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Saturday, 15 August 2020

डॉ.विपिन कुमार {आचार्य~बीएचयू} की "सत्रह कोरोजीवी कविताएँ"

 






१.

एक ही नहीं थे

कई जोड़े थे

दो बजे के बाद

जब स्कूल 

बंद हो जाता था

शांत वातावरण में

पुलिया पर बैठकर

गुलजार किये रहते थे

शांत माहौल को


स्कूल की बाउंड्री और पुलिया

मेरे सरकारी आवास के मित्र हैं

परिचय बना रहता है लगातार

वहाँ के कार्यसेवकों से

आते-जाते, घूमते-टहलते

नित्य देखता रहता हूँ

उन परिन्दों को

जो उस पुलिया पर आश्रय लेते हैं


कालोनी के कई मित्रों को देखा है

डाट-फटकार कर उड़ाते हुए

वे मानते कहाँ है

सैर-सपाटा कर फिर आ बैठ जाते हैं

मुझे बहुत सुख मिलता है उन्हें देख

मैं कभी छेड़ता नहीं हूँ उन्हें

वे मुझसे बेफिक्र रहते हैं

जैसे मेरी दोस्ती हो गयी हो उनसे


कभी लड़की पुलिया पर बैठी है

और लड़का साइकिल पर

गाल पर हाथ रखे धीमे स्वर में

होंठ हिलते पर आवाज न आती

कभी लड़का पुलिया पर

लड़की स्कूटी पर बैठी होती

कभी लड़की का पैर तो 

हाथ छूने की कामयाब कोशिश


कभी ऐसा भी दिखता

दोनों कमर में हाथ डाले बैठे

राहगीरों की आवा-जाही को

अनदेखा कर आलिंगन करते

कभी तो अच्छी खासी नोक-झोक

कलह में बदल जाती है

गाली-गलौज और संबंध विच्छेद की

स्थिति आयी है कई बार


ऐसा नहीं कि उनकी सारी हरकतें

मुझे अच्छी ही लगती हैं

कुछ तो बहुत अश्लील होती हैं

सोचता हूँ इस उमर में नहीं तो कब

सोचता हूँ इस बेरोजगारी के दौर में

नौकरी न सुकून बस परेशानी

कुछ न सही कुछ पल के लिए

प्रेम ही सही भले चोरी छुपे ही सही

कभी-कभी मुँह से निकल जाता है

लगे रहो कोई गम नहीं


कुछ दिनों से पुलिया सूनसान पड़ी है

बरबस निगाहें उधर पहुँच जाती हैं

कमी बहुत खल रही है

चाहे-अनचाहे वे जोड़े 

अपने से लगने लगे थे

सोचता हूँ कि उन परिंदों पर

क्या बीत रही होगी आज कल

जो केवल इतना ही सीख पाये थे

प्रेम तो लोक के बंधन से परे है।

१० अप्रैल

2.

आवारा आग जलाती है

केवल जलाती है

पहचानती नहीं वह

किसी रिश्ते को

आग को आवारा छोड़ने वाला

भूल जाता है कि

रास्ते में उसका भी घर है

जलेगा सब तो

बचेगा वह भी नहीं

आवारा आग जलाती है

केवल जलाती है।

२० अप्रैल

3.

सदाबहार के पत्ते

पीले हो रहे हैं

माली की तरफ देख रहे हैं

माली ने वादा किया था

समय- समय पर पानी देने का

तपती धूप और लू के दिनों में


तपन बढ़ती ही जा रही है

कुछ के पत्ते सूख रहे हैं

कुछ के तने सूख गये हैं

कुछ मृत हो चुके हैं

कुछ अभी इंतज़ार में खड़े हैं

झेल रहे हैं तीखी धूप की मार

झेल रहे हैं तेज लू के थपेड़ों को


माली आता-जाता है

उसी रास्ते से बार-बार

सुनकर भी अनसुना कर देता है

कराह को, पुकार को

देखकर आँखे चुराता है

ठिठकता भी नहीं, ठहरता भी नहीं

कभी सहलाता था, खुश होता था

देखकर हरियाली को


आज संकट में है सदाबहार के पौधे

माली के वाले याद आते हैं बार- बार

छलावा था माली का वादा

गीत से लगते हैं उसको

सदाबहार के  दुख-दर्द और कराह

अब वह मुंह नहीं दिखाता

ढंक लिया है चेहरे को

कपड़े के अजीब से टुकड़े से

इस उम्मीद में कि

वक्त गुजरने के बाद छल सके

जिन्दा बचे कुछ सदाबहार को।

२५ अप्रैल

4.

लॉकडाउन के 30 दिन पूरा होने पर 


देश की गरीब जनता को सलाम! 

जिसने जीवन बीज बचाने के लिए 

भूखों रहने का संकल्प लिया


सलाम! उन हाथों को जिसने

भाईचारा को जिंदा रखने के लिए

लाखों भूखों को निवाला दिया


सलाम! उन डॉक्टरों को जिसने

जाति-धर्म से ऊपर उठकर

पीड़ितों का इलाज किया


सलाम! उन सफाई कर्मियों को

जिसने सड़क से अस्पताल तक को साफ रखा


सलाम! उन दुकानदारों को

जिसने दवा और राशन दिया


लड़ाई अभी जारी है

सलाम! लड़ने के हर एक जज्बात को।

२५ अप्रैल

5.

निगाहें टिकी हुई हैं

टीवी स्क्रीन पर लगातार

विश्व के सभी देशों में

गिनती जारी है

कौन आगे है और कौन पीछे

यह जानने की

बेताबी लगातार बनी हुई है


कहीं हजार में तो कहीं लाख

जो आगे है वह दुखी है

जो पीछे है वह भी दुखी है

जो दोनों की होड़ में नहीं है

वह होड़ में आना भी नहीं चाहता

जब कोई गिनती

अपने आस-पास आ जाती है

हलक सूख जाता है

चिंता बढ़ जाती है


व्यक्ति खुद को देखता है

परिवार को देखता है

आँखे भर आती हैं

मासूमों को देख

न चाहते हुए भी बार- बार

मन में आ ही जाता

पहले कौन? 

आँखे बंद हो जाती हैं

चेतना शून्य में

विचरण करने लगती हैं


यह पहली गणना है

जिसमें सारे देश

पीछे रहने की जद्दोजहद में हैं

कोई किसी से

आगे नहीं निकलना चाहता

आज का चुनाव 

किसी व्यक्ति के लिए नहीं है

इसमें देश खड़े हैं मैदान में


हार जीत का फैसला

अधिक संख्या पर नहीं है

कम से कम संख्या पर है

विजेता तो वही होगा

जिसकी संख्या शून्य होगी

यह जीवन बचाने का चुनाव है


ताज इंतज़ार कर रहा है

किसी नेता का नहीं

किसी योद्धा का नहीं

उस देश के वैज्ञानिक का

उस देश के डॉक्टर का

जो खोज लायेगा

जीवन की सुरक्षा के लिए वह दवा

जिससे दुनिया में गिनती रूक जाय।

२७ अप्रैल

6.

सरकार की तरफ से

जरूरी और सराहनीय कदम

आम परिवार की औरतें और बच्चे

चालीस दिनों से

टी वी ड्रामा देखकर ऊब चुके थे

आज से उनको लाइव ड्रामा

देखने का सुअवसर मिलेगा


आज से फिर एक बार

आम आदमी का घर

चीख पुकार से गुंजायमान होगा

साहब ने साहब के लिए

जाम की व्यवस्था कर दी है

साहब तो साहब के सुकरगुजार हैं

पड़ोसी भी साहब के सलामगार

लॉकडाउन में बैठे बिठाये

एक और मनोरंजन होता रहेगा


साहब ने साहब के लिए नहीं

साहब ने साहब के बहाने

अपने साहब के लिए रास्ता बनाया है

चालीस दिन साहब ने

अपने साहब की हरकतों को

इसी वादे के झांसे में झेला है


अपने साहब के वादे

निभाने के लिए

साहब सारे वादे तोड़ आये हैं

आम जनता के सहारे

अपने लिए रास्ता बनाये हैं

गिनती अभी जारी है

कोई उपाय आना अभी बाकी है

फिर भी सबको कतार में

खड़ा कर आये हैं


पिओ और पीते रहो

४ म

7.

बस यहीं तक जिन्दगी


रूक जा तू

कदम है मेरा

मानता क्यों नहीं?

सुन रहा है किसकी? 

कहाँ ले चलेगा? 

क्यों ले चलेगा? 


सुनता ही नहीं

समझता ही नहीं

है मेरा ही कदम

बगावत कर बैठा है

जोर नहीं है मेरा

चल दिया है किधर


मन घूमता है

रोटी तलाश में

मन रोकता है

जिन्दगी की आश में

कदम कह रहा

यहाँ न रोटी न जिन्दगी


मांगा रोटी

वर्दी से टोपी से

वर्दी से मिली लाठी

टोपी तो कहीं खो गयी

किस बात का इंतज़ार

मन रे चल कदम के साथ


इंतज़ार में हैं

बूढ़ी आँखें जहाँ

लिए हाथ में सूखी रोटी

कमाई सूखी हडिड्यों से

आज के लिए ही

लाल के लिए भी


पेट तू सब्र कर

कदम तेरे साथ है

तू अकेला नहीं रे

दायें-बायें देख ले

तेरी जिम्मेदारी भी

है तेरे साथ में


मुन्ना-मुन्नी सिसक रहे हैं

अपनी माँ की गोद में

पहाड़ सा दुख लिए

कदम सरक रहा है

दूरी ज्यादा नहीं है

हजार मील की बात है


कहीं पानी मिले तो

प्यास मैं बुझाता हूँ

भूख का नाम मत लेना

भूख ने ही मारा है

मन रे चलता रहा

कदम तुम्हारे साथ है


थक चली हैं सासें

ढह चली हैं उम्मीदें

कदम ने भी छोड़ा साथ

मन हुआ अब हताश

न मिली माँ न मिली मंजिल

बस यहीं तक जिन्दगी। 

बस यहीं तक जिन्दगी।

१५ मई

8.

मझधार में हैं तो सहारा, 

खुद ही बनना पडे़गा। 

उसकी तरफ मत देखो, 

घर पत्थर का बना रखा है। 

आप की बेबसी का आलम, 

परिन्दों की बेबसी में है। 

परिन्दों को कब से उसने, 

पिजड़े में बन्द किये रखा है।

११जून

9.

यह कुआँ 

रोज खोदने

और पानी पीने वाला नहीं

यह मिला है

पहले से खुदा हुआ

पानी भरा हुआ है

बाल्टी है जगत पर

रस्सी के सहारे


पानी साफ नहीं है

गंदला है

नीचे झांकने पर

उसकी गंदगी और बदबू 

स्वादहीन रंग बिखेर रही है

प्यास अपार है

पर पीने का साहस नहीं है


मेरे सामने ही आकर

प्यास के बस भेट चढ़े

कुछ ने साहस किया

कुछ ने सांस छोड़ दी

कुछ छटपटा रहे हैं

कुछ कतार में हैं


ये वही लोग हैं

जिन्होंने बेच दिये थे

अपने सभी सपने

अपने कल के लिए

सपनों की कीमत पर

उन्हें मिला था यही कुआँ

पीना तो है 

मरने के लिए

या जीने के लिए

उनके हिस्से का

यही है एक कुआँ

१३जून

10.

