Sunday, 14 June 2026

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं
बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा 
कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास 
हमें खड़ा होने की जगह मिली
तब हम उतना ही ख़ुश हुए 
जितना हिंदी का कोई रचनाकार ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने पर प्रसन्न होता है 

रेलवे स्टेशन पर जो भीड़ दिखाई देती है
वह यात्रियों की भीड़ नहीं है
वे लोग घर लौटते मजदूर भी नहीं
न ही किसी मेले या तीर्थ की ओर जाते श्रद्धालु हैं
वे हाथों में प्रवेश-पत्र लिए
देश के वे युवा हैं
जो अपने भविष्य की तलाश में
एक शहर से दूसरे शहर धकेले जा रहे हैं।

उनकी पीठ पर टंगा बैग
सिर्फ कपड़ों का बोझ नहीं है
उसमें वर्षों की तैयारी
माता-पिता की उम्मीदें
उधार लेकर भरी गई फीस
और एक नौकरी का सपना रखा हुआ है
कहा जाता है
देश तरक्की कर रहा है
अवसर बढ़ रहे हैं
रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं
लेकिन फिर
कुछ हजार पदों के लिए
लाखों आवेदन क्यों आते हैं?
क्यों हर भर्ती परीक्षा
एक जनसैलाब में बदल जाती है?
क्यों ट्रेनों के दरवाज़ों से लटकते हुए
युवा दिखाई देते हैं?
क्यों खिड़कियों से घुसकर
उन्हें अपने सपनों तक पहुँचना पड़ता है?

एक लड़का
सासाराम से किशनगंज भेज दिया जाता है
एक लड़की
अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर
परीक्षा देने निकल पड़ती है
किसी की जेब में
बस किराए भर पैसे हैं
किसी ने
रास्ते के लिए घर से लाई रोटियाँ रखी हैं
किसी ने
दोस्तों के साथ मिलकर
एक समोसा चार हिस्सों में बाँट लिया है
और सरकार इसे
एक सामान्य परीक्षा कहती है
यह परीक्षा नहीं
यह सहनशक्ति का महोत्सव है
यहाँ ज्ञान से पहले
भूख की परीक्षा होती है
धैर्य की परीक्षा होती है
भीड़ में कुचलने से बचने की परीक्षा होती है
समय पर पहुँचने की परीक्षा होती है
और फिर कहीं जाकर
प्रश्नपत्र सामने आता है।

देश का बेरोज़गार युवा
अब केवल नौकरी नहीं खोज रहा
वह सम्मान खोज रहा है
अपने श्रम का मूल्य खोज रहा है
अपने जीवन का अर्थ खोज रहा है
वह पूछ रहा है
यदि मेरे लिए अवसर हैं
तो मैं लाखों की भीड़ में क्यों खड़ा हूँ?
यदि व्यवस्था मेरे साथ है
तो मुझे अपने ही देश में
एक परीक्षा देने के लिए
सैकड़ों किलोमीटर क्यों भटकना पड़ता है?
रेलवे स्टेशनों पर बैठा हुआ हर युवक
एक आँकड़ा नहीं है।

वह किसी किसान का बेटा है
किसी मज़दूर की बेटी है
किसी माँ की अधूरी नींद है
किसी पिता की अंतिम उम्मीद है
लेकिन व्यवस्था
उन्हें अक्सर संख्या की तरह देखती है
फॉर्मों की संख्या
रोल नंबरों की संख्या
कटऑफ की संख्या
और इसी बीच
उनकी उम्र बीतती रहती है
भर्तियाँ टलती रहती हैं
परीक्षाएँ रद्द होती रहती हैं
पेपर लीक होते रहते हैं
परिणाम अटकते रहते हैं
और सपनों की उम्र
धीरे-धीरे कम होती जाती है
फिर भी वे हार नहीं मानते
वे अगली भर्ती का इंतज़ार करते हैं
अगली ट्रेन पकड़ते हैं
अगला फॉर्म भरते हैं
अगला सपना देखते हैं।

