Saturday, 5 September 2026

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि — गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि

इन दिनों
आँखें बंद होने पर
तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं
और खुली होने पर
कबीर
मैं भाषा में ही नहीं
भूमि पर भी ऐसे मनुष्यों की तलाश में हूँ
जिनकी कथाएँ
मेरी अपनी जीवनगाथा-सी लगें
जिनसे मिलकर ऐसा बोध हो
मानो वे मेरे लिए
जीवित बोधिवृक्ष हों!

महराजगंज की मिट्टी में
एक दिन
एक बच्चा जन्म लेता है
किसान के घर
उस गाँव में
जहाँ सुबह
सूरज से पहले
हल जागता है
और शाम
मजदूर की हथेली पर
थककर सोती है
वही बच्चा
आगे चलकर
शब्दों का यात्री बनता है।

गाँव की पगडंडी
उनकी पहली पाठशाला है
खेत
पहला विश्वविद्यालय
मिट्टी
पहली किताब
और श्रम
पहला शिक्षक
उन्होंने
जीवन को
दूर से नहीं पढ़ा
उसे
अपने आसपास घटते देखा
किसान के माथे पर
गाँव की गलियों में
जल की कमी में
बदलते रिश्तों में
और उन आँखों में
जो कम साधनों के बावजूद
बड़े सपने देखती थीं।

फिर
गाँव की सीमा से बाहर
शिक्षा की यात्रा शुरू होती है
राजकीय इंटर कॉलेज गोरखपुर
जहाँ किताबें
उनके सामने
एक नई दुनिया खोलती हैं
फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय
समाजशास्त्र की पढ़ाई में
वे समाज को
सिर्फ विषय नहीं
जीवित मनुष्य की तरह
पढ़ते हैं।

वे समझते हैं
गाँव
सिर्फ खेत और खलिहान नहीं है
वहाँ इतिहास है
वर्ग है
जाति है
श्रम है
परंपरा है
परिवर्तन है
और सबसे बढ़कर
मनुष्य है।

फिर उनकी यात्रा
दिल्ली की ओर मुड़ती है
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
जहाँ गाँव से आया
एक जिज्ञासु मन
देश और दुनिया के
बड़े सवालों के सामने
खड़ा होता है
वहाँ वे
सिनेमा को भी
सिर्फ मनोरंजन की तरह नहीं देखते।

वे पूछते हैं
परदे पर
कौन दिखाई देता है?
कौन छूट जाता है?
किसकी कहानी
किसकी आवाज़ में कही जाती है?
इसी तलाश में
वे शोध करते हैं
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’ पर।
सिनेमा से समाज तक
समाज से मनुष्य तक
मनुष्य से उसकी स्मृति तक
उनकी दृष्टि
लगातार विस्तृत होती जाती है।

फिर
उनकी शोध-यात्रा
गाँव की ओर लौटती है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
यह केवल
एक शोध-विषय नहीं
यह उस दुनिया में
फिर से लौटना है
जहाँ से उनकी यात्रा
शुरू हुई थी
जिस गाँव को
उन्होंने बचपन में
जिया था
उसी गाँव को
वे अब
समाजशास्त्र की पैनी दृष्टि से
पढ़ते हैं।

वे देखते हैं
समय बदलता है
रास्ते बदलते हैं
रिश्ते बदलते हैं
गाँव बदलता है
लेकिन
श्रम की गंध
अब भी वही है
किसान की चिंता
अब भी वही है
मनुष्य की
बेहतर जीवन की आकांक्षा
अब भी वही है।

शिक्षा से निकला यह युवक
फिर जीवन की ओर लौटता है
अब हाथ में
सिर्फ डिग्रियाँ नहीं हैं
अनुभव है
दृष्टि है
समाज की समझ है
और उन लोगों के प्रति
एक गहरी जिम्मेदारी है
जिनके बीच से
वे आए हैं
फिर जीवन
उन्हें प्रशासन की ओर ले जाता है।

वे
उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में आते हैं
लेकिन
सरकारी पद
उनके भीतर के गाँव को
नहीं मिटाता
कुर्सी बदलती है
दृष्टि नहीं
पद बदलता है
पक्ष नहीं
वे व्यवस्था के भीतर आते हैं
लेकिन व्यवस्था के
सिर्फ अधिकारी नहीं बनते
वे उसके भीतर
मनुष्य को खोजते रहते हैं।

शायद इसी कारण
उनकी रचनाओं में
फाइलों के साथ
खेत भी आता है
कार्यालय के साथ
गाँव भी
शहर के साथ
नदी भी
और शासन के साथ
वह आदमी भी
जो हर व्यवस्था के केंद्र में
होना चाहिए।

गाँव से निकला जनपक्षधर्मी शब्द 
अब राजपथ पर है
लेकिन
उसके पैरों में
अब भी पगडंडी की धूल है
उसकी आँखों में
अब भी खेत का आकाश है
उसकी स्मृति में
अब भी किसान का घर है
और उसके सृजन में
अब भी
मिट्टी की आवाज़ है
यही यात्रा
उन्हें कवि बनाती है
गाँव से विश्वविद्यालय तक
विश्वविद्यालय से शोध तक
शोध से प्रशासन तक
और प्रशासन से
फिर मनुष्य तक।

यात्रा पूरी नहीं होती
वह कविता बन जाती है
वे युग संवेदना लिखते हैं
तो लगता है
जैसे कोई नदी
अपने भीतर का इतिहास
कह रही हो
वे नदी को
सिर्फ बहता हुआ जल नहीं देखते
उसमें वे
मनुष्य का चेहरा देखते हैं
सभ्यता की स्मृति देखते हैं
गाँव की साँस देखते हैं
किसान की उम्मीद देखते हैं
और विस्थापित आदमी की
चुप्पी सुनते हैं
इसलिए
उनका पहला विश्वास
शायद यही है
‘नदियाँ बहती रहेंगी’।

यह केवल
नदी के पक्ष में कहा गया वाक्य नहीं है
यह जीवन के पक्ष में
उनका विश्वास है
वे जानते हैं
नदी को बाँधना आसान है
लेकिन
उसकी स्मृति को बाँधना कठिन
जमीन को घेरना आसान है
लेकिन
मिट्टी की गंध को
किसी कागज़ पर कैद करना कठिन
मनुष्य को विस्थापित करना आसान है
लेकिन
उसकी जड़ों को
उसके भीतर से निकाल देना
इतना आसान नहीं।

वे पूछते हैं,
“कुँवरवर्ती कैसे बहे?”
जब रास्ते
पहले ही बाँट दिए गए हों
जब किनारों पर
बाजार के पहरे हों
जब नदी से पूछा जाए
कि वह किसकी है
तब नदी
अपनी तरह
कैसे बहे?
यह प्रश्न
केवल नदी का प्रश्न नहीं है
यह उस किसान का प्रश्न है
जिसके खेत तक
पानी नहीं पहुँचता।

यह उस मजदूर का प्रश्न है
जिसके हाथों से
शहर बनता है
लेकिन शहर में
उसका अपना घर नहीं होता
यह उस स्त्री का प्रश्न है
जो रोज
जल, जंगल और जमीन के बीच
अपना जीवन ढोती है
यह उस आदमी का प्रश्न है
जो अपने ही देश में
हाशिए पर खड़ा होकर
केंद्र को देखता है।

वे जानते हैं
नदी को बचाना
सिर्फ पानी बचाना नहीं है
नदी बचती है
तो मछुआरे की नाव बचती है
किसान का खेत बचता है
गाँव की स्मृति बचती है
बच्चे का भविष्य बचता है
इसीलिए
जब वे कहते हैं,
“नदियाँ ही राह बताएँगी”
तो यह
सिर्फ एक काव्य-पंक्ति नहीं रहती।