हरवाह


यह एक मजबूरी और 

बेबसी भरा शब्द है

वैसे तो है भारी-भरकम

यह ढोता रहता है

भूमिहर काश्तकारों का

खेत-खलिहान, पशु-परानी

क्षीणकाय जर्जर कंधों पर


व्यक्ति हरवाह बनने की

योग्यता तब रखता है

जब वह भूखों मरने लगे

परिवार दाने-दाने को

तरसने लगे

यहाँ तक कि शरीर पर

फटे चिथड़े के सिवा

कोई दूसरी अमानत न हो

और योग्यता पर जीने के

सारे रास्ते बंद हो चुके हों


फिर शुरू होती है

हरवाह बनने की परीक्षा

इसके लिए गिड़गिड़ाना

सबसे सफल प्रमाण पत्र है

जूठन खाना और 

गंदगी साफ करना

साथ ही मनुष्यता के

सारे लिबास उतार देना

फिर बैल के साथ

बैल जैसा जीवन जीना

सहायक प्रमाण पत्र हैं


चेतना में आग ढोना

व्यवहार में 

बादल जैसा बरसना

धीरे-धीरे आग को

पानी में बदल देना

पूंछ न होते हुए भी

हमेशा पूंछ हिलाना

हँसी न आते हुए भी

खुद के लिए गाली पर

हँसी की आदत डाल लेना

चारित्रिक विकास है

विश्वासपात्र बनने की कला

अनायास दो-चार लात 

हमेशा खाने के लिए तैयार रहना 


आज हरवाह की कोटि

बदल चुकी है

हरवाह के मायने 

बदल चुके हैं

आज लोग मजबूरी में नहीं

स्वार्थ में हरवाह बनते हैं

गला काटने के लिए भी

हरवाह बनते हैं लोग

गले लटकने के लिए

हरवाह बनते हैं लोग

गला छुड़ाने के लिए

हरवाह बनते हैं लोग

सिद्धांत बेंचकर

हरवाह बनते हैं लोग

संवेदना का सौदा करके भी

हरवाह बनते हैं लोग


बड़ा बिस्तार हुआ है

आज हरवाह का

गाँव में मिल जायेंगे हरवाह

कस्बे में मिल जायेंगे हरवाह

शहर में मिल जायेंगे हरवाह

गली में मिल जायेंगे हरवाह

अॉफिस में मिल जायेंगे हरवाह

संसद में मिल जायेंगे हरवाह

एक बार पहचान जाइये

हर जगह मिल जायेंगे हरवाह

२५जून

11.

कपड़ा सीधा करना

कपड़ा लोहा करना

चिंगुरन छुड़ाना

कपड़ा प्रेस करना

इसके लिए एक शब्द समूह

और अाता है

कपड़ा इस्त्री करना


जब कपड़े की बात आती है

मन यहाँ पहुँचकर 

कुछ देर के लिए

ठहर जाता है

सबसे अधिक चलन में

यही वाक्य है

अमूमन यह काम

स्त्रियाँ ही करती हैं

वे भी बार-बार 

यही वाक्य दुहराती हैं


स्त्रियाँ कोमलांगी, मृदुभाषी

सुशील, सुन्दर और

बेहद ही सीधे-साधे 

स्वाभाव की होती हैं

छल-कपट से परहेज करती हैं

सीधी रेखा में

जीवन जीती हैं


बार-बार सोचता हूँ

सिकुड़न युक्त कपड़े को

सीधा करने के लिए

इस्त्री करना ही क्यों

प्रयोग किया जाता है

पुरुष करना क्यों नहीं

जबकि पुरुष तो

स्वाभाव से एकदम 

आड़ा-तिरछा होता है


लगता तो यही है कि

यह वाक्य पुरुषों द्वारा

स्त्री को उसकी

पुरुष पराधीनता को

बनाये रखने के लिए

पुरुष द्वारा गढ़ा गया

मुकम्मल वाक्य है

ताकि स्त्री काम भी करती रहे

पुरुष पराधीनता को

महसूस भी करती रहे

२६जून

12.

एक बाज मडरा रहा था

आज सुबह से

घर के आस-पास

कौवे तो अक्सर दिख जाते थे

पर बाज

बहली बार दिखा था

जितना कि मुझे याद है

बीते दस सालों में


दस साल पहले दिखा था

वह कोई दूसरा था

आज जो मडरा रहा था

उसका रूप रंग

पहले जैसा नहीं था

मंसा नहीं समझ पाया था

ऐसे ही आ गया होगा

समझ कर

घर के अंदर चला गया


अभी कल की बात है

बेटे ने बड़ी उत्सुकता से

हाथ पकड़ा और

यह कहते हुए

बाहर ले गया कि

देखो! अमरूद के

छोटे वाले पेड़ पर

चिड़िया घोसला बनायी है

थोड़ी दूर से 

दोनों देख ही रहे थे कि

एक छोटी सी काली चिडि़या

आकर घोषले में बैठ गयी


उसको कुछ असहज न लगे

इसलिए हम दोनों

धीरे से वहाँ से हट लिए

बेटे ने सारी बात

अपनी मम्मी को बतायी

उन्होंने एक मुट्ठी चावल लिया

पेड़ के नीचे बिखेर आयीं

रात बीती 

आज की सुबह से

उसकी आवा-जाही बनी रही


दरवाजे पर रोज

चिड़ियों को देखते रहते हैं

इसलिए वह उत्सुकता

ज्यादा देर तक न रही

और बाज की साज़िश भी

न भाप सका 

आज शाम को जब

मैं सपरिवार बाहर बैठा था

तभी घोसले में चिड़िया

आराम से बैठी थी


बेटे ने एक बार फिर

उसकी तरफ

ध्यान आकर्षित किया

इस सवाल के साथ

पापा! वह क्या कर रही है? 

बिना कुछ सोचे 

मैंने जवाब दिया

अंडा से रही है

उसने फिर पूछा कि

पापा! फिर तो बच्चा निकलेगा? 

मैं हाँ में जवाब दिया

उसने चहकते हुए कहा

तो मैं उसे पालूंगा

बात पूरी ही हुई थी कि

बाज ने झपट्टा मारकर

उसे अपने पंजों में दबोच लिया

हमारे मुँह

खुले के खुले रह गये।

२९जून

13.

झुरमुट


कंटीली झाडियों और

घास-फूस का 

एक सघन आकार

इसके पीछे 

छुपा जाता है

इसके अंदर भी

छुपा जाता है

विषधर और विष विहीन

आश्रय लेते रहते हैं


विषधर छिपता है

शिकार के लिए

विष विहीन छिपता है

आश्रय के लिए

कुछ झुरमुट प्राकृतिक

तो कुछ मानवीकृत

मानवीकृत 

सजग रूप से

बनाये जाते हैं

कटीले मानवों से

ये होते हैं

चलते-फिरते झुरमुट


कटीले मानवों के झुरमुट में 

घास-फूस मानव

समय-समय पर

झुरमुट से अलग होकर

अपने कांटे 

बिखराने के लिए

उतर जाता है

मानव समाज में

बिखेर जाता है

जहरीले कांटे


कुछ अवसर पर

पूरा झुरमुट 

उतर आता है

मानव बस्तियों में

दिलों में दहशत

फैलाने के लिए

ये झुरमुट मानव नहीं

मानव विध्वंशक रोबोट हैं

जो बनाये जाते हैं

पीछे छिपने के लिए

विध्वंशक आकाओं द्वारा


ये झुरमुट बसते हैं

सभ्य बस्तियों में

रहते हैं उनके जैसे ही

उनके बीच

समय-समय पर

बढ़ाते रहते हैं

अपनी झाडि़यों की संख्या

सघनता बढ़ाने के लिए

संख्या बढ़ाने का हथियार

लालच और बेरोजगारी


एक छोटी सी झाड़ी

होती है बहुत विषैली

बनी ऐसे मानवों से

बहुत मुश्किल होता है

पहचान पाना

कौन है झुरमुट का हिस्सा

शांति के दिनों में

अचानक 

चेहरा सामने आता है

हाथ में हथकड़ी लगते ही

भौचक्की निगाहें

घूरने लगती हैं


एकाध झाड़ियों के

नष्ट हो जाने पर

कुछ असर नहीं दिखता

आकाओं पर

जब झुरमुट आ जाता है

कानून के गिरफ्त में

आकाओं की चाल

सामने आने लगती है

वह सामने नहीं आता

दूसरे झुरमुट के पीछे छिपकर

नारा लगवाता है

मानवाधिकार का।

३०जून

14.

हथियार बनाने वालों ने 

अपने और एक 

बिगड़े हुए हथियार को 

तोड़ दिया

आप के अंदर का भय

भगाने के लिए नहीं

अपनी पहचान

छुपाने के लिए


कोई बात नहीं

आप निश्चिंत मत होइये

उनके गोदाम में 

ऐसे अनगिनत हथियार हैं

कल कोई नया हथियार 

जरूर लान्च होगा 

जो इससे अधिक मारक 

और घातक होगा


आप का भय

उनकी ताकत है

अपनी ताकत को

बनाये रखने के लिए

वे तोड़-फोड़ का खेल

खेलने में माहिर हैं

नया हथियार

जब बिगड़ेगा

उसे भी तोड़ देंगे

यह सिलसिला

चलता रहेगा

और आपका भय

बरकरार रहेगा।

१०जुलाई

15.

#समुद्र#


दाहिने भुखमरी गरीबी का समुद्र 

और लाचार तड़पती जिंदगी

बायें मजबूरी खड़ी है 

और बेबसी से सजा हूँ। 

मैं तो समुद्र के बीच खड़ा हूँ। 


आगे बेरोजगारी का साया

और हर शहर भटक कर आया हूँ

पीछे देखने की हिम्मत नहीं

मां-बाप की आशायें छोड़ आया हूँ

लोग समुद्र देखने जाते हैं

मैं तो समुद्र के बीच खड़ा हूँ। 


अफवाहों को वादे समझ बैठा था

विश्वास की जमीन सोचकर

चला था साथ उनके हर कदम

कदम गिनने की फुर्सत में नहीं हूँ

लोग समुद्र देखने जाते हैं

मैं तो समुद्र के बीच खड़ा हूँ। 


देखा है रोज उनके हाथों को

खून से लथपथ अखबारों में

पुरस्कार की तख्त है आज

सजी उनकी बाहों में

लोग समुद्र देखने जाते हैं

मैं तो समुद्र के बीच खड़ा हूँ।

२१जुलाई

16.