शायद यही इस देश के युवाओं की सबसे बड़ी ताकत है
कि व्यवस्था बार-बार उन्हें निराश करती है
फिर भी वे उम्मीद करना नहीं छोड़ते
लेकिन किसी राष्ट्र की सभ्यता
इस बात से नहीं मापी जाती
कि उसके नेता कितने बड़े भाषण देते हैं
वह इस बात से मापी जाती है
कि उसके युवाओं को
अपने भविष्य तक पहुँचने के लिए
कितनी पीड़ा से गुजरना पड़ता है
आज भारत के रेलवे स्टेशन
एक मौन प्रश्न की तरह खड़े हैं
वे पूछ रहे हैं
क्या यह वही देश है
जिसका सपना इन युवाओं ने देखा था?
या यह
बेरोज़गारों का एक विशाल प्रतीक्षालय है
जहाँ करोड़ों सपने
अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं?

★★★
रचयिता: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com






कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता









Wednesday, 3 June 2026

अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व — गोलेन्द्र पटेल

जीवनकाल: 1953 से 2007
संघर्षकाल: 1978 से 2007


अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व

भारतीय समाज का इतिहास केवल राजसत्ताओं, युद्धों और शासकों का इतिहास नहीं है; वह उन असंख्य व्यक्तित्वों की स्मृतियों से भी निर्मित होता है जिन्होंने अपने समय की अन्यायपूर्ण संरचनाओं से टकराने का साहस किया। ऐसे व्यक्तित्व प्रायः इतिहास और लोककथा के मध्य खड़े दिखाई देते हैं, एक ओर वे कानून की दृष्टि में अपराधी घोषित किए जाते हैं, तो दूसरी ओर जनमानस उन्हें अपने दुखों, अपमानों और प्रतिरोध की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक बना लेता है। बुंदेलखंड की धरती पर उभरा ददुआ का व्यक्तित्व इसी द्वंद्व का एक ज्वलंत उदाहरण है। ददुआ (शिवकुमार पटेल) केवल एक नाम नहीं है; वह बुंदेलखंड के बीहड़ों में जन्मी उस बेचैन चेतना का नाम है जिसने सत्ता, सामंतवाद, भय और सामाजिक वर्चस्व के सामने घुटने टेकने से इनकार किया। उनकी जीवन-कथा के चारों ओर अनेक किंवदंतियाँ, जनश्रुतियाँ और विवाद जुड़े हुए हैं। कुछ लोग उन्हें हिंसा और आतंक का पर्याय मानते हैं, तो कुछ उन्हें उस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने सदियों से वंचित और कमजोर वर्गों को हाशिये पर धकेल रखा था। इसीलिए ददुआ का मूल्यांकन केवल न्यायालय की भाषा में नहीं किया जा सकता; उसे लोकस्मृति, सामाजिक मनोविज्ञान और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझना आवश्यक है। बुंदेलखंड की कठोर भौगोलिक परिस्थितियाँ, वहाँ की आर्थिक विषमताएँ, जातिगत तनाव और प्रशासनिक उपेक्षा लंबे समय से सामाजिक असंतोष को जन्म देती रही हैं। जब किसी समाज में न्याय की संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं और आम मनुष्य स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है, तब वह ऐसे प्रतीकों की तलाश करता है जो उसके आत्मसम्मान और प्रतिरोध की आवाज़ बन सकें। बुंदेलखंड के वीरप्पन ददुआ का उदय इसी सामाजिक पृष्ठभूमि में हुआ। लोकविश्वासों में यह धारणा बार-बार व्यक्त होती है कि व्यक्तिगत अपमान और पारिवारिक त्रासदी ने उनके भीतर विद्रोह का बीज बोया। धीरे-धीरे वह बीज एक ऐसे वृक्ष में परिवर्तित हुआ जिसकी छाया में समर्थकों ने प्रतिरोध का स्वप्न देखा और विरोधियों ने भय का अनुभव किया।

