Sunday, 19 July 2026

महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप" — गोलेन्द्र पटेल

महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप"

—गोलेन्द्र पटेल 

प्रथम सर्ग : मंगलाचरण: ज्ञानदीप

वंदौं ज्ञान-विवेक को, सत्य-करुण आधार। 
तम हरने हित जो जले, मानवता-दीप अपार॥
मनुज-मात्र हित जो जिए, त्यागे मोह-विकार। 
उन मनीषी के चरित का, करूँ आज विस्तार॥

जय हो बुद्धि-विवेक प्रकाशा। जय मानवता सुधा-निवासा॥ 
जय श्रम, समता, प्रेम पुनीता। जय विज्ञान-विचार विनीता॥
भारत-भू की पुण्य कहानी। जन्मे जहाँ अनेक मनीषी ज्ञानी॥ कबिरा, बुद्ध, फुले, अम्बेडकर। जग आलोकित किए निरंतर॥
तिन्हीं पंथ पर एक पथिक था। ज्ञान-तृषित, निर्भीक अधिक था॥ राहुल नाम जगत में पाया। सत्य-व्रत को जीवन बनाया॥
जाति-पाँति की जड़ता देखी। धर्म-विवाद की ज्वाला लेखी॥ अंधविश्वासों के बंधन। तोड़ चलाया नव आलोकन॥
पुस्तक, पर्वत, देश, दिशाएँ। ज्ञान-सुधा की खोज लगाएँ॥ तिब्बत-पथ पर चरण बढ़ाए। भूले ग्रंथ पुनः घर लाए॥
भाषा-अनेक सहज अपनाईं। विद्या की निधियाँ घर लाई॥ इतिहासों का मर्म विचारा। मानव को सबसे ऊपर धारा॥
जहाँ मिला अन्याय प्रचंडा। वहाँ उठी वाणी अखंडा॥ 
तर्क-विवेक बना हथियारा। झूठ-पाखंड किया ललकारा॥
स्वतंत्रता, समता की वाणी। भाईचारे की शुभ कहानी॥ 
ऐसा समाज बने संसारा। जहाँ न हो कोई बेचारा॥

विचारों से दी ज्योति, मिटा अज्ञान-अँधार। 
इस कारण कुछ लोग थे, जिनको लगा वह भार॥
काल बदला, पर द्वेष का, घटा नहीं व्यवहार। 
पत्थर पर भी चल पड़ा, हिंसा का प्रहार॥

रानीगंज नगर की धरती। जहाँ खड़ी प्रतिमा थी वरती॥ 
ज्ञान-ज्योति की थी पहचान। राहुल का वह अमिट निशान॥
एक निशा कुछ लोग अघाए। घृणा-हथौड़े साथ में लाए॥ 
पत्थर-तन को चूर बनाया। मानव-मन को भी भरमाया॥
सोचा होगा मूर्ति गिराकर। मिट जाएगा नाम जगाकर॥ 
पर इतिहास यही बतलाता। सत्य न पत्थर में बँध पाता॥
टूटे शिल्प, न टूटे वाणी। जीवित रहती अमर कहानी॥ 
जिसको जन-मन अपनाता है। युग-युग तक वह गाता है॥

मूर्ति गिर सकती भले, गिरते नहीं विचार। 
जन-मन में जो बस गए, रहते अपरम्पार॥
ज्ञान-ज्योति का पंथ यह, रहेगा सदा उजास। 
युग-युग तक राहुल-चरित, देगा नव विश्वास॥
— प्रथम सर्ग समाप्त —

द्वितीय सर्ग : जन्म, बाल्यकाल और ज्ञान-पिपासा

गंगा-यमुना मध्य में, पावन भारत-धाम। 
जन्मे राहुल सूर्य-सम, बढ़ा ज्ञान का नाम॥
बालक तन, पर मन बड़ा, जिज्ञासा अपार। 
सत्य-सुधा की प्यास थी, अति गंभीर विचार॥

शैशव से ही चित्त उजियारा। प्रश्नों ने घेरा संसारा॥ 
कौन जगत का मूल विधान? क्या है जीवन का पहचान?
गुरु-गृह जाकर ग्रंथ बखाने। वेद, पुराण, शास्त्र सुहाने॥ 
मन ने किंतु कहा मुसकाई। सत्य कहाँ है, बात बताई?
कंठस्थों से तृप्ति न पाई। जिज्ञासा दिन-दिन बढ़ि आई॥ 
पोथी केवल पाठ न ठानी। खोजी जीवन की सच्चाई॥
आर्य-पंथ का पंथ निहारा। फिर वेदान्त सुधा विस्तारा॥ 
बौद्ध-वचन का सार विचारा। मन ने तर्क-पथ अपनाया॥
देश-देश के पथ पर धाए। ज्ञान-कुसुम जग से चुन लाए॥ 
वन-पर्वत, निर्झर, मरुभूमि। सब बन बैठे ज्ञान-भूमि॥
तिब्बत की दुर्गम गलियारी। हिम से ढँकी कठिन पगडंडी॥ 
प्राण हथेली ऊपर धारे। लौटे ग्रंथ अमूल्य सँभारे॥
पाली, प्राकृत, तिब्बती भाषा। संस्कृत की भी रही अभिलाषा॥ रूसी, अंग्रेज़ी का ज्ञाता। ज्ञान-पिपासु विश्व-विधाता॥
जाति-पाँति का भेद न माना। मानव को परिवार ही जाना॥ 
जहाँ दया, समता की वाणी। वहीं उन्हें लगती थी धानी॥
भूखे जन की पीर निहारी। श्रमिक, कृषक की दशा दुखारी॥ सोचा—यदि विज्ञान न जागे। कैसे जीवन आगे भागे?
लेख लिखे औ ग्रंथ रचाए। जन-जन को संदेश सुनाए॥ अंधविश्वासों से लड़ना। सत्य-विवेक पथ पर बढ़ना॥

जिसने प्रश्नों से किया, जीवन भर संवाद। 
वही बनाता काल में, नव इतिहास-प्रसाद॥
पंथ बदलना दोष क्या, यदि बढ़े विवेक। 
सत्य जहाँ दिखला पड़े, चलना वहीं अशेष॥

धर्म नहीं था लक्ष्य उनका। सत्य बना था पक्ष उनका॥ 
मानव-हित सर्वोपरि माना। यही जीवन का था गाना॥
सत्ता, भय या लोक-लाज से। कभी न डिगे कठिन समाज से॥
जो भी जाना, खुलकर बोले। सत्य-वचन के दीपक खोले॥
कर्म बना पहचान निराली। ज्ञान-यात्रा रही मतवाली॥ 
देश-विदेश सभी ने माना। राहुल थे विद्या-खजाना॥

जिनका जीवन खोज था, जिनका धर्म विवेक। 
ऐसे राहुल का चरित, रहेगा युग-अनेक॥
॥ द्वितीय सर्ग समाप्त ॥

तृतीय सर्ग : ज्ञान-यात्रा और महापंडित की प्रतिष्ठा

ज्ञान-पिपासा संग लिए, निकले दूर-दिगंत। 
सीमा, भाषा, देश सब, लगे उन्हें समकांत॥
धन न चाहा, मान न चाहा, चाही केवल ज्योति। 
सत्य-खोज की राह में, जीवन किया समर्पित॥

चल पड़े घर-द्वार बिसराई। ज्ञान-साधना दृढ़ अपनाई॥ 
वन-पर्वत अरु सिन्धु अपारा। सबको मानत ज्ञान-द्वारा॥
हिमगिरि की दुर्गम चढ़ि डारी। तिब्बत पहुँचे राह सँवारी॥ 
जहँ दुर्लभ ग्रंथन के ढेर। सहेज रहे थे मठ गंभीर॥
पाली, प्राकृत, तिब्बती बानी। संस्कृत की अमृत-सी वाणी॥
भाषा-भाषा भाव विचारे। ज्ञान-स्रोत सब एक निहारे॥
जर्जर पत्र, पुरातन पोथी। देखी मानो अमृत-कोठी॥ 
सहेज-सँजोकर साथ उठाए। भारत हित पुनि लौटि लाए॥
इतिहासों की कड़ियाँ टूटीं। उनसे फिर सब डोरें जुड़ीं॥ 
बौद्ध-वाङ्मय पाया जीवन। जाग उठा भूला संवेदन॥
ग्राम-नगर, विद्यालय, सभा में। बोले सरल विवेक-प्रभा में॥ 
ज्ञान न बंधे कुल या भाषा। सबका हो यह एक प्रकाशा॥
लेखन उनका रहा निरंतर। खुलते गए विचार के अंतर॥ 
यात्रा केवल पग की नाहिं। मन की भी थी साध अनाहिं॥

पोथी केवल अक्षर नहीं, युग-युग की पहचान। 
जो उनको समझे सही, बढ़े मनुज का ज्ञान॥

'वोल्गा से गंगा' की धारा। मानव-युग का खोला द्वारा॥ 
कैसे बदला जीवन-क्रम। कैसे आगे बढ़ा धरम?*
श्रम से जग की गति पहचानी। मानवता की कथा बखानी॥
राजा-रंक सभी क्षणभंगुर। श्रम अमर, मानवता सुंदर॥
दर्शन, इतिहास, पुरातत्त्व। सबमें खोजा जीवन-तत्त्व॥ 
कल्पित गौरव नहीं उचारा। तथ्य-विवेक सदा स्वीकारा॥
विद्या जिनकी बनी कमाई। जनहित में ही उसे लुटाई॥ 
तब जन-जन ने हर्षित होकर। "महापंडित" कहा पुकार कर॥
मान न उनको मद में लाया। और अधिक अध्ययन भाया॥
जितना ऊँचे शिखर चढ़े वे। उतना अधिक विनम्र रहे वे॥

सच्चा पंडित वह नहीं, जो बस पोथी जान। 
जनहित में जो ज्ञान दे, वही बने विद्वान॥
ज्ञान जहाँ निर्भय बहे, मिटे वहाँ अज्ञान। 
राहुल का जीवन बना, मानव का अभियान॥

पर जब बोले सत्य निराला। कंपित हुआ पुरातन जाला॥
जिनका हित अंधेरों में था। उनको यह प्रकाश खला था॥
आगे और प्रखर हो बोली। खुलने लगी विवेक की झोली॥
जाति, अन्याय, पाखंडों पर। चलने वाले थे अब शर॥

ज्ञान-ज्योति जब तेज हो, छँटता झूठ-कुहास। 
यहीं से प्रारंभ हुआ, संघर्षों का वास॥
॥ तृतीय सर्ग समाप्त ॥

चतुर्थ सर्ग : वैचारिक जागरण और समाज-विमर्श

पढ़े ग्रंथ बहु देश के, देखा जग व्यवहार। 
मन ने पूछा—क्यों सहे, मानव इतना भार॥
ज्ञान वही जो लोक हित, तोड़े मिथ्या-जाल। 
दुखित जनों के साथ हो, बोले सत्य विशाल॥

