Monday, 28 September 2026

शिक्षा से होगा उद्धार || बहुजन मुख्यधारा की कविता || अर्जक कविता

शिक्षा से होगा उद्धार

मृत्यु स्वीकार है, दोस्त!
पर दासता स्वीकार नहीं करूँगा।
ईश्वर के आगे शीश झुकाकर
अपने विवेक की हत्या नहीं करूँगा!

तथागत बुद्ध से तर्क-प्रज्ञा का दीपक पाया,
करुणा, मैत्री, समता का मानवीय पथ अपनाया।
अशोक से सीखा—धम्म मनुष्य के कल्याण में हो,
सत्ता का हर निर्णय जनहित, न्याय और संविधान में हो।

रैदास ने मनुष्य-मनुष्य की समता का स्वप्न सजाया,
कबीर ने पाखंडों पर निर्भय प्रहार करना सिखाया।
तुकाराम की वाणी में श्रमशील जन की पीड़ा है,
बसवन्ना ने श्रम-सम्मान को जीवन की रीति कहा है।

अंधविश्वास के आगे
अपनी बुद्धि नहीं झुकाऊँगा,
जन्माधारित श्रेष्ठता के आगे
अपना आत्मसम्मान नहीं गँवाऊँगा!

ज्योतिबा फुले ने शिक्षा से अज्ञान का अंधकार मिटाया,
सावित्रीबाई ने स्त्री को ज्ञान और स्वाभिमान का अधिकार दिलाया।
शाहूजी ने सामाजिक न्याय का प्रश्न उठाया,
बाबा साहेब ने संविधान से समता का मार्ग दिखाया।

पेरियार ने तर्क की मशाल जलाकर रूढ़ियों को ललकारा,
रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक चेतना से शोषण को नकारा।
इन पुरखों की वैज्ञानिक चेतना लेकर चलता हूँ,
जहाँ प्रश्न उठता है, वहीं प्रश्न करता हूँ।

किसी शास्त्र, सत्ता या परंपरा के नाम पर
विवेक नहीं बेचूँगा,
किसी धार्मिक पहचान के दबाव में
अपने प्रश्न नहीं छोड़ूँगा।

नक्षत्रों को देव नहीं,
प्रकृति के नियमों में पढ़ता हूँ;
बिजली को देव-कोप नहीं,
भौतिक विज्ञान की भाषा में समझता हूँ।

रोग को पाप का फल कहकर
रोगी को नहीं सताऊँगा;
प्रमाण और परीक्षण जहाँ उपलब्ध हों,
वहीं अपना मत बनाऊँगा।

ग्रहण को राहु-केतु का खेल नहीं बताऊँगा,
खगोलीय घटना को विज्ञान की दृष्टि से समझूँगा।
प्रकृति के रहस्यों को प्रश्नों से परखूँगा,
प्रयोग, प्रमाण और तर्क से सत्य को खोजूँगा।

भाग्य के भरोसे बैठकर
श्रम का अपमान नहीं करूँगा,
मानव-निर्मित संकटों को
दैवी विधान नहीं कहूँगा।

अंधकार कितना भी गहरा हो,
तर्क का दीप जलाऊँगा;
अपने विवेक की हत्या
कभी नहीं करूँगा!

माना देवालयों में मिल सकते हैं
अवसर, पद और सम्मान अनेक,
पर अपनी कलम की कीमत लगाकर
नहीं लिखूँगा कोई झूठा लेख।

सत्य जानते हुए झूठ के पक्ष में
अपनी भाषा नहीं मोड़ूँगा,
सुविधा के लिए अपने विचारों से
कभी समझौता नहीं करूँगा।

जाति के आगे शीश झुकाना
मेरी रीति नहीं होगी,
जन्म से कोई ऊँचा-नीचा हो,
ऐसी मान्यता नहीं होगी।

मनुष्य की गरिमा
जन्म से निर्धारित नहीं होगी;
हर व्यक्ति को समान मानवाधिकार मिले,
यही सभ्यता की कसौटी होगी।

न जाति पूछूँगा, न धर्म 
न कुल का प्रमाण माँगूँगा,
न जन्माधारित श्रेष्ठता का
कोई विधान मानूँगा।

मनुष्य को मनुष्य समझना
मेरी पहली नैतिकता होगी;
मानवीय गरिमा से बड़ा
कोई जन्म-प्रमाण नहीं होगा!

झूठे गौरव के आगे
अपनी गरिमा नहीं गँवाऊँगा,
घृणा का उत्तर घृणा से नहीं,
तर्क और संवाद से दूँगा।

ईश्वर! आपके सम्मुख
मुझको कोई आसन नहीं चाहिए,
मंदिरों से मिला हुआ
झूठा अभिनंदन नहीं चाहिए।

चाटुकारिता के बदले
कोई सम्मान नहीं लूँगा,
सत्ता के सम्मुख सत्य कहने से
कभी नहीं झुकूँगा।

मेरी आवाज़ असफलता से डरकर
मौन नहीं होगी,
मेरी चेतना किसी ग्रंथ की
दासी नहीं होगी।

कलम अगर जनता की पीड़ा
लिखने से रुक जाए,
तो ऐसी रचना
मेरे किसी काम की नहीं होगी।

मैं बुद्ध की प्रज्ञा और करुणा
साथ लिए चलता हूँ,
अशोक के धम्म को
मानव-कल्याण में पढ़ता हूँ।

रैदास-कबीर की निर्भीकता
मेरी आवाज बने,
तुकाराम-बसवन्ना का श्रम-सम्मान
मेरे कर्म का आधार बने।

फुले-सावित्री की शिक्षा
मेरी मशाल रहे,
शाहूजी का सामाजिक न्याय
मेरे विचारों का विस्तार रहे।

बाबा साहेब का संविधान
समान अधिकारों की ढाल रहे,
पेरियार का तर्क
मेरी चेतना का सवाल रहे।

रामस्वरूप वर्मा की अर्जक चेतना से
मैं भी प्रेरणा लेता हूँ;
इसलिए प्रश्न करूँगा,
तर्क करूँगा,
प्रमाण माँगूँगा,
अन्याय से लड़ूँगा;
पर अंधविश्वास के आगे
अपना विवेक नहीं दूँगा!

जिस दिन मानव-मानव में
जन्म का भेद नहीं रह जाएगा,
श्रम को सम्मान और
सबको समान अधिकार मिल जाएगा;

जिस दिन स्त्री और पुरुष
दोनों निर्भय होकर जी पाएँगे,
जिस दिन बच्चे प्रश्न करेंगे
और उत्तर स्वयं खोज पाएँगे;

जिस दिन ज्ञान पर
किसी का एकाधिकार नहीं होगा,
जिस दिन मनुष्य की गरिमा
जन्म से नहीं, मानवता से आँकी जाएगी—

उस दिन मनुष्य
सचमुच स्वतंत्र कहलाएगा,
विज्ञान अंधविश्वास पर
विजय पाएगा।

उस दिन मेरे पुरखों का
समतामूलक स्वप्न साकार होगा
और मानव-मुक्ति का
नया अध्याय तैयार होगा।

तब तक प्रश्न उठाता रहूँगा,
तब तक तर्क सिखाता रहूँगा;
अंधविश्वास के विरुद्ध
विज्ञान का दीप जलाता रहूँगा।

मृत्यु स्वीकार है, दोस्त!
पर दासता स्वीकार नहीं करूँगा।
किसी अदृश्य सत्ता के भय में
अपने विवेक की हत्या नहीं करूँगा!

अंधविश्वास चाहे जितना प्रबल हो,
तर्क से समझूँगा,
प्रमाण से मानूँगा;
प्रमाण न हो तो
विश्वास को तथ्य नहीं बताऊँगा।

मनुष्य से प्रेम करूँगा,
जीव-जगत के प्रति करुणा रखूँगा,
पर किसी अदृश्य सत्ता की
चरण-वंदना नहीं करूँगा!