यह समय के सामने
एक भरोसा बन जाती है
जब रास्ते बंद हों
तब नदी
रास्ता बनाती है
जब व्यवस्था
पत्थर की तरह ठहर जाए
तब नदी
चलना सिखाती है
जब मनुष्य
मनुष्य से दूर कर दिया जाए
तब नदी
दो किनारों के बीच
पुल बनती है।

वे शायद जानते हैं
सभ्यताएँ
सड़कें बनाकर नहीं
रिश्ते बचाकर
टिकती हैं
और नदी से आगे
वे हमें
नदी की तलाश में ले जाते हैं
‘नदी की तलाश में’
केवल पर्यावरण की चिंता नहीं है
यह उस मनुष्य की तलाश भी है
जो विकास के शोर में
कहीं पीछे छूट गया है।

वे पूछते हैं
क्या नदी केवल
मानचित्र पर बची रहेगी?
क्या जंगल
केवल सरकारी रिपोर्ट में
हरा रहेगा?
क्या मिट्टी
सिर्फ जमीन का दूसरा नाम है?
क्या विकास
उस घर का नाम है
जिसे बनाते-बनाते
हजारों घर उजड़ जाएँ?
उनकी दृष्टि में
पर्यावरण
पेड़-पौधों का विषय भर नहीं है।

वह मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न है
जल है, तो जीवन है
जंगल है, तो साँस है
मिट्टी है, तो अन्न है
और मनुष्य है, तो इन सबका अर्थ है।

वे श्रम को
दूर से नहीं देखते
श्रम
उनकी कविता में
पसीने की तरह आता है
किसान की हथेली पर
मजदूर के कंधे पर
रिक्शे के पहिए में
ईंट ढोती स्त्री की देहभाषा में
खेत की मेड़ पर
वे श्रम की कविता पढ़ते हैं।

उन्हें मालूम है
देश
सिर्फ भाषणों से नहीं बनता
देश बनता है
उन हाथों से
जिन पर
अक्सर इतिहास की रोशनी
नहीं पड़ती
वे उन्हीं हाथों की तरफ
अपनी कविता मोड़ते हैं
उनकी दृष्टि
सिर्फ कविता तक सीमित नहीं है।

उन्होंने
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
पर एम.फिल. के माध्यम से
सिनेमा और समाज के रिश्ते को
गहराई से देखा है
उन्होंने
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
पर पीएचडी के माध्यम से
गाँव को
सिर्फ स्मृति नहीं
बल्कि बदलती हुई
सामाजिक संरचना के रूप में पढ़ा है
इसलिए
जब वे गाँव लिखते हैं
तो उसमें
सिर्फ हरियाली नहीं होती
वहाँ
जाति भी होती है
वर्ग भी होता है
श्रम भी होता है
विस्थापन भी होता है
परिवर्तन भी होता है
और संघर्ष भी।

वे गाँव को
रोमांस नहीं बनाते
वे गाँव को
उसकी पूरी जटिलता में
देखते हैं
फिर वे
सिनेमा के सामने बैठते हैं
परदे पर
कहानी चलती है
लोग
हँसते हैं
रोते हैं
तालियाँ बजाते हैं
लेकिन वे
सिर्फ कहानी नहीं देखते
वे देखते हैं
किसकी आवाज़
परदे पर आई?
किसकी आवाज़
काट दी गई?
कौन नायक बना?
कौन भीड़ में
खड़ा रह गया?
किसका सपना
सिनेमा ने अपना लिया?
और किसका जीवन
पर्दे के बाहर
छूट गया?

इसीलिए
उनकी दृष्टि में
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
दरअसल
समाज को पढ़ना भी है
परदा
उनके लिए
आईना है
और आईने में
वे चेहरा ही नहीं
उसके पीछे खड़ी
पूरी व्यवस्था देखते हैं
फिर वे
‘चिलम चौक का बादशाह’
रचते हैं।

एक चौक
कुछ चेहरे
कुछ छोटे-छोटे सपने
कुछ बड़ी-बड़ी आकांक्षाएँ
थोड़ी हँसी
थोड़ी धूल
थोड़ा संघर्ष
और
पूरा जीवन।

वे जानते हैं
इतिहास
सिर्फ राजमहलों में नहीं बनता
इतिहास
चौराहों पर भी बनता है
चाय की दुकानों पर
रिक्शों की घंटियों में
बाजार की आवाज़ों में
मजदूर के पसीने में
और उस आदमी की आँख में
जो रोज
एक बेहतर दिन की उम्मीद लेकर
घर से निकलता है।

उनकी रचनात्मक दुनिया में
कहानी भी है
जीवन की ऐसी छोटी-छोटी कथाएँ
जिनमें बड़ी दुनिया
अपना चेहरा दिखाती है
एक बिवाई
सिर्फ फटी हुई त्वचा नहीं रहती
वह श्रम का इतिहास बन जाती है
एक बूढ़ी आवाज़
सिर्फ आवाज़ नहीं रहती
वह बीते समय की गवाही बन जाती है।

एक बच्चा
सिर्फ बच्चा नहीं रहता
वह आने वाले समय की
सबसे बड़ी संभावना बन जाता है
वे छोटी चीजों में
बड़ी मनुष्यता खोजते हैं
उनकी कविता
अंधविश्वास से सवाल करती है
रूढ़ियों को चुनौती देती है
पाखंड का चेहरा पहचानती है
लेकिन उनका प्रतिरोध
मनुष्य से घृणा नहीं करता
वह मनुष्य को
और अधिक मनुष्य बनाने की
कोशिश करता है
इसीलिए
उनकी कविता में
क्रोध के साथ
करुणा है
प्रतिरोध के साथ
प्रेम है
व्यंग्य के साथ
आत्मीयता है
और संघर्ष के बीच
एक गहरी उम्मीद।

उनकी कविता में
नदी है
पर नदी अकेली नहीं
उसके साथ
मछलियाँ हैं
पेड़ हैं
पक्षी हैं
पहाड़ हैं
किसान हैं
मजदूर हैं
बच्चे हैं
स्त्रियाँ हैं
और वह पूरा लोक है
जिसे सभ्यता
अक्सर अपने विकास की
फुटनोट बना देती है।

वे उस फुटनोट को
मुख्य पाठ में ले आते हैं
वे कहते हैं
देखिए
जिसे आप हाशिया कहते हैं
वहीं से
केंद्र की असली कहानी
दिखाई देती है
कभी
बाढ़ आती है
लोग डूबते हैं
घर डूबते हैं
फसल डूबती है
लेकिन
भाषण नहीं डूबता
मंच सुरक्षित रहता है
माइक सुरक्षित रहता है
आश्वासन सुरक्षित रहता है
डूबता है, तो सिर्फ आदमी।

वे इस दृश्य को देखते हैं
और उनकी कविता
व्यंग्य में बदल जाती है
वे जानते हैं
व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना
यह नहीं कि वह
झूठ बोलती है
विडंबना यह है कि
वह झूठ बोलते समय भी
सच का मंच सजाती है
लेकिन
उनकी कविता केवल
व्यवस्था से लड़ती नहीं
वह जीवन को
बचाती भी है
एक पिता और बेटी के बीच
बचा हुआ स्पर्श
एक अजनबी में
जन्म लेती आत्मीयता
एक किसान की आँख में
बचा हुआ विश्वास
एक नदी में
बचा हुआ संगीत
एक बच्चे के हाथ में
खुली हुई किताब।

वे जानते हैं
दुनिया को बदलना है
तो पहले
मनुष्य के भीतर
मनुष्य को बचाना होगा
इसलिए
उनकी आठ दिशाएँ
अलग-अलग नहीं हैं
‘नदियाँ बहती रहेंगी’
जीवन का विश्वास है
‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’
व्यवस्था से पूछा गया सवाल है
‘नदियाँ ही राह बताएँगी’
भविष्य पर रखा गया भरोसा है
‘नदी की तलाश में’
प्रकृति और मनुष्य की खोज है
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
समाज और सिनेमा के रिश्ते को पढ़ने की दृष्टि है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
गाँव के भीतर बदलती दुनिया की पड़ताल है
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
परदे के पीछे छिपे समाज को देखने की आँख है
और
‘चिलम चौक का बादशाह’
लोकजीवन के छोटे-से चौक में
बड़ी दुनिया खोज लेने की
रचनात्मक क्षमता है।

इन सबके बीच
एक ही धारा बहती है
मानवता की
इसलिए
डॉ. राकेश कबीर को
केवल नदी का कवि कहना
उनकी कविता को छोटा करना है
वे नदी के माध्यम से
मनुष्य को पढ़ते हैं
वे मिट्टी के माध्यम से
इतिहास पढ़ते हैं
वे श्रम के माध्यम से
समाज पढ़ते हैं
वे सिनेमा के माध्यम से
समय पढ़ते हैं
वे गाँव के माध्यम से
भारत पढ़ते हैं
और कविता के माध्यम से
वे पूछते हैं
क्या हम अब भी
मनुष्य हैं?

