूपांतरित करते हैं। पूर्वांचल की मिट्टी से निकली उनकी गायकी मनोरंजन से आगे बढ़कर जागरण का मिशन बन जाती है। वे उस बिरहा परंपरा के गायक हैं, जहाँ विरह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक होता है।

उनके गीत तथागत बुद्ध, संत कबीरदास, संत रविदास, संत तुकाराम, राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, राजर्षि छत्रपति शाहू जी महाराज, विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर, पेरियार, कांशीराम, ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा की वैचारिकी से संचालित हैं। जाति-व्यवस्था, मनुवाद, धार्मिक पाखंड, मीडिया-सत्ता गठजोड़ और संविधान की अवहेलना—ये सभी विषय उनकी गायकी में प्रतिरोध की भाषा पाते हैं। मंच पर उठता “जय भीम” और “नमो बुद्धाय” केवल नारे नहीं, बल्कि बहुजन आत्मसम्मान की उद्घोषणा हैं।


राजकुमार यादव की बिरहा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अशिक्षित और ग्रामीण समाज तक भी सामाजिक न्याय की जटिल अवधारणाओं को भावनात्मक और संगीतमय ढंग से पहुँचाती है। यही कारण है कि उनकी गायकी समर्थन और विवाद—दोनों के केंद्र में रहती है। समर्थकों के लिए वे बहुजन की सच्ची आवाज़ हैं, और आलोचकों के लिए असुविधाजनक प्रश्न।

वस्तुतः राजकुमार यादव की बिरहा यह सिद्ध करती है कि लोक-संस्कृति जब चेतना से जुड़ती है, तो वह आंदोलन बन जाती है। बहुजन आंदोलन का दिमाग जहाँ विचार गढ़ता है, वहीं उनकी बिरहा उसकी वह आवाज़ है, जो समाज को सुनाई देती है।


मिशन बहुजन बिरहा गीत
(चाल: “मनुवाद की खटिया खड़ी कर देहला” – बहुजन बिरहा सम्राट राजकुमार यादव जी को समर्पित)

(ढोलक – ठेकेदार चाल, प्रवेश हुंकार)
अरे सुनो रे भाई सुनो,
आज बिरहा आग उगले!
जय भीम! नमो बुद्धाय!
मनुवाद का खेल न चले!


मुखड़ा (Hook Line – बार-बार आएगा)

खटिया हिल गई रे बाबा,
जब संविधान बोला,
जय भीम की गूँज पड़ी तो
झूठा भगवान डोला।



पूरब की माटी बोले आज,
आजमगढ़ से तान चली,
गाजीपुर–सुल्तानपुर
हर चौपाल में बात चली।

हम गाना नहीं आए साथी,
हम मिशन लेकर आए,
जो सदियों से दबा पड़ा था
आज वही सवाल उठाए।

मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब बहुजन जागा,
जिसने पचासी को लूटा था
उसका हिसाब माँगा।



पहले बिरहा साजन रोवे,
अब बिरहा समाज रोए,
भूख, जाति, अपमान की पीड़ा
सुर बनके बाहर होए।

बाबासाहेब जब उतरे स्वर में,
भीड़ नहीं—इतिहास खड़ा,
किसी की आँख में आग जली,
किसी का कलेजा फटा।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब भीम बोला,
संविधान की एक-एक पंक्ति
सत्ता को चुभोला।



कांशीराम जब रावण बनें,
मनुवाद काँप जाए,
जो झंडा ओढ़ के लूट करे
उसका नक़ाब उतर जाए।

रविदास बोले—सब एक समान,
फुले पूछें—ज्ञान किसका?
पेरियार तर्क की आग जलाएँ,
अंधविश्वास का दम घुटता।


मुखड़ा
खटिया हिल गई रे बाबा,
जब सवाल उठा,
जिस मूर्ति को खुद गढ़ा हमने,
उससे डर क्यों लगा।



(संवादात्मक बोल – राजकुमार यादव स्टाइल)
बताओ रे भाई बताओ,
कुम्भ से पेट भरता है?
या बाबा साहेब का संविधान
भूखे को रोटी देता है?



EVM सोए, मीडिया बिके,
दलाल धर्म बेचें,
संविधान की कमाई खाने वाले
जनता को कैसे देखें?

जो वोट को मंदिर में बेचे,
जो धर्म से राज चलाए,
उनकी खटिया यही मंच पर
बिरहा आज गिराए।

मुखड़ा (तेज़, हुंकार के साथ)
खटिया हिल गई रे बाबा,
अब गिरने वाली है,
बहुजन एक हुआ है अब
सरकार बदलने वाली है।



भीम आर्मी की नीली हवा
गीत बनके फैल जाए,
भीम पाठशाला की हर बच्ची
कल संविधान पढ़ाए।

नगीना से गूँजे पैग़ाम,
युवा कंधे से कंधा जोड़ें,
SC–ST–OBC–अल्पसंख्यक
एक ही सुर में बोलें।

अंतिम मुखड़ा (सबसे तेज़, क्लोज़िंग)
खटिया गिर गई रे बाबा,
अब राज नहीं चलेगा,
जय भीम! नमो बुद्धाय!
बहुजन ही देश संभालेगा।


(हुंकार)
जय भीम! जय भीम!
राजकुमार की तान,
यह बिरहा नहीं रे बाबा,
यह बहुजन की पहचान।

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना — गोलेन्द्र पटेल

  सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना भारतीय समाज की संरचना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी हुई ...