मेरा महानायक—मानवीय विचार।
मेरी शक्ति—शिक्षा और वैज्ञानिक विचार।
मेरा पथ—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।
मेरी साधना—मित्रता।
मेरा संकल्प—मानव-मुक्ति।

शिक्षा से होगा उद्धार।
तर्क से होगा अंधविश्वास पर प्रहार।
विज्ञान से होगा मानवता का विस्तार।
★★★


रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कवि

Thursday, 24 September 2026

अशोक वाजपेयी : कविता, सत्ता और सांस्कृतिक वर्चस्व के कठघरे में || गोलेन्द्र पटेल

अशोक वाजपेयी : कविता, सत्ता और सांस्कृतिक वर्चस्व के कठघरे में
(पोस्टर साभार: नवीन कुमार) 

अशोक वाजपेयी का प्रश्न केवल एक कवि के प्रश्न के रूप में नहीं देखा जा सकता। वे कवि होने के साथ-साथ प्रशासन, कला-संस्कृति, संस्थाओं और साहित्यिक आयोजनों की दुनिया से गहरे जुड़े रहे हैं। इसलिए उनके सार्वजनिक वक्तव्य, सांस्कृतिक मंचों पर उनकी उपस्थिति और साहित्यिक प्रतिष्ठान में उनकी भूमिका स्वाभाविक रूप से आलोचना के विषय बनती है। यहाँ मुद्दा यह नहीं कि अशोक वाजपेयी अच्छे कवि हैं या बुरे; मुद्दा यह है कि क्या साहित्यिक प्रतिष्ठा किसी लेखक को सामाजिक आलोचना से ऊपर उठा देती है? निश्चित ही नहीं। किसी कवि की काव्य-प्रतिभा का सम्मान करते हुए भी उसके सामाजिक दृष्टिकोण, सार्वजनिक वक्तव्यों और संस्थागत भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं। बल्कि जो व्यक्ति स्वयं सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका में उपस्थित हो, उससे जवाबदेही की अपेक्षा और अधिक होती है। इसी संदर्भ में फेसबुक पर कृष्ण कल्पित की टिप्पणी बेहद तीखी है। वे अशोक वाजपेयी और अन्य साहित्यकारों को “अवसरवादी” कहते हुए लिखते हैं, “ये सब लिबरल कहलाते हैं लेकिन हैं अवसरवादी। अचूक अवसरवादी!” उनका आरोप है कि एक ऐसे आयोजन में साहित्यकार उपस्थित थे जहाँ, उनके अनुसार, सावरकर और गोडसे का महिमामंडन किया जा रहा था और उपस्थित साहित्यकारों ने उसका प्रतिवाद नहीं किया। कवि कृष्ण कल्पित की भाषा भले ही आक्रामक हो, लेकिन उसके भीतर एक गंभीर नैतिक प्रश्न छिपा है; साहित्यकार की वैचारिक प्रतिबद्धता की परीक्षा उसके लेखन से बाहर उसके सार्वजनिक आचरण में भी होती है या नहीं? यदि कोई लेखक लोकतांत्रिक, उदार और मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधि होने का दावा करता है, तो यह पूछना असंगत नहीं कि वह किन मंचों पर जाता है, किन सांस्कृतिक शक्तियों के साथ खड़ा होता है और किन परिस्थितियों में मौन रहता है। हाँ, कृष्ण कल्पित द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार अथवा अन्य गंभीर व्यक्तिगत आरोपों को प्रमाण (साहित्यिक सीबीआई जाँच) के अभाव में तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन उन आरोपों से अलग भी सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न पूरी शक्ति से मौजूद रहता है। साहित्यकार मंच चुनता है तो मंच भी साहित्यकार को चुनता है; इसलिए मंच की वैचारिकी से स्वयं को पूरी तरह असंबद्ध घोषित करना हमेशा संभव नहीं होता। यहीं अशोक वाजपेयी के संदर्भ में कविता और सत्ता के बीच संबंध का प्रश्न उठता है। कविता यदि सत्ता से सवाल करती है, तो कवि का सत्ता-समीप सांस्कृतिक व्यवहार भी आलोचना के दायरे में आएगा और यदि कविता में लोकतांत्रिक संवेदना का दावा हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उसका व्यवहार उस दावे से असंगत दिखाई दे, तो आलोचक को उस अंतर्विरोध को रेखांकित करने का पूरा अधिकार है।

कवि कँवल भारती इस प्रश्न को और गहरे सामाजिक धरातल पर ले जाते हैं। उनका आरोप है, “अशोक वाजपेयी की नज़र में ब्राह्मण होना ही आजकल साहित्यकार होने की सबसे बड़ी योग्यता है।” यह व्यक्तिगत आरोप है और इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस कथन के पीछे छिपे संरचनात्मक प्रश्न को टाला भी नहीं जा सकता; क्या हिंदी साहित्य का प्रतिष्ठान वास्तव में जाति-निरपेक्ष है? भारत में साहित्यिक प्रतिष्ठा केवल रचना की गुणवत्ता से नहीं बनती। विश्वविद्यालय, अकादमियाँ, पुरस्कार, प्रकाशन-संस्थाएँ, पत्रिकाएँ, आलोचक, साहित्यिक मंच, सांस्कृतिक संस्थाएँ और सामाजिक संपर्क; ये सभी मिलकर साहित्यिक पूँजी का निर्माण करते हैं। यदि इन संस्थाओं में सामाजिक प्रतिनिधित्व असंतुलित हो, तो “प्रतिभा” की चर्चा को सामाजिक संरचना से काटकर देखना अधूरा होगा। लेकिन जाति-विरोध की सबसे पहली शर्त यह भी है कि आलोचना जाति-व्यवस्था और जाति-व्यक्ति में अंतर करे। किसी व्यक्ति का ब्राह्मण होना अपने आप में उसके साहित्य को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। प्रश्न तब पैदा होता है जब जन्म से प्राप्त सामाजिक-सांस्कृतिक पूँजी को प्राकृतिक श्रेष्ठता समझा जाए या किसी सामाजिक पदानुक्रम को साहित्यिक योग्यता का अदृश्य प्रमाण बना दिया जाए। यहीं आचोलक डॉ. कमलेश वर्मा की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। वे अशोक वाजपेयी की विद्वत्ता को स्वीकार करते हुए लिखते हैं, “अशोक वाजपेयी विद्वान् हैं। उनके कला कोविद होने पर कभी किसी को संदेह नहीं रहा है।” लेकिन उसी के साथ वे कथित “भड़भूजा” संबंधी वक्तव्य को उनकी साख को कमजोर करने वाला बताते हैं। वे आगे कहते हैं कि यदि अपनी जाति के अभिमान और दूसरे की जाति के अपमान को हास्य का आधार बनाया जाए, तो ज्ञान “आत्मघाती” हो जाता है। यहाँ आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है; विद्वत्ता नैतिक प्रतिरक्षा-कवच नहीं है। किसी व्यक्ति ने कितनी पुस्तकें पढ़ी हैं, कितने पुरस्कार पाए हैं, कितने बड़े साहित्यकार उसके मंच पर आए हैं या उसने कितने बड़े पदों पर काम किया है; इन सबका अपना महत्व है; लेकिन इनमें से कोई भी उपलब्धि उसे सामाजिक पूर्वाग्रह से मुक्त होने का प्रमाणपत्र नहीं देती। ज्ञान की वास्तविक परीक्षा इस बात में होती है कि वह मनुष्य को अधिक मनुष्य बनाता है या नहीं। यदि जाति के आधार पर हास्य किया जाता है, तो यह देखना जरूरी है कि उस हास्य का निशाना कौन है और उसमें शक्ति-संबंध किसके पक्ष में काम कर रहा है। “मजाक” कह देने मात्र से सामाजिक अपमान का प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता। विशेषतः उस समाज में जहाँ जाति केवल पहचान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता की संरचना रही है। यहीं युवा आलोचक डॉ. मोतीलाल की टिप्पणी नैतिक प्रश्न को और तीखा करती है। वे लिखते हैं, “निम्न कोटि के विचार महान आत्माओं के हृदय में पैदा नहीं होते हैं। वे क्षुद्र हृदय में ही पैदा होते हैं।” उनके द्वारा उद्धृत गीता-वाक्य (क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परन्तप!) का आशय भी तुच्छ दुर्बलता से ऊपर उठने की प्रेरणा से जुड़ा है। इस कॉमेंट को किसी व्यक्ति की अंतिम नैतिक पहचान मान लेना उचित नहीं होगा; लेकिन इसका प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है; क्या महान साहित्यिक प्रतिभा लेखक को नैतिक छूट दे देती है? यदि ऐसा होता, तो साहित्य का समूचा नैतिक विवेक समाप्त हो जाता।