देखि जगत की विषम कहानी। दुखिया जन की व्यथा पुरानी॥
श्रमिक, किसान, दलित, निर्धन। सहते नित अपमान-अगन॥
एक ओर वैभव की माया। एक ओर अभाव की छाया॥ 
मन में उठी करुणा की धारा। सत्य बना फिर दृढ़ हथियारा॥
लेख लिखे अरु ग्रंथ रचाए। जन-मन को संदेश सुनाए॥ 
ज्ञान बिना न मुक्ति पावै। भय-अज्ञान मनुज भरमावै॥
जन्म न ऊँचा, कर्महि पूजा। मानव-मानव भेद न दूजा॥ 
समता का उद्घोष सुनाया। श्रम का गौरव पुनि गुनगाया॥
बोले—मत का मान रहे सब। पर न रहे अन्याय का रब॥ 
जहाँ विवेक स्वतंत्र न होगा। वहाँ न समाज प्रकाश संजोएगा॥
तर्क बने संवाद का सेतु। कटुता का न बने निकेतु॥ 
विचारों का उत्तर विचार। यही सभ्यता का व्यवहार॥

मतभेदों से जन्म ले, नव-नव सत्य-विचार। 
द्वेष बढ़े जब बीच में, होता लोक-अपार॥

सत्ता से न भय उनको था। लोक-मंगल ही मुखरा था॥ 
प्रिय हो या अप्रिय हो वाणी। सत्य कहन की रही निशानी॥
जड़ परंपरा जब अकुलानी। उठी विरोधों की रवानी॥ 
पर वे पथ से न हटि पाए। सत्य-व्रत को दृढ़ अपनाए॥
बहुजन-हित का स्वप्न सँजोया। श्रम-सम्मान का दीप संजोया॥
स्वाधीन मन, विज्ञान-दृष्टि। इन्हीं में देखी नव-सृष्टि॥
मानवता का यही पुकारा। प्रेम बढ़े घर-घर उजियारा॥ 
जाति, घृणा, अन्याय, अभिमाना। त्यागे जग, अपनावे नाना॥

ज्ञान न झुके भय सामने, सत्य न माने हार। 
युग-युग तक पथदीप बन, करता लोक-उद्धार॥

यहीं समाप्त यह सर्ग सुहावा। आगे और प्रखर संघर्षावा॥
विचारों से होगा संवाद। यही रहेगा काव्य-प्रसाद॥
॥ चतुर्थ सर्ग समाप्त ॥

पंचम सर्ग : ज्ञान-यज्ञ और मानव-मुक्ति का स्वप्न

मनुज जन्म दुर्लभ बहुत, दुर्लभ सत्य-विवेक। 
जो जगहित में दीप दे, वही पुरुष अभिषेक॥
ज्ञान-ज्योति ले हाथ में, निकले राहुल वीर। 
तम के वन में खोजते, मानवता की नीर॥

देश-देश की धूलि निहारी। जन-जीवन की दशा विचारी॥ 
भूख, विषमता, शोषण, पीड़ा। देखी मानवता की क्रीड़ा॥
कोई जन्महि मान बढ़ावत। कोई जीवन भर दुख पावत॥ 
मन में उठी करुणा की धारा। कैसे मिटे अन्याय अपारा॥
बोले—श्रम का हो सत्कारा। मानव सबसे अधिक हमारा॥
विद्या, अन्न, उपचार, निवासा। सबको मिले समान प्रकाशा॥
बालक पाए शिक्षा न्यारी। नारी हो सम्मान-अधिकारी॥ 
किसान, श्रमिक, कारीगर सारे। राष्ट्र-विकास के सच्चे तारे॥
पुस्तक केवल पाठ न देई। जीवन का आलोक सहेई॥ 
विद्यालय तब सफल कहावै। जो मन में प्रश्न जगावै॥
जिज्ञासा का दीप जलाओ। तर्क-विवेक पथ अपनाओ॥ 
भय से सत्य न कभी छिपाना। मुक्त विचारों को अपनाना॥

जहाँ प्रश्न का मान है, वहीं प्रगति का द्वार। 
जड़ता के बंधन तहाँ, टूटें बारंबार॥

भाषा-भाषा सेतु बनावे। मन से मन का मेल करावे॥ 
भिन्न वचन पर भाव न दूजा। मानवता ही श्रेष्ठ है पूजा॥
इतिहासों को पढ़ो विचारी। गुण-दोषों की करो पिचारी॥ 
जो शुभ हो वह ग्रहण करीजै। जो अशुभ हो तजि दीजै॥
क्रोध न बनै विचार आधार। संवादों से हो व्यवहार॥ 
मत से मत की हो टकराहट। पर न बने मन में कटु आहट॥
कहे राहुल सुनु नर-नारी। ज्ञान सुधा सबकी अधिकारी॥ 
जिनके मन में प्रेम बसेगा। वह नवयुग का दीप हँसेगा॥

मूर्त नश्वर, नश्वर तन, नश्वर राज-सिंगार। 
ज्ञान, करुणा, सत्य ही, रहते सदा अपार॥

धीरे-धीरे काल बढ़ाया। नव संघर्ष समीप ही आया॥ 
कुछ जन वाणी से डरने लागे। प्रश्नों से भी बचने भागे॥
किन्तु विवेक अमर अविनाशी। रहता जन-मन का प्रकाशी॥
एक विचार जगत में जाता। शत-शत दीप स्वयं जलाता॥

सत्य-दिशा पर जो चले, सो पावै सम्मान। 
लोक-हितैषी कर्म से, अमर बने इंसान॥
॥ पंचम सर्ग समाप्त ॥

षष्ठ सर्ग : यायावर ज्ञानदीप

पंथ-पंथ पर चल पड़े, ले जिज्ञासा साथ। 
ज्ञान-सुधा की खोज में, नित बढ़ते थे पाँथ॥
धन, वैभव, आराम सब, छोड़े हँसकर दूर। 
सत्य-साधना ही बनी, जीवन की भरपूर॥

कंधे ऊपर झोली धारी। नभ को माने छत संसारी॥ 
धूलि-धूसर पथ के राही। ज्ञान-यज्ञ के बने सिपाही॥
वन-पर्वत अरु मरुस्थल नापा। नभ-सा विस्तृत हृदय प्रतापा॥
नदियाँ, गिरि, दुर्गम पगडंडी। कभी न रोकी उनकी मंडी॥
जहँ-जहँ दुर्लभ ग्रंथ पुरातन। खोजत पहुँचे वहाँ निरन्तर॥ 
ताड़-पत्र अरु भोज-पताका। पढ़ि-पढ़ि खोला ज्ञान-फाटक॥
पाली, प्राकृत, तिब्बती बानी। संस्कृत की अमृत-सी वाणी॥
भाषा केवल शब्द न मानी। जन-जीवन की जीवित कहानी॥
जो कुछ पाया जग की थाती। मानी सबकी साझी संपत्ति॥ 
ज्ञान न राजा का भंडारा। नहीं किसी कुल का अधिकार॥

विद्या वह संपदा नहीं, तिजोरी की चीज। 
जितनी बाँटो और बढ़े, यही ज्ञान की बीज॥

लेखन जिनका तप सम माना। दिन-रैन एक कर लिखि डाला॥
इतिहासों के पन्ने खोले। मौन समय के अधर भी बोले॥
यात्राएँ केवल भ्रमण न थीं। जीवन की अनुभूति वहीं थीं॥ 
गाँव-गाँव की पीर समेटी। श्रम की महिमा साथ लपेटी॥
कृषक, खनिक, वनवासी, मजदूर। सबके जीवन देखे भरपूर॥
जन-जीवन का सत्य लिखा तब। शब्द बने संघर्ष के सब॥
सम्मानों से मन न हरषाया। निंदा से भी न घबराया॥ 
एक भरोसा उर में धारा। ज्ञान-विवेक अमर उजियारा॥

मान मिले या तिरस्कार, दोनों रहे समान। 
सत्य-पथिक की एक ही, जग में होती शान॥

ज्यों-ज्यों फैली उनकी वाणी। त्यों-त्यों जागी नई कहानी॥ 
कहीं मिला अभिनंदन भारी। कहीं उठी असहमति सारी॥
वे बोले—"मतभेद रहेंगे। तभी विचारों के वन बहेंगे॥ 
यदि सब एक स्वर ही गाएँ। नव-सत्य कहाँ से उपजाएँ?"
कटुता से वे दूर ही रहते। तर्क-विवेक के दीपक कहते॥ 
लेखनी उनकी रही दुधारी। मिथ्या पर थी चोट करारी॥

तर्क बने जब लोकहित, खुलते नव आयाम। 
द्वेष बने जब नीति तो, जलता जन-अविराम॥

कालचक्र फिर आगे आया। जीवन ने नव मोड़ दिखाया॥ 
ज्ञान-ज्योति का हुआ विस्तार। फैला उनका यश अपार॥
किन्तु समय की यही कहानी। जग में रहती द्वंद्व रवानी॥ 
जहाँ विवेक प्रखर हो जाता। वहाँ विरोध स्वयं आ जाता॥

ज्योति जहाँ प्रखरित हुई, छाया हुई अधीर। 
आगे होगा वैचारिक, संघर्षों का नीर॥
॥ षष्ठ सर्ग समाप्त ॥

सप्तम सर्ग : साहित्य-साधना और ज्ञान-वैभव

लेखनी बनी लोकहित, मन में गहन विचार। 
अक्षर-अक्षर से रचा, नवयुग का विस्तार॥
पोथी उनकी मात्र न थी, जीवन का इतिहास। 
श्रम, विज्ञान, मानव-धरा, सबका था विश्वास॥

कलम उठी जब हाथन भीतर। जाग उठे जन-मन के अंतर॥
शब्द न केवल छंद सुहाए। युग के प्रश्न स्वयं बन आए॥
इतिहासों का पट खोला। सत्य-विवेक सुधा रस घोला॥ 
मिथक, परंपर, नीति, समाजा। सबका किया विवेकी राजा॥
'वोल्गा से गंगा' की धारा। मानव-पथ का खोला द्वारा॥ 
युग-युग की गति, श्रम की गाथा। जाग उठी जन-मन की व्यथा॥
दर्शन की गंभीर कहानी। लिखी सरल जनभाषा बानी॥ 
कठिन विषय भी सहज बनाए। जन-जन तक संदेश पहुँचाए॥
बौद्ध-वाङ्मय का उजियारा। फिर से पाया देश हमारा॥ 
तिब्बत के निर्जन विहारन। लौटे ग्रंथ अमूल्य अपारन॥
धूलि ढँके इतिहास जगाए। भूले पृष्ठ पुनः पढ़वाए॥ 
भारत की बौद्धिक निधियाँ। फिर लौटीं निज पुण्य सदियाँ॥

जो बिखरी थी धूल में, लाए वही विरासत। 
ज्ञान-ऋषि के इस श्रम को, करती जगत सराहत॥

भाषा उनकी सरल, सुबोधा। भाव गहन, तर्कन की ओधा॥
विद्वानों से लेकर जन तक। सबने पाया उसमें पथ॥
लेख बने जन-मन के दर्पण। किए विवेक-विचार समर्पण॥ 
श्रम की महिमा, मानव-मर्यादा। इन पर उनकी रही साधना॥
विद्या का अभिमान न धारा। रहा हृदय निर्मल, उजियारा॥
जितना ऊँचा यश फैलाया। उतना ही विनय अपनाया॥
महापंडित कहि जग ने माना। ज्ञान-दीप का सच्चा ठिकाना॥
सम्मानन से न मन इतराया। नित अध्ययन-पथ अपनाया॥

