Thursday, 5 March 2026

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत || गोलेन्द्र पटेल

 क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत

❝जो व्यक्ति राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के संघर्ष और विचारों से अनभिज्ञ है, उसके साथ जीवन साझा करने से बेहतर है कि हम अकेले रहना स्वीकार करें।❞ — गोलेन्द्र पटेल


भारतीय समाज में यह एक गंभीर प्रश्न है कि कितने लोग, विशेषतः अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग, यह जानते हैं कि भारत की प्रथम महिला शिक्षिका कौन थीं। यह तथ्य अक्सर भुला दिया जाता है कि भारत की पहली महिला शिक्षिका किसी उच्च वर्ण से नहीं, बल्कि समाज के वंचित तबकों से आईं। वे थीं क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने शिक्षा और समानता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा दी।

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ। उनके पिता खंडोजी नैवसे और माता लक्ष्मीबाई थीं। किशोरावस्था में उनका विवाह समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव ने उन्हें शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया और यही शिक्षा आगे चलकर एक बड़े सामाजिक आंदोलन का आधार बनी। सावित्रीबाई ने 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय प्रारम्भ किया और स्वयं उसकी शिक्षिका बनीं। इस प्रकार वे भारतीय इतिहास में पहली महिला शिक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।

उनका संघर्ष केवल विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-उद्धार, जाति-भेद के विरोध और मानवीय समानता के लिए निरंतर काम किया। समाज में व्याप्त कुरीतियों—बाल विवाह, छुआछूत, स्त्री-अशिक्षा और विधवाओं के उत्पीड़न—के विरुद्ध उन्होंने खुलकर आवाज उठाई। फुले दंपती ने ऐसे आश्रय-गृह भी स्थापित किए जहाँ असहाय महिलाओं और नवजात शिशुओं को सुरक्षा और देखभाल मिल सके।

सावित्रीबाई ने महिलाओं को संगठित करने के लिए महिला मंडलों का निर्माण किया, जहाँ अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वाभिमान जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए समान अधिकार की भावना को व्यवहार में उतारा—यहाँ तक कि अपने घर का कुआँ भी सभी जातियों के लिए खोल दिया, जो उस समय सामाजिक समानता का साहसिक कदम था।

वे केवल समाजसेवी ही नहीं, बल्कि साहित्यकार भी थीं। वे मराठी की पहली कवयित्री हैं, उनकी कृतियों में शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के विचार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनकी लेखनी सरल भाषा में समाज के वंचित वर्गों को जागरूक करने का माध्यम बनी।

1897 में पुणे में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने रोगियों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। एक बीमार बच्चे को उपचार के लिए ले जाते समय वे स्वयं संक्रमण का शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उनका जीवन सेवा, साहस और समर्पण की अद्वितीय मिसाल बन गया।

सावित्रीबाई फुले की विरासत आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा है। स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की जो मशाल उन्होंने जलाई, वह आज भी संघर्ष और परिवर्तन की राह को प्रकाशमान करती है। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति का सबसे सशक्त साधन है।

सावित्री ज्ञान-ज्योति


सावित्री के ज्ञान से, जो जन अब भी दूर।
ऐसे अज्ञानित संग से, रहना अच्छा दूर॥
तीन जनवरी जन्म दिन, उन्नीसवीं सदी भोर।
ज्ञान-ज्योति बन जल उठीं, जन-मन के हर छोर॥

खंदोजी की संतति थीं, लक्ष्मी माँ की लोर।
संघर्षों की गोद में, पला क्रांति का जोर॥
भारत की प्रथम शिक्षिका, ब्राह्मण कुल की नाहिं।
ओबीसी की बेटी थी, सावित्री की चाहिं॥

ज्योतिराव संग बंध गया, जीवन का अभियान।
शिक्षा, समता, स्वाभिमान, बन गया पहचान॥
भिड़े वाड़ा के द्वार से, खुला नया इतिहास।
बालिकाओं की पाठशाला, तोड़ा अंधा त्रास॥

काँटे, पत्थर, तिरस्कार, सहती रहीं निडर।
ज्ञान-पथ पर बढ़ चलीं, बनकर दीप प्रखर॥
अठारह विद्यालय से, फैला शिक्षा-धाम।
नारी, शूद्र, अनाथ सब, पाए नव-अभिराम॥

मुस्लिम मित्रों ने दिया, घर-आँगन का साथ।
लहुजी की पहरेदरी, बनी संघर्ष की थात॥
कुएँ का जल खोलकर, तोड़ी जाति दीवार।
प्यासे होंठों तक पहुँचा, मानवता का प्यार॥

विधवा-पीड़ा देख कर, खोला आश्रय-द्वार।
ममता से पाले शिशु को, दिया नया संसार॥
सत्यशोधक विवाह से, टूटी रूढ़ि-कमान।
बिना पुरोहित बंध गए, समता के अरमान॥

‘काव्यफुले’ की पंक्तियाँ, जगा रहीं स्वाभिमान।
‘रत्नाकर’ में गूँजता, शिक्षा-समता गान॥
स्त्री स्वर बन मंच पर, बोली निर्भय बात।
घर की सीमाएँ तोड़कर, बदली जग की जात॥