कवि कितना भी बड़ा हो, उसके शब्दों की सामाजिक परिणति पर प्रश्न उठेंगे। रचनाकार कितना भी प्रतिष्ठित हो, उसके सार्वजनिक वक्तव्यों की आलोचना होगी। साहित्यिक उपलब्धियाँ किसी मनुष्य को आलोचनातीत नहीं बनातीं और यहीं युवा कवि मोहन मुक्त की टिप्पणी इस पूरे विवाद को कविता से उठाकर श्रम, वर्ग और अर्थव्यवस्था के प्रश्न तक पहुँचा देती है। उनका तीखा सवाल है, “हम अन्न खाते हैं या कविता???” और फिर वे पूछते हैं, “ये 21 लाख रुपए किसके श्रम से पैदा होते हैं?” इन प्रश्नों को शाब्दिक अर्थ में लेकर कवि और श्रमिक को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना उचित नहीं। समाज को अन्न भी चाहिए और कविता भी; भौतिक श्रम भी चाहिए और सांस्कृतिक श्रम भी। लेकिन मोहन मुक्त जिस असमानता की ओर संकेत करते हैं, वह गंभीर है; सांस्कृतिक सम्मान और आर्थिक गरिमा का वितरण इतना असमान क्यों है? एक कवि को इक्कीस लाख रुपये का पुरस्कार मिलना अपने आप में श्रमिक के श्रम का अपमान नहीं है। लेकिन उसी समय यह पूछना पूरी तरह जायज़ है कि पुरस्कार-व्यवस्था किस सामाजिक प्राथमिकता का प्रतिनिधित्व करती है, साहित्यिक प्रतिष्ठा किन वर्गों तक अधिक आसानी से पहुँचती है और श्रमजीवी समाज को उसकी बुनियादी गरिमा क्यों नहीं मिल पाती। इसलिए सही प्रश्न यह नहीं कि “कवि अधिक जरूरी है या श्रमिक?” सही प्रश्न यह है कि ऐसा समाज क्यों नहीं बनाया जा सकता जिसमें कवि को उसकी रचना का सम्मान और श्रमिक को उसके श्रम की गरिमा—दोनों मिलें? कवि श्रमिक का विकल्प नहीं है; लेकिन कवि श्रमिक से अलग कोई विशेषाधिकार-संपन्न मनुष्य भी नहीं है। यहीं साहित्यिक सौंदर्यबोध का प्रश्न भी सामने आता है। यदि कविता केवल अभिजात सांस्कृतिक स्वाद, संस्थागत प्रतिष्ठा और पुरस्कारों के संसार में घूमती रहे और खेत, कारखाने, ईंट-गारा, भूख, जातिगत अपमान, स्त्री, दलित, आदिवासी और श्रमजीवी मनुष्य उसके सौंदर्यशास्त्र के बाहर छूटते जाएँ, तो उस सौंदर्यबोध पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। साहित्य का सौंदर्य मनुष्य से बड़ा नहीं हो सकता। यही कारण है कि “ब्राह्मण सौंदर्यबोध” जैसी अवधारणा को केवल जातिगत गाली समझकर खारिज करने के बजाय उसके सामाजिक आशय की जाँच जरूरी है। प्रश्न किसी जन्मना समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक संरचना के विरुद्ध होना चाहिए जिसमें कुछ अनुभव “साहित्यिक” और कुछ अनुभव “गैर-साहित्यिक” मान लिए जाते हैं; कुछ भाषिक संस्कार “उच्च” और लोकभाषाएँ “निम्न” समझी जाती हैं; कुछ जीवनानुभव सार्वभौमिक और कुछ हाशिये के अनुभव घोषित कर दिए जाते हैं।

इसी अर्थ में अशोक वाजपेयी का प्रश्न व्यक्तिगत सीमा से बाहर जाकर हिंदी साहित्यिक प्रतिष्ठान का प्रश्न बन जाता है। कृष्ण कल्पित का “अवसरवाद”, कँवल भारती का “जात्याभिमान”, कमलेश वर्मा का “आत्मघाती ज्ञान”, मोतीलाल का “क्षुद्र हृदय” और मोहन मुक्त का “श्रम के प्रश्न” पर ज़ोर देने वालीं टिप्पणियाँ भिन्न कोणों से एक ही बड़ी समस्या की ओर संकेत करती हैं: क्या साहित्य अपनी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी से बचकर केवल प्रतिष्ठा, पुरस्कार और सांस्कृतिक प्रभाव का संसार बन सकता है? यहीं अशोक वाजपेयी की सबसे कठोर आलोचना संभव है। उनकी कविता का साहित्यिक मूल्य अपनी जगह है। उनकी विद्वत्ता और सांस्कृतिक सक्रियता भी अपनी जगह है। लेकिन कवि होना आलोचना से मुक्ति-पत्र नहीं है। जितनी बड़ी सार्वजनिक प्रतिष्ठा, उतनी ही बड़ी सार्वजनिक जवाबदेही। साहित्य में किसी लेखक की वास्तविक ऊँचाई केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने बड़े संस्थान उसे सम्मानित करते हैं; बल्कि इस बात से भी कि उसकी भाषा समाज के कितने अदृश्य मनुष्यों को दृश्य बनाती है। यदि किसी साहित्यिक प्रतिष्ठान में जाति, वर्ग, सत्ता, पूँजी और संस्थागत पहुँच साहित्यिक मान्यता को प्रभावित करते हैं, तो उस प्रतिष्ठान की आलोचना जरूरी है। यदि किसी मंच पर लेखक अपनी घोषित मानवीय प्रतिबद्धताओं के विपरीत शक्तियों के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो सवाल जरूरी है। यदि किसी वक्तव्य में किसी जाति या श्रमजीवी समुदाय की गरिमा चोटिल होती है, तो प्रतिवाद जरूरी है और यदि साहित्यिक पुरस्कारों की चमक के सामने श्रमजीवी मनुष्य की बुनियादी गरिमा अदृश्य हो जाती है, तो साहित्य को अपने आईने में स्वयं को देखना होगा। इसलिए अशोक वाजपेयी की आलोचना किसी कवि को गिराने की कवायद नहीं होनी चाहिए। यह उस सांस्कृतिक सत्ता की आलोचना होनी चाहिए जो साहित्यकार को इतना प्रतिष्ठित बना देती है कि उसके शब्दों और व्यवहार पर सवाल उठाना ही असभ्यता समझ लिया जाता है। साहित्य में सबसे बड़ी पूँजी पुरस्कार नहीं, विश्वसनीयता है। सबसे बड़ा पद कवि का नहीं, मनुष्य का है और साहित्य की अंतिम कसौटी यह नहीं कि वह कितनी ऊँची संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि यह है कि वह समाज के सबसे नीचे धकेले गए मनुष्य की गरिमा को कितनी ऊँचाई देता है। जिस साहित्य में कवि की प्रतिष्ठा मनुष्य की प्रतिष्ठा से बड़ी हो जाए, वहाँ कविता को नहीं, पूरे साहित्यिक प्रतिष्ठान को कठघरे में खड़ा करना चाहिए।
★★★
टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कवि