अगर हैं
तो नदी को
बहने दीजिए
जंगल को
साँस लेने दीजिए
मिट्टी को
अन्न उगाने दीजिए
किसान को
अपने खेत में रहने दीजिए
मजदूर को
अपने श्रम का सम्मान दीजिए
बच्चे को
उसका भविष्य दीजिए
और कविता को
सच बोलने दीजिए।

क्योंकि वे जानते हैं
नदियाँ रुकेंगी
तो सभ्यता सूखेगी
श्रम रुकेगा
तो देश रुकेगा
सवाल रुकेंगे
तो लोकतंत्र रुकेगा
प्रेम रुकेगा
तो मनुष्य रुकेगा
और जिस दिन
मनुष्य रुक जाएगा
उस दिन
कविता के पास
कहने को कुछ नहीं बचेगा
इसलिए
वे नदी के पक्ष में खड़े हैं
और नदी के पक्ष में खड़ा होना
दरअसल
मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है।

उनकी मानवीय दृष्टि
यही कहती है
नदी बचेगी
तो स्मृति बचेगी
मिट्टी बचेगी
तो रोटी बचेगी
श्रम बचेगा
तो समाज बचेगा
प्रेम बचेगा
तो मनुष्य बचेगा
और मनुष्य बचेगा
तो कविता बहती रहेगी

और हमें याद रहेगा 
इस धरती पर
अप्रैल में 
एक और स्वर ने जन्म लिया है—
राकेश कबीर
अशोक की करुणा
फुले की शिक्षा
आंबेडकर का समता-संकल्प
राहुल का तर्क-विज्ञान
इन धाराओं की स्मृति लिए
वे कहते हैं
मनुष्य ही केंद्र है
समानता ही मंजिल
और संघर्ष ही
परिवर्तन का रास्ता।
★★★
रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता

Thursday, 3 September 2026

गोलेन्द्र पटेल : मुख्यधारा के युवा स्वर

*गोलेन्द्र पटेल : मुख्यधारा के युवा स्वर

संक्षिप्त परिचय:-
नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास, UPTET पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : श्रीमती उत्तम देवी
पिता : श्री नन्दलाल
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :
कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप', 'निर्माण पत्रिका' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।
प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)
काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।
सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।
संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव
संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