ददुआ की छवि का सबसे रोचक पक्ष यह है कि वह एकरेखीय नहीं है। वह जितना विवादास्पद है, उतना ही बहुआयामी भी है। उनके समर्थक उन्हें गरीबों का सहायक, वंचितों का संरक्षक और स्थानीय समाज की समस्याओं में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति बताते हैं। अनेक लोककथाएँ उन्हें ऐसे पात्र के रूप में चित्रित करती हैं जो सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण के विरुद्ध खड़ा था। दूसरी ओर, उनके जीवन से जुड़े गंभीर आपराधिक आरोप यह भी स्मरण कराते हैं कि प्रतिरोध और हिंसा के बीच की रेखा अत्यंत जटिल होती है। यही द्वंद्व ददुआ को एक साधारण व्यक्ति से किंवदंती में बदल देता है। लोकजीवन की स्मृति में ददुआ उस प्रश्न की तरह उपस्थित हैं जिसका उत्तर आज भी निश्चित नहीं है। क्या वे केवल एक अपराधी थे या उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया थे जिसने लाखों लोगों को अपमान और अभाव का जीवन दिया? क्या वे व्यवस्था-विरोधी विद्रोह के प्रतीक थे या फिर उस अराजकता के प्रतिनिधि जो न्याय के अभाव में जन्म लेती है? इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्ति की वैचारिक दृष्टि के अनुसार बदल जाता है। यही कारण है कि उनके नाम पर आज भी तीखी बहसें होती हैं और उनके बारे में धारणाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न दिखाई देती हैं।

ददुआ और फूलन देवी जैसे व्यक्तित्वों की लोकप्रियता भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गहरे प्रश्न को भी उजागर करती है। जब समाज के किसी वर्ग को लगता है कि उसकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है, तब वह अपने नायकों का निर्माण स्वयं करता है। ये नायक हमेशा आदर्श नहीं होते, पर वे उस मौन आक्रोश की अभिव्यक्ति अवश्य बन जाते हैं जिसे मुख्यधारा का इतिहास अक्सर अनदेखा कर देता है। इसी कारण ऐसे चरित्र केवल व्यक्ति नहीं रह जाते; वे सामाजिक असंतोष, आत्मसम्मान और संघर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बन जाते हैं। फिर भी यह समझना आवश्यक है कि विद्रोह और क्रांति में मौलिक अंतर होता है। विद्रोह तत्काल अन्याय के विरुद्ध उठी हुई प्रतिक्रिया हो सकता है, जबकि क्रांति एक व्यापक सामाजिक दर्शन, मानवीय दृष्टि और रचनात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया है। विद्रोह व्यवस्था को चुनौती देता है, किंतु क्रांति नई व्यवस्था की कल्पना भी प्रस्तुत करती है। इसलिए किसी भी बागी चरित्र के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी उसके ऐतिहासिक मूल्यांकन में विवेक और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। ददुआ का व्यक्तित्व इसी जटिलता का प्रतीक है। वे इतिहास के पन्नों में जितने विवादित हैं, लोकस्मृति में उतने ही जीवित। वे उस सामाजिक यथार्थ की उपज थे जहाँ अन्याय, असमानता और शक्ति-संघर्ष लगातार टकराते रहे। उनकी कथा हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि समाज में न्याय की स्थापना केवल कानून से नहीं होती; उसके लिए विश्वास, सम्मान और समान अवसरों की भी आवश्यकता होती है। जब ये तत्व अनुपस्थित हो जाते हैं, तब इतिहास के किनारों से ऐसे पात्र जन्म लेते हैं जो व्यवस्था के लिए चुनौती और जनता के लिए किंवदंती बन जाते हैं। इस अर्थ में शोषितों के मसीहा ददुआ का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। वह भारतीय ग्रामीण समाज के भीतर छिपे हुए उन अंतर्विरोधों का आख्यान है, जिनमें सत्ता और प्रतिरोध, भय और सम्मान, अपराध और लोकनायकत्व, व्यवस्था और विद्रोह निरंतर एक-दूसरे से संवाद करते रहते हैं। शायद इसी कारण ददुआ आज भी केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक प्रश्न हैं और कुछ प्रश्न इतिहास से अधिक समय तक जीवित रहते हैं।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता


कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में यदि किसी समाज ने सबसे अधिक श्रम किया, सबसे अधिक उत्पादन किया, सबसे अधिक संगठन खड़े किए, सबसे अधिक संघर्ष किए और फिर भी अपनी वास्तविक शक्ति के अनुरूप स्थान प्राप्त नहीं किया, तो उनमें कुर्मी समाज प्रमुख है।

यह लेख किसी दल के पक्ष या विपक्ष का लेख नहीं है। यह कुर्मी समाज के आत्ममंथन का लेख है। यह प्रशंसा का नहीं, चेतना का लेख है। यह ताली बजाने का नहीं, आईना दिखाने का लेख है।

आज कुर्मी समाज को सबसे पहले अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए—

क्या हम सचमुच उतने शक्तिशाली हैं, जितना हम स्वयं को समझते हैं?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो फिर हमारी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति हमारी जनसंख्या और योगदान के अनुपात में क्यों नहीं है?

नेताओं की लंबी सूची, लेकिन समाज की छोटी उपलब्धियाँ

कुर्मी समाज के पास नेताओं की कमी कभी नहीं रही।

बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेता हुए, जिन्होंने वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन किया।

गुजरात में केशुभाई पटेल, आनंदीबेन पटेल, भूपेंद्र पटेल जैसे मुख्यमंत्री हुए।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने।

उत्तर प्रदेश में बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. सोनेलाल पटेल, अनुप्रिया पटेल, पल्लवी पटेल, जंग बहादुर पटेल, राम लखन वर्मा, बरखू राम वर्मा, राम पूजन पटेल, लालजी वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, केसरी देवी पटेल, आर. के. पटेल, नंदलाल पटेल, रामसेवक पटेल, हीरामणि पटेल, रामदेव पटेल, सुखदेव वर्मा, दीपक पटेल, राजेंद्र प्रसाद चौधरी, अरविंद चौधरी, संग्राम सिंह वर्मा, संतोष गंगवार, पंकज चौधरी जैसे अनेक नाम राजनीति में दिखाई देते हैं। इनमें कुछ स्मृति शेष चुके हैं।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कुर्मी विधायकों में प्रमुख नामों में शामिल हैं राजेंद्र चौधरी, कविंद्र चौधरी, पटेल दयाराम चौधरी, गंगवार, सत सिंह, संत सिंह, वीरेंद्र चौधरी, राजेंद्र वर्मा, रुधौली, फरेंदा, कप्तानगंज, मुंगरा, बादशाहपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, महाराजगंज, जौनपुर, पीलीभीत सदर, भोगनीपुर, मिनगा, गौरा, उतराला, अविनाश चंद्र द्विवेदी, आरके पटेल, संजय गंगवार, शैलेंद्र सिंह गंगवार, सकेंद्र प्रताप, राकेश कुमार वर्मा, पल्लवी पटेल, पूजा सरोज, रागिनी सोनकर, लालजी वर्मा, स्वतंत्र देव सिंह, ओम प्रकाश सिंह, पंकज चौधरी, संतोष गंगवार जैसे नेताओं से जुड़े क्षेत्रों के विधायक तथा अन्य कई कुर्मी/पटेल/चौधरी/वर्मा/गंगवार उपनाम वाले विधायक जो कुल संख्या को 40-43 तक ले जाते हैं और वर्तमान में यूपी से कुर्मी समुदाय के सांसदों में समाजवादी पार्टी से रामप्रसाद चौधरी (बस्ती), उत्कर्ष वर्मा (लखीमपुर खीरी), नरेश चंद्र उत्तम पटेल (फतेहपुर), लालजी वर्मा (अंबेडकर नगर), राम शिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती), शिवपाल सिंह पटेल (प्रतापगढ़), कृष्णा देवी पटेल (बांदा); भाजपा से पंकज चौधरी (महाराजगंज) और अन्य कुर्मी/पटेल चेहरे जैसे कुछ क्षेत्रीय नाम; तथा अपना दल (सोनेलाल) से अनुप्रिया पटेल (मिर्जापुर) शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 11 के आसपास कुर्मी सांसदों की संख्या को पूरा करते हैं।