Sunday, 13 September 2026

लोकतंत्र में हिंदी का लोक और लोक की हिंदी (भाषा, जनचेतना और सामाजिक न्याय की पड़ताल) — गोलेन्द्र पटेल

लोकतंत्र में हिंदी का लोक और लोक की हिंदी
(भाषा, जनचेतना और सामाजिक न्याय की पड़ताल)

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। यह भारतीय भाषिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण संवैधानिक घटना थी। किंतु राष्ट्रीय हिंदी दिवस को केवल हिंदी की स्तुति, समारोह और औपचारिक संकल्पों तक सीमित कर देना हिंदी के वास्तविक अर्थ को छोटा करना होगा। यह दिन भाषा के बहाने मनुष्य, समाज, लोकतंत्र, ज्ञान, सत्ता, रोजगार और सामाजिक न्याय के प्रश्नों से मुठभेड़ का अवसर है। यह संवैधानिक तथ्य भी स्मरणीय है कि हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘संघ की राजभाषा’ का स्थान प्राप्त है। भारत की कोई संवैधानिक राष्ट्रभाषा नहीं है। यह अंतर भारतीय बहुलता और संघीय लोकतंत्र की आत्मा को समझने की कुंजी है। हिंदी का इतिहास किसी एक दिन या संस्था से आरंभ नहीं होता। उसकी जड़ें लोकजीवन, बोलियों, यात्राओं, बाजारों, खेतों, श्रम, लोकगीतों और संतवाणी में गहरी हैं। विद्यापति का उद्घोष “देसिल बअना सब जन मिट्ठा” अपनी धरती और अपने लोगों से निकली भाषा की आत्मीयता को व्यक्त करता है। भाषा की पहली शक्ति उसके राजकीय पद में नहीं, उसके लोक-संबंध में होती है। कबीर ने इसी लोकधर्मी प्रवाह को कहा, “भाखा बहता नीर।” उनके लिए भाषा पांडित्य की बंद चौहद्दी नहीं, जीवन तक पहुँचने वाला बहता जल थी। “संस्कृत है कूप जल” वाला उनका रूपक ज्ञान के सामाजिक चरित्र पर भी प्रश्न उठाता है। कबीर की भाषा स्वयं अनेक स्रोतों के मेल से बनी थी; उसमें संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, लोकभाषाओं के साथ फारसी-अरबी प्रभाव भी दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि जीवित भाषा किसी एक जाति, धर्म या सांस्कृतिक सीमा में बंद नहीं रहती।

तुलसीदास का कथन “का भाषा का संसकृत, प्रेम चाहिए सांच” भाषा के मूल्य को उसके मानवीय आशय से जोड़ता है। भाषा अपने आप में ऊँची या नीची नहीं होती; उसकी सार्थकता उसके संप्रेषण, संवेदना और जीवन-संबंध में है। इसलिए हिंदी को संस्कृत या किसी अन्य भारतीय भाषा के विरोध में खड़ा करना उसके स्वभाव को समझना नहीं है। हिंदी की शक्ति उसकी ग्रहणशीलता में है; वह संस्कृत से भी सीखती है, लोकभाषाओं से भी, उर्दू-फारसी से भी और आधुनिक समय में अंग्रेजी सहित दूसरी भाषाओं से भी। भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।/ बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।” आधुनिक हिंदी चेतना का महत्त्वपूर्ण आधार है। अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित करना मनुष्य को अपने परिवेश और अनुभव से जोड़ता है। किंतु बहुभाषी भारत में ‘निज भाषा’ का अर्थ केवल हिंदी नहीं हो सकता। प्रत्येक मातृभाषा अपने समुदाय की स्मृति, अस्मिता और संवेदना की वाहक है। इसलिए हिंदी का विस्तार तभी स्वस्थ होगा जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं को विस्थापित करने के बजाय उनके बीच संवाद का सेतु बने।

निराला की कविता ‘सच है’ में हिंदी के हित और जनता के ज्ञान का संबंध सामने आता है। उनके यहाँ हिंदी का प्रश्न जनता से अलग नहीं है। यही कसौटी आज भी प्रासंगिक है। यदि हिंदी दिवस पर समारोह होते रहें, पुरस्कार दिए जाते रहें और भाषण होते रहें, लेकिन किसान अपने अधिकारों से अनजान रहे, मजदूर कानून न समझ सके और विद्यार्थी उच्चस्तरीय ज्ञान तक सहज पहुँच न बना सके, तो हिंदी का गौरव अधूरा रहेगा। रघुवीर सहाय की कविता ‘हिंदी’ इसी उत्सवी वातावरण में असुविधाजनक प्रश्न खड़ा करती है। उनकी पंक्ति “हिंदी का प्रश्न अब हिंदी का प्रश्न नहीं रह गया” भाषा के भीतर छिपे सत्ता और वर्ग के प्रश्न को सामने लाती है। भाषा की लड़ाई तब खोखली हो जाती है जब उसके नाम पर बोलने वाले लोग जनता से दूर होकर अपने संस्थागत हितों की रक्षा करने लगते हैं। हिंदी को यदि वास्तव में लोकतांत्रिक बनना है तो केवल अंग्रेजी के स्थान पर बैठना पर्याप्त नहीं; उसे ज्ञान, सत्ता और अवसर के केंद्रीकरण को भी चुनौती देनी होगी। इसी संदर्भ में राही मासूम रज़ा की टिप्पणी “भाषा की लड़ाई दरअसल नफ़े-नुकसान की लड़ाई है।” भाषा और रोजगार के संबंध को उजागर करती है। भाषा का प्रश्न अक्सर शिक्षा, नौकरी, अवसर और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न भी होता है। इसलिए हिंदी को विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, न्यायालयों, प्रशासन, चिकित्सा, तकनीक और आधुनिक शोध की सक्षम भाषा बनाना होगा। केवल अनुवाद नहीं, हिंदी में मौलिक ज्ञान-उत्पादन आवश्यक है।

दिनकर ने कहा था, “भाषा की खानें दो हैं। एक पुस्तकों में, दूसरी जनता की जबान पर।” पुस्तकें भाषा को परंपरा और ज्ञान देती हैं, जनता उसे जीवन और नवीनता देती है। साहित्य को इन दोनों के बीच जीवंत संवाद स्थापित करना होता है। दूसरी ओर थॉमस ग्रे का कथन “ज़माने की भाषा कभी भी काव्य की भाषा नहीं होती है।” याद दिलाता है कि कविता केवल तत्कालीन बोलचाल की प्रतिलिपि नहीं होती; वह भाषा को नया अर्थ, लय और संवेदना भी देती है। फिर भी उसकी ऊर्जा अंततः जीवन से ही आती है। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्ति “हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू” भारतीय भाषिक संस्कृति की साझी विरासत की ओर संकेत करती है। हिंदी और उर्दू को केवल दो धार्मिक समुदायों की भाषाओं के रूप में देखना उनके लंबे सह-अस्तित्व और पारस्परिक आदान-प्रदान को नकारना है। भाषा की कोई धार्मिक जाति नहीं होती। शब्द मनुष्य की सामूहिक यात्रा से जन्म लेते हैं। केदारनाथ सिंह की पुकार, “ओ मेरी भाषा / मैं लौटता हूँ तुम में” मातृभाषा में लौटने की स्मृति और आत्मीयता का अनुभव है। यह लौटना केवल शब्दों में नहीं, बचपन, लोक और अपने लोगों में लौटना है। मनुष्य अनेक भाषाएँ सीख सकता है, लेकिन मातृभाषा उसके सबसे गहरे भावलोक से जुड़ी रहती है। इसलिए मातृभाषा का सम्मान बहुभाषिकता के विरोध में नहीं, उसके पक्ष में है।