समकालीन हिंदी साहित्य का परिदृश्य अनेक वैचारिक धाराओं, जीवनानुभवों और सौंदर्य-दृष्टियों के अंतर्संबंध से निर्मित होता है। इस परिदृश्य में नई पीढ़ी के कुछ रचनाकार ऐसे हैं जो कविता को केवल निजी अनुभूति का माध्यम न मानकर सामाजिक जीवन की जटिलताओं से मुठभेड़ का उपकरण बनाते हैं। गोलेन्द्र पटेल इसी पीढ़ी के एक युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक के रूप में अपनी रचनात्मक पहचान निर्मित कर रहे हैं। उनकी कविताएँ समकालीन जीवन के उन दृश्यों को सामने लाती हैं जहाँ खेत और कारखाना, भूख और रोटी, श्रम और शोषण, जाति और मनुष्यता, स्त्री और असमानता, गाँव और सत्ता, उम्मीद और निराशा एक-दूसरे से टकराते हुए दिखाई देते हैं। कविता कोश में उनके जन्म-वर्ष और जन्मस्थान के साथ उनकी अनेक प्रतिनिधि कविताएँ—‘मुसहरिन माँ’, ‘श्रम का स्वाद’, ‘थ्रेसर’, ‘लकड़हारिन’, ‘उम्मीद की उपज’ आदि—दर्ज हैं; इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उनका काव्य-संसार आरंभ से ही श्रम, किसान और वंचित जीवन की ओर उन्मुख रहा है। गोलेन्द्र पटेल का जन्म 5 अगस्त 1999 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद के खजूरगाँव, साहुपुरी में होता है। ग्रामीण कृषक परिवेश से आने के कारण उनके अनुभव-संसार में गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवन की पहली पाठशाला के रूप में उपस्थित होता है। माता श्रीमती उत्तम देवी और पिता श्री नन्दलाल से प्राप्त जीवन-संस्कार, ग्रामीण समाज की संरचना, श्रमशील समुदायों का जीवन, खेत-खलिहान का परिवेश और अभावों के बीच मनुष्य की जिजीविषा उनकी संवेदना को आधार प्रदान करते हैं। आगे चलकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन उनके अनुभव को व्यापक साहित्यिक और वैचारिक संदर्भ देता है। उनकी शिक्षा में हिंदी के साथ संस्कृत और अध्यापन का प्रशिक्षण भी शामिल होता है। इस तरह लोकजीवन और अकादमिक अध्ययन, अनुभव और विचार, मिट्टी और पुस्तक—इन दोनों संसारों के बीच उनका रचनात्मक व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है। गोलेन्द्र पटेल की साहित्यिक उपस्थिति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी जनपक्षधरता है। जनपक्षधरता उनके यहाँ किसी राजनीतिक नारे की पुनरावृत्ति मात्र नहीं है; यह मनुष्य के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को देखने की एक नैतिक और साहित्यिक दृष्टि है। वे उन लोगों को कविता का केंद्र बनाते हैं जिनका श्रम समाज की अर्थव्यवस्था और सभ्यता को चलाता है, लेकिन जिनकी आवाज सत्ता और प्रतिष्ठा के गलियारों में अक्सर कमजोर पड़ जाती है। किसान, खेतिहर मजदूर, निर्माण मजदूर, गरीब परिवार, दलित समुदाय, स्त्री और श्रमजीवी मनुष्य उनकी कविता में सहानुभूति के पात्र भर नहीं हैं; वे अपनी पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता में ‘श्रम’ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य बनकर उभरता है। उनकी कविता ‘थ्रेसर’ में कृषि-आधारित जीवन की आधुनिक तकनीक और श्रमिक की असुरक्षा के बीच पैदा होने वाली त्रासदी को देखा जा सकता है। ‘गुढ़ी’ में खेत, कटाई और रोटी के प्रश्न के माध्यम से श्रम और अधिकार का संबंध सामने आता है। ‘ऊख’ में कृषि-श्रम और लोकतांत्रिक सत्ता के अंतर्विरोध को तीखे रूपक में व्यक्त किया जाता है। ‘उम्मीद की उपज’ में किसान-जीवन को केवल अभाव की कथा न बनाकर उम्मीद की खेती से जोड़ा जाता है। इन रचनाओं के प्रकाशित रूपों से यह प्रमाणित होता है कि गोलेन्द्र की कविता का किसान केवल दयनीय पात्र नहीं है; वह उत्पादक, संघर्षशील और प्रश्न करने वाला मनुष्य है। उनकी कविता का एक बड़ा गुण यह है कि वह सामाजिक यथार्थ को अमूर्त शब्दावली में नहीं, बल्कि जीवन के ठोस बिंबों में पकड़ती है। खेत, ऊख, थ्रेसर, रोटी, चोकर, ईंट, गारा, माँ, पसीना, हथौड़ा, धूल, धुआँ और भूख जैसे शब्द उनकी काव्य-भाषा में प्रतीक बनकर आते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता को पढ़ते हुए पाठक किसी दूरस्थ वैचारिक व्याख्यान में नहीं, बल्कि जीवन के बीच खड़ा हुआ महसूस करता है। उनकी भाषा का सौंदर्य उसकी सहजता और सामाजिक अर्थवत्ता में है। वे कठिन शब्दों के प्रदर्शन से कविता की शक्ति नहीं बनाते; साधारण जीवन के शब्दों में असाधारण अर्थ की संभावना तलाशते हैं। ‘मेरा दुःख मेरा दीपक है’ जैसी रचना उनके काव्य-दर्शन को समझने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी प्रदान करती है। इस कविता में माँ का श्रम, मजदूर परिवार का जीवन और पीढ़ियों से चले आ रहे अभाव एक निजी स्मृति से उठकर सामाजिक अनुभव में बदल जाते हैं। यहाँ दुःख केवल रोने का कारण नहीं है; वह देखने की रोशनी है। यही उनकी कविता की उल्लेखनीय विशेषता है कि वह पीड़ा को निष्क्रिय भावुकता में बदलने के बजाय चेतना का स्रोत बनाती है। प्रकाशित पाठ में माँ का श्रम और उसके माध्यम से श्रम-संस्कृति की स्मृति जिस तरह सामने आती है, उससे स्पष्ट होता है कि कवि के लिए व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक यथार्थ अलग-अलग संसार नहीं हैं। गोलेन्द्र पटेल की रचना-दृष्टि में दलित और बहुजन जीवन का प्रश्न इसी व्यापक सामाजिक यथार्थ के भीतर आता है। वे सामाजिक असमानता को केवल आर्थिक समस्या के रूप में नहीं देखते; उसके भीतर जाति, सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक वर्चस्व और संसाधनों के असमान वितरण की परतों को भी पहचानते हैं। ‘चोकर की लिट्टी’ जैसी कविता में भोजन का साधारण-सा बिंब सामाजिक पदानुक्रम का गहरा प्रतीक बन जाता है। रोटी की गुणवत्ता यहाँ केवल गरीबी का संकेत नहीं रहती; वह इस प्रश्न को जन्म देती है कि समाज में किसके हिस्से में सम्मानजनक जीवन आता है और किसके हिस्से में अभाव। इस तरह भोजन, जाति और गरिमा का संबंध कविता में एक साथ उपस्थित होता है। उनकी जनपक्षधरता का अर्थ किसी एक जाति या समुदाय की सीमित प्रतिनिधि आवाज बन जाना नहीं है। उनकी रचनात्मक दृष्टि वंचना के विविध रूपों को एक-दूसरे से जोड़ती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े, श्रमिक, किसान, स्त्री, गरीब और अन्य सामाजिक रूप से वंचित समूह उनके व्यापक मानवीय सरोकार के हिस्से बनते हैं। इस दृष्टि का मूल आधार संख्या नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा है। बहुजन चेतना उनके लिए सामाजिक न्याय की उस व्यापक आकांक्षा का नाम बनती है जिसमें इतिहास में उपेक्षित समुदाय अपने श्रम, ज्ञान और सांस्कृतिक योगदान के साथ दिखाई दें। गोलेन्द्र पटेल के साहित्य में जाति-विरोधी चेतना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह मनुष्य की बराबरी के प्रश्न से जुड़ती है। उनके यहाँ सामाजिक रूढ़ि का विरोध केवल असहमति व्यक्त करने के लिए नहीं है; उसके पीछे मनुष्य को जन्मगत श्रेणियों में बाँटने वाली मानसिकता से मुक्ति की आकांक्षा है। यह आकांक्षा उन्हें संत परंपरा, बौद्ध चिंतन और आधुनिक सामाजिक न्याय की विचारधाराओं से संवाद करने की प्रेरणा देती है। बुद्ध की करुणा, कबीर की निर्भीक प्रश्नाकुलता, रविदास की समतामूलक कल्पना, फुले की सत्यशोधक चेतना, शाहू महाराज की सामाजिक न्याय-दृष्टि और आंबेडकर के लोकतांत्रिक-समानतावादी विचार उनके वैचारिक संसार में अलग-अलग स्रोतों की तरह दिखाई देते हैं। इस वैचारिक पृष्ठभूमि की एक विशेषता यह है कि गोलेन्द्र पटेल अतीत के महापुरुषों को केवल श्रद्धा के विषय के रूप में नहीं, बल्कि विचार के स्रोत के रूप में ग्रहण करते हैं। उनके लिए किसी महापुरुष की प्रासंगिकता उसके अनुयायियों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके विचार की वर्तमान उपयोगिता में निहित होती है। यही दृष्टि उन्हें स्मृति और समकालीनता के बीच संवाद स्थापित करने में सहायता करती है। वे परंपरा को जड़ वस्तु नहीं मानते; उसे वर्तमान के प्रश्नों से जाँचते हैं। उनकी कविता में बुद्ध का संदर्भ इसी कारण विशेष अर्थ ग्रहण करता है। बुद्ध उनके लिए केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि करुणा, विवेक, नैतिकता और मनुष्य-केंद्रित चिंतन के प्रतिनिधि हैं। इसी प्रकार कबीर उनके लिए केवल भक्तिकाल के कवि नहीं, बल्कि प्रश्न करने और रूढ़ियों को चुनौती देने वाली चेतना के प्रतीक हैं। आंबेडकर सामाजिक समानता और संवैधानिक लोकतंत्र के नैतिक आधार के रूप में सामने आते हैं। इस प्रकार गोलेन्द्र की वैचारिकता कई परंपराओं के रचनात्मक संवाद से बनती है। उनकी कविता में स्त्री की उपस्थिति भी इसी व्यापक सामाजिक न्याय-बोध का विस्तार है। ‘मुसहरिन माँ’ जैसी रचना में स्त्री का जीवन केवल मातृत्व के भावुक चित्रण तक सीमित नहीं रहता। श्रम, गरीबी, जातिगत वंचना और स्त्री होने की सामाजिक स्थितियाँ एक-दूसरे में गुंथी हुई दिखाई देती हैं। ऐसी कविता पाठक को यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि समाज में श्रम करने वाली स्त्री की पहचान, उसकी गरिमा और उसके अधिकार को किस तरह देखा जाता है। उनकी स्त्री-संवेदना का महत्त्व इसी बात में है कि वह स्त्री को केवल करुणा की वस्तु न बनाकर संघर्षरत मनुष्य के रूप में देखने की कोशिश करती है।