जाति, वर्ग, जेंडर सभी, देखे एक ही साथ।
सावित्री की दृष्टि में, मानवता की बात॥
प्लेग-काल में कंध पर, रोगी बालक लाय।
सेवा-पथ में प्राण दे, अमर कथा बन जाय॥

दस मार्च अठारह सौ, सत्तानबे का दिन।
सेवा में बलिदान से, अमर हुआ वह क्षण॥
विद्यालय, मंडल, गृह, जल— रचना दी समाज।
संघर्षों की यह धरोहर, बदले युग का आज॥

नारी यदि शिक्षित हुई, जागे घर परिवार।
ज्ञान-सूर्य से मिट गया, अज्ञानों का अँधियार॥
सावित्री की राह पर, जो भी बढ़ता जाय।
समता, शिक्षा, मानवता, जीवन में फल पाय॥



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Monday, 2 March 2026

लघु कथा: चंदन की होली

 

चंदन की होली : गोलेन्द्र पटेल 

होली आने वाली थी और गाँव में रंगों की धूम मची थी।
गोलेन्द्र ने चौपाल पर खड़े होकर गंभीर स्वर में घोषणा की, “मित्रों! मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप दिया है कि मैं प्रेमिका के अलावा किसी के साथ होली नहीं खेल सकता। और कृपया, कोई भी कृत्रिम रंग, अबीर-गुलाल लेकर मेरे पास न आए। मेंहदी या चंदन ही स्वीकार्य है!”
लोग पहले तो चौंके, फिर मुस्कुरा उठे।
उधर मन ही मन गोलेन्द्र को याद आया कि कुछ दिन पहले महर्षि अगस्त्य ने आशीर्वाद दिया था, “वत्स! शीघ्र ही तुम्हारी GF से भेंट होगी।”
गोलेन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था, “भगवन्! मुझे किसी God Father से नहीं मिलना, आप ही मेरे पथप्रदर्शक हैं। मैं आपका ही गोलेन्द्र हूँ!”
होली के दिन सब लोग चमकीले रंगों से सराबोर थे, पर गोलेन्द्र सफेद कुर्ते में शांत खड़ा था। तभी एक बालिका आई, हाथ में चंदन लिए। उसने मुस्कुराकर उसके माथे पर तिलक लगाया और बोली, “सच्चा रंग वही है जो मन को रंग दे।”
गोलेन्द्र समझ गया, श्राप रंगों का नहीं, अहंकार का था। प्रेमिका कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि निर्मल प्रेम की अनुभूति थी।
उस दिन उसने जाना कि होली बाहर नहीं, भीतर खेली जाती है।

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (चंदौली, उत्तर प्रदेश।)

Sunday, 22 February 2026

एक दोस्त का आख़िरी पत्र : गोलेन्द्र पटेल

एक दोस्त का आख़िरी पत्र 


यह अंतर्मन की शुद्धतम पुकार है—
मेरे प्रिय मित्र!

यदि कभी मेरी किसी बात, व्यवहार या अनजानी भूल से तुम्हारे हृदय को ठेस पहुँची हो, तो उदार मन से मुझे क्षमा कर देना। मेरी सच्ची प्रार्थना है कि तुम्हारे जीवन के समस्त दुःख मेरे हिस्से आ जाएँ और मेरे हिस्से का समस्त सुख तुम्हारी झोली में भर जाए।

तुम जहाँ भी रहो, सदा आनंदित रहो, उल्लास से भरे रहो, अपने स्वप्नों और साहस के साथ आगे बढ़ते रहो। जीवन की किसी भी घड़ी में निराशा को अपने पास मत ठहरने देना, मत उदास होना।

और हाँ, मेरे लिए कभी मत रोना—
क्योंकि मैं देह से अधिक स्मृति हूँ, और स्मृति से भी अधिक एक रचनात्मक स्पंदन।
मुझे समय की धूल में नहीं, शब्दों की रोशनी में सँभाल कर रखना।
मुझे भाषा और कला के हवाले कर देना—
वहीं मैं जीवित रहूँगा, शांत, मुक्त और उज्ज्वल।

प्रिय साथी,
यह पत्र लिखते समय शब्द काँप रहे हैं, पर मन अद्भुत रूप से शांत है—जैसे कोई उदास मौसम स्वयं बोल उठे।

आज उसी मौसम ने मुझसे कहा—
कि मैं उस कली के लिए कार्तिक का बादल था,
जो तपते सूरज के प्रकोप से कुम्हला रही थी;
जिसे वसंत के स्वागत में एक प्रेम-पुष्प बनना था।

यदि कभी तुम्हें मेरी उपस्थिति में शीतलता मिली हो,
यदि मेरे शब्दों ने तुम्हारी थकान पर हल्की-सी छाया रखी हो,
तो समझ लेना—मैं उसी बादल की क्षणिक छाया था।
बादल ठहरते नहीं, वे केवल बरस कर आगे बढ़ जाते हैं।

इस उदास मौसम ने मुझसे यह भी कहा—
कि हम स्मृतियों के उजड़े हुए चमन हैं।
हमारी आँखों में जो चमकता हुआ मोती है,
वह दो फूलों का रोना है—
एक तुम, एक मैं।