विनोद कुमार शुक्ल की पंक्ति “मैं किसी भी भाषा का / अपमान नहीं करूँगा।” हिंदी-प्रेम की नैतिक कसौटी प्रस्तुत करती है। अपनी भाषा से प्रेम यदि दूसरी भाषा के प्रति घृणा पैदा करता है, तो वह भाषिक आत्मविश्वास नहीं, अहंकार है। यू. आर. अनंतमूर्ति का विचार भी इसी उदारता को पुष्ट करता है, “अन्य भाषा की निंदा-तिरस्कार करना पसंद नहीं है।” अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम करते हुए दूसरी भाषाओं का सम्मान करना ही बहुभाषी भारत की लोकतांत्रिक चेतना है। प्रो. सदानंद शाही की ‘आज फिर हिंदी दिवस है’ हिंदी को प्रेम, ज्ञान, विज्ञान और सम्मान की भाषा बनाने की आकांक्षा व्यक्त करती है। किंतु उनकी ही कविता ‘भाषा के नाख़ून’ चेताती है कि भाषा के भीतर भी हिंसा उग सकती है। जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग, क्षेत्रीय श्रेष्ठताबोध और घृणा के ‘नाख़ून’ भाषा को संवाद से हिंसा की ओर ले जा सकते हैं। इसलिए हिंदी की रक्षा केवल हिंदी बोलने से नहीं, हिंदी के भीतर मनुष्यता की रक्षा करने से होगी। गाँधी का भाषा-विचार भी जनता और स्वराज के संबंध से जुड़ा था। उनका कथन “हिंदी को हम राष्ट्रभाषा मानते हैं।”अपने ऐतिहासिक संदर्भ में व्यापक जन-संपर्क की भाषा के पक्ष में उनकी आकांक्षा को व्यक्त करता है। उनके दूसरे विचार में यह प्रश्न और स्पष्ट है कि यदि स्वराज केवल अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का हो तो अंग्रेजी की प्रधानता स्वाभाविक होगी, लेकिन यदि स्वराज करोड़ों गरीब, निरक्षर, दलित और अंत्यज लोगों का है तो जनभाषा का प्रश्न केंद्रीय हो जाता है। गाँधी की चिंता भाषा की श्रेष्ठता से अधिक सत्ता और जनता की दूरी को लेकर थी। उनका यह कथन भी महत्त्वपूर्ण है, “विदेशी भाषा सुवर्णमय होने पर भी उपयोगी नहीं हो सकती। हमारी भाषा तृणवत् हो, तो उसे स्वर्णमय बनाना चाहिए।” आज इसे अंग्रेजी-विरोध के रूप में नहीं, भारतीय भाषाओं को सक्षम बनाने के आह्वान के रूप में पढ़ना चाहिए। अंग्रेजी आधुनिक वैश्विक ज्ञान की महत्त्वपूर्ण भाषा है; उसका ज्ञान किसी भारतीय भाषा से विश्वासघात नहीं। आवश्यकता भाषाओं के संघर्ष की नहीं, भाषिक लोकतंत्र की है।

डॉ. आंबेडकर का कथन “हिंदी को ऊँची-से-ऊँची शिक्षा का माध्यम होना चाहिये।” ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में पढ़ा जाना चाहिए। उच्च शिक्षा यदि किसी सीमित भाषिक अभिजन के नियंत्रण में रहे तो सामाजिक लोकतंत्र अधूरा रह जाता है। किंतु भारत की बहुभाषिक संरचना में ज्ञान का लोकतंत्रीकरण बहुभाषिक होना चाहिए, ताकि दलित, आदिवासी, पिछड़े, स्त्री और ग्रामीण समाज सहित सभी समुदायों को अपनी भाषिक पृष्ठभूमि के कारण अवसर से वंचित न होना पड़े। जाकिर हुसैन ने हिंदी को वह धागा माना जो “विभिन्न मातृभाषाओं रूपी फूलों” को पिरो सके। यह हिंदी की श्रेष्ठ भूमिका का सुंदर रूपक है। हिंदी को धागा बनने की आवश्यकता है, अकेला फूल बनने की नहीं। टैगोर का विचार “हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करना चाहिये जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिये महात्माजी ने हमसे आग्रह किया, वह हिंदी है।” ऐतिहासिक संदर्भ में हिंदी की व्यापक संपर्क-भूमिका की ओर संकेत करता है। किंतु भारत की एकता का अर्थ भाषिक एकरूपता नहीं हो सकता। सुमित्रानंदन पंत ने हिंदी को “कुंजी” कहा, “मैं कुंजी कहता हिंदी को, खुलता जिससे सामूहिक मन।/क्षेत्रवृत्ति से उठकर ही हम, कर सकते जन राष्ट्र संगठन।।” हिंदी विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद की कुंजी हो सकती है, लेकिन भारत में अनेक भाषाएँ अनेक सांस्कृतिक द्वार खोलती हैं।

कृष्ण कल्पित की ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ हिंदी के नाम पर होने वाले संस्थागत आयोजनों, पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार-व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करती है। उसका सवाल “कहाँ खो गया प्रतिरोध!” हिंदी के उत्सवी विमर्श के बीच वास्तविक जनसरोकार की तलाश है। किसी भाषा की विडंबना तब बढ़ती है जब उसके नाम पर संस्थाएँ बहुत हों, पर जनता की पीड़ा और अन्याय के विरुद्ध बोलने का साहस कम होता जाए। विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता उसकी भव्यता से अधिक हिंदी में उपलब्ध शिक्षा, शोध, विज्ञान और लोकतांत्रिक ज्ञान-संसाधनों से तय होगी। पंकज चौधरी की कविता ‘हिंदी कविता के द्विजवादी प्रदेश में आपका प्रवेश दंडनीय है’ साहित्य की संस्थागत संरचना और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर प्रश्न उठाती है। कौन लिखता है, कौन छपता है, किसे मंच और सम्मान मिलता है तथा किसके अनुभव को सार्वभौमिक माना जाता है; ये साहित्यिक ही नहीं, सामाजिक लोकतंत्र के प्रश्न हैं। किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्री, पिछड़े, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित समुदाय केवल साहित्य के विषय न रहें; वे रचनाकार, संपादक, आलोचक, अध्यापक और निर्णायक भी बनें। साहित्यिक प्रतिष्ठा किसी वंशानुगत अधिकार का नाम नहीं हो सकती।

हिंदी की बड़ी शक्ति उसकी बोलियाँ हैं। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी, मैथिली, मगही और अनेक लोकभाषिक रूपों ने हिंदी के संसार को समृद्ध किया है। हिंदी को अपनी बोलियों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। अपनी जड़ों को काटकर कोई भाषा स्थायी रूप से बड़ी नहीं हो सकती। इसी तरह शुद्धतावाद भी हिंदी के लिए उपयोगी नहीं। किसी शब्द की श्रेष्ठता उसके स्रोत से नहीं, उसके अर्थ, उपयोग और जीवन-संबंध से तय होती है। आज डिजिटल युग हिंदी के सामने नई संभावनाएँ खोल रहा है। इंटरनेट, डिजिटल पत्रकारिता, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हिंदी की उपस्थिति बढ़ रही है। किंतु केवल उपयोगकर्ताओं की संख्या पर्याप्त नहीं। हिंदी को वैज्ञानिक संसाधनों, शोध-सामग्री, मुक्त शैक्षिक सामग्री, तकनीकी अवसंरचना और उच्चस्तरीय डिजिटल ज्ञान की भाषा बनना होगा। विज्ञान की भाषा बनने का अर्थ केवल वैज्ञानिक शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में वैज्ञानिक चिंतन और मौलिक ज्ञान-उत्पादन की क्षमता विकसित करना है। इसी तरह कानून और प्रशासन की भाषा नागरिक को भयभीत करने के बजाय उसे अपने अधिकार समझने में सक्षम बनाए।