गोलेन्द्र पटेल की कविता का प्रतिरोधी स्वर भी उल्लेखनीय है। सत्ता, वर्चस्व और सामाजिक अन्याय के प्रति उनका असंतोष स्पष्ट है, लेकिन उनकी कविता केवल उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहती। उसके भीतर प्रश्न, तर्क और संवाद की आकांक्षा भी दिखाई देती है। यही बात उन्हें महज घोषणापरक कविता से अलग करती है। वे पाठक को आदेश नहीं देते; उसे अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने के लिए विवश करते हैं। उनकी कविता की राजनीतिकता इसी अर्थ में साहित्यिक बनती है—वह सीधे राजनीतिक भाषण में बदलने के बजाय जीवन के अनुभवों से प्रश्न पैदा करती है। ‘ऊख’ जैसी कविता इसका उदाहरण प्रस्तुत करती है। गन्ने और पेरने की प्रक्रिया का रूपक लोकतंत्र, श्रम और सत्ता के संबंधों को एक साथ पकड़ता है। ‘गुढ़ी’ में खेत और रोटी के प्रश्न से सत्ता और श्रम के बीच दूरी दिखाई देती है। ‘थ्रेसर’ में कृषि-आधुनिकता के भीतर छिपी श्रमिक असुरक्षा सामने आती है। इन रचनाओं में राजनीतिक चेतना किसी बाहरी विचार को कविता पर आरोपित नहीं करती; वह जीवन की परिस्थितियों से पैदा होती है। उनके साहित्य में ‘रोटी’ एक बार-बार लौटने वाला महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक बिंब है। रोटी भूख का समाधान भर नहीं है; वह श्रम, अधिकार, सम्मान और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रतीक बन जाती है। जिस समाज में रोटी पैदा करने वाला ही भूखा रह जाए, वहाँ कविता का प्रश्न स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और नैतिक प्रश्न बन जाता है। गोलेन्द्र पटेल इसी विडंबना को अपने काव्य में पकड़ते हैं। उनकी कविता में ग्रामीण जीवन के प्रति एक गहरी आत्मीयता है, लेकिन यह आत्मीयता ग्रामीण जीवन का रोमानीकरण नहीं करती। खेत सुंदर भी है और संघर्ष का स्थल भी। किसान प्रकृति के निकट भी है और बाजार तथा सत्ता के दबाव में भी। गाँव स्मृति का संसार भी है और सामाजिक विषमता का भूगोल भी। इस द्वंद्व को समझना उनकी कविता को समझने के लिए आवश्यक है। वे गाँव को किसी काल्पनिक स्वर्णयुग के रूप में नहीं देखते; वे उसके भीतर मौजूद श्रम, गरीबी, जातिगत संबंधों, उम्मीद और संघर्ष की वास्तविकता को सामने लाते हैं। युवा कवि के रूप में उनकी एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि वे पारंपरिक काव्य-सौंदर्य की सीमाओं को विस्तृत करने का प्रयास करते हैं। उनके यहाँ सौंदर्य केवल फूल, चाँद, नदी और प्रेम के पारंपरिक बिंबों से निर्मित नहीं होता। फटी हथेली, खेत की मिट्टी, मजदूर का पसीना, माँ का श्रम, चोकर की लिट्टी और किसान की उम्मीद भी उनके लिए सौंदर्य के विषय हैं। इस दृष्टि से उनका काव्य-सौंदर्य जीवन की उन वस्तुओं को साहित्यिक गरिमा देता है जिन्हें अभिजात सौंदर्यशास्त्र लंबे समय तक उपेक्षित करता रहा है। उनकी भाषा में लोक और आधुनिकता का एक रोचक मेल दिखाई देता है। भोजपुरी भाषिक परिवेश से प्राप्त शब्द-संवेदना हिंदी की व्यापक अभिव्यक्ति में प्रवेश करती है। इससे उनकी कविता में स्थानीयता का स्वाद आता है, लेकिन वह स्थानीयता संकीर्ण नहीं होती। चंदौली की मिट्टी से उठी संवेदना व्यापक भारतीय समाज के प्रश्नों से जुड़ती है। यही स्थानीय से वैश्विक और निजी से सार्वभौमिक की ओर बढ़ने की साहित्यिक प्रक्रिया है। गोलेन्द्र पटेल की रचनात्मक सक्रियता कविता तक सीमित नहीं है। कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास और आलोचना जैसी विधाओं में उनकी रुचि यह संकेत देती है कि वे साहित्य को एक बहुविध बौद्धिक कर्म के रूप में देखते हैं। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि कविता के भीतर मौजूद सामाजिक संरचनाओं को समझने की कोशिश करती है, जबकि कविता अनुभव को संवेदना और भाषा में बदलती है। यह द्वंद्व उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को केवल कवि की सीमा से आगे ले जाकर साहित्यिक चिंतक की दिशा में विकसित करता है। इसी क्रम में उनका सांस्कृतिक चिंतन भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। संस्कृति उनके लिए केवल परंपराओं और उत्सवों का संग्रह नहीं है। संस्कृति में भाषा, श्रम, स्मृति, लोकजीवन, इतिहास, ज्ञान और सामाजिक संबंध सभी शामिल होते हैं। इसलिए किसी समुदाय के सांस्कृतिक योगदान को पहचानना उसके अस्तित्व और सम्मान को पहचानना भी है। बहुजन इतिहास और श्रम-संस्कृति की पुनर्पहचान की उनकी चिंता इसी सांस्कृतिक दृष्टि का परिणाम है।