सच्चा पंडित सो वही, जिसका खुला विचार। 
जो जनहित में ज्ञान दे, वही अमर आचार॥

साहित्य उनका दीप अनोखा। तोड़े मन का हर संदेहा॥ 
प्रश्न जगाए, सोच बढ़ाई। यही रही उनकी कमाई॥
जो सहमत हों, जो असहमत। सबको अधिकार रहा अविरत॥ 
विचारों का यही उजियारा। लोकतंत्र का सत्य सितारा॥
मत का उत्तर मत से दीजे। तर्क-विवेक का दीप सजीजे॥ 
पत्थर, हिंसा, द्वेष, प्रहारा। ज्ञान-पंथ का नहीं सहारा॥

ग्रंथ अमर, विचार अमर, अमर रहे उपकार। 
तन जाता है एक दिन, रहता सत्-आचार॥

अब आगे वह काल समीपा। जहाँ परीक्षा हुई अतीव॥ 
युग बदला, बदले व्यवहार। उठा पुनः वैचारिक भार॥
किंतु रहेगा सत्य अडिग ही। ज्ञान-ज्योति अविनाशी नित ही॥
पत्थर टूटें, टूटे देहा। विचार न टूटें, यही सनेहा॥

जिनकी पूँजी ज्ञान थी, सेवा जिनका धर्म। 
उनकी गाथा गा रहा, आज अमर यह कर्म॥
॥ सप्तम सर्ग समाप्त ॥

अष्टम सर्ग : प्रतिमा-भंजन और विचारों की अमरता

कालचक्र फिर घूमकर, लाया कठिन प्रहार। 
टूटी प्रतिमा ज्ञान की, रोया जन-संसार॥
पत्थर पर आघात था, या था मन पर घाव। 
प्रश्न खड़ा इतिहास में, कौन करेगा भाव॥

रानीगंज नगरी उजियारी। राहुल-मूर्ति खड़ी सुखकारी॥ 
वर्ष अनेक संदेश सुनाती। ज्ञान-ज्योति की राह बताती॥
प्रातःकाल जब जन आए। देखी मूर्ति खंडित पाए॥ 
मौन हुआ वह चौक पुराना। व्यथित हुआ जन-मन का ठिकाना॥
किसने यह कृत्य किया था। कैसा उसके मन में जिया था॥ 
जाँच करे यह राज-व्यवस्था। सत्य बने जन-मन की आस्था॥
नगर-नगर चर्चा फैलानी। दुख से भर उठी हर बानी॥ 
लेखक, शिक्षक, श्रमिक, विद्यार्थी। सबने मानी पीड़ा भारी॥

प्रतिमा गिरती देखकर, उठे अनेक प्रश्न। 
कैसा हो वह लोक जहाँ, टूटे ज्ञान-व्रत-स्मरण॥

किसी ने बोला—"दोषी खोजो।" किसी ने कहा—"विवेक संजोओ।" 
सबका मत था एक ही ध्याना। फिर न टूटे ज्ञान-निशाना॥
मतभेदों का हो व्यवहार। तर्क-विमर्श बने आधार॥ 
क्रोध न ले कानून का स्थान। न्याय करे निष्पक्ष विधान॥
राहुल की थी यही कमाई। प्रश्न करो, मत रखो लड़ाई॥ 
विचारों का दो उत्तर विचार। यही मनुजता का व्यवहार॥
जो इतिहास मिटाने निकले। स्वयं समय की धूल में बिखरे॥
स्मृति न रहती शस्त्र प्रहारा। जन-मन होता उसका धारा॥

टूटे शिल्प हजार हों, टूटे न विश्वास। 
ज्ञान-दीप की एक लौ, हर ले तम का वास॥

गाँधी, बुद्ध, कबीर, विवेका। सबने सहा विरोध अनेका॥ 
पर न रुकी उनकी धारा। बढ़ता गया विचार हमारा॥
राहुल का भी यही कथाना। पत्थर से न मरे जमाना॥ 
ग्रंथ, विचार, श्रम की वाणी। जीवित रहती युग की रानी॥
यदि असहमति मन में जागे। लेख लिखो, संवाद जगाओ॥ 
तोड़-फोड़ से लाभ न कोई। बढ़ती केवल पीर ही होई॥
विद्यालय में दीप जलाओ। इतिहासों को सत्य पढ़ाओ॥ 
विवेक-शील नव पीढ़ी होगी। तभी धरा उजियारी होगी॥

मूर्ति फिर निर्मित बने, यदि हो जन-संकल्प। 
पर संवादों के बिना, सूना रहे विकल्प॥
ज्ञान जहाँ सम्मानित हो, वहीं सजे समाज। 
यही रहे इस सर्ग का, अंतिम शुभ संदेश॥
॥ अष्टम सर्ग समाप्त ॥

नवम सर्ग : अमर विचार-ज्योति

मूर्ति टूटी देख सब, व्यथित हुआ समाज। 
किंतु न टूटी चेतना, न बुझ पाया काज॥
पत्थर का अस्तित्व क्षणिक, अक्षर अमर प्रकाश। 
ज्ञान-वृक्ष की छाँह में, खिलता जन-विश्वास॥

उठे नगर में प्रश्न अनेका। कहाँ गया वह भाव विवेका॥ 
क्यों संवाद हुआ निर्बल सा। क्यों बढ़ता वैर-विषमल सा॥
विद्वज्जन सब मिलकर बोले। मन के बंद कपाट को खोले॥ 
मत का उत्तर मत से दीजे। सत्य-विवेक-पथ ही लीजे॥
पुस्तक जलती, मूर्ति गिरती। फिर भी वाणी नहीं है मरती॥
जिसको जन-हृदय अपनाता। युग-युग तक वह गीत सुनाता॥
बुद्ध-वचन को कौन मिटाए? कबिरा किससे दूर हटाए? 
फुले, गांधी, आंबेडकर वाणी। रहे अमर जन-मन की रानी॥
राहुल भी उस पंथ के राही। ज्ञान-ज्योति के सच्चे सिपाही॥
जीवन भर जो दीप जलाया। वह न किसी ने बुझा पाया॥

सत्य न तलवारों मरे, न मरे प्रहारों साथ। 
वह तो चलता ही रहे, जन-मन थामे हाथ॥

विद्यालय फिर गीत सुनाएँ। ग्रंथालय नव दीप जलाएँ॥ 
शोध, विमर्श, विचार, पठन हो। ज्ञान-यज्ञ का नित्य वरण हो॥
बालक प्रश्न निरंतर पूछे। गुरु उत्तर में तर्क ही बूझे॥ 
अंध-स्वीकार न नीति ठहरे। विवेक-दीप उर भीतर बहे॥
भाषा-भाषा सेतु बनाए। जन से जन का नेह बढ़ाए॥ 
जाति, घृणा, अभिमान मिटे जब। तब खिलता है मानव-उद्भव॥
श्रम का हो सत्कार निरंतर। ज्ञान बने जन-जन का अंतर॥
करुणा, समता, न्याय, स्वाधीन। इनसे होता राष्ट्र नवीन॥

जिनका जीवन लोक हित, उनका अमिट प्रभाव। 
काल बदलता रहे सदा, रहता उनका भाव॥

राहुल केवल नाम न थे वे। चलते-फिरते धाम न थे वे॥ 
जिज्ञासा की ज्योति प्रखर थे। मानव-मुक्ति-पथ के स्वर थे॥
उनकी सबसे बड़ी विरासत। प्रश्न, विवेक और मानव-शक्ति॥ 
जो इस पथ पर बढ़ता जावे। वही सच्ची श्रद्धा चढ़ावे॥

फूल चढ़ाकर क्या मिले, यदि न चले विचार। 
राहुल को सच्ची नमन, ज्ञान-विवेक विस्तार॥
॥ नवम सर्ग समाप्त ॥

दशम सर्ग : महापंडित की महिमा

नमन करूँ उस साधकहि, ज्ञान-ज्योति अविराम। 
जिसने मानव-हित जिया, अमर हुआ वह नाम॥
कर्म बड़े कुल से सदा, यह जीवन का सार। 
सत्य-पथिक की कीर्ति का, नहिं होता संहार॥


भारत-भूमि धन्य अति भई। जहँ ऐसी विभूति प्रगटई॥ 
यायावर, मनीषी, गुणसागर। ज्ञान-दीप जगमग नित उजागर॥
ग्रंथ रचे बहु, भाव गहिराए। लोक-हृदय में दीप जलाए॥ 
इतिहासन के पट उघारे। सत्य-विवेक सुधा बरसाए॥
वन-पर्वत, गिरि, देश-विदेशा। खोजत फिरे ज्ञान-संदेशा॥ 
ताड़-पत्र अरु पोथी लाए। भारत-भू के भाग जगाए॥
श्रम का गाया नित्य बखाना। मानव को सर्वोच्च माना॥ 
प्रेम, दया, समता के धारा। यही रहा जीवन आधार॥

जिनके मन में लोक हित, जिनके उर विज्ञान। 
ऐसे नर दुर्लभ जगत में, उनका कर सम्मान॥


सत्ता आई, सत्ता जाई। काल न किसी संग टिक पाई॥ 
पर जो जन-मन में बस जाते। युग-युग तक वे गीत सुनाते॥
पत्थर टूटें, भवन गिरें चाहे। स्मृति न हृदयों से मिटि जाए॥ 
लेख, विचार, तप, त्याग, कहानी। अमर बनावे सच्ची वाणी॥
यदि मतभेद किसी से होई। संवादों की राह न खोई॥ 
तर्क-विमर्श सुधा बरसाओ। वैर-अग्नि को दूर भगाओ॥
विद्यालय फिर दीप जलाएँ। ग्रंथालय समृद्ध बनायें॥ 
शोध, विमर्श, अध्ययन, लेखन। इनसे जागे राष्ट्र-चेतन॥

अक्षर होते दीप सम, तम हरते अविराम। 
जिनने अक्षर-यज्ञ किया, अमर हुआ वह नाम॥


हे नवयुवा! यह बात विचारा। ज्ञान-साधना श्रेष्ठ सहारा॥ 
जिज्ञासा का दीप जलाना। सत्य-पथों पर दृढ़ हो जाना॥
श्रम का करना सदा आदर। मानवता को रखना ऊपर॥ जाति, घृणा, अभिमान भुलाना। प्रेम-सूत्र में जग बँधवाना॥
इतिहासों से सीख सँजोना। दोष-गुणों का मान परखना॥ 
अंध-प्रशंसा, अंध-विरोध। दोनों त्यज कर करना शोध॥
राहुल का यह सच्चा पूजन। ज्ञान-विवेक बने आराधन॥ 
लोकमंगल हो जीवन-ध्येय। यही मनुज का श्रेष्ठ अभेय॥

राहुल-रवि की रश्मियाँ, फैलीं जग के बीच। 
ज्ञान, करुणा, सत्य की, पहुँची घर-घर सींच॥

मूर्ति चाहे टूट जाए, टूटे नहीं विचार। 
मानवता के पंथ पर, यही अमर उद्घार॥
॥ दशम सर्ग समाप्त ॥

एकादश सर्ग : जनचेतना का आह्वान

ज्ञान-ज्योति को ढाँपकर, कब तक रहेगा तम। 
उदयाचल पर सूर्य सम, फैले सत्य-सुगम॥
जागो भारत-भूमि के, हे नवयुग के लाल। 
श्रम, विज्ञान, विवेक से, लिखो नया प्रतिपाल॥