राष्ट्रीय हिंदी दिवस इसलिए आत्ममुग्धता का नहीं, आत्मालोचन का दिन होना चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि कितने लोग हिंदी बोलते हैं; प्रश्न यह है कि हिंदी कितने लोगों को अवसर देती है। क्या किसान अपने अधिकार समझ सकता है? क्या मजदूर श्रम-कानून पढ़ सकता है? क्या हिंदी माध्यम का विद्यार्थी विश्वस्तरीय विज्ञान तक पहुँच सकता है? क्या वंचित समुदाय अपनी आवाज़ स्वयं दर्ज कर सकते हैं? क्या हिंदी सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हिंदी के विकास की वास्तविक कसौटी हैं। हिंदी को केवल राजभाषा बने रहना पर्याप्त नहीं; उसे जनभाषा, ज्ञानभाषा, विज्ञानभाषा, न्यायभाषा और लोकतंत्र की भाषा बनना होगा। राजभाषा का संबंध प्रशासन से है, जनभाषा का संबंध जीवन से। भाषा केवल संचार नहीं, आत्मसम्मान और नागरिक भागीदारी का माध्यम भी है। हिंदी की सबसे बड़ी उपलब्धि तब होगी जब सरकारी भाषा और जनता की भाषा के बीच की दूरी घटेगी। हिंदी को अपनी महानता सिद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं से श्रेष्ठ होने का दावा करने की आवश्यकता नहीं। महान भाषा वह है जो प्रश्न पूछ सके, अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो सके, प्रेम व्यक्त कर सके, विज्ञान समझ सके, श्रम का सम्मान कर सके और वंचित मनुष्य को समान अधिकार वाला नागरिक माने। हिंदी की शक्ति उसकी संख्या के साथ-साथ उसकी बहुलता में है। उसमें लोक की मिठास, बोलियों की विविधता, हिंदी-उर्दू की साझी विरासत, भारतीय भाषाओं की स्मृति और आधुनिक विज्ञान की तार्किकता एक साथ संवाद कर सकती है।

विद्यापति से कबीर, तुलसी से भारतेंदु, निराला से रघुवीर सहाय, शमशेर से केदारनाथ सिंह, गांधी से आंबेडकर और समकालीन जनपक्षधर स्वरों तक हिंदी की यात्रा एकरंगी नहीं रही। यह लोक, संघर्ष, स्मृति, प्रेम, प्रतिरोध, असहमति और संवाद से निर्मित हुई है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यही बहुलता है। इसलिए हिंदी दिवस का संकल्प केवल हिंदी बोलने का नहीं, हिंदी को अधिक मानवीय, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, समावेशी और जनपक्षधर बनाने का होना चाहिए। हम हिंदी को दूसरी भाषाओं के विरुद्ध खड़ा न करें और उसके भीतर जाति, धर्म, लिंग, वर्ग तथा क्षेत्रीय श्रेष्ठताबोध के ‘नाख़ून’ न उगने दें। हम हिंदी में ज्ञान पैदा करें, प्रश्न पूछें, विज्ञान समझें, अपने अधिकार जानें और अपने समय की सच्चाइयों से मुठभेड़ करें। भाषा की असली प्रतिष्ठा उसके राजकीय दर्जे में नहीं, उसके जनसंबंध में होती है; उसकी वास्तविक शक्ति शब्दकोश में नहीं, बोलने वालों के आत्मविश्वास में होती है; उसका गौरव सम्मेलनों की भव्यता में नहीं, उस अंतिम मनुष्य की आवाज़ में होता है जिसे बोलने का अवसर अब तक नहीं मिला। हिंदी तभी सचमुच बड़ी भाषा होगी जब उसमें बड़ा मन होगा और वह भारत को एकरूप बनाकर नहीं, उसकी बहुरूपता को साथ लेकर जोड़ेगी। वह सत्ता की चापलूस नहीं, जनता की साथी; विभाजन की दीवार नहीं, संवाद का पुल; ज्ञान पर पहरा नहीं, ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम बने। राष्ट्रीय हिंदी दिवस पर इससे बड़ी कामना क्या हो सकती है कि हिंदी सत्ता की ऊँची दीवारों से उतरकर फिर उसी लोक में लौटे, जहाँ से उसकी सबसे गहरी आवाज़ आती है उस लोक में, जहाँ मनुष्य अपनी भाषा में हँसता है, रोता है, प्रेम करता है, श्रम करता है, प्रश्न पूछता है, अन्याय का प्रतिरोध करता है और बेहतर संसार का सपना देखता है। हिंदी की जय तभी सार्थक है, जब उसमें मनुष्य की जय हो।
★★★
टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कवि

Saturday, 5 September 2026

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि — गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि

इन दिनों
आँखें बंद होने पर
तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं
और खुली होने पर
कबीर
मैं भाषा में ही नहीं
भूमि पर भी ऐसे मनुष्यों की तलाश में हूँ
जिनकी कथाएँ
मेरी अपनी जीवनगाथा-सी लगें
जिनसे मिलकर ऐसा बोध हो
मानो वे मेरे लिए
जीवित बोधिवृक्ष हों!

महराजगंज की मिट्टी में
एक दिन
एक बच्चा जन्म लेता है
किसान के घर
उस गाँव में
जहाँ सुबह
सूरज से पहले
हल जागता है
और शाम
मजदूर की हथेली पर
थककर सोती है
वही बच्चा
आगे चलकर
शब्दों का यात्री बनता है।

गाँव की पगडंडी
उनकी पहली पाठशाला है
खेत
पहला विश्वविद्यालय
मिट्टी
पहली किताब
और श्रम
पहला शिक्षक
उन्होंने
जीवन को
दूर से नहीं पढ़ा
उसे
अपने आसपास घटते देखा
किसान के माथे पर
गाँव की गलियों में
जल की कमी में
बदलते रिश्तों में
और उन आँखों में
जो कम साधनों के बावजूद
बड़े सपने देखती थीं।

फिर
गाँव की सीमा से बाहर
शिक्षा की यात्रा शुरू होती है
राजकीय इंटर कॉलेज गोरखपुर
जहाँ किताबें
उनके सामने
एक नई दुनिया खोलती हैं
फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय
समाजशास्त्र की पढ़ाई में
वे समाज को
सिर्फ विषय नहीं
जीवित मनुष्य की तरह
पढ़ते हैं।

वे समझते हैं
गाँव
सिर्फ खेत और खलिहान नहीं है
वहाँ इतिहास है
वर्ग है
जाति है
श्रम है
परंपरा है
परिवर्तन है
और सबसे बढ़कर
मनुष्य है।

फिर उनकी यात्रा
दिल्ली की ओर मुड़ती है
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
जहाँ गाँव से आया
एक जिज्ञासु मन
देश और दुनिया के
बड़े सवालों के सामने
खड़ा होता है
वहाँ वे
सिनेमा को भी
सिर्फ मनोरंजन की तरह नहीं देखते।

वे पूछते हैं
परदे पर
कौन दिखाई देता है?
कौन छूट जाता है?
किसकी कहानी
किसकी आवाज़ में कही जाती है?
इसी तलाश में
वे शोध करते हैं
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’ पर।
सिनेमा से समाज तक
समाज से मनुष्य तक
मनुष्य से उसकी स्मृति तक
उनकी दृष्टि
लगातार विस्तृत होती जाती है।