एक बार व्यवस्था बदलकर देखो

तुम उनकी आरती उतारो

उनकी भी कलाइयों को सजने दो

एक बार उनसे भी रक्षा भीख मांगकर देखो


मांगने में कितना सुख है

एक बार तुम भी भोगकर देखो

कब तक वही मांगती रहेगी सुरक्षा की भीख

कब तक रहेगी वह असुरक्षित

एक बार तुम भी असुरक्षित होकर देखो


मुबारक

३अगस्त

17.

बारिश बहुत विषैली है

जहरीले कीड़े

चारों तरफ फैल चुके हैं

पत्तों को खाकर

तार-तार कर रहे हैं


दवा का छिड़काव

अब जरूरी हो चुका है

जड़ों में घुस जायेंगे तो

चारों तरफ

वीरान ही नजर आयेगा


समय रहते कुछ करो

पेड़-पौधों का रस 

बहुत तेजी से चूस रहे हैं

कुछ के मुँह में

खून लगा देखा है


जल्दी करो

ऐसा न हो कि

ये कीड़े

हमारी पीढ़ियां ही 

खत्म कर दें

१०अगस्त

 
साहित्यिक परिचय :-

जन्म : १जनवरी १९८०

शिक्षा : एम.ए., नेट, डी.फिल.

प्रकाशित रचनाएँ :-

सर्द हवाओं में, काफी नहीं इतना {कविता संग्रह} ;

कहत कबीर सुनहु रे तुलसी {कहानी संग्रह} ; अंतिम विकल्प {उपन्यास} ; दलित समाज और साहित्य {संपादित}

संपादन :- अनिश {साहित्यिक पत्रिका}

संप्रति :- असिस्टेंट प्रोफेसर{स्टेट-३}, हिन्दी विभाग, बीएचयू-वाराणसी 221005

संपर्क :- एल-12 , तुलसीदास कॉलोनी , बीएचयू-वाराणसी।

ई-मेल :- bipink317@gmail.com

मो. :- 8765625611


https://www.youtube.com/c/GolendraGyan

संपादक संपर्क सूत्र :-

ई-मेल :- corojivi@gmail.com

मो. :- 8429249326

नाम :- गोलेन्द्र पटेल

बीएचयू , बी.ए. द्वितीय वर्ष ,चतुर्थ सत्र

नोट :-  अहिंदी भाषी साथियों के इस पेज़ पर आप का आत्मिक अभिवादन ,अभिनंदन व सादर स्वागत है।

Monday, 10 August 2020

वरिष्ठ कवयित्री डॉक्टर रचना शर्मा मैम का १२ "कोरोजीवी प्रेम कविताएँ""

 ◆डॉक्टर रचना शर्मा मैम का 12 "कोरोजीवी कविता"

1.
यौवन की दहलीज़ पर
खड़ा मन
कैसे ढ़ो पाया होगा
सूखी लकड़ियों का गठ्ठर अपने  सिर पर
जब ओढ़नी चाहिए थी उसे
लाल चुनरिया गोटे वाली ।

उसके उम्र की लड़कियाँ
जब अपने बच्चे को  छाती से लगाये
सोती होंगी सर्द रातों में
अपनी ममता को संतुष्ट करती
चैन की नींद ।
उस उम्र में अन्तस के वात्सल्य को
आले में एक कोने में छुपा कर
कैसे रखा होगा उसने गठ्ठर
अपने सिरहाने ।

जब सब कस रहे थे
अपने सपनों को
श्रम की कसौटी पर
जी रहे थे भरपूर जीवन प्रिय की कोमल बाँहों में
वह चल रही थी लगातार
अपने जिस्म की आग को राख करती
गठरी और पगडंडी के बीच सामंजस्य बैठाती
उस रास्ते पर
जो किसी ठौर तक नहीं जाते थे।

बुधनी हो या मीता
दूसरों के लिए जीवन भर गठ्ठर ढोती स्त्री को
नहीं पता होता
वह स्वयं ही दे रही है
स्वयं को मुखाग्नि ।---------रचना।
2.
समय कब रूका है
किसी की मुँडेर ।

वह तो झप्प से उड़ जाता है
जैसे आँख खुलते ही
खट्ट से खो जाता है सपना
गुम हो जाता है तुम्हारा चेहरा ।

मैं फिर से करने लगती हूँ
रात होने की प्रतीक्षा
जी सकूँ
सुकून के दो पल तुम्हारे साथ ।

काश विरह भी होता समय की तरह
आँख खुलते ही
झप्प से उड़ जाता
हमारी मुँडेर से । -------रचना ।
3.
तुम्हारा प्यार
मुझमें असीमित संभावनाओं को जन्म देता है
जैसे मिट्टी जन्म देती है
सुन्दर फूलों और फलों को
बादल के बरसने पर ।

तुम्हारा प्यार
भरता है मुझमें सोंधी गन्ध
एक एहसास से ऊर्जित रहती हूँ
आस पास हरीतिमा भरते तुम्हारे शब्द
मुझमें स्पंदित रखते हैं
स्त्री होने के भाव को ।

प्यार में होना
जीवन की उच्चता में होना है । ------रचना ।

4.
मेघ आये द्वार हमारे
आओ चलें आँचल फैलायें
समेट लायें वर्षा की बूँदें |
तपते - तपते तन को मन को
शीतल - निर्मल करनेवाली 
रिमझिम - रिमझिम गिरती झरती
बर्फीली सी , कुछ शर्मीली
मुझको जीवन देती है |

धरती को रंग देने वाली
वृक्षों को धो देने वाली
नदियों में लहरें भर देती
मन में नया उमंग - उल्लास |
छोटी - छोटी पर बलवान
खुद में भर ताकत अपार
सब को जीवन दे जाती हैं |

मत रोको अब खुद को घर में ,
आँगन में आओ सब भींगो
बूंदों से तुम जीना सीखो 
सबको जीवन देना सीखो | ..................... रचना |
5.
मेरे लिए तुम्हारे आँखों की  घृणा
मेरी उपलब्धियों पर तुम्हारी ख़ामोशी
कुछ भी श्रेष्ठ मेरे पास न हो इसकी कामना
कोई भी मुझसे प्यार न करे इसकी प्रार्थना
और मेरे आस-पास के लोगों में
मेरे प्रति घृणा भरने की कोशिश
मुझे कोई कुछ न दे यह भावना 
इन सब ने मुझे योग्य और मजबूत बनाने में
बड़ी भूमिका निभायी है
मैं तुम्हारी घृणा और तुम्हारे असहयोग के लिए
तुम्हारी उतनी ही ऋणी हूँ
जितना कोई सुडौल घड़ा
होता है ऋणी
कुम्हार के प्रति ।

मैं अब तैयार हूँ और भी ज्यादा
आग में तपाये जाने के लिए
मेरी प्रार्थना है
मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया जाये 
मुझमें नमी रहेगी तो मैं
नव सृजन करूँगी
कर्मठता होगी तो
अन्तिम साँस तक लड़ूँगी । ---------रचना।
6.
उसकी महफिल में मेरे जाने पर इतनी पाबन्दियाॅ थीं
हमारी मुलाकात भी होती तो किस तरह होती  
मिल जाता गर  कोई शख्स रस्ते में आता जाता
पूछ लेती हाल उसकी बीमारियों का मैं 
रहना फिक्रमंद मेरी आदत तो न थी कभी    
वो शख्स ऐसा था कि फिर फिर याद आता था---   रचना
7
वह मेरे भाल  पर लिखता रहा अपना नाम
मैं खामोश चुपचाप 
उसके कंधे पर  सिर टिकाए बैठी रही ।

कई दिनों तक यूं ही ख़ामोश
जैसे कोई शब्द ना हो मेरे पास ।

ऊँनींदी सी  उन आंखों को मैं
खोलना भी नहीं चाहती थी
पलकों पर रखे  ख्वाब खहीं गिर ना जाए
जबकि मैं कहना चाहती थी बहुत कुछ
बहुत कुछ पूछने और जानने के लिए भी था मेरे पास
पर सच है
कुछ क्षण ख़ामोशी में ही
जिये जाने चाहिए
प्रेम
खामोशी में भी बहुत कुछ कहता है।-------रचना ।
8.
पर्यावरण दिवस पर विशेष।

मुट्ठी भर छावं  .................

यहाँ से वहाँ तक
फैली धरती पर
अनगिनत संख्या में लगे हैं
वृक्ष |
पर कोई घना छायादार नहीं
कुछ की ऊँचाई तो
आश्रितों से भी कम
कुछ इतने ऊँचे
कि
आश्रयदाता हो ही नहीं सकते |

शायद
वातावरण में फैली विसंगतियों ने
मनुष्य के साथ ही
छीन लिये हैं
वृक्षों के भी संस्कार |

या फिर
लोगों ने ही
बंद कर दिये हैं लगाने
ऊँचाइयों से
धरती की ओर जानेवाले
जड़ों से युक्त
वटवृक्ष |

आओ
हम सब प्रण करें
और लगायें
मात्र एक ऐसा वृक्ष
जिसकी जड़ें
धरती में गहरा जाएँ
और जो
भविष्य में हमें दे सके
निर्मल निश्छल
मुट्ठी भर छावं |.................रचना |
9.
कुछ अलग सी बस्तियों में
दोस्त अब रहने लगे हैं
जो कभी हमनवा थे
अजनबी लगने लगे हैं |

डरी हुयी आँखें हैं सबकी
मुस्कुराहटें ठहरी हुयी हैं
खोयी खिलखिलाहटें हैं सबकी
मुलाकातें अजनबी हुयी हैं |

मौत के डर से हैं सहमें
चाहतों के सिलसिले
जो गले लगते थीं हरदम
बाहें वो अजनबी हुयी हैं |

कुछ अलग सी बस्तियों में
दोस्त अब रहने लगे हैं
जो कभी हमनवा थे
अजनबी लगने लगे हैं |---------------रचना |
10.
जैसे किसी ने लूट लिया हो
मेरा खजाना
ऐसा था माँ
तुम्हारा जाना ।

***********************
नहीं पहुँच पाता था
कोई आघात
मुझ तक
तुम
कवच थी माँ ।

************************

दुःख
लांघते नहीं थे देहरी
जब
तुम साथ थी माँ ।

***************************
जब-जब
ठण्डी हवा चली
तुम बहुत याद आयी
माँ ।                         -------------------------रचना ।
11.
कभी साथ तेरे
दीप दो
गंगा में प्रवाहित कर सकूँ
कर सकूँ मैं आचमन
संग में तुम्हारे
और मेरे भीगे ललाट पर तुम
रक्तिम चंदन की टिकुली लगा
शेष मेरी माँग में छुआ दो
पूर्ण समझूँगी उसी दिन शिवार्चन को ।-------रचना।
12.
एक शाम
आँख में रुका सपना ढलक गया
सिन्दूरी रंग बिखर गया
शाम के धुँधलके में
एक साया जो अलग हुआ
अपनी सुगन्ध छोड गया
भटकती रह गयी मैं
जैसे मृग ।--------रचना ।