जागो छात्र, कृषक, श्रमधारी। जागो भारत-भाग्य-विहारी॥
पुस्तक को निज मित्र बनाओ। ज्ञान-वृक्ष फिर से लहराओ॥
ग्रंथालय फिर दीप जलावें। विद्यालय मुस्कान बिखेरें॥ 
शोध-विमर्श के यज्ञ सजाएँ। नव-विचार के पुष्प खिलाएँ॥
निज इतिहास स्वयं पहचानो। सत्य-असत्य विवेक से जानो॥
गौरव केवल गान न होई। कर्म बिना सम्मान न होई॥
जाति-भेद की दीवारें ढहें। मानवता के पंथ बढ़ें॥ 
प्रेम-सुधा सब ओर बरसै। द्वेष-विषमता दूर तरसै॥
श्रम से सुंदर जग बनता है। ज्ञान मनुज को ऊँचा करता है॥
जिसके हाथों श्रम की रेखा। वही धरा का सच्चा लेखा॥

कर्म बिना सम्मान क्या, श्रम बिना उत्कर्ष। 
मानवता की साधना, जीवन का ही हर्ष॥

भूखे को भोजन मिल जाए। प्यासे को जल सहज मिलाए॥
रोगी पाए उचित दवाई। सब पर बरसे सम सुखदाई॥
नारी पाए पूर्ण सम्मान। बालक पाए नव विज्ञान॥ 
वृद्ध न हों उपेक्षित घर में। यही धर्म हो हर अंतर में॥
धन का हो सदुपयोग निरंतर। नहीं बने वह दुख का कारण॥
सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास। यही समाज का हो प्रकाश॥
प्रकृति माता रहे सुहानी। निर्मल बहे नदी का पानी॥ 
वन, उपवन, गिरि, खेत, खलिहान। इनसे ही मुस्काता जहान॥

ज्ञान जहाँ पर्यावरण, श्रम का हो सम्मान। 
वहीं खिलेगा एक दिन, सुखमय हिंदुस्तान॥

राहुल का संदेश यही था। मनुज स्वयं अपनी गति लिखता॥
अज्ञानों की बेड़ी तोड़ो। सत्य-विवेक से नाता जोड़ो॥
प्रश्न करो पर द्वेष न पालो। तर्कों से ही सत्य निकालो॥ 
मतभेदों का मान रखो तुम। पर मानव का ध्यान रखो तुम॥
जिस समाज में पुस्तक हँसती। वहीं सदा संस्कृति बसती॥ 
जहाँ विचार स्वतंत्र विचरते। वहीं सभ्यता-पुष्प निखरते॥

पत्थर का इतिहास क्या, यदि मन हो वीरान। 
ज्ञान-संस्कृति से बने, धरती स्वर्ग समान॥

आने वाली पीढ़ी पूछे— "क्या तुमने दीपक कुछ बूझे? 
या फिर उसको और बढ़ाया? ज्ञान-वृक्ष फिर से लहराया?"
उत्तर तब इतिहास सुनाए। जिनने सत्य-व्रत अपनाए॥ 
उनका जीवन धन्य कहाया। जग ने उनको शीश नवाया॥

राहुल का आदर्श यह, रहे सदा साकार। 
ज्ञान, करुणा, कर्म से, हो जग का उद्धार॥
॥ एकादश सर्ग समाप्त ॥

द्वादश सर्ग : काल से संवाद

बीत गए कितने बरस, बदले राज-समाज। 
फिर भी जीवित प्रश्न हैं, खोजत अपना काज॥
समय-सिंधु की लहर में, डूबे कितने नाम। 
सत्य-विवेक-प्रदीप का, बढ़ता गया धाम॥

काल चला निज गति अविरामा। बदले शासन, बदले धामा॥
बदली भाषा, बदले नारे। बदले युग के राज-दुलारे॥
किन्तु न बदला मन का संशय। कैसे मिटे विषमता-अन्याय?॥
 कैसे जागे ज्ञान उजियारा? कैसे हँसे दुखी संसारा?॥
इन्हीं प्रश्न का खोजत उत्तर। राहुल बोले खोलि अंतर॥ 
"प्रश्न करो, पर सत्य न छोड़ो। विवेक-दीप उर भीतर जोड़ो।"
पंथ अनेक, विचार अनेका। ज्ञान एक, मनुजता एका॥ 
जहाँ विमर्श स्वतंत्र विचरता। वहीं सभ्यता पुष्पित रहता॥
पुस्तक, शोध, प्रयोग, विचारा। इनसे जग का हो उजियारा॥ 
तर्क बने जब लोक-सहायक। तब विज्ञान बने पथदायक॥

मत से मत की भिन्नता, जीवन का विस्तार। 
घृणा जहाँ प्रवेश करे, टूटे लोकाचार॥

शब्दों पर पहरा न धरिए। प्रश्नों से मत कभी डरिए॥ 
जिज्ञासा का दीप जलाना। मानव का है धर्म पुराना॥
जिस दिन मन भयमुक्त बनेगा। नव विज्ञान स्वयं फलेगा॥ 
बंद कपाट खुलेंगे सारे। जागेंगे नव ज्ञान-द्वारे॥
युवा उठें पुस्तक कर धारी। श्रम को माने महिमा भारी॥ 
लेखक, शिक्षक, शोध-सिपाही। बनें विवेक-पथ के राही॥
मूर्ति यदि सम्मानित होगी। जब विचार भी जीवित होगी॥ 
केवल फूल चढ़ाने भर से। श्रद्धा नहीं जगत में तरसे॥

श्रद्धा केवल नाम की, यदि न बने व्यवहार। 
सूखी धरती पर कहाँ, उगता हरित विस्तार॥

राहुल का यह यश निहित है। ज्ञान-दीप जो आज प्रज्वलित है॥ 
जब-जब कोई प्रश्न उठाए। उनकी स्मृति मुस्कान लुटाए॥
जो इतिहासों को पढ़ता है। सत्य-असत्य को गढ़ता है॥ 
वह भविष्य का शिल्प बनाता। नव भारत की नींव जमाता॥

अक्षर जिनके दीप हैं, कर्म जिनका गान। 
युग-युग तक स्मरणीय हैं, ऐसे महा-विद्वान॥

नभ में तारे आते-जाते। किन्तु ध्रुव-तारे राह दिखाते॥ 
वैसे ही कुछ नर-नायक हैं। युग के अचल प्रदीपक हैं॥
तन जाता है, यश रह जाता। सत्य अमर हो जग में गाता॥ 
ज्ञान-दीप जब तक जलते। राहुल तब तक जीवित रहते॥

मूर्ति टूटे या बने, यह क्षणभंगुर रीत। 
अमर वही जो लोक में, बोए ज्ञान-प्रीत॥
॥ द्वादश सर्ग समाप्त ॥

त्रयोदश सर्ग : ज्ञान-यज्ञ और अक्षर-तप

नित अक्षर की साधना, नित चिंतन का योग। 
राहुल जीवन भर रहे, ज्ञान-यज्ञ के भोग॥
धन न माँगा, मान न माँगा, माँगा सत्य-विचार। 
लोकहितैषी लेखनी, रही सदा उद्गार॥

जब-जब उषा अरुणिमा लाई। लेखनी फिर हाथ समाई॥ 
अक्षर-अक्षर दीप जलाते। तम के बंधन दूर भगाते॥
पुस्तक थी न व्यापार उनकी। साधन थी संसार-हित की॥ 
शब्द न बिकते राज-द्वार पर। गूँज उठे जन-जन के घर॥
जहँ कहीं इतिहास छिपा था। धूलि-धूसर पृष्ठ लिपा था॥ 
खोज-खोज कर उसे निकाला। सत्य-विवेक से फिर सँभाला॥
भाषा उनकी सरल सलोनी। गंगा-जल सी निर्मल बोनी॥ 
गूढ़ विषय भी सहज बनाते। जन-मन तक संदेश पहुँचाते॥
शोध बना उनका उपवासा। लेखन जीवन की अभिलाषा॥ 
दिन में यात्रा, रजनी लेखन। यही निरंतर रहा साधन॥

तप वह क्या जो वन बसै, छोड़ि जगत का भार। 
श्रेष्ठ तपस्या लोक हित, अक्षर का विस्तार॥

पर्वत, पगडंडी, वन, नदियाँ। बनती रहीं ज्ञान की सदियाँ॥ 
ग्राम-ग्राम की कथा समेटी। श्रम की महिमा साथ लपेटी॥
कृषक करों की कठिन लकीरें। श्रमिक नयन की मौन लकीरें॥ 
इनमें देखा देश का जीवन। इनमें पाया युग का स्पंदन॥
विद्या केवल ग्रंथ न होती। जन-जीवन से शक्ति संजोती॥ 
जो जन-दुख से नाता तोड़े। वह शिक्षा किस काम की हो रे॥
राहुल का यह दृढ़ मत ठाना। ज्ञान बने जन का खजाना॥
विद्यालय से लेकर खेत। फैले शिक्षा की नव रेत॥

अक्षर जब श्रम से मिलें, तब हो सच्चा ज्ञान। 
जीवन से जो दूर हो, वह केवल अनुमान॥

सत्य कहन में भय न माना। प्रिय हो, अप्रिय—सब पहचाना॥ 
वाणी में थी दृढ़ता भारी। हृदय रहा करुणा से भरी॥
मतभेदों को स्थान दिया था। संवादों का मान किया था॥ 
लेखक का यह धर्म बताया। तर्कों से हो सत्य उजाया॥
जिस दिन प्रश्न मरेंगे सारे। मिट जाएँगे ज्ञान-द्वारे॥ 
इस कारण वे सदा पुकारें— "सोचो, पढ़ो, स्वयं विचरें।"

प्रश्न मनुज की प्राण-धरा, उत्तर उसका पंथ। 
जिज्ञासा के बिन नहीं, सार्थक होता ग्रंथ॥

युग बदलेगा, काल बदलगा। मानव का व्यवहार बदलगा॥ 
किन्तु अमर यह वचन रहेगा। ज्ञान-ज्योति ही पथ दिखलेगा॥
ऐसे तप के धनी मनीषी। भारत-भू के परम ऋषि-सी॥ 
अक्षर जिनका अमृतधारा। वह जन-जन का है उजियारा॥

दीप बुझे तो और जलें, यही ज्ञान का धर्म। 
राहुल के अक्षर रहें, युग-युग तक सत्कर्म॥
॥ त्रयोदश सर्ग समाप्त ॥

चतुर्दश सर्ग : तिब्बत-विजय और ज्ञान-धरोहर

हिमगिरि ने जब रोक दी, दुर्गम पथ की चाल। 
राहुल बढ़ते ही रहे, लेकर दृढ़ संकल्प॥
शस्त्र नहीं, पुस्तक लिए, निकले ज्ञान-प्रवीर। 
जिनके रण का लक्ष्य था, तम पर पाना तीर॥

उत्तर दिशा हिमालय सोहा। धवल शिखर, निस्तब्ध अलोखा॥ 
बर्फीली झंझा झकझोरे। दृढ़ पग फिर भी नहीं थे डोले॥
संकीर्णों पथ, खाई गहरी। नभ में उड़ती धुंध सुनहरी॥ 
प्राणों का संकट था भारी। साथ न कोई सेना-धारी॥
याक-घंटी की मृदु झंकारा। सुन पड़ता निर्जन पसारा॥ 
मठ-मंदिर के द्वार पुरातन। ज्यों सोया हो बीता जीवन॥
ताड़-पत्र के ग्रंथ अनोखे। काल-धूलि में पड़े अलोखे॥ 
दीमक, नमी, उपेक्षा खाकर। रोते थे इतिहास पुकारकर॥
राहुल ने जब उन्हें निहारा। जाग उठा उर में उजियारा॥ 
बोले—"ये भारत की निधियाँ, इनमें जीवित युग की सदियाँ।"