फिर
उनकी शोध-यात्रा
गाँव की ओर लौटती है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
यह केवल
एक शोध-विषय नहीं
यह उस दुनिया में
फिर से लौटना है
जहाँ से उनकी यात्रा
शुरू हुई थी
जिस गाँव को
उन्होंने बचपन में
जिया था
उसी गाँव को
वे अब
समाजशास्त्र की पैनी दृष्टि से
पढ़ते हैं।

वे देखते हैं
समय बदलता है
रास्ते बदलते हैं
रिश्ते बदलते हैं
गाँव बदलता है
लेकिन
श्रम की गंध
अब भी वही है
किसान की चिंता
अब भी वही है
मनुष्य की
बेहतर जीवन की आकांक्षा
अब भी वही है।

शिक्षा से निकला यह युवक
फिर जीवन की ओर लौटता है
अब हाथ में
सिर्फ डिग्रियाँ नहीं हैं
अनुभव है
दृष्टि है
समाज की समझ है
और उन लोगों के प्रति
एक गहरी जिम्मेदारी है
जिनके बीच से
वे आए हैं
फिर जीवन
उन्हें प्रशासन की ओर ले जाता है।

वे
उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में आते हैं
लेकिन
सरकारी पद
उनके भीतर के गाँव को
नहीं मिटाता
कुर्सी बदलती है
दृष्टि नहीं
पद बदलता है
पक्ष नहीं
वे व्यवस्था के भीतर आते हैं
लेकिन व्यवस्था के
सिर्फ अधिकारी नहीं बनते
वे उसके भीतर
मनुष्य को खोजते रहते हैं।

शायद इसी कारण
उनकी रचनाओं में
फाइलों के साथ
खेत भी आता है
कार्यालय के साथ
गाँव भी
शहर के साथ
नदी भी
और शासन के साथ
वह आदमी भी
जो हर व्यवस्था के केंद्र में
होना चाहिए।

गाँव से निकला जनपक्षधर्मी शब्द 
अब राजपथ पर है
लेकिन
उसके पैरों में
अब भी पगडंडी की धूल है
उसकी आँखों में
अब भी खेत का आकाश है
उसकी स्मृति में
अब भी किसान का घर है
और उसके सृजन में
अब भी
मिट्टी की आवाज़ है
यही यात्रा
उन्हें कवि बनाती है
गाँव से विश्वविद्यालय तक
विश्वविद्यालय से शोध तक
शोध से प्रशासन तक
और प्रशासन से
फिर मनुष्य तक।

यात्रा पूरी नहीं होती
वह कविता बन जाती है
वे युग संवेदना लिखते हैं
तो लगता है
जैसे कोई नदी
अपने भीतर का इतिहास
कह रही हो
वे नदी को
सिर्फ बहता हुआ जल नहीं देखते
उसमें वे
मनुष्य का चेहरा देखते हैं
सभ्यता की स्मृति देखते हैं
गाँव की साँस देखते हैं
किसान की उम्मीद देखते हैं
और विस्थापित आदमी की
चुप्पी सुनते हैं
इसलिए
उनका पहला विश्वास
शायद यही है
‘नदियाँ बहती रहेंगी’।

यह केवल
नदी के पक्ष में कहा गया वाक्य नहीं है
यह जीवन के पक्ष में
उनका विश्वास है
वे जानते हैं
नदी को बाँधना आसान है
लेकिन
उसकी स्मृति को बाँधना कठिन
जमीन को घेरना आसान है
लेकिन
मिट्टी की गंध को
किसी कागज़ पर कैद करना कठिन
मनुष्य को विस्थापित करना आसान है
लेकिन
उसकी जड़ों को
उसके भीतर से निकाल देना
इतना आसान नहीं।

वे पूछते हैं,
“कुँवरवर्ती कैसे बहे?”
जब रास्ते
पहले ही बाँट दिए गए हों
जब किनारों पर
बाजार के पहरे हों
जब नदी से पूछा जाए
कि वह किसकी है
तब नदी
अपनी तरह
कैसे बहे?
यह प्रश्न
केवल नदी का प्रश्न नहीं है
यह उस किसान का प्रश्न है
जिसके खेत तक
पानी नहीं पहुँचता।

यह उस मजदूर का प्रश्न है
जिसके हाथों से
शहर बनता है
लेकिन शहर में
उसका अपना घर नहीं होता
यह उस स्त्री का प्रश्न है
जो रोज
जल, जंगल और जमीन के बीच
अपना जीवन ढोती है
यह उस आदमी का प्रश्न है
जो अपने ही देश में
हाशिए पर खड़ा होकर
केंद्र को देखता है।

वे जानते हैं
नदी को बचाना
सिर्फ पानी बचाना नहीं है
नदी बचती है
तो मछुआरे की नाव बचती है
किसान का खेत बचता है
गाँव की स्मृति बचती है
बच्चे का भविष्य बचता है
इसीलिए
जब वे कहते हैं,
“नदियाँ ही राह बताएँगी”
तो यह
सिर्फ एक काव्य-पंक्ति नहीं रहती।

यह समय के सामने
एक भरोसा बन जाती है
जब रास्ते बंद हों
तब नदी
रास्ता बनाती है
जब व्यवस्था
पत्थर की तरह ठहर जाए
तब नदी
चलना सिखाती है
जब मनुष्य
मनुष्य से दूर कर दिया जाए
तब नदी
दो किनारों के बीच
पुल बनती है।

वे शायद जानते हैं
सभ्यताएँ
सड़कें बनाकर नहीं
रिश्ते बचाकर
टिकती हैं
और नदी से आगे
वे हमें
नदी की तलाश में ले जाते हैं
‘नदी की तलाश में’
केवल पर्यावरण की चिंता नहीं है
यह उस मनुष्य की तलाश भी है
जो विकास के शोर में
कहीं पीछे छूट गया है।

वे पूछते हैं
क्या नदी केवल
मानचित्र पर बची रहेगी?
क्या जंगल
केवल सरकारी रिपोर्ट में
हरा रहेगा?
क्या मिट्टी
सिर्फ जमीन का दूसरा नाम है?
क्या विकास
उस घर का नाम है
जिसे बनाते-बनाते
हजारों घर उजड़ जाएँ?
उनकी दृष्टि में
पर्यावरण
पेड़-पौधों का विषय भर नहीं है।

वह मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न है
जल है, तो जीवन है
जंगल है, तो साँस है
मिट्टी है, तो अन्न है
और मनुष्य है, तो इन सबका अर्थ है।

वे श्रम को
दूर से नहीं देखते
श्रम
उनकी कविता में
पसीने की तरह आता है
किसान की हथेली पर
मजदूर के कंधे पर
रिक्शे के पहिए में
ईंट ढोती स्त्री की देहभाषा में
खेत की मेड़ पर
वे श्रम की कविता पढ़ते हैं।

उन्हें मालूम है
देश
सिर्फ भाषणों से नहीं बनता
देश बनता है
उन हाथों से
जिन पर
अक्सर इतिहास की रोशनी
नहीं पड़ती
वे उन्हीं हाथों की तरफ
अपनी कविता मोड़ते हैं
उनकी दृष्टि
सिर्फ कविता तक सीमित नहीं है।

उन्होंने
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
पर एम.फिल. के माध्यम से
सिनेमा और समाज के रिश्ते को
गहराई से देखा है
उन्होंने
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
पर पीएचडी के माध्यम से
गाँव को
सिर्फ स्मृति नहीं
बल्कि बदलती हुई
सामाजिक संरचना के रूप में पढ़ा है
इसलिए
जब वे गाँव लिखते हैं
तो उसमें
सिर्फ हरियाली नहीं होती
वहाँ
जाति भी होती है
वर्ग भी होता है
श्रम भी होता है
विस्थापन भी होता है
परिवर्तन भी होता है
और संघर्ष भी।

वे गाँव को
रोमांस नहीं बनाते
वे गाँव को
उसकी पूरी जटिलता में
देखते हैं
फिर वे
सिनेमा के सामने बैठते हैं
परदे पर
कहानी चलती है
लोग
हँसते हैं
रोते हैं
तालियाँ बजाते हैं
लेकिन वे
सिर्फ कहानी नहीं देखते
वे देखते हैं
किसकी आवाज़
परदे पर आई?
किसकी आवाज़
काट दी गई?
कौन नायक बना?
कौन भीड़ में
खड़ा रह गया?
किसका सपना
सिनेमा ने अपना लिया?
और किसका जीवन
पर्दे के बाहर
छूट गया?