लेकिन प्रिय, रोना ही अंत नहीं होता।
कुछ प्रेम खिलने के लिए नहीं,
स्मृति बनने के लिए जन्म लेते हैं।
कुछ साथियाँ जीवन-पथ पर हाथ थामने नहीं,
आत्मा को दिशा देने आते हैं।

यदि मेरी किसी भूल से तुम्हारा मन आहत हुआ हो,
तो उसे भी इस मौसम की धूल समझकर क्षमा कर देना।
तुम्हें हँसते देखना ही मेरी अंतिम इच्छा है।
तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा वसंत तुम्हें अवश्य मिले—
तुम प्रेम-पुष्प बनो, पूर्ण, प्रस्फुटित, सुगंधित।

मेरे लिए मत रुकना, मत रोना।
मैं कोई विरह का बोझ नहीं,
मैं केवल एक रचनात्मक स्मृति हूँ—
मुझे शब्दों के हवाले कर देना,
कला की शांत शरण में छोड़ देना।

जब कभी कार्तिक का बादल घिर आए,
या आँखों में कोई मोती चमक उठे—
समझ लेना, वह मैं नहीं,
हमारे प्रेम का शुद्धतम अंश है
जो तुम्हें आशीष देने आया है।

अंतिम प्रणाम सहित,
तुम्हारा
— गोलेन्द्र पटेल

चंदौली, उत्तर प्रदेश।


Friday, 20 February 2026

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल 

भारतीय इतिहास में कई ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें समय, सत्ता और वर्चस्व ने ढँक दिया। बहुजन चिंतन का एक महत्वपूर्ण कार्य उन दबे हुए अध्यायों को सामने लाना है। इसी संदर्भ में
राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले (11 अप्रैल 1827 - 28 नवम्बर 1890) का योगदान अत्यंत निर्णायक माना जाता है।

फुले और स्मृति की पुनर्खोज

उन्नीसवीं सदी में जब समाज पर वर्ण-आधारित वर्चस्व गहरा था, तब फुले ने इतिहास को बहुजन नजर से पढ़ने का साहस किया। 1869 में रायगढ़ स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज (19 फरवरी 1630 – 3 अप्रैल 1680) की समाधि की खोज और उसके सार्वजनिक स्मरण का कार्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था—वह प्रतीक था कि इतिहास पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं हो सकता।

फुले ने शिवाजी पर पोवाड़ा लिखकर यह स्थापित किया कि शिवाजी की स्मृति केवल दरबारों की नहीं, जनता की भी है। 1870 में शिवजयंती का सार्वजनिक आयोजन दरअसल सामाजिक आत्मसम्मान का आयोजन था—एक संदेश कि शासक की विरासत को जनता अपने अर्थों में पुनर्परिभाषित कर सकती है।


शिवाजी और सामाजिक संरचना

बहुजन दृष्टि शिवाजी को केवल महिमामंडित व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर देखती है।

  • उन्होंने विभिन्न जातियों, समुदायों और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपनी सेना और प्रशासन में स्थान दिया।
  • किसानों (रयत) के संरक्षण, कर-व्यवस्था में सुधार और सैनिकों को वेतन-आधारित प्रणाली देने जैसे कदम उठाए।

इन पहलों ने उन्हें “रयत का राजा” कहलाने का आधार दिया।

परंतु बहुजन विमर्श केवल उपलब्धियों की सूची तक सीमित नहीं रहता। वह यह भी पूछता है:
क्या उस दौर की सत्ता संरचना जाति-आधारित भेदभाव से पूर्णतः मुक्त थी?
क्या शिक्षा और निर्णय-प्रक्रिया में बहुजन समुदाय की समान भागीदारी थी?

ऐसे प्रश्न किसी व्यक्तित्व को कमतर करने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए होते हैं।


हिंदवी स्वराज की अवधारणा

शिवाजी द्वारा प्रतिपादित “हिंदवी स्वराज” को बहुजन चिंतन इस अर्थ में पढ़ता है कि यह विदेशी प्रभुत्व और अन्याय के विरुद्ध स्वशासन का विचार था।

यह अवधारणा उस समय के राजनीतिक आत्मसम्मान का प्रतीक थी। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि स्वराज का अर्थ केवल सत्ता-परिवर्तन न होकर सामाजिक समानता भी हो।


धर्म और शासन

इतिहास में कई दस्तावेज़ यह संकेत देते हैं कि शिवाजी ने धार्मिक स्थलों की रक्षा और सम्मान का आदेश दिया। प्रशासन में विभिन्न धर्मों के लोगों की भागीदारी थी।

बहुजन दृष्टि यहाँ भी संतुलन रखती है—
धार्मिक सम्मान और सामाजिक न्याय, दोनों को साथ देखने की आवश्यकता है।

आज के संवैधानिक भारत में राज्य का आधार धर्म नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार हैं—यह दृष्टि हमें विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के विचारों से मिलती है।


राजतंत्र और लोकतंत्र का प्रश्न

बहुजन समाज के सामने एक वैचारिक प्रश्न भी है—
यदि आज हम संविधान-आधारित लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो ऐतिहासिक राजाओं का स्मरण किस रूप में करें?

क्या वह सांस्कृतिक स्मृति है?
क्या वह आत्मसम्मान का प्रतीक है?
या क्या उसे आलोचनात्मक विवेक के साथ पढ़ा जाना चाहिए?