गोलेन्द्र पटेल को अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा को प्राप्त सम्मान और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं से भी उनके सक्रिय रचनात्मक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। कविता कोश पर उनका स्वतंत्र रचनाकार-पृष्ठ और वहाँ दर्ज प्रतिनिधि रचनाएँ उनके काव्य-प्रसार का एक सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।  उनकी रचनाएँ   'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप', 'निर्माण पत्रिका' इत्यादि में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं, जो युवा कवि के रूप में उनकी रचनात्मक उपस्थिति की ओर संकेत करता है। गोलेन्द्र पटेल को 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी' जैसे अनेक विशेषणों से संबोधित किया गया है। इन विशेषणों को उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को रेखांकित करने वाले संकेतों के रूप में देखा जा सकता है, किंतु किसी भी रचनाकार की स्थायी पहचान अंततः उसकी रचना से ही निर्मित होती है। गोलेन्द्र पटेल की वास्तविक पहचान उनकी कविता में मौजूद श्रम-संवेदना, सामाजिक प्रश्नाकुलता, जाति-विरोधी चेतना, मानवीय करुणा और परिवर्तन की आकांक्षा से बनती है। ‘मुख्यधारा का युवा कवि-लेखक’ कहना भी उनके संदर्भ में एक विशेष अर्थ रखता है। मुख्यधारा का अर्थ यदि केवल स्थापित साहित्यिक प्रतिष्ठान की स्वीकृति से लिया जाए तो यह संज्ञा अपर्याप्त होगी। किंतु यदि मुख्यधारा का अर्थ अपने समय के केंद्रीय मानवीय प्रश्नों से संवाद करने वाली साहित्यिक धारा है, तो गोलेन्द्र पटेल की रचनात्मकता इस अवधारणा को अधिक लोकतांत्रिक अर्थ देती है। वे हाशिए के अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने का प्रयत्न करते हैं। उनकी दृष्टि में मुख्यधारा वह नहीं है जो पहले से केंद्र में बैठी है; मुख्यधारा वह भी हो सकती है जो केंद्र की परिभाषा को ही विस्तृत कर दे। उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण नैतिक आग्रह मनुष्य को उसकी जाति, पेशे, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान से पहले मनुष्य के रूप में देखने का है। यही आग्रह उनकी जनपक्षधरता को मानवीयता से जोड़ता है। यदि केवल प्रतिरोध हो और करुणा न हो तो कविता कठोर घोषणापत्र बन सकती है; यदि केवल करुणा हो और प्रतिरोध न हो तो वह निष्क्रिय सहानुभूति में बदल सकती है। गोलेन्द्र पटेल की कविता इन दोनों के बीच एक संतुलन खोजती है। उसमें आँसू हैं, लेकिन आँसू के साथ आग भी है; उसमें आक्रोश है, लेकिन आक्रोश के भीतर मनुष्यता भी है; उसमें निराशा है, लेकिन निराशा के भीतर उम्मीद की तलाश भी है। यही कारण है कि उनके यहाँ दुःख का अंतिम अर्थ पराजय नहीं है। दुःख अनुभव को गहरा करता है, अनुभव चेतना को जन्म देता है और चेतना परिवर्तन की आकांक्षा को। ‘मेरा दुःख मेरा दीपक है’ शीर्षक इसी काव्य-दृष्टि का अत्यंत सार्थक रूपक है। प्रकाशित पाठ में मजदूर जीवन और माँ के श्रम को जिस तरह उम्मीद और मानवीय गरिमा से जोड़ा गया है, वह उनकी कविता के मूल स्वभाव को समझने में विशेष सहायता करता है। एक युवा कवि के रूप में गोलेन्द्र पटेल के सामने अभी लंबी रचनात्मक यात्रा है। उनके साहित्य का अंतिम मूल्यांकन भविष्य का आलोचक करेगा। किसी भी रचनाकार की स्थायी प्रतिष्ठा समय, पुनर्पाठ और रचनाओं की दीर्घजीविता से तय होती है। किंतु उनकी वर्तमान रचनात्मक सक्रियता यह बताती है कि उन्होंने अपने लिए ऐसे प्रश्न चुने हैं जिनसे समकालीन भारतीय समाज लगातार जूझ रहा है। जाति, गरीबी, श्रम, किसान, स्त्री, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, सांस्कृतिक स्मृति और मनुष्यता के प्रश्न आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगे और इन प्रश्नों के साथ उनका रचनात्मक संवाद उनकी साहित्यिक यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बन सकता है। गोलेन्द्र पटेल को इसलिए केवल युवा कवि कहना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे कविता के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक चिंतन की ओर बढ़ते हुए ऐसे रचनाकार हैं जिनकी दृष्टि अपने समय के सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने का प्रयत्न करती है। उनकी रचनाओं में गाँव की मिट्टी से लेकर लोकतंत्र के प्रश्न तक, माँ के श्रम से लेकर बहुजन इतिहास तक, भूख से लेकर मनुष्य की गरिमा तक एक विस्तृत जीवन-संसार उपस्थित होता है। उनकी कविता साहित्य को जीवन से जोड़ती है और जीवन को प्रश्न में बदलती है। उनकी रचनात्मकता का सबसे बड़ा मूल्य शायद यही है कि वे साहित्य को मनुष्य से अलग नहीं करते। उनके लिए कविता का सौंदर्य मनुष्य की पीड़ा को देखने में है, उसकी गरिमा को पहचानने में है और उसके बेहतर भविष्य की कल्पना करने में है। वे उन आवाजों को शब्द देना चाहते हैं जिन्हें इतिहास, सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा ने लंबे समय तक दबाए रखा है। लेकिन उनकी आकांक्षा केवल आवाज देने तक सीमित नहीं रहती; वे ऐसी सामाजिक चेतना की तलाश करते हैं जिसमें किसी मनुष्य को अपनी मनुष्यता सिद्ध करने के लिए जन्म, जाति, धर्म, गरीबी या पेशे की दीवारों से लड़ना न पड़े। इस दृष्टि से गोलेन्द्र पटेल समकालीन हिंदी कविता में उस युवा रचनात्मक ऊर्जा के प्रतिनिधि हैं जो अनुभव से विचार की ओर, विचार से प्रतिरोध की ओर और प्रतिरोध से मानवीय मुक्ति की ओर बढ़ना चाहती है। उनकी कविता खेत की मेड़ से निकलकर समाज के बड़े प्रश्नों तक जाती है; मजदूर की हथेली से उठकर इतिहास की किताब को छूती है; माँ के आँसू से गुजरकर मनुष्य की गरिमा का प्रश्न बनती है और रोटी के छोटे-से बिंब में पूरे सामाजिक न्याय की आकांक्षा को समेट लेती है। गोलेन्द्र पटेल की पहचान किसी एक विशेषण में संभव नहीं है। वे जनकवि हैं क्योंकि उनका सरोकार जनजीवन से है; युवा कवि हैं क्योंकि उनकी रचनात्मक ऊर्जा अपने समय की नई बेचैनियों को अभिव्यक्ति देती है; साहित्यिक चिंतक हैं क्योंकि वे साहित्य को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखते हैं; और सांस्कृतिक चिंतक हैं क्योंकि उनके लिए मनुष्य की स्मृति, श्रम, भाषा और सम्मान संस्कृति के अनिवार्य तत्व हैं। उनकी कविता में जो सबसे अधिक मूल्यवान है, वह है मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की निरंतर आकांक्षा। इसलिए गोलेन्द्र पटेल की साहित्यिक यात्रा को केवल उपलब्धियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे रचनात्मक प्रयत्न के रूप में पढ़ा जाना चाहिए जो अपने समय के अँधेरे में मनुष्य की गरिमा की रोशनी तलाशता है। उनकी कविता कहती हुई प्रतीत होती है कि साहित्य का अंतिम पक्ष मनुष्य है—उसकी भूख, उसका श्रम, उसका दुःख, उसका स्वप्न, उसका आत्मसम्मान और उसकी मुक्ति। यही पक्षधरता उनके कवि-व्यक्तित्व को समकालीन हिंदी साहित्य में अर्थवान बनाती है और यही उनकी आगामी रचनात्मक यात्रा के लिए सबसे बड़ी संभावना भी है।


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Thursday, 27 August 2026

रक्खा सुत्त बंधन : गोलेन्द्र पटेल

रक्खा सुत्त बंधन : गोलेन्द्र पटेल 

सांस्कृतिक परंपराएँ समय के साथ अपने मूल अर्थ और स्वरूप में परिवर्तन ग्रहण करती हैं। रक्षाबंधन का एक संभावित प्राचीन बौद्ध-सांस्कृतिक संदर्भ “रक्खा सुत्त बंधन” के रूप में देखा जा सकता है। सुत्त अर्थात् सूत्र/उपदेश और रक्खा अर्थात् रक्षा—अर्थात् धम्म-सूत्र को रक्षा-संकल्प के रूप में बाँधना।

रक्खा-सुत्त में कहा गया है—

“सब्बे बुद्धा बलप्पत्ता पच्चेकानञ्च यं बलं ।
अरहन्तानञ्च तेजेन रक्खं बन्धामि सब्बसो ।।”

अर्थात् बुद्धों, पच्चेकबुद्धों और अरहंतों के तेज से सब प्रकार की रक्षा का संकल्प किया जाता है।

इसी प्रकार धम्म-सूत्रों के संरक्षण की आवश्यकता को यह पद रेखांकित करता है—

“सुत्तन्तेसु असन्तेसु, पमुट्ठे विनयम्हि च।
तमो भविस्सति लोके, सूरिये अत्थङ्गते यथा ॥”

अर्थात् जब सुत्त उपलब्ध नहीं रहते और विनय विस्मृत हो जाता है, तब सूर्यास्त के समान संसार में अंधकार छा जाता है।

इस दृष्टि से “रक्खा सुत्त बंधन” केवल धागा बाँधने की क्रिया नहीं, बल्कि धम्म-सूत्र, सदाचार और मानवीय कल्याण की रक्षा के संकल्प का सांस्कृतिक प्रतीक माना जा सकता है। कालांतर में यही सांस्कृतिक प्रतीक लोकपरंपरा में रूपांतरित होकर रक्षाबंधन के वर्तमान स्वरूप से जुड़ता दिखाई देता है।

अतः “रक्खा सुत्त बंधन” से “रक्षाबंधन” तक की यात्रा सांस्कृतिक रूपांतरण का एक विचारणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है—जहाँ आध्यात्मिक-नैतिक सूत्र धीरे-धीरे सामाजिक और पारिवारिक उत्सव का रूप ग्रहण करता है।

रक्खा सुत्त बंधन — धम्म की रक्षा, मानवता का बंधन।

टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, क्रांतिकारी जनपक्षधर्मी मूलनिवासी बहुजन किसान अर्जक कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com