साहित्यिक परिचय :-

            बनारस में जन्मी,पली बढी और वर्तमान में बनारस के  ही राजकीय महिला महाविधालय में बतौर एसोसिऐट प्रोफेसर अध्यापन कर रही कवयित्री रचना शर्मा ने स्नातकोत्तर डिग्री करने के बाद पी-एच डी की। बनारस में जन्मी,पली बढी हैं, जाहिर है साहित्य और संस्कृति से लगाव पैदाइशी है। रचना शर्मा की कविताएं और लेख हिन्दुस्तान, कादम्बिनी,सोच विचार, गर्भनाल,क‍विताम्भरा,प्रज्ञा पथ,उत्तर प्रदेश आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है ।अभी तक उनके तीन कविता संग्रह अंतर पथ(2012), नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो (2015) तथा नदी अब मौन है(2019)  प्रकाशित हो चुके है। इसके अलावा एक निबन्ध  संग्रह पुरातन संस्कृ्ति अधुनातन दृष्टि (2019) तथा काशी के पौराणिक इतिहास पर आधारित पुस्तक काशीखण्ड और काशी प्रकाशित (2010)हो चुकी है । रचना शर्मा 70 राष्ट्रीय  एवं 20 अर्न्तराष्ट्रीय स्तर की संगोष्टियों में प्रतिभाग कर चुकी है तथा उनके तीस से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके है। रचना शर्मा को 

साहित्य श्री सम्मान 2014

मातृ शक्ति सम्मान 2015 भारतीय भाषा सम्मान 2015 शब्द साधना सम्मान 2016 (इनाल्को यूनिवर्सिटी पेरिस में प्रदत्त )

उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान द्वारा शब्द शिल्पी सम्मान 2018 से नवाजा जा चुका है ।



रचना शर्मा की रचना धर्मिता के बारे में ख्यात समीक्षक ओम निश्चल कहते है कि कवयित्री रचना शर्मा के तीन संग्रह अंतर पथ, नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो तथा नदी अब मौन है प्रकाशित हो चुके है । अंतर पथ उनके सहृदय‍ चित्त की बानगी देने वाला संग्रह था तो नींद के हिस्से  में कुछ रात भी आने दो स्त्री मन की भावनाओं का ज्ञापन,जिसमें छोटी छोटी रचनाओं में प्रश्नानकुलता के साथ वे जीवन जगत के अपने अनुभवों को संवेदना की शीतल पाटी पर उकेरती है। नदी अब मौन है संग्रह में कवयित्री का मन पर्यावरण और प्रकृति के साहचर्य में अपनी कल्पना के ताने बाने बुनता है तो जीवन में सहज ही आयत्त प्रेम की कल्पनाओं में डूबता भी है । जीवन जितना कुदरत से दूर होता जा रहा है उतना ही प्रेम से रिक्त। रचना शर्मा की कविताएं जीवन को प्रेम और कुदरत के साहचर्य से संवलित करने का उपक्रम है। उनकी कविताओं में स्त्री की तमाम कोमल अभिलाषाएं है तो प्रीत की डोर में बंधने से लेकर नदियों के कूल किनारे ,प्रकृति के मंडप तले परिणय रचाने की उत्कंठा भी ।

👆👇

एसोसिऐट प्रोफेसर, संस्कृत 

राजकीय महिला महाविद्यालय,

डी.एल.डबल्यू,वाराणसी 

इ.मेल : rachanasrachana@gmail.com. 


प्रकाशित  पस्तकें 05

1. काशीखण्ड और काशी ( काशी के पौराणिक इतिहास  पर आधारित  पुस्तक )

 2. अन्तर-पथ (कविता  संग्रह  )

 3. नींद के हिस्से में कुछ रात भी आने दो (कविता संग्रह  )

4.पुरातन संस्कृति अधुनातन  दृष्टि ।( निबन्ध संग्रह )

5. नदी अब मौन है ( कविता संग्रह )


प्रकाशित शोध –पत्रों की संख्या - 30


क्रियेटिव राइटिंग ---- हिन्दुस्तान, कादम्बिनी  ,सोच-विचार,गर्भनाल,कविताम्बरा ,प्रज्ञा-पथ,

 उत्तर प्रदेश ,आदि पत्र पत्रिकाओं में कवितायेेँ एव॔ लेख  प्रकाशित ।


अंतर-राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय संगोष्ठीयों में प्रतिभाग और प्रस्तुत शोध पत्र ।

कुल 90 संगोष्ठियों में प्रतिभाग ।

अंतर-राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रस्तुति----------------20

राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुति ---------------------70

राज्य स्तरीय संगोष्ठी में प्रस्तुति  -----------------09

पुरस्कार एवं सम्मान  

1.तमिलनाडु हिन्दी अकादमी द्वारा सम्मान 2014.

 2. साहित्य श्री सम्मान  2014 

 3. मातृ शक्ति सम्मान  2015 

 4. भारतीय भाषा सम्मान  2015

 6. शब्द साधना सम्मान  2016 शुलभ इंटरनेनल द्वारा इनालको यूनिवर्सिटी  पेरिस, फ्रांस में प्रदत्त ।

7. शब्द शिल्पी सम्मान 2018 उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान ,लखनऊ ।

9450183026


सम्पर्क सूत्र :-

corojivi@gmail.com


मो.नं. : 🇮🇳 8429249326




Wednesday, 15 July 2020

कोरोजीवी कविता // कोरोजयी कविता : श्रीप्रकाश शुक्ल

वरिष्ठ कवि ,आलोचक व आचार्य प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल :-
★कोरोजीवी कविता // कोरोजयी कविता★
https://golendragyan.blogspot.com/2020/07/blog-post_12.html?m=1
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कोरोजीवी कविता नए इतिहास विवेक की कविता है -प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल

के.एल.पचौरी प्रकाशन,नई दिल्ली  द्वारा  उसके आमुख पटल पर हिंदी के  ख्यात कवि और  बीएचयू,हिंदी विभाग के आचार्य प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल का एकल व्याख्यान 'कोरोजीवी कविता: प्रक्रिया और पाठ' विषय पर संपन्न हुआ ।

इस अवसर पर बोलते हुए प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि इस दौर की कविता को 'कोरोजीवी' कविता कहना उचित होगा क्योंकि  कोरोजीवी कविता ने दुनियाभर में साहित्य  की भाषा को  बदल दिया है।आज कोरोना की  महामारी में निजी अनुभूति सार्वजनिक हो गयी है जहां भय, निर्वासन और मुत्यु की यन्त्रणादायक स्थितियों से  हम रोज गुजरते हैं जिनसे आज के समय में हमारा संबंध तय होता है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे समय में जहां मीडिया व व्यवस्था सिर्फ़ आंकड़ों तक सीमित हो गई है,कविता व साहित्य ने इन आकड़ो को ध्वस्त करते हुए  अपनी एक भाषा रची है जिसमें समाज की संवेदनशीलता को जगह मिलती है।आज की कविता दृश्य- परिदृश् में बदलाव के साथ  अपने भाषाई सामर्थ्य  व  सामाजिक अर्थवक्ता से जुड़ गई है ।

प्रो शुक्ल ने आगे कहा कि कोरोजीवी कविता जीवन जीने का एक विकल्प दे रही है जो कथ्य में व्यक्त हो रही है और संरचना में बदल रही है ।उनके अनुसार आज की हिंदी कविता  प्रसिद्ध फ्रांसीसी उपन्यासकार अल्बेर कामू के 'प्लेग' उपन्यास के प्रमुख नायक  डॉ.रियो की भूमिका में दिखाई देती है जो उदासीनता का निषेध करने के साथ, दहशत पैदा करने वालों का भी निषेध करती है।

प्रो शुक्ल के अनुसार,कोरोजीवी कविता का महत्व इस कारण नहीं है कि वह महामारी के बीच लिखी जा रही है बल्कि इस कारण है कि यह  महामारी के बावजूद लिखी जा रही है जिसमें युगबोध की उपस्थिति के साथ इतिहास बोध की नई अंतर्दृष्टि भी है । किसी भी समय विशेष की कविता की विशेषताओं में एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि उस समय की कविता अपने परिवेश के भीतर कैसे विकसित होते हुए एक नई दृष्टि और चेतना के निर्माण में सहायक होती है ।कोरोना के समय में कविता ने अपने को कैसे विकसित किया यह जानना जरूरी है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कोरोजीवी कविता एक नई दृष्टि और चेतना को लिए हुए है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह मात्र आपदा को अवसर में नहीं बदलती बल्कि यह आपदा के आंतरिक मर्म को उद्घाटित करती हुई आगे बढ़ी है ।उनके अनुसार , ऐसे समय में जो अवसरवादी सक्रिय हैं,वे जनता के साथ छल कर रहे हैं ,मुनाफा खोरी कर रहे हैं ,ठग विद्या को विकसित कर रहे हैं। ऐसे में हिंदी कविता उस छल के समक्ष मनुष्य को बल और संबल प्रदान करती है । 

आगे आपने कहा कि 90 के बाद का दशक श्रम का शोषण करता रहा जिसके भीतर से यह महामारी विकसित हुई है।उन्होंने इसे पूंजीवादी विकृतियों की देन मानते कहा कि आज की हिंदी कविता इसी  पूंजीवाद के विकृतियों को ध्वस्त करती है।उनके अनुसार,कोरोजीविता कविता में परिवेश के प्रति एक संवेदनशील व्यवहार मिलता है जिससे कविता कोरोजई हो सकती है।

 उनके अनुसार,कोरोजीवी कविता ने संप्रदायगत सजगता की जगह इतिहास विवेक पैदा किया।साथ ही हमें सजग किया कि हम जिस भूगोल पर चल रहे थे उस पर हमारा ध्यान बने रहना चाहिए। कविता को उन्होंने आंतरिक लय के दायरे में लोकोन्मुखी मानते हुए कहा कि यह कोरोजीविता ही  कविता की कोरोजयिता का प्रमुख  आधार है । 

इस अवसर पर उन्होंने मदन कश्यप,अरुण कमल,सुभाष राय,संजय कुंदन,विनय कुमार,यतीश कुमार,सोनी पांडेय,रश्मि भारद्वाज,पूनम विश्व कर्मा,अमरजीत राम,संदीप तिवारी,शैलेन्द्र शुक्ल  से लेकर बिल्कुल नवांकुर कवि गोलेन्द्र पटेल की कविताओं के संदर्भ से अपनी स्थापनाओं को पुष्ट भी किया।

उनके अनुसार ईश्वर की अलौकिकता से अधिक मनुष्य की आंतरिक शक्ति में बढ़ता हुआ आत्म विश्वास इस कोरोजीवी कविता का एक प्रमुख लक्षण बनकर उभरा है जहां मानव अस्तित्व के लिए गहरी चिंता व्यक्त होती है और अंधकार पर प्रकाश के विजय का संकल्प दिखाई देता है।


(प्रस्तुति:रंजना गुप्ता)