इसीलिए
उनकी दृष्टि में
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
दरअसल
समाज को पढ़ना भी है
परदा
उनके लिए
आईना है
और आईने में
वे चेहरा ही नहीं
उसके पीछे खड़ी
पूरी व्यवस्था देखते हैं
फिर वे
‘चिलम चौक का बादशाह’
रचते हैं।

एक चौक
कुछ चेहरे
कुछ छोटे-छोटे सपने
कुछ बड़ी-बड़ी आकांक्षाएँ
थोड़ी हँसी
थोड़ी धूल
थोड़ा संघर्ष
और
पूरा जीवन।

वे जानते हैं
इतिहास
सिर्फ राजमहलों में नहीं बनता
इतिहास
चौराहों पर भी बनता है
चाय की दुकानों पर
रिक्शों की घंटियों में
बाजार की आवाज़ों में
मजदूर के पसीने में
और उस आदमी की आँख में
जो रोज
एक बेहतर दिन की उम्मीद लेकर
घर से निकलता है।

उनकी रचनात्मक दुनिया में
कहानी भी है
जीवन की ऐसी छोटी-छोटी कथाएँ
जिनमें बड़ी दुनिया
अपना चेहरा दिखाती है
एक बिवाई
सिर्फ फटी हुई त्वचा नहीं रहती
वह श्रम का इतिहास बन जाती है
एक बूढ़ी आवाज़
सिर्फ आवाज़ नहीं रहती
वह बीते समय की गवाही बन जाती है।

एक बच्चा
सिर्फ बच्चा नहीं रहता
वह आने वाले समय की
सबसे बड़ी संभावना बन जाता है
वे छोटी चीजों में
बड़ी मनुष्यता खोजते हैं
उनकी कविता
अंधविश्वास से सवाल करती है
रूढ़ियों को चुनौती देती है
पाखंड का चेहरा पहचानती है
लेकिन उनका प्रतिरोध
मनुष्य से घृणा नहीं करता
वह मनुष्य को
और अधिक मनुष्य बनाने की
कोशिश करता है
इसीलिए
उनकी कविता में
क्रोध के साथ
करुणा है
प्रतिरोध के साथ
प्रेम है
व्यंग्य के साथ
आत्मीयता है
और संघर्ष के बीच
एक गहरी उम्मीद।

उनकी कविता में
नदी है
पर नदी अकेली नहीं
उसके साथ
मछलियाँ हैं
पेड़ हैं
पक्षी हैं
पहाड़ हैं
किसान हैं
मजदूर हैं
बच्चे हैं
स्त्रियाँ हैं
और वह पूरा लोक है
जिसे सभ्यता
अक्सर अपने विकास की
फुटनोट बना देती है।

वे उस फुटनोट को
मुख्य पाठ में ले आते हैं
वे कहते हैं
देखिए
जिसे आप हाशिया कहते हैं
वहीं से
केंद्र की असली कहानी
दिखाई देती है
कभी
बाढ़ आती है
लोग डूबते हैं
घर डूबते हैं
फसल डूबती है
लेकिन
भाषण नहीं डूबता
मंच सुरक्षित रहता है
माइक सुरक्षित रहता है
आश्वासन सुरक्षित रहता है
डूबता है, तो सिर्फ आदमी।

वे इस दृश्य को देखते हैं
और उनकी कविता
व्यंग्य में बदल जाती है
वे जानते हैं
व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना
यह नहीं कि वह
झूठ बोलती है
विडंबना यह है कि
वह झूठ बोलते समय भी
सच का मंच सजाती है
लेकिन
उनकी कविता केवल
व्यवस्था से लड़ती नहीं
वह जीवन को
बचाती भी है
एक पिता और बेटी के बीच
बचा हुआ स्पर्श
एक अजनबी में
जन्म लेती आत्मीयता
एक किसान की आँख में
बचा हुआ विश्वास
एक नदी में
बचा हुआ संगीत
एक बच्चे के हाथ में
खुली हुई किताब।

वे जानते हैं
दुनिया को बदलना है
तो पहले
मनुष्य के भीतर
मनुष्य को बचाना होगा
इसलिए
उनकी आठ दिशाएँ
अलग-अलग नहीं हैं
‘नदियाँ बहती रहेंगी’
जीवन का विश्वास है
‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’
व्यवस्था से पूछा गया सवाल है
‘नदियाँ ही राह बताएँगी’
भविष्य पर रखा गया भरोसा है
‘नदी की तलाश में’
प्रकृति और मनुष्य की खोज है
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
समाज और सिनेमा के रिश्ते को पढ़ने की दृष्टि है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
गाँव के भीतर बदलती दुनिया की पड़ताल है
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
परदे के पीछे छिपे समाज को देखने की आँख है
और
‘चिलम चौक का बादशाह’
लोकजीवन के छोटे-से चौक में
बड़ी दुनिया खोज लेने की
रचनात्मक क्षमता है।

इन सबके बीच
एक ही धारा बहती है
मानवता की
इसलिए
डॉ. राकेश कबीर को
केवल नदी का कवि कहना
उनकी कविता को छोटा करना है
वे नदी के माध्यम से
मनुष्य को पढ़ते हैं
वे मिट्टी के माध्यम से
इतिहास पढ़ते हैं
वे श्रम के माध्यम से
समाज पढ़ते हैं
वे सिनेमा के माध्यम से
समय पढ़ते हैं
वे गाँव के माध्यम से
भारत पढ़ते हैं
और कविता के माध्यम से
वे पूछते हैं
क्या हम अब भी
मनुष्य हैं?

अगर हैं
तो नदी को
बहने दीजिए
जंगल को
साँस लेने दीजिए
मिट्टी को
अन्न उगाने दीजिए
किसान को
अपने खेत में रहने दीजिए
मजदूर को
अपने श्रम का सम्मान दीजिए
बच्चे को
उसका भविष्य दीजिए
और कविता को
सच बोलने दीजिए।

क्योंकि वे जानते हैं
नदियाँ रुकेंगी
तो सभ्यता सूखेगी
श्रम रुकेगा
तो देश रुकेगा
सवाल रुकेंगे
तो लोकतंत्र रुकेगा
प्रेम रुकेगा
तो मनुष्य रुकेगा
और जिस दिन
मनुष्य रुक जाएगा
उस दिन
कविता के पास
कहने को कुछ नहीं बचेगा
इसलिए
वे नदी के पक्ष में खड़े हैं
और नदी के पक्ष में खड़ा होना
दरअसल
मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है।

उनकी मानवीय दृष्टि
यही कहती है
नदी बचेगी
तो स्मृति बचेगी
मिट्टी बचेगी
तो रोटी बचेगी
श्रम बचेगा
तो समाज बचेगा
प्रेम बचेगा
तो मनुष्य बचेगा
और मनुष्य बचेगा
तो कविता बहती रहेगी

और हमें याद रहेगा 
इस धरती पर
अप्रैल में 
एक और स्वर ने जन्म लिया है—
राकेश कबीर
अशोक की करुणा
फुले की शिक्षा
आंबेडकर का समता-संकल्प
राहुल का तर्क-विज्ञान
इन धाराओं की स्मृति लिए
वे कहते हैं
मनुष्य ही केंद्र है
समानता ही मंजिल
और संघर्ष ही
परिवर्तन का रास्ता।
★★★
रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



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