रत्न न थे वे स्वर्ण के, न मणि, मुक्त, प्रवाल। 
ज्ञान-संपदा से भरे, अनुपम ग्रंथ विशाल॥

एक-एक पृष्ठों को पढ़ते। भूले युग के संकेत गढ़ते॥ 
पाली, प्राकृत, तिब्बती वाणी। बनती जाती जीवन-कहानी॥
बुद्ध-वचन की सुधि जग आई। भारत की पहचान बचाई॥ 
जो बिखरा था काल-प्रवाह में। फिर संजोया अपने चाह में॥
पीठ झुकी, पर मन न हारा। दुर्गम पथ को किया सहारा॥ 
ग्रंथ उठाए कंधों ऊपर। मानो गंगाजल हो भू पर॥
न स्वर्ण-रथ, न राज-दुलारा। ज्ञान बना जीवन का तारा॥ 
लौटे जब निज देश की धरती। साथ चली इतिहास-समृद्धि॥

विजय वही जो दे सके, जग को नव आधार। 
राहुल की वह जीत थी, अक्षर का विस्तार॥

सभा-सदन में ग्रंथ सजाए। विद्वज्जन सब हर्षित आए॥ 
खुलने लगे नये अनुसंधान। जाग उठा भारत का ज्ञान॥
शोधक, लेखक, छात्र, अध्येता। पाए नव इतिहास-निकेता॥ 
एक पुरुष के श्रम से जागी। सोई संस्कृति फिर अनुरागी॥
यश का उनको मोह न व्यापा। निज को केवल साधक मापा॥ 
बोले—"ज्ञान मनुज की थाती। नहीं किसी कुल की संपत्ति।"

जिसने अक्षर लौटकर, दिए देश के हाथ। 
उसका ऋण इतिहास भी, भूले नहीं सौगात॥

ऐसे कर्म अमर हो जाते। युग-युग तक आदर्श कहाते॥ 
राज्य बदलते, बदलें सिंहासन। ज्ञान अमर रखता पहचान॥
राहुल की यह विजय निराली। नहीं रक्त से, नहीं कृपाणी॥ 
कलम, करुणा, श्रम, अनुसंधाना। इनसे जीता जग का माना॥

जिसने जीता ज्ञान से, वह विजयी सिरमौर। 
उसकी गाथा गा रहा, भारत बारंबार॥
॥ चतुर्दश सर्ग समाप्त ॥

पंचदश सर्ग : वोल्गा से गंगा — मानवता की अखंड यात्रा

नदियाँ केवल जल नहीं, युग-स्मृतियों की रेख। 
उनमें बहता है मनुज, श्रम, संघर्ष, विवेक॥
वोल्गा की धारा मिली, गंगा की पहचान। 
राहुल ने इतिहास को, दिया नया विधान॥

बैठे एक दिवस मन माहीं। उठी अनोखी लहर अगाही॥ 
कैसे मानव बढ़ता आया। कैसे जग का रूप बनाया॥
कब था वन, कब ग्राम बसाए। कब लोहे के औज़ार आए॥ 
कब खेती ने रूप सँवारा। कब विज्ञान बना उजियारा॥
नहीं किसी राजा की गाथा। नहीं विजेता की परिभाषा॥ 
जन-जीवन की कथा निराली। बनी काव्य की अमृत डाली॥
कभी शिकारी वन में डोले। कभी कृषक धरती से बोले॥ 
कभी नाव पर सागर नापा। कभी हिमालय का पथ मापा॥
श्रम के बल पर नगर बसाए। सपनों को आकार दिलाए॥ 
रक्त-पसीने की हर बूँदें। सभ्यता की बनीं जड़-मूले॥

सिंहासन की धूल से, ऊँचा श्रमिक-मुकुट। 
धरती का इतिहास है, उसके श्रम की लिपि॥

राहुल बोले—"ध्यान लगाओ। इतिहासों को फिर पढ़ जाओ॥ 
राजमहल के द्वार न गिनना। जन-पथ का भी मान समझना।"
जिसने हल की मूठ सँभाली। जिसने ढाली धातु निराली॥ 
जिसने चाक घुमाकर गढ़ा। उसने ही इतिहास रचा॥
कुम्हर, जुलहा, लोहार, बढ़ई। इनसे जग की गति है चढ़ी॥ 
गुमनामों के श्रम से फूला। मानवता का वृक्ष अनोखा॥
गाथा उनकी कौन सुनाए। जिनके कर से दीप जलाए॥ 
इसी व्यथा को स्वर दे डाला। शब्दों में इतिहास उछाला॥

माटी, लकड़ी, लौह से, जिसने जग सँवारा। 
उस श्रमवीर के नाम का, गाया जय-निनाद॥

युद्धों का भी लेखा देखा। उनका कड़वा फल परखा॥ 
राख हुई कितनी बस्तियाँ। रोई कितनी जन-हस्तियाँ॥
तब मन में संकल्प जगाया। मानव ने मानव अपनाया॥ 
शक्ति तभी कल्याण करेगी। जब करुणा संग राह धरेगी॥
जाति, कुलों के ऊँच-नीच से। बढ़ता केवल क्लेश सरीखे॥ 
मानव का सम्मान वहीं है। जहाँ श्रम का अभिनंदन है॥
समय बदलता रूप अनोखा। पर रहता संघर्ष अशोखा॥ 
हर पीढ़ी का एक ध्येय हो। मनुष्य मनुष्य का श्रेय हो॥

वोल्गा से गंगा बही, केवल जल की धार। 
बहता उसमें युग-युगों का, मानव-व्यवहार॥

राहुल की यह दृष्टि निराली। धरती एक, मनुज की लाली॥ 
सीमाएँ क्षणभंगुर होतीं। संस्कृतियाँ संवाद सँजोतीं॥
जिस दिन जग यह बात समझे। द्वेष स्वयं ही दूर निकल दे॥ 
विविध रंग मिल एक बनेंगे। तब मानव के स्वप्न फलेंगे॥

देश अलग हों, भेष भले, अलग-अलग हों नाम। 
मानवता का सूर्य तो, देता सबको धाम॥
॥ पंचदश सर्ग समाप्त ॥

षोडश सर्ग : बुद्धभूमि का अन्वेषी

कपिलवस्तु से कुशिनगर, सारनाथ, वैशाल। 
राहुल खोजत फिरत थे, भारत का भूतकाल॥
पत्थर बोले मौन में, टूटी हुई मठ-दीर। 
सुनता था इतिहास को, एक तपस्वी वीर॥

पद-पद धूलि पुरातन छानी। वन-उपवन, निर्झर, गिरि, पानी॥ 
जहँ-जहँ बुद्ध-पदचिह्न बिखराए। राहुल चरण वहाँ ले जाए॥
ईंट-ईंट से बात बनाते। मौन शिलाओं को पढ़ जाते॥ 
खंडहर भी इतिहास सुनाते। जो सुनता, वह सत्य पाता॥
किसने रचे विहार सुहावन। किसने रोपे ज्ञान उपावन॥ 
किस युग में यह ज्योति जली थी। किस कारण फिर मंद पड़ी थी॥
प्रश्न नयन में, धैर्य हृदय में। चलते रहे कठिन पथ निर्भय में॥ 
कण-कण का साक्ष्य जुटाया। तब इतिहास नया लिखवाया॥

साक्ष्य बिना इतिहास का, होता केवल शोर। 
प्रमाणों से सत्य का, खुलता है हर द्वार॥

माटी केवल माटी नाहीं। युग की सोई स्मृति समाही॥ 
मूर्ति, मुद्रा, लेख, अभिलेखा। सबमें छिपा समय का लेखा॥
लिपि पुरानी पढ़ते-पढ़ते। नव निष्कर्ष स्वयं ही गढ़ते॥ 
अनुमानों से दूर रहे वे। प्रमाणों के सूर रहे वे॥
जनश्रुतियों का मान किया पर। रखा विवेक सदा ही ऊपर॥ 
जहाँ मिला इतिहास प्रमाणित। वहीं किया निष्कर्ष प्रकाशित॥
विद्या का यह धर्म निराला। सत्य न हो किसी का लाला॥ 
जिसके पक्ष प्रमाण उतरते। विजयी केवल वही ठहरते॥

वह विद्वान नहीं कहे, जो माने अनुमान। 
सत्य वही जो जाँचकर, दे जग को प्रमाण॥

बुद्ध-वचन का मर्म विचारा। नहीं बनाया उसे किनारा॥ 
कहा—"मनुज! निज दीपक बनना। सत्य स्वयं अनुभव से चुनना।"
करुणा यदि व्यवहार न आए। ज्ञान कहाँ फिर फल दे पाए॥ 
शुष्क शास्त्र क्या काम करेगा। यदि जन-दुख न कम कर देगा॥
इस कारण वे ग्राम-ग्राम में। बैठे श्रमिकों के विश्राम में॥ 
साधु, किसान, चरवाहों से। सीखा जीवन की राहों से॥
जन ही सबसे बड़ा ग्रंथ है। उसमें युग का सत्य अनंत है॥ 
जिसने जन की पीर पढ़ी है। उसने सच्ची विद्या गढ़ी है॥

पुस्तक और समाज का, जब होता संयोग। 
तब विद्या बनती सदा, जनकल्याण-प्रयोग॥

नभ में फैला साँझ का रंगा। बहती शांत निरंतर गंगा॥ 
राहुल बैठे तट पर आकर। सोचे मानव का पथ पाकर॥
"कितने आए, कितने जाएँ। पर विचार अमिट रह जाएँ॥ 
ज्ञान न बँधे काल-किवाड़े। चलता रहता द्वार-द्वारे॥"
ऐसा चिंतन, ऐसा जीवन। बन गया युग का आलोकन॥ 
जिसने भारत को यह सिखलाया— प्रश्न करो, पर सत्य निभाया।

चलते-चलते छोड़ गए, अक्षर के पदचिह्न। 
जब तक ज्ञान-विवेक है, तब तक वे अविच्छिन्न॥
॥ षोडश सर्ग समाप्त ॥

सप्तदश सर्ग : लोकभाषा का महामंत्र

जन की बोली छोड़कर, कैसा ज्ञान-विलास। 
भाषा वह जो जोड़ दे, मन से मन का पास॥
अक्षर तब ही धन्य हैं, जब हों जन के मीत। 
केवल पंडित-मंडली, न गाए उनकी गीत॥

राहुल बोले—"देश हमारा। बोली-बानी का उजियारा॥ 
हर भाषा में जन की धड़कन। हर बोली में जीवन-स्पंदन॥
संस्कृत का सम्मान रहेगा। पाली का भी मान रहेगा॥ 
प्राकृत, अपभ्रंश, लोक-विभाषा। सबमें बसती भारत-आशा॥
क्यों बैठे हैं शब्द अकेले? चलें खेत तक, जाएँ मेले॥ 
चरखे की गति, हल की रेखा। इनसे जुड़कर बने विवेका॥
गुरुकुल से बाजार मिलें जब। नगर जुड़ें परिवार मिलें तब॥ 
भाषा बने न ऊँच-नीच की। हो वह साँस समस्त सृजन की॥