मध्य प्रदेश में भीम सिंह पटेल, बुद्धसेन पटेल, विद्यावती पटेल जैसे नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई।

संगठनात्मक क्षेत्र में इंजीनियर बलिहारी पटेल, चौधरी विकास पटेल, डॉ. आर.एस. पटेल जैसे नाम भी संघर्ष की पहचान बने।

लेकिन एक प्रश्न आज भी खड़ा है, इतने नेताओं के बावजूद समाज कहाँ है?

क्या केवल नेताओं का बड़ा होना ही समाज का बड़ा होना है?

यदि ऐसा होता तो आज कुर्मी समाज देश का सबसे संगठित, सबसे प्रभावशाली और सबसे निर्णायक समाज होता।

सच्चाई यह है कि नेताओं की सफलता और समाज की सफलता दो अलग-अलग बातें हैं।

सबसे बड़ी बीमारी, व्यक्ति पूजा

कुर्मी समाज की सबसे बड़ी समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक है।

हम व्यक्ति को समाज से बड़ा बना देते हैं।

कोई नेता मंत्री बन गया, तो हम उसे अपनी उपलब्धि मान लेते हैं।

कोई सांसद बन गया, तो हम खुश हो जाते हैं।

कोई मुख्यमंत्री बन गया, तो हम समझ लेते हैं कि समाज का उद्धार हो गया।

लेकिन क्या कभी हमने यह हिसाब लगाया कि इन सबके बावजूद समाज की सामूहिक ताकत कितनी बढ़ी?

कितने विश्वविद्यालय बने?

कितने बड़े विद्यालय बने?

कितने शोध संस्थान बने?

कितने राष्ट्रीय समाचार पत्र बने?

कितने बड़े उद्योगपति पैदा हुए?

कितने राष्ट्रीय विचारक तैयार हुए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर कमजोर है, तो हमें अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

वोट हमारा, एजेंडा किसी और का

यह कटु सत्य है कि कुर्मी समाज ने अनेक दलों को ताकत दी।

कभी समाजवादी राजनीति को।

कभी बहुजन राजनीति को।

कभी कांग्रेस को।

कभी भाजपा को।

लेकिन हर दल में कुर्मी समाज ने दूसरों के एजेंडे को आगे बढ़ाया, अपना स्वतंत्र सामाजिक एजेंडा बहुत कम बनाया।

आज भी अधिकांश लोग किसी दल की पहचान से स्वयं को परिभाषित करते हैं, समाज की पहचान से नहीं।

यही कारण है कि चुनाव समाप्त होते ही समाज फिर वही पुराना प्रश्न पूछता है, "हमें क्या मिला?"