बहुजन दृष्टि कहती है—
सम्मान और आलोचना विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।


वर्तमान संदर्भ

आज शिवाजी की जयंती विभिन्न वैचारिक धाराएँ अलग-अलग अर्थों में मनाती हैं।

  • कुछ उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • कुछ सामाजिक न्याय और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में।
  • कुछ उनके प्रशासनिक कौशल और सैन्य नेतृत्व पर बल देते हैं।

बहुजन दृष्टि इन सभी दावों के बीच संतुलन साधते हुए यह आग्रह करती है कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को एकांगी प्रतीक में सीमित न किया जाए।


परिवार और वंश

शिवाजी का पारिवारिक और राजवंशीय इतिहास भी महत्वपूर्ण है। उनके पिता शाहजी राजे और माता जीजाबाई ने उनके व्यक्तित्व-निर्माण में भूमिका निभाई। उनके पश्चात संभाजी और राजाराम ने सत्ता संभाली, जिससे मराठा साम्राज्य की अलग-अलग शाखाएँ विकसित हुईं।

आज भी महाराष्ट्र में भोसले वंश की विभिन्न शाखाएँ सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं।


निष्कर्ष: बहुजन पुनर्पाठ का आग्रह

बहुजन दृष्टि का उद्देश्य किसी को देवत्व देना या नकार देना नहीं है।

उसका आग्रह है:

  • इतिहास को जनकेंद्रित नजर से पढ़ा जाए
  • सत्ता और समाज के संबंधों को समझा जाए
  • संविधान-आधारित समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को अंतिम आदर्श माना जाए

शिवाजी का स्मरण यदि सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और संगठन-शक्ति की प्रेरणा देता है, तो वह बहुजन चेतना का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन यदि स्मरण आलोचना से मुक्त होकर केवल महिमामंडन बन जाए, तो वह इतिहास की जटिलता को सीमित कर देता है।

इसलिए बहुजन दृष्टि कहती है—
इतिहास को श्रद्धा और प्रश्न, दोनों के साथ पढ़ें।
तभी स्वराज का विचार वर्तमान में सार्थक होगा।



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Wednesday, 11 February 2026

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026, सामाजिक न्याय और उत्तर प्रदेश की राजनीति : एक संक्षिप्त विश्लेषण || डॉ. पल्लवी पटेल की भूमिका और राजनीतिक पृष्ठभूमि : गोलेन्द्र पटेल

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026, सामाजिक न्याय और उत्तर प्रदेश की राजनीति : एक संक्षिप्त विश्लेषण

(तस्वीर साभार: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म)

उच्च शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है; यह सामाजिक गतिशीलता, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक चेतना का आधार भी है। जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भेदभाव, असमान अवसर या संस्थागत उपेक्षा के प्रश्न उठते हैं, तो वे सीधे संविधान की मूल भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—से जुड़ जाते हैं। इसी व्यापक संदर्भ में UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 का मुद्दा राष्ट्रीय और प्रांतीय राजनीति के केंद्र में आया।

1. UGC इक्विटी रेगुलेशन : उद्देश्य और बहस

प्रस्तावित विनियमों का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव-निरोधक तंत्र को सुदृढ़ करना, शिकायत-निवारण प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना तथा SC, ST, OBC, महिलाओं, दिव्यांगजनों, अल्पसंख्यकों, ट्रांसजेंडर समुदाय और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों को सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना है।

समर्थकों का तर्क है कि यह कदम ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को वास्तविक समान अवसर देने की दिशा में आवश्यक है। विरोधियों की आशंका है कि इससे संस्थानों की स्वायत्तता या प्रशासनिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इस प्रकार, यह विवाद केवल एक नियम का नहीं, बल्कि शिक्षा की सामाजिक भूमिका को लेकर दो दृष्टिकोणों का है।

2. डॉ. पल्लवी पटेल की भूमिका और राजनीतिक पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डॉ. पल्लवी पटेल एक प्रमुख नाम हैं। वे सिराथू विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक हैं और अपना दल (कमेरावादी) की अग्रणी नेता के रूप में जानी जाती हैं। वे दिवंगत डॉ. सोनेलाल पटेल की पुत्री हैं, जिन्होंने पिछड़े और वंचित समुदायों की राजनीतिक चेतना को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

सोनेलाल पटेल की चार बेटियों—पारुल, पल्लवी, अनुप्रिया और अमन—में राजनीतिक सक्रियता विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। परिवार के भीतर समय-समय पर वैचारिक और राजनीतिक मतभेद भी सामने आए, किंतु सामाजिक न्याय की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा प्रत्येक धड़ा करता रहा है।

डॉ. पल्लवी पटेल ने स्वयं को जनपक्षधर राजनीति से जोड़ा है—चाहे वह शिक्षा का प्रश्न हो, स्कूलों के विलय का मुद्दा, किसी हिंसक घटना के पीड़ित परिवार से मिलना हो या छात्र आंदोलनों में भागीदारी।

3. “चलो लखनऊ” और आंदोलन की राजनीति

10 फरवरी 2026 को UGC इक्विटी रेगुलेशन को लागू करने की मांग के समर्थन में लखनऊ में एक मार्च और धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस आंदोलन का आह्वान करते हुए डॉ. पल्लवी पटेल ने इसे केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का प्रयास बताया।

मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। बैरिकेडिंग, रोक-टोक और हिरासत की घटनाओं ने आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया। समर्थकों ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर कठोर कार्रवाई बताया, जबकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता का हवाला दिया।

यहाँ प्रश्न केवल पुलिस-प्रदर्शनकारी टकराव का नहीं था, बल्कि उस प्रतीकात्मक अर्थ का था जो एक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के साथ हुए व्यवहार से जुड़ गया। नारी-सम्मान, लोकतांत्रिक अधिकार और राजनीतिक असहमति—ये सभी मुद्दे एक साथ उभर आए।

4. सामाजिक न्याय बनाम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

आंदोलन के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों पर आरोप-प्रत्यारोप लगे। कुछ नेताओं पर यह आरोप लगाया गया कि वे वंचित समाज के वोट तो चाहते हैं, परंतु उनके मुद्दों पर खुलकर साथ नहीं देते। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगे—कि अलग-अलग समूहों के विरोध प्रदर्शनों के प्रति प्रशासनिक रवैया समान नहीं रहता।

हालाँकि लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि प्रत्येक दल अपनी राजनीतिक रणनीति के अनुसार प्रतिक्रिया दे। किंतु दीर्घकालिक समाधान के लिए आवश्यक है कि शिक्षा और समान अवसर जैसे मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर देखा जाए।

5. महिला नेतृत्व और प्रतीकात्मकता

डॉ. पल्लवी पटेल के आंदोलन ने महिला नेतृत्व के प्रश्न को भी केंद्र में ला दिया। भारतीय समाज में नारी-सम्मान का आदर्श अक्सर उद्धृत किया जाता है, परंतु वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों में महिला नेताओं को अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

जब किसी महिला प्रतिनिधि के साथ सार्वजनिक स्थल पर बलपूर्वक व्यवहार की खबरें सामने आती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत घटना नहीं रह जाती; वह व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बन जाती है। समर्थकों ने इसे महिला अस्मिता से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने इसे राजनीतिक नाटकीयता बताया।

6. शिक्षा, संविधान और भविष्य

डॉ. पल्लवी पटेल ने अपने वक्तव्यों में बार-बार संविधान का उल्लेख किया—विशेषतः शिक्षा के अधिकार, समान अवसर और सामाजिक न्याय के संदर्भ में। उनका कहना रहा कि लोकतंत्र की असली कसौटी यह है कि क्या वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को भी समान अवसर देता है।

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 की बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उच्च शिक्षा अब केवल अकादमिक नीति का विषय नहीं रही; यह सामाजिक संरचना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक मूल्यों का भी प्रश्न बन चुकी है।

7. निष्कर्ष : संघर्ष, संवाद और लोकतांत्रिक मर्यादा

इस पूरे घटनाक्रम से तीन प्रमुख निष्कर्ष निकलते हैं—

  1. समानता का प्रश्न जीवंत है – उच्च शिक्षा में भेदभाव-निरोधक तंत्र को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
  2. राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है – किंतु उसका समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए।
  3. नेतृत्व की परीक्षा संघर्ष में होती है – चाहे वह सत्तापक्ष हो या विपक्ष, जनप्रतिनिधियों को मर्यादा और जिम्मेदारी दोनों निभानी पड़ती हैं।

डॉ. पल्लवी पटेल का यह रुख उनके समर्थकों के लिए साहस और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वहीं, विरोधियों के लिए यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। किंतु निर्विवाद तथ्य यह है कि UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 ने सामाजिक न्याय, महिला नेतृत्व और लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक व्यापक बहस को जन्म दिया है।

अंततः, किसी भी लोकतंत्र की शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह विरोध और समर्थन—दोनों को स्थान दे, और अंतिम निर्णय जनता तथा संवैधानिक संस्थाओं की सामूहिक बुद्धि से निकले।

जय संविधान। जय लोकतंत्र।

लिंक पर पढ़ें:- https://golendragyan.blogspot.com/2026/02/we-support-ugc-act-2026-ugc-golendra.html


मंडल कमीशन से लेकर UGC बिल 2026 तक की राजनीतिक चुप्पियों का सामाजिक विश्लेषण : गोलेन्द्र पटेल 

लिंक: https://golendragyan.blogspot.com/2026/01/ugc-2026.html


लिंक: https://golendragyan.blogspot.com/2026/01/nfs-not-found-suitable.html

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मंडल। जय जवान। जय किसान। जय विज्ञान। जय संविधान। जय मानवतावाद।