कोरोना समय में रची गई कविताओं पर लोगों ने अपनी तरह से प्रतिक्रियाएं दी हैं| कई ने, जिन्हें न तो समस्याओं में उलझे समाज से कुछ लेना-देना था और न ही तो समय की क्रूरता से, कवि की भूमिका और कविताओं की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया| कवि ने अपनी भूमिका का निर्वहन जिस तरीके से किया है और जिस तरह से कविताओं ने संघर्ष की भूमि को उर्वर बनाने का श्रम किया है, वह बिलकुल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता|
लखनऊ से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स में एक लेख प्रकाशित हुआ है| यह लेख कोरोना समय में लिखी गयी श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं पर आधारित है| इसे प्रकाशित करने के लिए जनसन्देश टाइम्स का हृदय से आभार और सुभाष राय सर का, जो स्वयं एक अच्छे कवि हैं और जिन्होंने कोरोना समय में जिम्मेदार कविताओं का सृजन की है, हृदय से आभार| तो आइये यह लेख पढ़ते हैं और कविता की जिम्मेदारी को पहचानते हैं-
आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर
-------------------------------
इस कोरोना समय में सबसे अधिक आरोपों का सामना यदि किसी विधा ने किया है तो वह कविता है| विरोध करने वालों के अपने-अपने कारण और अपनी-अपनी राजनीति होती है| यदि मुझे कहना हो तो मैं कहूँगा कि सबसे अधिक जिम्मेदारी जिस विधा ने निभाई वह कविता है| राजनीति लोगों की हो सकती है कविता की नहीं| कविता कवि-नीति से निभती है जिसका एकमात्र उद्देश्य होता है जन-जीवन की खुशहाली और समृद्धि| कवि निःस्वार्थ भाव से इसी दायरे में रहकर श्रम करता है|
कोरोना समय में रचित श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में भूख है, भय है, त्रासदी है, प्रकृति है| आगत भविष्य के प्रति कुछ आशंकाएं हैं तो स्पष्टता भी है| अपनी कविताओं में कवि समस्याओं पर बयानबाजी नहीं करता अपितु यथार्थ स्थिति को उठाकर एकदम सामने रख देता है| मजबूर और बेबस लोगों का ‘तप्त सड़कों’ पर नंगे पाँव चलना, ‘अटैची पर अटा पड़ा’ बच्चे को लाचार माँ द्वारा खीचकर घर की तरफ वापसी करना, अपनों के इन्तजार में अपनों का वेबस होना, सुखी और सम्पन्न लोगों के अन्दर अधिक डर का होना, ये सारे के सारे ऐसे दृश्य हैं जो कवि के हृदय को चीर कर निकले हुए हैं| चीर कर निकलना कोई सरल मुहावरा नहीं है| कितना दुखी हुआ होगा कवि इन दृश्यों को देखकर यह सोचना सहज है कविताओं का सामना करना बहुत मुश्किल है| मुश्किल इसलिए है कि सुख के दृश्य आदमी बार-बार देखना चाहता है जबकि दुःख जिस तरह झेलना नहीं चाहता उसी तरह देखना भी नहीं चाहता| इस मायने में श्रीप्रकाश शुक्ल ने एक जाग्रत कवि का परिचय दिया है| 
इस कोरोना समय में सभी डरे हुए हैं| जो जितना शक्तिशाली है या सम्पन्न है वह उतना डरा हुआ है और जो जितना ‘निर्बल’ है या अभावों से घिरा है भयमुक्त है| ‘डर’ का अपना समाजशास्त्र होता है यह कवि ने ‘डर’ कविता में बताना चाहा है| इधर की स्थितियों को देखते हुए यह तो स्पष्ट हो ही गया कि “बहुत ताकत बहुत डर पैदा करती है/ जो बहुत ताकतवर होता है/ डरा होता है!” यह साधारण सी बात है कि “बहुत ताकत का होना असल में/ बहुत के शोषण से संभव होता है/ और यह शोषण ही बहुत ताकत के तकिए के नीचे दबा होता है/ जो डराता रहता हैं” और डरे हुए लोग भयाक्रांत होकर इधर छिपते फिर रहे हैं|
वैसे हुआ यह पहली बार है जब शोषण करने वाले आपदा की गिरफ्त में हैं अन्यथा तो शोषित ही समस्याओं के हत्थे चढ़ता था| कवि डर कर घर में बैठने के लिए नहीं है| वह सामाजिक गतिविधि पर बराबर नज़र रखे हुए है| गतिविधियाँ बिलकुल सामान्य नहीं हैं| चारों तरफ अफरा-तफरी मची हुई है| इतनी कि ‘इंतजार’ के निमित्त “एक दृश्य देखता हूँ/ दूसरा उछलने लगता है/ एक आंसू पोछता हूँ/ अनेक टपकने लगते हैं|” सहज मन भी अशांत होकर ऊंघता है और एक घर से अनेक घरों को जाने-आने वाले के इंतजार में घुट-घुटकर जीता है, ऊंघता है| ऐसे परिदृश्य में वर्तमान रहते हुए “हाय कैसे कहूँ कि हर क्षण एक  बीतता हुआ क्षण है/ और जो बीत  रहा है/ वह किसी अनबीते का महज़ इंतज़ार लगता  है/ जिसमें सीझती हुई करुणा/ गुजरते समय की उदासी बन/ कंठ में अटक सी  गई है!” न तो कुछ बोला जा रहा है और न ही तो कुछ समझा और समझाया जा रहा है|
इसी कविता के माध्यम से कवि यह भी देखता है कि तमाम राहों के तमाम अटके-भटके लोग, बच्चे नहीं पहुँच पा रहे हैं जिनके वियोग में “दूर बहुत दूर कोई मां रो रही है/ अर्थ तो बचा नहीं/ भाषा भी खो रही है|” दुःख से भाव और भाव से भाषा की विकृति का होना सामाजिक प्रक्रिया का क्षीण होना है| माँ की जिन आँखों को सुख-सुविधा हेतु सांत्वना देकर एक बालक दूर-देश में गया होता है वही बालक सब कुछ गंवाकर पुनः उसी माँ के पास ‘लौटना’ चाहता है| कभी केदारनाथ सिंह ने कहा था ‘जाना सबसे खतरनाक क्रिया है’ लेकिन मजदूरों, मजबूरों और महानगरों से ठुकराए गए लोगों को ‘तप्त सड़कों’ पर नंगे पांव चलते, भागते और आते हुए देखकर कवि कहता है “जाना नहीं  रही अब  एक  ख़तरनाक क्रिया/ नई  सदी में लौटने की यह क्रिया/ जाने से  कहीं अधिक  ख़ौफ़नाक  है!” इस अर्थ में कि-
भूख तो बड़ी थी लेकिन उन्हें सिर्फ पहुंचना था
उन तक पहुंचाए गए सारे आश्वासन अब तक बेकार हो चुके थे/ अनुशासन के नाम पर/   उनके पास अब सिर्फ एक जिद बची थी/ कि उन्हें घर पहुंचना है
उनकी जिद व घर के बीच  एक  गहरा तनाव था/ जिसमें घर लगातार निथर रहा था!
मुश्किलें विकराल हो रही थीं/ जिनके  समाधान के लिये वे घर  पहुंचना चाह रहे थे/ मानों  ख़ैर ख्वाह यह घर/ उनके ख़ैर -मकदम के लिए वर्षों से खड़ा हो!
उनकी जिद लगातार बड़ी हो रही थी/ और इस जिद में बड़ी हो रही थीं उनकी उम्मीदें/ जिसे अब एक घर से ही  संभव होना था
कितना ताकतवर था यह 'पहुंचना' कि/ एक पथियाई पथरीली जमीन पर कभी सायकिल से  तो कभी पैदल चलते/ ठंडे पानी की तरह बह रहा था  उनके भीतर/ जिससे लौटने से अधिक पहुंच पाना संभव हो रहा था