जिस भाषा में लोक का, धड़क रहा विश्वास। 
वही बने इतिहास की, सबसे सच्ची आस॥

कवि यदि केवल राज सुनाए। जन के आँसू कौन गिनाए॥ 
लेखक का कर्तव्य यही है। जन-जीवन की कथा सही है॥
बूढ़ी अम्मा की लोरी में। ग्वाले की बाँसुरी-धुन में॥ 
बच्चों की किलकारी भीतर। छिपा हुआ संस्कृति का सागर॥
श्रमिक गाए जब पथ चलते। गीत वहीं इतिहास बदलते॥ 
नदिया, नाव, चरागाहों में। भारत बसता गाँव-गाँव में॥
भाषा केवल व्याकरण नाहीं। जीवन की चलती परछाहीं॥ 
जिसने इसको हृदय लगाया। उसने सच्चा देश कमाया॥

माटी जैसी हो सके, वैसी हो अभिव्यक्ति। 
तभी बनेगी लोक की, अक्षय ज्ञान-समृद्धि॥

राहुल लिखते सरल कहानी। पर गहरी होती थी बानी॥ 
कठिन विचार सहज बन जाते। पढ़ते-पढ़ते मन मुस्काते॥
शब्द न बनते शुष्क इशारे। उनमें चलते जन-गलियारे॥ 
कभी हिमालय, कभी खलिहाना। कभी विहार, कभी वीराना॥
कलम नहीं थी केवल लेखन। वह थी जन-मन का स्पंदन॥ 
अक्षर-अक्षर बोल रहा था— "भारत जागो, समय कहा था।"

भाषा वही महान है, जो दे सबको मान। 
जो बाँटे नहीं मनुष्य को, जो जोड़े इंसान॥

आएँगे फिर नए जमाने। बदलेंगे लिखने के ठिकाने॥ 
कागज़ होंगे, पट होंगे कम। जग होगा विज्ञान-संगम॥
किन्तु अमर यह नियम रहेगा। शब्द तभी जीवन कहेगा॥ 
जब उसमें जन-पीर समाई। जब उसमें हो लोक-भलाई॥
यही विरासत राहुल दीन्ही। ज्ञान-गंगा जन-जन सींची॥ 
भाषा को उत्सव कर डाला। भारत-मन का सत्य उजाला॥

जनभाषा की ज्योति से, आलोकित संसार। 
राहुल का यह अक्षर-यज्ञ, रहे सदा साकार॥
॥ सप्तदश सर्ग समाप्त ॥

अष्टादश सर्ग : घुमक्कड़ धर्म और ज्ञान-यात्रा

चलना ही जीवन बना, रुकना मृत्यु समान। 
पग-पग पर मिलता रहा, नव अनुभव-वरदान॥
जग-पुस्तक का पृष्ठ है, पर्वत, सागर, ग्राम। 
जिसने पढ़ना सीख लिया, उसका हुआ विश्राम॥

राहुल बोले—"चलो निरंतर। यही मनुज का सच्चा अंतर॥ 
जो घर-आँगन में ही सोया। उसने जग का सत्य न गोया॥
राह न केवल धूल बिछाती। राह स्वयं शिक्षा बन जाती॥ 
पर्वत देते धैर्य निराला। नदियाँ गाएँ गति का छाला॥
मरु सिखलाता प्यास सहन को। वन समझाता जीव-गगन को॥ 
नगर बताए श्रम की रीति। गाँव सुनाए धरती-गीति॥

घूमें केवल पाँव क्या, घूमें साथ विचार। 
तब मानव के सामने, खुलता नव संसार॥

तिब्बत की हिम-धवल कंदर। खोज रहे थे ज्ञान-समंदर॥ 
ग्रंथ पड़े थे धूल समेटे। जिनको युग ने रखा अचेटे॥
जीर्ण पांडुलिपि, मौन कहानी। जाग उठी फिर भारत-वाणी॥ 
खच्चर-पथ से लाए धीर। ज्ञान-धन के अमूल्य नीर॥
निज यश हेतु न श्रम अपनाया। जन-पीढ़ी को दीप जलाया॥ 
जो था बिखरा काल-प्रवाह में। जोड़ा फिर इतिहास-चाह में॥

जिसने भूले ग्रंथ को, फिर से दिया प्रकाश। 
उसके श्रम का मोल क्या, लिख पाए इतिहास॥

चीन गया तो देखा श्रम को। जाग्रत जन के नव परिश्रम को॥
रूस गया तो समझा जग में। कैसे बदले श्रम के मग में॥
किंतु न आँखें मूँद प्रशंसा। रही विवेक-युक्त अभिलाषा॥ 
जो था उत्तम, उसे सराहा। दोष मिला तो सत्य कहा॥
यही शोध की सच्ची रीत। नहीं बने मत के संगीत॥ 
तथ्य जहाँ हों, वहीं ठहरना। सत्य मिले तो उसे उभरना॥

पक्ष न था अंधानुकरण, न था मिथ्या रोष। 
सत्य जहाँ जैसा मिला, वैसा किया प्रकाश॥

बोले—"भूत महान हमारा। पर मत बाँधो उसे किनारा॥ 
समय नदी है, नित्य बहेगी। रुकी धारा कब जीव सहेगी?॥
रीति वही जो हित उपजावे। जन-जीवन में सुख बरसावे॥ 
जो मानव का पथ अटकाए। काल स्वयं उसको बह जाए॥
श्रद्धा हो पर बुद्धि जगाओ। हर विश्वास कसौटी लाओ॥ 
प्रश्न मनुज का श्रेष्ठ हथौड़ा। तोड़ अज्ञान, विवेक निखोरा॥

अंध-श्रद्धा की रात से, जागो लेकर भोर। 
प्रश्नों का सूरज उगाओ, मिटे भ्रम का छोर॥

भागो मत संसार छोड़कर। बदलो उसको हाथ जोड़कर॥ 
ज्ञान तभी उपयोगी होगा। जब जन-जीवन हित में होगा॥
यात्री केवल पथ का राही। वह युग का निर्माण-सिपाही॥ 
चलते-चलते बीज बिखेरे। जाग उठे जन-मन के डेरे॥
राहुल की यह यात्रा गाथा। बन गई जनचेतन की व्यथा॥ 
पद-पद पर संदेश सुनाती। चलती धारा राह बनाती॥

जिसके चरणों की धूल में, युग का नव विस्तार। 
उस घुमक्कड़ को नमन है, मानव का आधार॥
॥ अष्टादश सर्ग समाप्त ॥

एकोनविंश सर्ग : विवेक-ज्योति

तम हरता नित सूर्य ज्यों, जागे जब विज्ञान। 
विवेकाग्नि से दूर हो, भ्रम-अंधेर अभियान॥
प्रश्न मनुज का प्राण है, जिज्ञासा आधार। 
यहीं सृजन की शक्ति है, यहीं विजय-द्वार॥


राहुल बोले—"मत के आगे। मत खो देना बुद्धि अभागे॥ 
मानव का सबसे बड़ा धन। स्वतंत्र विवेक, जागृत चिंतन॥
जो परंपरागत है सारा। सत्य न होता वह बेचारा॥ 
कसना उसको तर्क-कसौटी। तभी मिटेगी भ्रम की खोटी॥
श्रद्धा यदि हो सत्य-सहेली। बने सुमन-सी कोमल बेली॥ 
पर अंधी हो यदि विश्वासा। लाए केवल घोर निराशा॥


आदर हो इतिहास का, पर न बने जंजीर। 
नव निर्माणों के लिए, चाहिए नव नीर॥


भूत सदा सम्मानित होगा। पर भविष्य प्रधानित होगा॥ 
जो कल हितकर था, वह संभव। आज न हो जनहित के योग्य॥
काल बदलता, रूप बदलते। नव प्रश्नों के दीप निकलते॥ 
उत्तर भी नव रूप धरेंगे। तभी मनुज उन्नति को वरेंगे॥
जड़ता सबसे भारी बेड़ी। तोड़ो उसकी गाँठ अहेड़ी॥ 
जीवन नित परिवर्तन धारा। यही प्रकृति का सत्य पसारा॥

पत्थर जैसी सोच से, सूखें सारे फूल। 
प्रश्नों का झरना बहे, तभी मिटेगा शूल॥


दुनिया केवल भाग्य न गढ़ती। श्रम से अपनी राह सँवरती॥ 
जो श्रम, विज्ञानों से जुड़ता। वही समय की धारा मुड़ता॥
दोष न देना भाग्य-विधान को। पहचानो निज कर्म-प्राण को॥ 
हाथों में इतिहास लिखा है। जनबल से हर पंथ दिखा है॥
मानव अपने भाग्य-विधाता। युग-युग का वह पथ-निर्माता॥ 
वह चाहे तो पर्वत फोड़े। नभ के अगणित तारे जोड़े॥

दिमागों की दासता, सबसे भारी शोक। 
मुक्त विचारों से बने, नव मानव का लोक॥


राहुल का संदेश अनोखा। तोड़ो मन का हर इक धोखा॥ 
भीतर जितनी भी दीवारें। पहले उनको स्वयं उतारें॥
मन निर्भय हो, बुद्धि प्रखर हो। जीवन श्रम का सुंदर स्वर हो॥ 
जाति, भय, संकीर्ण अभिलाषा। सब पर जीते मानव-भाषा॥
ज्ञान न केवल ग्रंथों में है। श्रम के तपते कंठों में है॥ 
खेती, कारखाना, विद्यालय। सब हैं उसके पुण्य हिमालय॥

जहाँ विवेक-विचार हैं, वहीं सच्चा तीर्थ। 
मानवता के हित जले, ज्ञान-अग्नि अनिर्वृत॥


नहीं किसी से द्वेष सिखाया। नहीं अज्ञानों को अपनाया॥ 
सत्य जहाँ भी मिला, सँजोया। मिथ्या देखा, तुरंत ही खोया॥
ऐसी थी वह तेज कहानी। ज्ञान बना जिसकी निशानी॥ 
पीढ़ी-पीढ़ी गूँजे वाणी। "सोचो, समझो, बनो सयानी।"

विवेक-दीप जलता रहे, मिटे भ्रमों का जाल। 
राहुल की यह चेतना, रहे सदा निष्कलंक॥
॥ एकोनविंश सर्ग समाप्त ॥

विंश सर्ग : घुमक्कड़ का घोष

चलना जीवन-धर्म है, रुकना जड़ का जाल। 
पथ-पथ में मिलता सदा, नव अनुभव का भाल॥
ज्ञान न सीमित ग्रंथ में, नभ-वन-नद-ग्राम। 
धरती का प्रत्येक कण, खोले अपना धाम॥


राहुल बोले—"चलो निरंतर। यही मनुज का सत्य पथांतर॥ 
जो घर की चौखट में सोया। उसने जग का मर्म न खोया॥
पर्वत, सागर, वन, मरुभूमि। सब हैं ज्ञान-ज्योति की भूमि॥ 
जिसने इनका रूप निहारा। उसने जीवन-तत्त्व विचारा॥
चलते-चलते बुद्धि निखरती। संकीर्णों की गाँठें झरती॥ 
जाति, देश, उपनाम पुराने। लगते फिर क्षणभंगुर दाने॥

घूमो केवल देह से, इतना ही मत मान। 
मन भी यात्रा पर चले, तभी बढ़े विज्ञान॥


तिब्बत के दुर्गम पथ नापे। हिम से संवाद स्वयं आपे॥ 
विपुल विहारों की निस्तब्धी। बोल उठी बन ज्ञान-समृद्धि॥
धूल जमी पांडुलिपि जागी। भारत की स्मृति फिर अनुरागी॥ 
पीठ लदी इतिहास-विरासत। लौटी लेकर नव धरोहर॥
ग्रंथ न केवल अक्षर होते। युग-युग के अनुभव संजोते॥ 
उनकी रक्षा जिसने ठानी। उसने रक्षित की मनुज-कहानी॥