उच्च शिक्षा, सामाजिक न्याय और बहुजन दृष्टि : UGC विमर्श का व्यापक परिप्रेक्ष्य

भारतीय लोकतंत्र का मूलाधार संविधान है, जिसने समानता, गरिमा और अवसर की समान उपलब्धता को राष्ट्र-निर्माण का केंद्रीय सिद्धांत माना। फिर भी, सामाजिक संरचना में निहित जातिगत असमानताएँ उच्च शिक्षा संस्थानों तक गहराई से व्याप्त रही हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा संसदीय समिति और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में पिछले पाँच वर्षों में लगभग 118 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जहाँ 2019–20 में ऐसी शिकायतों की संख्या 173 थी, वहीं 2023–24 में यह बढ़कर 378 तक पहुँच गई। यह केवल सांख्यिकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में व्याप्त सामाजिक विषमता का संकेत है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : मंडल से समता-विनियम तक
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 340 सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों का आधार प्रदान करते हैं। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के समय जो तीव्र सामाजिक-राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई थी, वह इस तथ्य को उजागर करती है कि प्रतिनिधित्व और संसाधनों में भागीदारी का प्रश्न सत्ता-संतुलन से जुड़ा हुआ है।
आज जब UGC द्वारा भेदभाव-रोधी और समता-संवर्धन संबंधी प्रावधानों पर चर्चा हो रही है, तो बहस का स्वर एक बार फिर उसी ऐतिहासिक प्रतिरोध की याद दिलाता है। प्रश्न यह नहीं कि सुधार की आवश्यकता है या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज वास्तव में समानता को व्यवहार में स्वीकार करने के लिए तैयार है।

भेदभाव के प्रकरण और संस्थागत प्रश्न
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव की घटनाएँ समय-समय पर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनी हैं। 2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या और 2019 में मेडिकल छात्रा पायल तडवी की मृत्यु ने संस्थागत वातावरण पर गंभीर प्रश्न उठाए। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं; गरिमापूर्ण और सुरक्षित शैक्षिक वातावरण भी उतना ही आवश्यक है।
इसी संदर्भ में यदि UGC समान अवसर, त्वरित शिकायत-निवारण और पारदर्शी तंत्र की बात करता है, तो उसे सामाजिक न्याय की संवैधानिक प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए।

दुरुपयोग की आशंका बनाम न्याय का प्रश्न
किसी भी कानून के संदर्भ में दुरुपयोग की आशंका स्वाभाविक है। किंतु दुरुपयोग की संभावना सुधार के प्रयास को ही निरस्त करने का आधार नहीं बन सकती। भारतीय न्याय-व्यवस्था में अपील, समीक्षा और लोकपाल जैसे प्रावधान उपलब्ध हैं। अतः समाधान कानून को रोकना नहीं, बल्कि उसे अधिक जवाबदेह और प्रतिनिधिक बनाना है।
बहुजन दृष्टि यह आग्रह करती है कि शिकायत-निवारण समितियों में भुक्तभोगी समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो, चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और निगरानी स्वतंत्र हो। तभी विश्वास और न्याय का संतुलन बन सकेगा।

सामाजिक-राजनीतिक विमर्श और प्रतिनिधित्व
शिक्षा और आरक्षण के प्रश्न पर भारतीय राजनीति का इतिहास जटिल रहा है। मंडल बनाम कमंडल की बहस ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक न्याय के मुद्दे अक्सर सांस्कृतिक या धार्मिक विमर्श से ढँक दिए जाते हैं। आज भी जब उच्च शिक्षा में समानता की बात उठती है, तो उसे कभी “योग्यता” के संकट के रूप में, कभी “सामाजिक विभाजन” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यहाँ यह स्मरणीय है कि 103वाँ संविधान संशोधन (EWS आरक्षण) भी संसाधनों के पुनर्वितरण का एक उदाहरण है। यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण को स्वीकार किया जा सकता है, तो सामाजिक आधार पर भेदभाव-रोधी प्रावधानों का विरोध क्यों? यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक भी है।

नेतृत्व और लोकतांत्रिक असहमति
हाल के घटनाक्रमों में कुछ जनप्रतिनिधियों ने उच्च शिक्षा में समानता के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई है। 10 फरवरी 2026 को लखनऊ में UGC से संबंधित मुद्दों पर प्रदर्शन के दौरान विधायक डॉ. पल्लवी पटेल की हिरासत और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सांसद चंद्रशेखर के नेतृत्व में हुए धरने ने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर सामने ला दिया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार है; असहमति को अपराध की तरह देखना लोकतांत्रिक संस्कृति के अनुकूल नहीं।
यह घटनाएँ यह भी दर्शाती हैं कि सामाजिक प्रतिनिधित्व केवल चुनावी सफलता तक सीमित नहीं, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी से परिभाषित होता है।

बहुजन चेतना और भविष्य की दिशा
इतिहास साक्षी है कि जब-जब वंचित समुदायों ने संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग की है, तब-तब नीतियों में परिवर्तन संभव हुआ है। मंडल आंदोलन इसका प्रमाण है। आज उच्च शिक्षा में समता के प्रश्न पर भी व्यापक सामाजिक संवाद की आवश्यकता है।
बहुजन दृष्टि का मूल आग्रह यह है कि—
समानता केवल संवैधानिक प्रावधान न रहे, बल्कि संस्थागत व्यवहार में उतरे।
शिक्षा-संस्थानों में गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित हो।
प्रतिनिधित्व और जवाबदेही साथ-साथ चलें।