‘बाहर’ होना बेघर होना है| यह पहली बार लोगों को एहसास हुआ कि ‘घर’ सही अर्थों में ‘घर’ है जहाँ पहुँचना मात्र, अपनों द्वारा संरक्षित और सुरक्षित होना है| दूर प्रदेशों से घर की तरफ लौटना सही अर्थों में लौटना नहीं पहुँचना है| यहाँ उत्कंठा है, उत्साह है, डर है, भय है और इन सभी से निजात तभी मिलेगी जब वह घर पहुंचेगा| “घर लौटने से अधिक पहुंचने के लिए होता है/ यह  तब  पता चला जब वे तप्त सड़कों पर/ संतप्त भाव से लौट रहे थे/ और अपनी पुरानी स्मृतियों को सहलाते/ नंगे  पांव उस सड़क पर दौड़ रहे थे/ जिससे कभी वे गए थे|” जाने और आने के बीच की जो त्रासदी है वह हमें हतप्रभ करती है| इसलिए भी कि जो जिस हाल में है, भाग रहा है कि भगाया जा रहा है बस उसी हाल में चला आ रहा है| कवि की ‘बच्चा’ कविता एकदम से द्रवित कर देती है जिसमें एक बच्चे को हेतु बनाकर माँ की ममता, बच्चे की दयनीयता और एक हद तक सभी राही-बटोही की बेबसी के साथ-साथ जीवन-संघर्ष को शब्द-चित्र में पिरो दिया है कवि ने| कवि देखता है कि “सड़क पर अटैची है/ और अटैची पर अटा पड़ा एक बच्चा/ जो पहियों के बल सरक रहा है/ बच्चा डोरी से बंधा है/ जिसे मां एक टांग से खींच रही है/ अपनी दूसरी टांग से सड़क को नापती/ बच्चा मां की मदद कर रहा है/ वह चुप्प है/ कि ओह!/ सब कुछ घुप्प है!”
सडकें शांत हैं, लोग गायब हैं| हर तरफ नीरवता है| ‘घुप्प’ शब्द अपनी अर्थवत्ता लिए होता है| सही अर्थों में कोरोना काल की “यह लगातार बड़ी होती  जाती एक  खबर है/ कि जेठ की इस तपती दोपहरी में/ सड़क के ठीक बीचो बीच एक बच्चा शांत है/ और मां की गर्दन की तरह सड़क को/ दोनों हाथ से जकड़ रखा है|” पूरा देश देख रहा है इस दृश्य को| आह-वाह की प्रक्रिया चल रही है| न्यूज चैनल बहस कर रहे हैं| विद्वान डिबेट का हिस्सा बने हुए हैं| दिल्ली का मुख्यमंत्री सुविधाओं का ऐलान कर रहा है| कांग्रेस बस चलवा रही है और भाजपा उसे रोक रही है| इस बीच उसी गति में “बच्चा चला जा रहा है/ और चली जा रही है यह माँ भी/ जिसके साथ लटक गई है यह कविता/ न तो माँ को पता है/ न ही इस कविता को/ कि इनको  किस पते पर जाना है!” यहाँ कवि उसी दर्द से तड़प रहा है जिस दर्द से माँ अपने बच्चे के लिए व्याकुल है| यह पूरे कोरोना काल का सबसे भयावह दृश्य है और कवियों की भीड़ में पहली कविता| माँ की वेबसी में बच्चे की भूख जैसे गायब हो जाती है उसी तरह सृजन की अनिवार्यता में कवि के आँखों की नींद गायब हो जाती है|  
कवि यह देखकर हैरान है कि जिस देश में अभी भी ‘रोटी’ एक स्थाई समस्या है उसी देश में ‘आत्मनिर्भर’ बनने का मंत्र दिया जा रहा है| यहाँ ‘रोटी’ बनने की प्रक्रिया से लेकर बिखरने और अपदस्थ किए जाने तक की स्थिति को जिस गंभीरता से वह रखता है हमें ठहरकर सोचने के लिए विवश होना पड़ता है| कवि देखता है कि “रोटी बन रही है/ अनेक के इंतज़ार में/ लोई पड़ी है/ लोई से रोटी बनने के बीच एक जगह है/ जहां उम्मीद है/ रोटी रोज़ ही इस उम्मीद के साथ निकलती हैं/ लेकिन हलक़ के नीचे उतरने से पहले ही/ बिखर जाती है|” रोटी का बिखरना आम आदमी की इच्छाओं और अभिलाषाओं का बिखरना है| यहाँ यह समझना जरूरी है कि ‘रोटी’ बनने और ‘आत्मनिर्भर’ होने के बीच ही ‘उम्मीद’ है जिस पर यह पूरा देश निर्भर है और यदि स्पष्टतः कहें तो जिन्दा है| जहाँ तक सवाल ‘हलक के नीचे उतरने’ का है तो जो सदियों से भूखे और नंगे रहते आए हैं फिलहाल ‘उम्मीद’ जैसी स्थितियां उनके लिए भयानक स्वप्न हैं|  कवि मानता है कि इस देश में “रोटी का बिखरना/ नहीं है कोई घटना/ जनता अभी भी सड़क पर है/ और उसके पलट प्रवाह के बीच/ देश आत्म निर्भर हो रहा है/ आत्म निर्भर होता देश अब/ रोटियों  से आगे निकल चुका है!” अब यह कौन समझाए कि जो जनता सड़कों पर है वह आत्मनिर्भर बनने के लिए ही निकली थी, लेकिन ‘रोटी’ के अभाव ने उसे फिर सड़कों पर लाकर छोड़ दिया| जिस भूख को बार-बार अपदस्थ किया जा रहा है वही भूख जब इस देश की स्थाई समस्या है तो कोई कैसे आत्मनिर्भर हो सकता है?
आत्मनिर्भर तो प्रकृति हो सकती है| सबको अशांत करके स्वयं शांति का उदाहरण रखती है| मुरझाए रहते हैं सब तो वह खिलखिलाकर हंसती है| जैसे मनुष्य प्रकृति को अशांत करके खिलखिलाता है| ‘गुलमोहर’ कविता में कवि-दृष्टि की यह गंभीरता देखिये-
धूप खड़ी है/ हवा स्तब्ध है
जेठ की धरती पपड़िया गई है/ पगडंडियां चिलचिला रही हैं
सड़क सुनसान है/ और आदमी अपनी ही छाया में कैद है
एक ज़हर है/ जिसमें पूरी बस्ती नीली हो गई है
बस बचा है केवल गुलमोहर/ जो अपने चटक लाल रंगों में/ अभी भी खिलखिला रहा है!”
सब त्रासद स्थिति में फंसे हुए हैं तो ‘गुलमोहर’ ‘अपने चटक लाल रंगों में अभी भी खिलखिला रहा है|’ होना तो यह चाहिए था कि सबके दुःख में दुखी होकर इसके चटकपन में कमी आ जाती लेकिन नहीं आई| सबके विपद के दिन इसके लिए उत्सव के लगे| ठीक हमारे समय के तथाकथित कवियों और विद्वानों की तरह| इन्हें और गुलमोहर को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे, यह समय आपदा का समय ही नहीं लोभ-वृत्ति को साधने और अंखुवाए लालची स्वभाव  के पुष्पित और पल्लवित होने का भी समय है| यह समय एक हद तक साहित्य का ऐसा विदूषक समय बनता दिखाई दे रहा हा जहाँ सभी ज्ञानी और सभी कवि की भूमिका में हैं| इस तरह से लाइव और वाच पार्टी के मोहजाल में फंसकर ‘व्यस्त’ हैं जैसे यदि वे नहीं लाइव आएँगे तो देश का बहुत अहित हो जाएगा| अधिकांश संख्या उन्हीं की है जो अभी तक साहित्यिक दुनिया में ‘फोकस के बाहर’ रहे| ऐसे वक्ता-प्रवक्ता-कवि-साहित्यकार कवि को दिखाई देते हैं जो कोरोना जैसी भयंकर आपदा को ‘अवसर’ के रूप में भुना रहे हैं| दरअसल वे जानते हैं ये कि जितने गुण हैं उन्हें दिखाने का यह उपयुक्त समय है, बाद में तो कोई पूछता नहीं| ऐसे लोगों की सक्रियता को कवि “विकल काल का विमल महोत्सव” कहता है, जहाँ “लिखना कम है दिखना  ज्यादा/ सिझना कम है  खिझना ज्यादा/ भिदना कम है छिदना  ज्यादा/ सिट पिट कम है गिट पिट ज्यादा|” यहाँ सिट पिट का अर्थ है चमत्कृत करती ध्वनि और गिट पिट का अर्थ है उलझी हुई ध्वनि| एक तरफ तो चमत्कृत करने की लालसा है और दूसरी तरफ कुछ स्पष्ट न कर पाने की वेबसी| इन सबको मिलाकर स्वभावतः ‘दिखना’ और ‘खिझना’ ही उनके अब तक के जीवन की प्रमुख दिनचर्या रही है|
श्रीप्रकाश शुक्ल के कवि-दृष्टि की एक खाशियत यह भी है कि वे अपने समय के सभी प्रश्नों पर चौकन्ने रहते हैं| समय जब परिवर्तित होता है तो बहुत कुछ बदल कर रख देता है| कई नई धारणाएँ जन्म लेती हैं तो कई टूटती भी हैं| यहाँ सारी-की-सारी स्थापनाएं धरी रह जाती हैं और जिज्ञासु मन वेबस होकर उलझ जाता है| कवि ‘उत्तर - कोरोना...(आत्माएं होंगी,आत्मीयता न होगी!)’ कविता में यह कहकर आश्चर्य व्यक्त करता है- “कितना विकट समय है कि जब दुनिया का सारा विज्ञान एक रोएं के हजारवें भाग से भी छोटे वायरस की काट नहीं खोज पा रहा है/ लगभग एक ब्रह्म की सूक्ष्म सत्ता की तरह इधर उधर छिटक रहा है/ अपने स्वरूप को लगातार बदलता हुआ हर क्षण धरती का खून पी रहा है/ तुम मुझसे उत्तर की अपेक्षा कर रहे हो” उत्तर कवि ही देगा यह भी सबको पता है| एक बार ‘बात बात में’ चर्चा करते हुए श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा था ‘जहाँ सभी सत्ताएँ निरुपाय हो जाती हैं वहीं से शब्द-सत्ता अपना कार्य शुरू करती है|’ आज जब कोरोना के सामने विज्ञान से लेकर आध्यात्म तक विवश और हताश नजर आ रहे हैं तो यही शब्द-शक्ति है जिससे हम संघर्ष की प्रेरणा ले रहे हैं| कवि यहाँ भी यही कहना चाहता है-“क्या तुम जानते हो/ यह आस्थाओं के फड़फड़ाने का दौर है/ जिसमें संत कवियों की एक बार फिर से वापसी हो रही है/ जब उन्होंने कहा था कि इस जगत में एक ही ब्रह्म की सत्ता है/ बाकी सब मिथ्या  है!” वह ब्रह्म शब्द है| आस्थाएँ फडफडा रही हैं नये तरीके ढूंढ रही हैं जबकि शब्द संघर्ष कर रहे हैं और हमें तमाम डर, भय और आशंका से मुक्ति दिला रहे हैं| कवि यह भी मानता है कि कोरोना काल के बाद ऐसा समय आएगा-
जहाँ अभिव्यक्तियाँ होंगी/ लेकिन आस्वाद न होगा/ लोग लौट रहे होंगे/ लेकिन लौटने के लिए कुछ न होगा
आत्माएं होंगी आत्मीयता न होगी/ एक देह होगी जिसको एक आत्मा ढो रही होगी
यह चिंताओं व शंकाओं  के संघर्ष का दौर होगा/ जिसमें हर कुछ एक भय की  तरह समर्पित होगा/ जहां स्वीकारने के अलावा और कुछ न होगा/ और संघर्ष के मोर्चे पर हर बार विवेक ही मारा जायेगा
यह जो समय अब हम कोरोना के साथ जी रहे हैं जैसे-जैसे समय बीत रहा है, कोरोना का आतंक बढ़ता जा रहा है, सही अर्थों में हम उत्तर कोरोना काल में पहुँचते जा रहे हैं| घर से बेघर हो रहे लोग दर-ब-दर होकर भटक रहे हैं| जिन्दा आदमी इतना डरा हुआ है कि किसी को देखना नहीं चाह रहा है| कोई किसी को छू रहा है तो लड़ाई हो जा रही है| कोई कुछ कह रहा है हम महज स्वीकार रहे हैं| विवेक का क्षरण पहले ऐसा हुआ कहाँ? कवि के इस कथन में भी कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि “शासक बहुत उदार होंगे/ लेकिन उनमें सब कुछ को पाने की एक जल्दी होगी/ लगभग इस समय की वाचाल मीडिया की तरह/ जहाँ ब्रेक के बाद भी/ एक पुराना ही चीखता है|” पुराने की चीख ही वर्तमान सत्तासीन शासक के पास शेष है| उसका अपना कार्य और कर्तव्य बिलकुल याद नहीं है| जब कवि यह कहता है कि “क्या तुम जानते हो/ वायरस का कोई पूर्व काल नहीं होता/ उसका सिर्फ एक वर्तमान होता है/ जो सदा एक उत्तर में बदल रहा होता है” तो हमें पता चलता है कि अतीत सिर्फ मनुष्य का होता है जिससे वह सीख ले सके| काल और मनुष्य-शत्रु का मात्र वर्तमान होता है ‘जो सदा एक उत्तर में बदल रहा होता है|” इस उत्तर कोरोना काल के बाद सही अर्थों में हम ऐसे समय में पदार्पण करने जा रहे हैं जहाँ से “यह एक नई शुरुआत होगी/ लेकिन शुरू करने के लिए कोई न होगा|” फिर? उसी शब्द की सत्ता होगी जिसेक नेतृत्व में मनुष्य नए समाज की संरचना और नई व्यवस्था का विधान रचेगा| 
अपने समय के प्रश्नों से टकराना श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं का मूल उद्देश्य है| इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह महज शब्द-व्यापार से कार्य नहीं चलाता अपितु हृदय-पक्ष को भी सक्रिय रखता है| कवि-हृदय अपनी स्वाभाविकता में इस तरह रमा हुआ है कि घर-परिवार से लेकर देश-समाज तक को दशा और दिशा उपलब्ध करवा रहा है| यही कोरोना त्रासदी का भी कहना है| अपने से अपनों का ख्याल रखिये| जब हम श्रीप्रकाश शुक्ल की इन कविताओं को पढ़ते हैं तो अपने से अपनों का ख्याल न रखने की बजाय सम्पूर्ण मानव जगत पर चिंतित होते हैं| श्रीप्रकाश शुक्ल का कवि-हृदय  सही अर्थों में यही चाहता है|
इस लिंक को भी आप देख सकते हैं