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Sunday, 16 August 2026

बौद्ध नाग पंचशील पर्व || गोलेन्द्र पटेल

बौद्ध नाग पंचशील पर्व

नमो बुद्धाय। घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध।

श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बौद्ध नाग पंचशील पर्व को बौद्ध परंपरा में नागवंश, बुद्ध-धम्म, पंचशील, वर्षावास और सामुदायिक नैतिक जीवन की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। इस दृष्टि में यह पर्व केवल सर्प-पूजा तक सीमित न होकर करुणा, अहिंसा, शील, समता और मानवता का संदेश देता है। ‘नाग’ शब्द को केवल सर्प के अर्थ में देखना उचित नहीं माना जाता। भारतीय इतिहास, बौद्ध साहित्य और लोकपरंपराओं में नाग एक प्राचीन समुदाय और राजवंश के रूप में भी वर्णित हैं। बुद्ध से जुड़े अनेक कलात्मक रूपों में नाग-छत्र दिखाई देता है। बौद्ध परंपरा में मूचुलिंद नाग की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें वे ध्यानमग्न बुद्ध की वर्षा से रक्षा करते हैं। इसलिए नाग-प्रतीक को बुद्ध-धम्म की करुणा, संरक्षण और लोकस्मृति के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।बौद्ध नाग पंचशील पर्व की लोक-स्मृति में शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नागवंशी राजाओं का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार इन पाँच राजाओं को बुद्ध-रक्षक पंचमुखी नाग के प्रतीक से जोड़ा जाता है। व्यापक नाग-परंपरा में अनंत, वासुकी, तक्षक, करकोटक और ऐरावत सहित अनेक नागराजाओं के नाम भी मिलते हैं। इन ऐतिहासिक एवं लोकपरंपरागत स्मृतियों को प्रमाणों के साथ समझना नागवंश की विरासत के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण आधार है।

बुद्धकालीन वर्षावास भी इस पर्व की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने में महत्त्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु में भिक्खु एक स्थान पर निवास करते, धम्म का अध्ययन-मनन करते और गृहस्थों को नैतिक जीवन का मार्ग बताते थे। ऐसे सामुदायिक वातावरण में पंचशील—प्राणी-हिंसा से विरति, चोरी से विरति, काम-दुराचार से विरति, असत्य वचन से विरति और मादक पदार्थों से विरति—व्यक्तिगत तथा सामाजिक अनुशासन का आधार बनता था। नाग पंचशील की स्मृति को इसी नैतिक चेतना से जोड़कर देखने पर पर्व का मूल संदेश अधिक व्यापक हो जाता है। इसका केंद्र किसी जीव के प्रति भय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि दया, करुणा, शांति, अहिंसा और सह-अस्तित्व होना चाहिए। साँपों को दूध पिलाने जैसी प्रथाओं के बजाय वैज्ञानिक समझ के साथ वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार आवश्यक है। इस पर्व का एक सुंदर लोक-संदेश पक्षी संरक्षण भी हो सकता है। सावन-भादों में पक्षियों के लिए दाना और स्वच्छ जल उपलब्ध कराना, पेड़-पौधों तथा प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना और जीव-जगत के प्रति करुणा रखना बुद्ध की करुणा-दृष्टि को व्यवहार में उतारने का सरल माध्यम है।

नागवंश से जुड़े अनेक ऐतिहासिक दावे लोकपरंपराओं और वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों में मिलते हैं। शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नामों तथा कन्हेरी आदि स्थलों से जुड़े नाग-प्रतीकों का उल्लेख भी मिलता है। किंतु ऐसे विशिष्ट ऐतिहासिक दावों को पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर अलग-अलग जाँचना आवश्यक है। लोकस्मृति और इतिहास दोनों का सम्मान तभी सार्थक है, जब आस्था के साथ प्रमाण और तर्क को भी स्थान दिया जाए। इसी प्रकार जातक कथाओं की संख्या से सीधे अठारह पुराणों की संख्या निकलने का दावा ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करने से पहले प्रमाण की अपेक्षा करता है। इतिहास का पुनर्पाठ आवश्यक है, लेकिन पुनर्पाठ का आधार प्रमाण, तर्क और आलोचनात्मक विवेक होना चाहिए। आज नाग पंचशील पर्व को इसी व्यापक अर्थ में पुनर्जीवित किया जा सकता है—अतीत की स्मृति, बुद्ध का धम्म, पंचशील का आचरण, प्रकृति के प्रति करुणा और मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता। पर्व तभी सार्थक है, जब वह केवल अनुष्ठान न रहकर जीवन-व्यवहार में दिखाई दे।

नाग पंचशील का संदेश यही हो—
अहिंसा हमारे कर्म में, सत्य हमारे वचन में,
करुणा हमारे हृदय में और मानवता हमारे जीवन में हो।

नमो बुद्धाय।
जय करुणा। जय समता। जय मानवता।

नाग पंचशील : बुद्ध, नाग और मानवता का महापर्व

नमो बुद्ध, करुणा-धन, नमो धम्म उजियार।
नमो संघ समता-सुधा, मिटे तिमिर-अंधकार॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर आँगन हो ज्ञान।
मित्रता, मुहब्बत, मनुजता—यही बने अभियान॥

दया धर्म का मूल है, करुणा जीवन-प्राण।
अहिंसा से विश्व में, जागे नव सम्मान॥

श्रावण शुक्ल की पंचमी, पर्व पुरातन गान।
नाग-पंचशील नाम से, जागे बुद्ध-विधान॥

बुद्ध-वचन की छाँह में, हो जीवन अनुशास।
शील-साधना से मिटे, मन का तम और त्रास॥

नागवंश की लोक-स्मृति, रखे पुराना मान।
इतिहासों की धूल में, खोजे अपना ज्ञान॥

कथा-कहानी के परे, देखो मानव रूप।
नाग कहे जिस जाति को, उसमें मन का धूप॥

जो भी मानव जन्म ले, मानव उसका नाम।
जाति-वर्ण की दीवारें, करतीं जग बदनाम॥

शेष भोगिन चंद्रांशु, धम्मवर्मन वंगार।
अनंत वासुकी तक्षक, करकोटक ऐरावत॥

बुद्ध धम्म की राह में, नाग हुए अनुरक्त।
समता, मैत्री, शील से, जीवन हुआ आसक्त॥

कहीं शेष की गाथा है, कहीं वासुकी नाम।
अनंत, पद्म, कंबलादि—लोक-स्मृति में धाम॥

कालिय, शंखपाल भी, कथाओं में विख्यात।
नागवीरों की लोक में, गूँज रही सौगात॥

परंपराओं के अर्थ को, पढ़ना होगा आज।
साँपों के मिथ में कहीं, छिपा हुआ है राज॥

रूपक के आवरण तले, इतिहासों की छाप।
पढ़ने वाला खोलता, सदियों का संताप॥

बुद्ध-मूर्ति के शीश पर, नाग-छत्र जब होय।
करुणा-रक्षक स्मृति का, अर्थ नया तब होय॥

मूचुलिंद की लोककथा, देती यही संदेश।
बुद्ध-विचार की छाँह में, सेवा सबसे विशेष॥

प्राणी-हिंसा से रहो, मन-वचन-कर्म विरत।
सत्य-वचन को धारकर, जीवन रखो निर्मल॥

दुराचार से दूर रहो, संयम अपना धर्म।
लोभ-मोह के बंधनों, से रखो जीवन वर्म॥

मदिरा-मादक से बचो, जाग्रत रखो विवेक।
पंचशील की साधना, मन को करती नेक॥

नहीं किसी पर क्रोध हो, नहीं किसी से द्वेष।
मैत्री का दीपक जले, मिटे हृदय का क्लेश॥

शील जहाँ व्यवहार में, वहीं धम्म साकार।
केवल पूजा से नहीं, बदलो जीवन-व्यवहार॥

बरखा आई, राह में, नदियाँ उठीं उफान।
भिक्खु एक ही स्थान पर, करते धम्म-ध्यान॥

वर्षावास के समय में, रुकता था परिव्राज।
सुनते जन उपदेश तब, खुलता मन का राज॥

गाँव-गाँव में बैठकर, बुद्ध-वचन पर बात।
शील, करुणा, मैत्री की, होती थी बरसात॥

घर-घर जागे चेतना, जन-जन पाए ज्ञान।
मानवता की साधना, बने लोक-अभियान॥

श्रावण की उस साधना, में सामूहिक भाव।
एक-दूसरे के लिए, बढ़ता प्रेम-सद्भाव॥

नगर बसाने वालों की, स्मृति कहती बात।
नाग-नाम से जुड़ गए, नगर और भू-भाग॥

इतिहासों में खोजिए, लोक-स्मृति के सूत्र।
नाम, शिलालेख, कथाएँ—सब हैं अपने पूरक॥

राज्य, गण और संघ में, चलता था व्यवहार।
योग्य व्यक्ति को चुनने का, होता था अधिकार॥