निष्कर्षतः UGC से जुड़ा वर्तमान विमर्श केवल एक प्रशासनिक सुधार का प्रश्न नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा—समानता, न्याय और बंधुत्व—की परीक्षा है। यदि उच्च शिक्षा सचमुच राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती है, तो उसे सामाजिक न्याय के मूल्यों से पृथक नहीं किया जा सकता। बहुजन चेतना का संदेश स्पष्ट है: शिक्षा सबकी है, सम्मान सबका है, और संविधान के दायरे में समानता की लड़ाई निरंतर चलती रहेगी।
विश्वविद्यालयों में बढ़ती जाति-आधारित शिकायतें यह बताती हैं कि समानता अभी भी अधूरी है। पिछले पाँच वर्षों में भेदभाव के मामलों में 118% से अधिक वृद्धि चिंताजनक है। ऐसे समय में UGC के समता-संवर्धन नियम शिक्षा संस्थानों को जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की दिशा में अहम कदम हैं।
मंडल आयोग की तरह आज भी बदलाव से कुछ लोगों को असहजता है, क्योंकि बराबरी विशेषाधिकार को चुनौती देती है। लेकिन शिक्षा का उद्देश्य अवसरों का लोकतंत्रीकरण है, न कि भेदभाव का संरक्षण।
हम संविधान की भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के साथ खड़े हैं। हर छात्र को गरिमा, सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है। UGC के प्रावधान इसी दिशा में प्रयास हैं।
आइए, नफरत नहीं, न्याय का साथ दें।
समानता सिर्फ नारा नहीं—व्यवहार बने।
हम UGC के समर्थन में हैं।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
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Tuesday, 10 February 2026

सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना — गोलेन्द्र पटेल

 सत्ता, संख्या और सामाजिक भ्रम : बहुजन दृष्टि से एक विवेचना

भारतीय समाज की संरचना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी हुई है। यहाँ शब्द भी तटस्थ नहीं होते—वे सत्ता के औज़ार होते हैं। ऐसा ही एक शब्द है “सवर्ण”, जिसे सामान्यतः सम्मानसूचक माना जाता है, लेकिन वस्तुतः यह एक रणनीतिक अवधारणा के रूप में विकसित हुआ है। यह शब्द केवल पहचान नहीं देता, बल्कि सामाजिक शक्ति-संतुलन को नियंत्रित करने का माध्यम भी बनता है।
परंपरागत वर्ण-व्यवस्था में चार वर्गों की चर्चा होती है, किंतु व्यवहार में “सवर्ण” शब्द के प्रयोग से श्रम-आधारित समुदायों को स्वतः बाहर कर दिया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह शब्द समावेशन के लिए नहीं, बल्कि चयनात्मक एकजुटता के लिए गढ़ा गया। जिन समुदायों के पास युद्ध-कौशल था, उन्हें शासक वर्ग में स्थान मिला; जिनके पास व्यापारिक दक्षता थी, वे आर्थिक मध्यस्थ बने; और शेष समाज श्रम-इकाई में बदल दिया गया। जो इस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए, वे सामाजिक सीढ़ी से और नीचे धकेल दिए गए।
यह पूरी संरचना किसी दैवी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सुनियोजित सामाजिक गणित का नतीजा है। एक सीमित जनसंख्या वाला वर्ग यह भली-भाँति समझता रहा है कि केवल संख्या के बल पर वह शासन नहीं कर सकता। इसलिए उसने पहले समान हित वाले वर्गों को प्रतीकात्मक एकता में जोड़ा, फिर उससे भी बड़े सामाजिक समूहों को धार्मिक पहचान के नाम पर अपने साथ खड़ा किया। इस प्रकार सामाजिक बहुलता को राजनीतिक बहुमत में बदला गया।
लेकिन जैसे-जैसे इतिहास के दबे हुए पन्ने खुलने लगे और वंचित समुदायों में चेतना का विस्तार हुआ, सत्ता-संरचना ने नए उपकरणों का सहारा लिया। अब मतदाता की भूमिका सीमित कर दी गई है और नीतियाँ ऐसे ढंग से बनाई जा रही हैं कि लाभ हमेशा ऊपर की ओर प्रवाहित हो। एक ओर आरक्षण और प्रतिनिधित्व का विरोध किया जाता है, दूसरी ओर विशेषाधिकारों को “योग्यता” के नाम पर सुरक्षित रखा जाता है।
योग्यता की यह परिभाषा भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। यदि बुद्धि और कार्यकुशलता के साथ नैतिकता का अभाव हो, तो वही योग्यता समाज के लिए सबसे अधिक घातक सिद्ध होती है। ऐसी दक्षता, जो ईमानदारी से शून्य हो, वह विकास नहीं, बल्कि शोषण को जन्म देती है।
वंचित और श्रमशील समाज की सबसे बड़ी समस्या उसकी आंतरिक विखंडन है। हज़ारों जातियों, उपजातियों और पहचानों में बँटा यह समाज अक्सर अपने वास्तविक शोषकों को पहचानने के बजाय आपस में ही उलझा रहता है। राजनीतिक दल और संगठन इस विखंडन को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं, क्योंकि विभाजित समाज को नियंत्रित करना आसान होता है।
इस परिस्थिति से निकलने का एकमात्र रास्ता व्यापक सामाजिक एकजुटता है—ऐसी एकजुटता जो किसी लिखित समझौते पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, साझी पीड़ा और साझा भविष्य की समझ पर आधारित हो। जब समाज स्वयं भ्रामक नेतृत्व और विभाजनकारी राजनीति का बहिष्कार करेगा, तभी एक नया सामाजिक संतुलन संभव हो सकेगा।
यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जनसंख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद वंचित वर्ग सत्ता, संपत्ति और निर्णय-प्रणालियों में अल्पसंख्यक बना हुआ है। यदि देश का एक बड़ा हिस्सा किसी सामाजिक वर्ग से आता है, तो शासन, न्याय, प्रशासन और अर्थव्यवस्था में उसकी समान भागीदारी क्यों नहीं दिखती? इसका उत्तर केवल तभी बदलेगा, जब यह वर्ग अपनी संख्या को राजनीतिक शक्ति में बदलने के लिए संगठित संघर्ष करेगा।
इतिहास साक्षी है कि सामाजिक न्याय की प्रत्येक पहल का विरोध उन्हीं शक्तियों ने किया है, जिन्हें परिवर्तन से अपने विशेषाधिकारों के छिनने का भय था। इसलिए आज सबसे ज़रूरी है—स्पष्ट पहचान। यह समझ कि मित्र कौन है और बाधक कौन। यही पहचान आगे की दिशा तय करेगी।
समाज को अब भ्रम से बाहर आना होगा। गाँव-गाँव, घर-घर संवाद की आवश्यकता है। जब बहुजन समाज अपने सामूहिक अस्तित्व और शक्ति को पहचान लेगा, तभी लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में जनतांत्रिक बन सकेगा।