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छंद एक प्रकार का स्पन्द है:श्रीप्रकाश शुक्ल


('बात में बात'  शीर्षक से शीघ्र प्रकाश्य हिंदी के महत्वपूर्ण कवि श्रीप्रकाश शुक्ल Shri Prakash Shukla से हुई लंबी 'फोन वार्ता' का संपादित अंश -अनिल कुमार पाण्डेय)

प्रश्न:::
प्रश्न के रूप में मैंने उनसे पूछा था कि सोसल मीडिया पर छंद की वापसी को लेकर जो घमासान मचा हुआ है ,उसके बारे में आपके क्या विचार हैं?ऐसा पूछना इसलिये भी जरूरी है कि आप खुद ही कभी कभी छंद में लिखते हैं जैसे कि 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित आपकी कविता 'सुबह -ए- बनारस' और 'नागा बाबा आये हैं'और कई बार उसे  बीच में तोड़ भी देते  हैं।

जबाब सुनें--श्रीप्रशुक्ल

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देखो अनिल,जो केवल छंद की दुहाई देते हैं वे अबोध हैँ।जो केवल मुक्त छंद की बात करते हैं वे अज्ञानी हैं और इन दोनों से अलग जो वाक्य को ही कविता बनाने पर आमादा हैं,वे उद्धत हैं।ऐसे लोग वाक्य को केवल संज्ञा,विशेषण व क्रिया में ही जानते हैं।वैसे हिंदी कविता में छंद परिवर्तन की परंपरा पुरानी है।

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छंद का बदलते जाना हिंदी कविता का मूल स्वभाव रहा है-----
एक  समय में चौपाई लिखने वालों ने दोहा लिखा,सोरठा लिखा,सवैया व कवित्त भी  लिखा।वे सभी महान लोग थे जो कविता को छंद के भीतर उसकी गति में बदल रहे थे और अभिव्यक्ति का नया मार्ग तलाश रहे थे। ग़ालिबन  'कुछ और चाहिए एक वुसअत' की तर्ज़ पर।यह जरूर है कि उस दौर में कविता विचार सम्पन्न होने से अधिक भाव सम्पन्न होती थी।इसलिए वहां मुक्त छंद की आधुनिक शैली के लिए स्पेस कम था।

देखो,छंद का सवाल उठना जायज है लेकिन छंद से आज की कविता की समस्या का समाधान खोजना मूर्खता है।इसी के साथ छंद को गाली दे देकर केवल वाक्यों  में लिखे विचारों को कविता मनवाने की जिद भी उतनी ही फूहड है।वाक्य को काव्य बनने के लिए आकांक्षा,अन्विति व आसक्ति से गुजरना पड़ता है।केवल अखबारी वाक्यों को कविता के फार्म में ढाल देने से कविता नहीं बन जाती।इसलिए मुक्त छंद के नाम पर मूर्खता का विस्फोट उतना ही खतरनाक है जितना छंद युक्ति के बीच विद्वता का प्रदर्शन!

आज कविता थके हुए पाठकों को  स्फूर्ति देने के लिए नहीं लिखी जाती बल्कि वह पाठक के जीवन विवेक को जागृत करने के लिए लिखी जाती है।यह कविता के कहे जाने का नहीं  ,लिखे जाने का दौर है ।छंद अगर रीतिकालीन समाज के जैसा थकान को दूर करने का वर्णिक माध्यम है तो जो थके हैं वे ,थकान मिटायें  लेकिन ऐसे लोग भी याद रखें,कविता का मिज़ाज कभी भी छंद का मसाज नहीं था।वह शब्दार्थ  की "स्पर्धाधिरोहि चारुता" रही है,जैसा कि  नवीं सदी  के एक आचार्य कुंतक ने कहा था जब न भक्तिकाव्य था और न ही रीतिकाव्य।

आज जब तुमने यह प्रसंग छेड़ दिया है तब मुझे सबसे पहले एक श्लोक याद आ रहा है -
'यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तो चन्दनस्य'।छंद उस चंदन के समान है जो  पीठ पर तो लदा हुआ है लेकिन गधा उसे भार समझ रहा है।उसकी सुगंध को नहीं समझ पा रहा है।तो जो छंद छंद कहते हैं वे वही लोग है जो सुगंध नहीं समझते।

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कविता के बहुत से विधानों में छंद भी एक विधान है लेकिन एक मात्र नहीं----

भामह ने तो 'काव्यालंकार' में  छठी सदी में ही लिख दिया है कि छंद,शब्द का अर्थ,इतिहास,कथाएं,लोक व्यवस्था और कला बोध यह सब मिलकर काव्य का निर्माण करते हैं।उद्भट ने काव्य को 'अविचारित रमणीय' माना है जिसका मतलब ही है कि अपने वस्तु के साथ कवि रमण करे।अब कवि जब रमण करेगा तो अपने वस्तु के अनुसार रूप भी खोज ही लेगा।वह चंद्रमा को 'अमृतांशु' ही नहीं समझेगा,दोषों का घर अर्थात 'दोषाकर' भी समझेगा।जाहिर सी बात है,'दोषाकर' की बात पारंपरिक मात्रात्मक व वर्णिक छंद में नहीं आ पाएगी।उसे छंद के नियमों को वैसे ही शिथिल करना होगा जैसे 'तोड़ती पत्थर' में निराला ने किया था।छंद के संदर्भ में निराला की चर्चा खूब की जाती है।लेकिन यह मत भूलो कि वे छंद को छोड़कर नहीं ,समझकर आगे बढ़े थे और कविता को वे छंद से मुक्ति नहीं,छंद में मुक्ति मानते रहे।

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इसलिए तोड़ना तो जरूरी है और अच्छा है कि वह टूटा है लेकिन  छंद को समझना भी उतना ही जरूरी है----

मुझे इस संदर्भ में नब्बे के दशक के सुप्रसिद्ध कवि मदन कश्यप Madan Kashyap की कविता '"क्योंकि वह जुन्नैद था"' कि याद आ रही है जो उनके संग्रह 'पनसोखा है इंद्रधनुष' में संकलित है।यह कविता जब प्रकाशित हुई थी,शायद पहली बार फेसबुक पर ही पढ़ी थी मैंने,तब इसकी बहुत चर्चा हुई थी।देखो,व्यवस्था का यह 'दोषाकर' किसी भी पारंपरिक छंद में नहीं आ सकता था यद्यपि  इसमें वाक्य की आवृत्ति से ग़ज़ब का विडम्बना मूलक जीवन बोध उपस्थित होता है.।क्योंकि वह जुनैद था,इसकी आवृत्ति ने इस कविता को न केवल रूप के स्तर पर आवृत्ति दी है बल्कि सम्प्रेषण के स्तर पर यह एक पाठक को संवेदित भी करती है ।इसी प्रकार कवि मित्र संजय कुंदन Sanjay Kundan  की एक कविता है --'किश्त' जो अभी अभी फेसबुक पर पढ़ी है।कोई छंद नहीं लेकिन जीवन का छंद एक किश्त से टूट रहा है और आदमी अपने ही घर में पनाह मांग रहा है।यह है जीवन का टूटता छंद जिसे कोई भी 'छंद प्रभाकर' नहीं समझ सकता।

दसवी सदी के एक कवि है क्षेमेन्द्र।उन्होंने 'कवि कंठाभरण' लिखा है।इसमें उन्होंने कविता को साधने की प्रविधि पर विचार किया है।वे लिखतें हैं कि कोई कवि यदि छंद अथवा व्याकरण को साध भी ले तो भी तब तक अच्छा कवि नहीं हो सकता जब तक कि वह अपनी कविता में रमणीयता की उपस्थिति न दर्ज करता हो।और इसके अंतर्गत उन्होंने 'समस्तसूक्तव्यापी  रमणीयता' की बात की है जिसका मतलब काव्यत्व पूरे कविता में रहता है।तो जब पूरे कविता की बात में रमणीयता की बात आएगी तो  छंद व व्याकरण के नियम भी तो शिथिल होंगे।

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अब जरा बताओ अगर छंद से ही कोई कवि बड़ा बनता तो आज ' रसिक प्रिया' व 'कवि प्रिया' लिखने वाले  केशवदास रामचंद्रिका' लिखकर हिंदी के सबसे बड़े कवि होते-----
लेकिन कहाँ हैं केशवदास।जबकि छंद के अनुशासन के भीतर रहते हुए भी तुलसी बड़े कवि हो गए।तो छंद बंधन नहीं है जहां हर क्षण मात्रा व वर्ण गिनते रहा जाए ।वह एक प्रकार का नियमन है।एक ब्यवस्था है जो तोड़ने के लिए ही बनती है।तो छंद कोई फंद या फंदा नहीं है।मैं तो इसे स्पन्द कहता हूं और स्पन्द की स्थिति में कई बार बंध टूट जाता है ।कई बार बन भी जाता है।अंततः यह स्पन्द ही महत्वपूर्ण होता है।यह कवि के ऊपर है कि अपने इस स्पन्द को किस तरह बांधे!,

इसी के साथ यह भी जान लो यह बोलियों के भीतर का अनुशासन है जहां विचार की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है----
बोलियाँ एक तरह से विचार से अधिक भावना आधारित होती हैं जहां प्रेम है,श्रृंगार है,भक्ति है,शक्ति है,।जब हिंदी भाषा के रूप में आई तब इसकी विचार शक्ति इसके नींव में थी।भारतेंदु युग को ध्यान में रखो।वह आया ही विचार की शक्ति के कारण।उस समय की कवि भावना ब्रज प्रधान थी लेकिन विचार के लिए हिंदी विकसित हो रही थी।स्वयं भारतेंदु कविता ब्रज में लिखते थे लेकिन गद्य हिंदी में।