कहीं कुश्ती, कहीं धनुष, कहीं अश्व की चाल।
साहस, कौशल, शक्ति का, होता था प्रतिपाल॥

आज दंगल, खेल और, कौशल के उत्सव।
लोक-स्मृति में जीवित हैं, बीते युग के स्वर॥

वीरता का अर्थ है, निर्बल का सम्मान।
शक्ति वही सार्थक बने, जो रखती कल्याण॥

इतिहासों की धूल में, दबे अनेक प्रसंग।
पढ़ने से खुलते कभी, स्मृति-ग्रंथ के रंग॥

किताबें चेतन-मन की, धूल हटातीं आज।
प्राचीनों से जोड़तीं, वर्तमान का राज॥

तर्क-प्रमाण की रोशनी, रखो सदैव साथ।
अंधविश्वासों से नहीं, सत्य बनेगा पथ॥

जो प्रमाण से सिद्ध हो, उसको दो सम्मान।
जो केवल आख्यान हो, उसको मानो ज्ञान॥

प्रश्न करो निर्भीक हो, यही विवेक-विधान।
जिज्ञासा से ही खुले, इतिहासों का ज्ञान॥

नाग शब्द के अर्थ को, केवल सर्प न मान।
लोक-परंपरा में मिले, अर्थ अनेक महान॥

कथा जहाँ प्रतीक बने, अर्थ वहाँ बहुतेर।
रूपक के भीतर छिपे, इतिहासों के फेर॥

सर्पों को दूध पिलाना, तर्क नहीं स्वीकार।
प्रकृति-विज्ञान समझकर, करो जीव से प्यार॥

जीव-जगत के प्राणियों, पर मत करना अत्याचार।
दूध चढ़ाने से अधिक, दया करो अपार॥

साँप भी धरती के जीव हैं, उनका भी संसार।
अंधविश्वासों से उन्हें, मत देना उपहार॥

नाग कहे तो मानव हो, सर्प कहे तो जीव।
दोनों की अपनी जगह, दोनों के अधिकार॥

शेष, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन, वंगर नाम।
लोक-स्मृति में आज भी, गूँज रहे हैं धाम॥

राजाओं की गाथा को, प्रमाणों से परखो।
सिक्के, शिलालेख, पुरातत्त्व—सबसे सत्य परखो॥

कन्हेरी की गुफाओं में, नाग-छत्र का रूप।
बुद्ध-प्रतिमा के साथ है, स्मृति का सुंदर धूप॥

पाँच फनों की छाँह में, पाँच प्रतीकों की बात।
लोककथा और इतिहास में, खोजो उनके अर्थ॥

सात-फनों की छवि मिले, तो भी प्रश्न करो।
प्रतीकों के मूल अर्थ को, तर्क-ज्योति से धरो॥

नागकन्या का अर्थ हो, केवल सर्प न जान।
लोक-संदर्भ के भीतर, देखो मानव-प्राण॥

नागमणि की चमक से अधिक, ज्ञान-मणि अनमोल।
मुनि बने जो साधना से, उसका ऊँचा मोल॥

नागमुनि की लोककथा, साधक की पहचान।
ज्ञान-ध्यान से श्रेष्ठ हो, ऐसा हो इंसान॥

मिथक अगर मनुष्य को, बाँटें ऊँच-नीच।
ऐसी कथा पर प्रश्न हो, विवेक रहे सदा नींव॥

मानव को मानव समझना, सबसे ऊँचा धर्म।
दया, शांति, समता बने, जीवन का सत्कर्म॥

आज पर्व का अर्थ हो, केवल पूजा-पाठ।
जीव-जगत की रक्षा में, बढ़े मनुष्य का हाथ॥

आँगन में दाना रखो, छत पर रखो अन्न।
वृक्ष तले जल भी रखो, जीव रहें प्रसन्न॥

चावल, गेहूँ, चना रखो, मटर रखो सम्मान।
भूखे पंछी लौटकर, पाएँ अपना स्थान॥

बरखा में जब अन्न कम, तब बनो उनका मित्र।
दाना देकर बचाइए, जीवन का यह चित्र॥

जो पंछी कल दिखते थे, आज न दिखते पास।
उनकी घटती संख्या पर, मन में जागे आस॥

बचे हुए जो जीव हैं, उनको दो संरक्षण।
करुणा ही सच्चा बने, मानव का आभूषण॥

नहीं किसी को मारना, नहीं किसी को छल।
सत्य-संयम साथ लेकर, जीवन करना सफल॥

लोभ-मोह से दूर हो, निर्मल हो व्यवहार।
मादकता से मुक्त मन, जागे विवेक-विचार॥

जाति-वर्ण का भेद मिटे, मिटे घृणा-अभिमान।
मानव-मानव एक हों, यही धर्म की शान॥

नारी, नर, श्रमिक, कृषक, सबका हो सम्मान।
जिसके श्रम से जग चले, उसका ऊँचा मान॥

धर्म वही जो जोड़ता, धर्म वही जो शील।
धर्म वही जो दुख हरे, करुणा जिसकी नील॥

धम्म-ज्योति फिर जल उठे, मिटे अज्ञान-तम।
बुद्ध-विचारों से बने, मानवता का क्रम॥

नहीं किसी के वर्चस्व की, चाह रहे संसार।
समता, न्याय, बंधुत्व से, हो जन-जन उद्धार॥

बुद्ध न केवल नाम हैं, बुद्ध विचार महान।
तर्क, करुणा, शील से, निर्मित हो इंसान॥

नहीं अतीत की अंधभक्ति, नहीं वर्तमान-विस्मार।
सत्य जहाँ प्रमाणित हो, उसको दें स्वीकार॥

अतीत से सीखें मगर, भविष्य करें निर्माण।
ज्ञान-विवेक के दीप से, रोशन हो जहान॥

नाग पंचशील पर्व पर, यही रहे संकल्प।
मन में बुद्ध-विचार हो, जीवन हो निष्कलंक॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर घर पंचशील।
द्वेष-दंभ सब दूर हों, मन हो निर्मल-नील॥

पक्षी, पशु, वन, जल, धरा—सबका हो अधिकार।
जीवन के हर रूप पर, बरसे प्रेम अपार॥

जाति-धर्म की सीम से, ऊपर उठता मानव।
करुणा जिसकी शक्ति हो, सत्य बने उसका धन॥

मित्रता में मूल हो, मुहब्बत में विस्तार।
मानवता में सार हो, मुक्ति बने उद्गार॥

बुद्ध-वचन की राह पर, चलना हो अभियान।
मानव-मानव एकसम, यही हमारा गान॥

नमो बुद्धाय मंत्र से, जागे जन-जन प्राण।
नमो धम्म, नमो संघ, नमो मानव सम्मान॥

नागवंश की लोक-स्मृति, बुद्ध धम्म का मान।
तर्क, करुणा, शील से, गढ़ें नया इंसान॥

जय करुणा, जय शांति हो, जय समता का ज्ञान।
घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध—मानवता महान॥
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, क्रांतिकारी जनपक्षधर्मी मूलनिवासी बहुजन किसान अर्जक कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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ईमेल : corojivi@gmail.com

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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com




राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि — गोलेन्द्र पटेल

राकेश कबीर: नदी के पक्ष में खड़े कवि इन दिनों आँखें बंद होने पर तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं और खुली होने पर कबीर मैं भाषा में ही नहीं भूमि पर...