सवर्ण की परछाईं में

यह जो एक शब्द है
“सवर्ण”
यह शब्द नहीं
एक ढाल है
ढाल
जिसके पीछे
तीन प्रतिशत की देह
पंद्रह प्रतिशत का भ्रम ओढ़ लेती है
और भ्रम
सत्ता में बदल जाता है।
वर्ण चार थे
पर नाम तीन के लिए गढ़ा गया
श्रम बाहर कर दिया गया
पसीने को
शब्दकोश से बेदख़ल कर दिया गया
जो लड़े—वे क्षत्रिय कहलाए
जो सौदे समझे—वे वैश्य बने
जो दोनों से वंचित रहे
वे शूद्र लिख दिए गए
और जो इस लिखावट से इनकार कर बैठे
उन्हें इतिहास के हाशिए पर
अतिशूद्र करार दे दिया गया।
यह कोई भूल नहीं थी
यह गणित था
तीन दशमलव पाँच
अपने बल पर
राज नहीं कर सकता
यह सच
उन्हें सबसे पहले पता था
इसलिए
संख्या को शब्दों से बढ़ाया गया
और शब्दों को
धर्म का लिबास पहनाया गया
फिर कहा गया
हम सब एक हैं
और “एक” के नाम पर
बहुजन की पीठ पर
सीढ़ी रख दी गई।
जब इतिहास बोलने लगा
जब ओबीसी सवाल करने लगे
जब स्मृति लौटने लगी
तो मशीनें आ गईं
अब उँगलियों की ज़रूरत नहीं
अब केवल
बटन काफ़ी है
अब
क्षत्रिय आतंकवादी है
वैश्य बेरोज़गार है
ओबीसी कानून का बोझ है
और
ईमानदारी
सबसे बड़ी अयोग्यता।
वे कहते हैं
मेरिट चाहिए
हाँ,
बुद्धि है
क्षमता है
पर
सच नहीं है
और जिस बुद्धि में
ईमानदारी नहीं होती
वह देश का नहीं
देश के ख़िलाफ़ काम करती है।
हज़ारों साल की लूट
किसी डकैती से नहीं हुई
वह एक ग्रंथ से हुई
जिसे संविधान कहा गया
पर
वह मनुष्यता का नहीं था
हम पढ़ते रहे
लड़ते रहे
आपस में
छह हज़ार से ज़्यादा टुकड़ों में
बँटे रहे
और साँप
हमारी ही आस्तीन में पलते रहे।
अब वक़्त है
काग़ज़ नहीं
कसम की
फीस नहीं
फिर से जुड़ने की
एक आवाज़
हर घर से
“मूलनिवासी नारा है,
भारत देश हमारा है।”
जो बाँटे
उन्हें बहिष्कार
जो भ्रम फैलाएँ
उनसे सावधान
क्योंकि
जब बहुजन
ख़ुद को पहचान लेता है
तो
सिस्टम अपने आप
हिलने लगता है।
आज
हर दूसरा नागरिक
ओबीसी है
पर सत्ता में
हर दूसरा क्यों नहीं?
यह सवाल
सड़क माँगता है
गिनती माँगता है
हिस्सेदारी माँगता है
इतिहास गवाह है
आरक्षण का विरोध
हमेशा ऊपर से आया
मूर्तियाँ
हमेशा ऊपर से टूटीं
और परिवर्तन
हमेशा नीचे से उगा
इसलिए
दोस्त और दुश्मन
पहचानो
जो तुम्हारे हक़ का विरोध करे
उसकी विशेषाधिकार की चुप्पी तोड़ो।
गाँव-गाँव जाओ
सच बाँटो
डरो मत
अब तुम अकेले नहीं हो
पीछे
पूरा समाज खड़ा है
और याद रखो
संख्या से नहीं
चेतना से क्रांति होती है।

★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत || गोलेन्द्र पटेल

  क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत ❝जो व्यक्ति राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के संघर...