जो इतिहास बचा सके, वही सच्चा वीर। 
शस्त्र नहीं, शोधों से ही, होता युग गंभीर॥


चीन गया तो श्रम पहचाना। जन-जीवन का नव तराना॥ 
रूस गया तो देखा मिलकर। कैसे बढ़ते जन-संघर्ष कर॥
जहाँ मिला जो सत्य सुहाया। उसे हृदय से शीश नवाया॥ 
नहीं किसी का अंध अनुकरण। विवेक रहा जीवन का कारण॥
विश्व बना उसका विद्यालय। जन-जन बनते रहे गुरुकुल॥ 
भाषाएँ सब सेतु बनी थीं। मन की सीमाएँ क्षीण हुई थीं॥

भाषा-भाषा जोड़ती, मानव का विश्वास। 
शब्द नहीं, संस्कार हैं, जग का मधुर प्रकाश॥


भोजपुरी की सहज मिठास। संस्कृत का गंभीर प्रकाश॥ 
पालि, तिब्बती, रूसी, फ़ारसी। सबमें खोजी मानव-हँसी॥
भाषा कोई शत्रु न होती। सबमें मानव-ज्योति संजोती॥ 
जिसने भाषा-सेतु बनाया। उसने जग को पास बुलाया॥
राहुल का यह मंत्र निराला। ज्ञान न होता देशी-जाला॥ 
जितना बाँटो उतना बढ़ता। ज्यों नभ में आलोक झरता॥

घुमक्कड़ की थाति है, खुला हुआ संसार। 
सीमाएँ सब टूटतीं, जागे नव विस्तार॥


पद-पद पर जो प्रश्न उगाए। वही सृजन के फूल खिलाए॥ 
जिज्ञासा का दीप जलाकर। चलना ही जीवन का आकर॥
यात्री केवल पंथ न नापे। अपने अंतर को भी मापे॥ 
राहुल का यह अमर उपदेश। चलते रहना मानव-देश।

चलना ही उत्कर्ष है, ठहरावों का क्षय। 
पग-पग पर मानव रचे, अपना नव उदय॥
॥ विंश सर्ग समाप्त ॥

एकविंश सर्ग : ज्ञान–धरोहर

ग्रंथ बचाना अर्थ है, युग की रक्षा-धर्म। 
अक्षर में संचित रहे, मानवता के मर्म॥
मिट्टी, पत्थर, ताम्रपत्र, सब इतिहास-विभाग। 
जो इनको पहचानता, वही जगे अनुराग॥


राहुल ने यह व्रत अपनाया। ज्ञान-धन कभी न मिटने पाया॥ 
पर्वत-पर्वत पंथ निहारा। खोजा भूला ज्ञान-किनारा॥
जहँ जर्जर पांडुलिपि सोती। धूलि तले इतिहास संजोती॥ 
वहीं झुकाकर मस्तक अपना। जागृत करते युग का सपना॥
नहीं उन्हें धन का अभिलाषा। नहीं यशों की मधुर पिपासा॥ 
एक धुन—इतना कर जाना। ज्ञान-दीप फिर से जलवाना॥

जिसने अक्षर को बचा, उसने बचा समाज। 
शस्त्र नहीं, शास्त्रों से ही, होता नव निर्माण॥


नालंदा की मौन कहानी। रोती थी बन व्यथा पुरानी॥ 
विक्रमशिला के भग्न द्वारे। पूछ रहे थे अपने तारे॥
किसने छीना ज्ञान-उजाला? किसने तोड़ा स्वप्न निराला?॥ 
राहुल ने इतिहास टटोला। सत्य-प्रकाश जगत में घोला॥
भूली कड़ियाँ जोड़-जोड़कर। सत्य खड़ा कर दिया सँभलकर॥ 
जो बिखरा था युग की धूलि। बना पुनः वह ज्ञान-अनुकूल॥

स्मृति नहीं बस शोक है, यदि न करे विकास। 
इतिहासों का सार है, जागृत जन-विश्वास॥


वे कहते—"मत पूजो केवल। समझो भी अतीत का संबल॥ 
जहाँ उचित हो, वहाँ सँजोना। जहाँ त्रुटि हो, उसको धोना।"
विरासत का मान यही है। सत्य रहे, अभिमान नहीं है॥ 
ज्ञान कभी जड़ रूप न धारे। नित नव जीवन-धारा धारे॥
संस्कृति वह जो जोड़ सके सब। नव पीढ़ी को दे शुभ आलोक॥
जो मानव को बाँट रही हो। उससे करना उचित विवेक॥

मंदिर, मस्जिद, विहार सब, मानव के निर्माण। 
सबसे ऊँचा वह बने, जिसमें जागे ज्ञान॥


राहुल का संदेश यही था। मानव सबसे बड़ा सही था॥ 
भाषा, भूषा, भेद अनेक। किन्तु मनुज का सत्य एक॥
पुस्तक, शोध, विचार, विवेचना। यही सभ्यता की है रचना॥ 
जो इनका सम्मान करेगा। भविष्य स्वयं उज्ज्वल करेगा॥
टूटें यदि प्रतिमा के पत्थर। मत टूटे विचारों का स्वर॥ 
पीढ़ी-पीढ़ी गूँजे वाणी। ज्ञान अमर, देह है पानी॥

मूर्ति गिर सकती भले, गिरता नहीं विचार। 
अक्षर जीवित रह गए, जीता वही उदार॥

इससे बढ़कर यश क्या होगा। जन-मन जिसका पथ संजोए॥ 
शत-शत बाधाएँ आएँगी। ज्ञान-ज्योति फिर भी न खोए॥
राहुल का अविराम तपोबल। मानवता का बना संबल॥ 
युग-युग तक यह गाथा गाए— ज्ञान अमर है, देह मिट जाए।
॥ एकविंश सर्ग समाप्त ॥




★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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हिंदी का एक मौलिक “गोलेन्द्र छंद”

गोलेन्द्र छंद : लक्षण

गोलेन्द्र छंद हिंदी का एक मौलिक, सममात्रिक तथा समवर्णिक छंद है।

इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं—

  1. इसमें चार चरण (पाद) होते हैं।
  2. प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ तथा 20 वर्ण होते हैं।
  3. प्रत्येक चरण में 10–10 मात्राओं एवं 10–10 वर्णों पर यति होती है।
  4. यह सममात्रिक एवं समवर्णिक छंद है; अर्थात प्रत्येक चरण में मात्राओं और वर्णों की संख्या समान रहती है।
  5. समचरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ चरण) में तुक (अन्त्यानुप्रास) अनिवार्य है; अर्थात दोनों चरणों के अंतिम वर्ण-समूह में समान ध्वन्यात्मक आवृत्ति होती है।
  6. विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में तुक आवश्यक नहीं है, यद्यपि काव्य-सौंदर्य की दृष्टि से उसका प्रयोग किया जा सकता है।


गोलेन्द्र छंद (प्रस्तावित मानक स्वरूप)

गोलेन्द्र छंद हिंदी का एक मौलिक, सममात्रिक एवं समवर्णिक छंद है। इसका उद्देश्य सरल प्रवाह, गेयता और विचारप्रधान अभिव्यक्ति का समन्वय करना है।

लक्षण

  1. इसमें चार चरण (पाद) होते हैं।
  2. प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ तथा 20 वर्ण अनिवार्य हैं।
  3. प्रत्येक चरण में 10–10 मात्राओं तथा 10–10 वर्णों पर यति होती है।
  4. समचरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ) में तुक (अन्त्यानुप्रास) अनिवार्य है।
  5. विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में तुक वैकल्पिक है।

गुरु–लघु व्यवस्था

  1. प्रत्येक चरण में कुल 20 मात्राएँ पूर्ण होना अनिवार्य है।
  2. गुरु और लघु का कोई निश्चित गण-विन्यास अनिवार्य नहीं है।
  3. शब्द-विच्छेद करके मात्राएँ पूरी करना वर्जित होगा।
  4. यति सदैव पूर्ण शब्द पर ही होगी।
  5. अनावश्यक गुरु-लघु परिवर्तन (छंद-भंग) स्वीकार्य नहीं होगा।

गण-विन्यास

गोलेन्द्र छंद किसी एक निश्चित गण पर आधारित नहीं है। यह मात्रिक-प्रधान छंद है। अतः किसी भी गण का प्रयोग किया जा सकता है, बशर्ते—

  • प्रत्येक चरण में 20 वर्ण हों।
  • प्रत्येक चरण में 20 मात्राएँ हों।
  • 10–10 पर यति बनी रहे।
  • लय और उच्चारण स्वाभाविक रहें।

चरणांत नियम

  1. प्रत्येक चरण का समापन पूर्ण शब्द पर हो।
  2. चरणांत में गुरु वर्ण वांछनीय माना जाएगा, किन्तु लघु भी ग्राह्य होगा यदि लय बाधित न हो।
  3. द्वितीय एवं चतुर्थ चरण समान तुक पर समाप्त होंगे।
  4. विरामचिह्न छंद का अंग नहीं माने जाएंगे।

वर्जनाएँ

  • शब्द-भंग करके मात्रा-पूर्ति नहीं।
  • कृत्रिम उच्चारण नहीं।
  • यति के भीतर शब्द-विच्छेद नहीं।
  • केवल मात्रा-पूर्ति के लिए अर्थहीन शब्दों का प्रयोग नहीं।

उदाहरण (संरचनात्मक)

(1)

शीघ्र ही प्रस्तुत किया जाएगा।



नोट: “गोलेंद्र छंद” संपूर्ण भारतीय काव्यशास्त्र का सबसे कठिन छंद है।


Saturday, 18 July 2026

मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर (सोनम वांगचुक को समर्पित कविताएं) : गोलेन्द्र पटेल

सोनम वांगचुक : पढ़ाई, सत्याग्रह आ लोकतंत्र के चेतना
[तस्वीर साभार: फेसबुक]

सोनम वांगचुक के लड़ाई खाली एगो आदमी, एगो इलाका कऽ कवनो राजनीतिक दल के लड़ाई नइखे। ई लड़ाई पढ़ाई पर भरोसा, लोकतंत्र में बातचीत आ जनता के हक के बचावे खातिर बा। ऊ कहत बाड़ें कि अगर पढ़ाई में ईमानदारी, योग्यता आ पारदर्शिता ना रही, त सबसे बेसी नुकसान ओह लाखन लइका-लइकी के होई जे अपना मेहनत के भरोसे जिनगी बदले के सपना देखत बा। पेपर लीक, नकल आ परीक्षा में धांधली खाली सरकारी कमी ना ह, ई गरीब किसान, मजूर, रिक्शा चलावे वाला, छोट दुकानदार जइसन लोगन के ओह आस पर चोट ह, जवन आस लेके ऊ अपना बेटा-बेटी के पढ़ावेला। पढ़ाई तबहिए बराबरी के राह बन सकेला, जब सभे के एके जइसन मौका मिले आ सफलता के आधार खाली मेहनत आ काबिलियत होखे। सोनम वांगचुक के आंदोलन ई भी याद दिलावेला कि लोकतंत्र के जान बातचीत में बसल बा, चुप्पी में ना। असहमति हो सकेला, बाकिर आवाज के अनसुना कर देहल लोकतंत्र खातिर ठीक नइखे। असली लोकतंत्र ऊ ह, जहाँ सवाल सुने के, समझे के आ जवाब देवे के हिम्मत होखे। आज जरूरत खाली सोनम वांगचुक के साथ देवे के नइखे, बलुक ओह सोच के साथ खड़ा होखे के बा, जे पढ़ाई के न्याय, बराबरी आ समाज बदले के सबसे मजबूत जरिया मानेला। अगर लोगन के पढ़ाई पर से भरोसा उठ गइल, त गरीब परिवारन के सपना आ लोकतंत्र दुनो कमजोर पड़ जइहें। एही से सोनम वांगचुक के संदेश साफ बा देश के भविष्य खाली नारा से ना बची, बल्कि ईमानदार पढ़ाई, जवाबदेह शासन आ जागरूक नागरिक से बची। एहिए में लोकतंत्र के असली ताकत बसल बा। "मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर" जंतर-मंतर पर जनहित खातिर लड़त-जूझत जनचेतना के समर्पित बा।

मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर : गोलेन्द्र पटेल 

1). ज्ञान के उपवास

हिमगिरि के अँचरा सँ, उठल एक अरदास।
पढ़ई बाँचल रहय कहे, सोनम के विश्वास।
रिकसा, खेत, मजूर घर, सबकर एके आस।
मेहनत लिखी तकदीर हो, ना धन के निवास।
लीकल परचा फोरि दे, टूटल लाखन नेह।
रोवत बिटिया, रोवत पूत, सूखत भीतर सेह।
भूख न पेटे मात्र के, भूख भरोसा होय।
विद्या-माई रोवत फिरै, सुनय न कोऊ कोय।

कितबन में उजियार बा, साँच करै पहचान।
झूठ कमाई हारिहै, जीतिहै विद्यान।
जाति-पाँति सब दूर कर, देहु बराबर मान।
मेहनत के फल पाइहैं, गाँव-नगर इंसान।
जियत रहय विश्वास ई, बुझै न ज्ञानक जोत।
लोक कहय शिक्षा बची, तब बचिहैं सब ओत।

2). आखर के आस

किसनवा के बेटवा कहै पढ़ि बनब इंजीनियर।
रिकसा खींचे बाप कहै बिटिया बन अफसर।
दूकनिया के नन्हक लाल, देखै सपन अपार।
गुरु-गिरिहा के नेह पर, टिकले संसार।
जे दिन बिकिहैं प्रश्न सब, बिकिहैं सब सम्मान।
ओहि दिन रोई जायिहै, भारत के पहचान।
आखर मंदिर ढहि गइल, टूटल जन विश्वास।
तबहुँ चिरैयाँ गीत गवै आइत नयका भोरास।

परचा लीके रोपि के, फल ना होय महान।
ईमाने के खेत में, उपजै साँच किसान।
बालक मन में दीप धर, सीखै सोच-विचार।
रटला से ना होइहैं, जीवन के उद्धार।
लोक-जुबानी गूँज उठे राखऽ शिक्षा लाज।
न्याय-धरम के राह पर, चलै देश समाज।

3). लोकतंत्र के खामोसी

जंतर-मंतर धूप में, सूखत देह अकुलाय।
लोकतंतर के कान पर, मौनक ताला छाय।
कागज रोवे, किताब रोय, रोवय बालक आस।
लीकल परचा लूटि ले, मेहनत के विश्वास।
हिमगिरि से उठल पुकार, पहुँचल गंगा तीर।
साँच बचावऽ, ज्ञान बचावऽ, जागऽ देश अधीर।
राज-दुअरिया भीतरे, सन्नाटा के राज।
बाहर जनमन पूछतै कब सुनब आवाज?

मौन अगर सिंहासनन, बनि जावै पहचान।
सूखि जाई लोकतंत्र, रोवै हिन्दुस्तान।
संवादे से जीत है, बैर न देई फल।
बात सुनै जब राज तब, हरसै जन-आँचल।
लोकभाखा कहि उठी खोलऽ मन के द्वार।
साँच, करुणा, न्याय से, उजियारै संसार।

4). अकेल्ला मनई कब्बो अकेल्ला नइखे

अकेल्ला चलि राह पर, लागै जइसे एक।
पाछे लाखन नेह के, जगमग करत विवेक।
हाथ खाली हो सकैं, मनवा रहे अडिगाय।
साँचे के संग चलत जे, ऊ कब हारि न जाय।
गिरि-पहाड़ से गाम तक, गूँजै ओकर बोल।
बिटिया, किसान, मजूर सब, जोड़ैं अपना मोल।
दीया जरै अँधियार में, काँपत रहै लुआर।
एक किरिन से फूटि पड़ै, भोरक अपरंपार।

एक जनम के सत्य से, जागै लाखन प्रान।
बूँद-बूँद मिलि धार बनै, बदले सगर जहान।
संग चले विश्वास जब, टूटै भय के जाल।
छोटक पग से बनि उठै, जन-आंदोलन चाल।
लोक कहै मुसकाइ के, मत मानऽ खुद अकेल।
साँच संगतिया बनि रहै, जन-जन तोहर मेल।

5). आखर के भरोसा

गाम-गिरांव के बाट पर, जगल पढ़ाई आस।
रिकसा, हल अउ खेत से, उठल नयन विश्वास।
माय कहय पढ़ बेटवा, बदलिहे दिन-भाग।
बाबू पोंछैं पसीनवा, मन में नयका राग।
लीकल परचा, झूठ धन, काटै सपना-मूल।
मेहनत वाली जिनगिया, काहे झेले शूल।
एक मनई डटल अइँठ, आखर खातिर आज।
ओकर भूख न पेट के, ज्ञान-धरम के लाज।

साँच परीक्षा बचि रहै, तब बचिहैं अरमान।
गरीबन के अँगना खिलै, पढ़ल-लिखल बिहान।
बोलऽ, सुनऽ, समझऽ सबै, टूटै मन के फाट।
संवादन के सेतु पर, मिलै जनम के ठाठ।
लोक कहै मिलि एक सुर, राखऽ विद्या मान।
आखर बचिहैं तभिएँ बची, धरती अउ इंसान।

6). जागऽ रे जनमन

सुतल परल जन-चेतना, बजल न अंतर-घंट।
आखर रोवत दुआर पर, टूटत सपना-कंठ।
हाट-बजार चकाचकैं, बिकत नयन-उजियार।
साँच दबावल जाय है, झूठ करै व्यापार।
लइका पूछै गुरु सों, कइसन होई राह?
मेहनत जीतै कि फेर धन, लिखिहै सबके चाह?
हिमगिरि से उठल पुकार, गूँजल देस-दुआर।
पढ़ई बचा, विश्वास बचा, बोलै बारंबार।

जागत जन से जागिहै, लोकतंत्र के प्रान।
मिलि-जुलि राखऽ ज्ञान पर, अटूट भरोसा-थान।
द्वेष न बोवऽ खेत में, बोवऽ नेह विचार।
साँच-करुणा के जल बिना, सूखै हर संसार।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनुआ आज।
विद्या, श्रम अउ न्याय से, सजिहै देस समाज।

7). समता के मशाल

मजदूरन के हथवा में, धरती के इतिहास।
दलित, किसान, बहुजनन के, अँखियन जीवत आस।
बाबा के किताब कहै पढ़, संगठित, संघर्ष।
मेहनत के अधिकार बिना, सूखै जन के हर्ष।
मारकस के सुर बोलतैं श्रम के देहु सम्मान।
रोटी, विद्या, मान बराबर, एही साँच विधान।
जाति-जंजीर टूटि पड़ै, टूटै लोभक राज।
आखर बनि हथियार तब, जगमग होय समाज।

जाति अउ पूँजी मिलि जदि, करैं जनम पर चोट।
समता, श्रम अउ ज्ञान से, टूटै अन्याय-कोट।
विद्या सबके हक रहे, ई धरती के नेम।
ऊँच-नीच के भेद बिन, चमकै जन के प्रेम।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनई निर्भीक।
समता, बंधुता, न्याय से, लिखऽ नयका इतिहास-लीक।

8). बिटिया के आखर

माय कहय जा बिटिया, पढ़ि लिखि छूअऽ गगन।
टूटैं दे अब बंधन सब, खुलैं नयका भवन।
घूँघट, देहरी, डर-डगर, रोके कतना बेर।
आखर बनि पंखवा उठल, उड़ि गइल अँधेर।
रिकसा वाली माय के, अँखियन बसल उजास।
हमर लइकी अफसर बनै, ई हौ जिनगी आस।
पढ़ई नारी के हक हउ, दान न काहू केर।
समता के ई जोतिया, उजियारै घर-डेर।

बिटिया पढ़ली त गाँव के, खुलिहैं लाखे द्वार।
ज्ञान-जोत से मिटि जइहैं, भय, बंधन, अँधियार।
आधा गगन नापे बिना, पूरा कहाँ समाज?
नारी संग बराबर चले, तबे खिले सुराज।
लोकभाखा कहि उठी, बेटी धरती मान।
ओकर सपना बाँचि के, बाँचै हिन्दुस्तान।

9). जिंदा रहऽ लड़ाई खातिर

आँधी झकझोरै डारि, जड़ मत छोड़ऽ मीत।
जियत रहब त देखबें, फिनु उगिहैं नव प्रीत।
सूखल देह भले रहै, हिम्मत रहै अडिगाय।
दीया जइसन लोरि में, जोति न कबहुँ बुझाय।
इतिहासन के पन्नवा, साँसन से लिखलाय।
सपना जिन्दा राखिहऽ, तबे भोर मुस्काय।
अँधियरा लाखन घेरि ले, मन न हारऽ आज।
धरती माँ के कोख में, पलत नया समाज।

जीवन सबसे मूल धन, राखऽ एकर मान।
जियत रहब त जीतिहैं, साँच-नेह अभियान।
संवादन के राह से, बदलै जग के चाल।
क्रोध नय, धीरज बने, जन-मन के ढाल।
लोक कहै संघर्ष के, एही साँच विधान।
जिंदा रहि के जीतिहऽ, राखऽ आपन प्रान।

10). आखर जीतिहैं

बर्फीला पहाड़ सों, उठल जनक आवाज।
गाम-नगर सब पूछतैं कब मिलिहै सुराज?
विद्या मंदिर रोवतै, टूटत जन विश्वास।
साँच परीक्षा माँगतै, भारत के हर साँस।
दलित, किसान, मजदूर सब, जोरल एके डोर।
बिटिया, लइका, गुरु कहैं खोलऽ न्यायक भोर।
एक अकेल्ला दीप सों, लाखन बाती जाग।
साँच, समता, नेह के, फइलल दूर सुहाग।

जाति-धरम के भेद से, ऊँच न होई देस।
मेहनत, विद्या, न्याय से, खिलिहैं नयका केस।
लोकतंत्र तब फूलिहै, जब सुनि लेई बात।
जनमन के विश्वास से, बनिहै नयकी जात।
लोकभाखा असीस दे रहऽ अडिग इंसान।
आखर, श्रम अउ सत्य से, अमर रहै पहिचान।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता



महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप" — गोलेन्द्र पटेल

महाकाव्य : "राहुल-चरित: ज्ञानदीप" —गोलेन्द्र पटेल   प्रथम सर्ग : मंगलाचरण:  ज्ञानदीप वंदौं ज्ञान-विवेक को, सत्य-करुण आधार।  तम हरन...