तो जब कविता हिंदी में शुरू हुई तो विचार आने के लिए छंद के बंधन से मोह मुक्ति जरूरी थी।वही हुआ भी।द्विवेदी युग में गुप्त जी व हरिऔध जी हिंदी में कविता का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे ।वे विचार कम, भावना अधिक लिख रहे थे।'भारत भारती' एक भावना प्रधान काव्य है जिसमें हिन्दू राष्ट्र की महिमा का बखान है लेकिन इसकी आंतरिक उथलपुथल की वैचारिकी के लिए वहां कोई जगह नहीं थी।यही कारण था कि छायावाद में निराला को छंद के बंधन से बाहर आना पड़ा।यद्यपि छंद को उन्होंने छोड़ा नहीं और न ही हेय माना।बस उसे स्पन्द से जोड़ दिया और उसी में बंध से मुक्त भी हुए।वहीं 'कामायनी ' को देखो।छंद के गहरे अनुशासन व विविधताओं में उलझी रही और अंततः भावना के विराट सागर में तैरती हुई विचार के लिए कोई गुन्जाईस नहीं छोडती।पूरी संरचना रैखिक न होकर वर्तुल हो गई।और वर्तुल संरचना का होना ही छंद की सीमा है।उसका अतिशय आग्रह रचना को अंततः रोमांटिक आग्रहों की तरह ले जाता है जिसमें पीछे लौटने की गुंजाइश अधिक रहती है।हाँ,आख्यान परक महाकाव्य में छंद का निर्वाह विचार के साथ हो जाता है बशर्ते कवि सावधान रहे।

**
यह समझना आज ज्यादे जरूरी है कि मुक्तक काव्य में छंद का अतिशय प्रयोग उसे एक रूमानी किस्म के प्रभाव से ही जोड़ता है-----

इस संदर्भ में एक और बात स्मृति से जोड़कर कही जाती है।असल में आधुनिक काल से पहले छंद पर जोर देने का कारण उसका मौखिक परंपरा में होना था जिससे कम पढ़ा लिखा समाज भी उसकी ध्वनि के दायरे में प्रभावित हो जाय।नाद से कविता की आयु बढ़ती है ,यह बात मध्यकालीन कविता के दौर में सही है लेकिन आधुनिक कविता में नहीं।यहां कविता विचार की रमणीयता या रमणीयता की विचार शक्ति की अपेक्षा करती है।इसकी शुरुवात भी पंडित जगन्नाथ से हो जाती है।यही कारण है कि जब कविता लिखित होती गई तब छंद भी शिथिल  होते गए।और ऐसा होना जरूरी था।छंद का शिथिल होना छंद का मर जाना नहीं है और न ही उसके किसी पुनर्जन्म की बात करना ही है।

* * 
छंद का पुनर्जन्म छंद की वापसी में नहीं, उसके परिवर्तन में है।

देखो अनिल,कोई भी कवि प्राथमिक कल्पना में छंद के दायरे में ही सोचता है जिसमें थोड़ी बहुत साधर्म्य मूलक आलंकारिकता भी रहती है।लेकिन जब वह लिखने लगता है तब इससे धीरे धीरे बाहर आता है।अपनी  वस्तु  के विकास क्रम में ।इस क्रम में वह छंद में लिख भी सकता है ,नहीं भी।असल में कविता बनती तो छंद से है लेकिन उसे आयु मिलती है उसके औचित्य से।अब औचित्य सिद्ध के क्रम में वह बंधन को तोड़  भी सकती है और नया बंधन ले भी सकती है।

असल बात यह है।वैसे भी 'काव्य प्रकाश ' के मम्मट को याद करो।वे कहते हैं कि कवि अपनी प्रतिभा के अतिरिक्त किसी का बंधन नहीं मानता।तो कवि छंद का बंधन क्यों मानेगा।इस रूप में  वह एक अनुशासन है । शासन थोड़े ही है।

तुमसे मैं कहूँ तो थोड़ा हंसोगे लेकिन मैं खुद ही कई बार छंद में लिखता हूँ और मेरी कई कविताएं छंदिक हैं लेकिन इनमें ज्यादेतर तब लिखी गई हैं जब मैं लंबी कविता लिखते अथवा कविता में श्रम व संघर्ष  करते थक गया होता हूँ।तो मेरे लिए मात्रिक वृत्त के छंद  कविता की लंबी यात्रा में एक पड़ाव जैसे हैं कोई ठहराव नहीं।मैने महसूस किया है कि हिंदी के समकालीन ज्यादेतर कवियों की यही स्थिति है।कम से कम अरुण कमल,देवीप्रसाद मिश्र,अष्टभुजा शुक्ल ,विनय कुमार , सुभाष राय  शैलेन्द्र कुमार शुक्ल  और संदीप तिवारी की कविताओं को पढ़ते तो ऐसा ही लगता है। पटना के कवि Vinay Kumar छंद के भीतर सुंदर कविताएं लिखते हैं.उन्होनें शानदार गज़लें लिखीं हैं। लेकिन जहां छंद को तोड़ देते हैं वहां और भी अच्छी कविता लिखते हैं।यहां मैं उनकी कविता "पाती' को याद करना चाहूंगा।
तुम खुद ही अपनी कविताओं व आलोचना में में छंद पर बहुत जोर मारते हो लेकिन पढ़कर तो यही लगता है कि ये मुक्त काव्य चेतना की उपपाद ही हैं,मुख्य निर्मिति नहीं।

**
चलते चलते यह भी दर्ज कर लो कि हर कृती रचनाकार को छंदशास्त्र व साहित्य शास्त्र का थोड़ा बहुत ज्ञान होना ही चाहिए------

'छंद शास्त्र' को वैसे भी छह वेदांगों में एक माना गया है।अब जिन्हें 'साहित्य शास्त्र' का ज्ञान ही नहीं है वे भी इधर देख रहा हूँ कि ज्ञान दिए जा रहे है।जिन्होंने आज तक न तो कायदे की एक कविता लिखी है और न ही कविता पर कुछ लिखा है वे भी छंद पर राय बांट रहे हैं। संपूर्णता में छंद के विधान को ही खारिज किये जा रहे हैं।यह एक प्रकार से अपनी अज्ञानता को छुपाने का तरीका भी है।यह ठीक है कि कविता छंद से ही नहीं बनती और न ही इसके शासन को मानती है ।वह तो नियति के नियमों के विरुद्ध जाती है।मम्मट ने बहुत पहले "काव्य प्रकाश" में लिख दिया है-- नियतिकृत नियम रहिता...लेकिन ज्ञान के अन्य अनुशासनों की तरह है तो वह भी एक अनुशासन जिसकी इज्जत करने से कोई कविता कमजोर थोड़े ही हो जाएगी।बाकी अपने शिल्प के लिए हर कोई स्वतंत्र है।छंद ही क्यों,कविता तो अलंकार व व्याकरण के नियमों को ही कहाँ मानती है !

... और मेरा कहना है कि  मानना भी नहीं चाहिए।

***

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Monday, 13 July 2020

जोंक // तड़प // कविता जनतंत्र के अखाड़े में // सावधान : गोलेन्द्र पटेल


                
कविता जनतंत्र के अखाड़े में // गोलेन्द्र पटेल
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एक मेंढक टर-टराए
तो दूसरे का टरटराना स्वभाविक क्रिया है
उमस है
तो उम्मीद है बारिश का
भले ही बादल आएं और चले जाएं
खेत से दूर बहुत दूर
बंजर मरूस्थल हृदय के पास।

बेलमुर्गी चीं-चीं चीख रही है
जलकुंभी में छिप कर
एक दिल्ली के आदमी से डर

जो अभी अभी आया है गांव में
खेतिहर के वोट के ख़ातिर
चिड़ियों को चना देने बाकी को दाना
खेतिहरिन को लाई पसंद है
खाना नहीं!

एक कमीना देख रहा है
कूशे में टिटिहरी का अंडा
सुन रहा है हु-टि२-टि३...

गंवईं गवाह हैं
उक्त प्रतिरोध की ध्वनि कानों-कान जायेगी
कचहरी।

कचहरी के दिवारों से टकरा 
लौट आयेगी प्रतिध्वनि कविता के शरण में

कविता बगावत करेगी
बहादूरों से
जनतंत्र के अखाड़े में।
©गोलेन्द्र पटेल
रचना : १ जुलाई ,२०२०


जोंक // 
गोलेन्द्र पटेल
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रोपनी जब करते है कर्षित किसान ;
तब रक्त चूसते हैं  "जोंक"!

चूहे फ़सल नहीं चरते
फ़सल चरते हैं
साँड़ और नीलगाय...

चूहे  तो बस संग्रह करते हैं
गहरे गोदामीय बिल में!

टिड्डे पत्तियों के साथ
पुरुषार्थ को चाट जाते हैं
आपस में युद्ध कर
काले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!

प्यासी धूप 
पसीना पीती है खेत में
जोंक की भाँति!

अंत में अक्सर ही
कर्ज़ के कच्चे खट्टे कथाफल दिख जाते हैं
सिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!

इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसान
सड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!

(©गोलेन्द्र पटेल

रचना : ०८-०७-२०२०)
★★★

तड़प // गोलेन्द्र पटेल
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देखो!
इस अंधेरे में
चमगादड़ लौट रहे हैं
अपने नयन से अपने नीड़
और उनके हमसफ़र उल्लू भी!

अन्य पंक्षी
दिन के पथिक कैसे पहुँचेंगे अपने घोसला???
पूछ रही बहेलिया की बेटी
प्रसव-पीड़ा से लेटी
संसद के पथरीली पथ पर पिता से।...
बापू
क्या मेरा पुत्र पहुँच पायेगा घर???
इसे अभी धरती पर आये
कुछ ही क्षण हुए हैं
मेरे पेट में चार दिन से चूहे दौड़ रहे हैं
सूख चूकी है छाती
चाम चिचोर रहा है मेरा बच्चा।
चमचमाती धूप में आत्मा चौंधिया
सिसक सिसक कर रो रही है
दर्ज़नों दर्द देह में ढो रही है इस महारंक-रूप में
चुपचाप चीख सून रहे हैं नये नेता
नाक पर रुमाल डाल कर
हाय! और क्या कहूँ असहाय
मैं देखता रहा "तड़प"।।

©गोलेन्द्र पटेल
०२५-०५-२०२०

◆सावधान◆

सावधान // गोलेन्द्र पटेल
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हे कृषक!
तुम्हारे केंचुओं को
काट रहे हैं - "केकड़े"
                सावधान!
ग्रामीण योजनाओं के "गोजरे"
चिपक रहे हैं -
गाँधी के 'अंतिम गले'
                   सावधान!
विकास के "बिच्छुएँ"
डंक मार रहे हैं - 'पैरों तले'
                    सावधान!
श्रमिक!
विश्राम के बिस्तर पर मत सोना
डस रहे हैं - "साँप"
                  सावधान!
हे कृषका!
सुख की छाती पर
गिर रही हैं - "छिपकलियाँ"
                  सावधान!
श्रम के रस
चूस रहे हैं - "भौंरें"
                 सावधान!
फिलहाल बदलाव में
बदल रहे हैं - "गिरगिट नेतागण"
                  सावधान!
(©गोलेन्द्र पटेल
रचना : १८-०७-२०२०)
काव्यगुरु : श्रीप्रकाश शुक्ल

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...