केवल जातीय गौरव नहीं, सामाजिक क्रांति चाहिए

कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि केवल जातीय गौरव के नारे समाज को आगे नहीं बढ़ाते।

यदि केवल गौरव से समाज आगे बढ़ते, तो इतिहास में कोई भी समुदाय पिछड़ा नहीं रहता।

समाज को आगे बढ़ाती है—

शिक्षा।

संगठन।

आर्थिक शक्ति।

वैचारिक स्पष्टता।

अनुशासन।

दीर्घकालिक रणनीति।

और इन क्षेत्रों में अभी बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. सोनेलाल पटेल का अधूरा प्रश्न

जब डॉ. सोनेलाल पटेल ने पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया था, तब वह केवल चुनावी टिकट का प्रश्न नहीं था।

वह सम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक शक्ति का प्रश्न था।

आज भी वह प्रश्न जीवित है।

लेकिन दुखद यह है कि समाज उस प्रश्न को आंदोलन में बदलने के बजाय अक्सर व्यक्तियों और दलों की बहस में उलझ जाता है।

यदुनाथ सिंह पटेल की विरासत

स्मृति शेष बाबू यदुनाथ सिंह पटेल जैसे नेताओं की चर्चा केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वे विधायक थे।

उनकी चर्चा इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने स्वाभिमान की राजनीति का संदेश दिया।

जिस समाज में स्वाभिमान मर जाता है, वहाँ संख्या भी बेकार हो जाती है और जिस समाज में स्वाभिमान जीवित रहता है, वहाँ छोटी संख्या भी इतिहास बदल देती है।

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है।

सबसे बड़ा संकट है, सामूहिक दृष्टि का अभाव। हर क्षेत्र में व्यक्ति हैं, लेकिन सामूहिक परियोजना नहीं है। हर जिले में नेता हैं, लेकिन राष्ट्रीय दृष्टि नहीं है। हर चुनाव में सक्रियता है, लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक कार्यक्रम नहीं है।

अब क्या करना होगा?

कुर्मी समाज को अगले 25 वर्षों का कार्यक्रम बनाना होगा। सैकड़ों छात्रावास बनाने होंगे। हजारों मेधावी छात्रों को सहायता देनी होगी। पुस्तकालय स्थापित करने होंगे। शोध संस्थान बनाने होंगे। सामाजिक इतिहास लिखना होगा। अपने महापुरुषों पर शोध कराना होगा।

युवाओं को प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता की ओर ले जाना होगा।

राजनीति को अंतिम लक्ष्य नहीं, साधन मानना होगा।

अंतिम चेतावनी

इतिहास किसी समाज को बार-बार अवसर नहीं देता। जो समाज समय रहते नहीं जागते, वे दूसरों की राजनीति का स्थायी ईंधन बन जाते हैं।

आज कुर्मी समाज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है नारों का, भावनाओं का, चुनावी उत्साह का।

दूसरा रास्ता है शिक्षा, संगठन, विचार और स्वाभिमान का।

पहला रास्ता भीड़ बनाता है।

दूसरा रास्ता इतिहास बनाता है।

निर्णय कुर्मी समाज को करना है।

क्या वह केवल वोट बैंक बना रहेगा?

क्या वह केवल दूसरों की रैलियाँ भरता रहेगा?

क्या वह केवल नेताओं की जय-जयकार करता रहेगा?

या फिर वह ज्ञान, संगठन, संघर्ष और आत्मसम्मान के आधार पर नई सामाजिक क्रांति का निर्माण करेगा?

याद रखो,

जिस दिन कुर्मी समाज ने अपनी संख्या को संगठन में, संगठन को विचार में और विचार को सामाजिक शक्ति में बदल दिया, उस दिन भारतीय राजनीति का नक्शा बदल जाएगा और उस दिन इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कुर्मी समाज के कितने मंत्री थे।

इतिहास यह लिखेगा कि कुर्मी समाज ने एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दिया था।

टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक सह सामाजिक कार्यकर्ता)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Monday, 18 May 2026

कबीर : भक्ति, विद्रोह और बहुजन चेतना — गोलेन्द्र पटेल

कबीर : भक्ति, विद्रोह और बहुजन चेतना

“सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।/जाके हिरदै सांच है, ताके हिरदै आप॥” अर्थात् कबीर के अनुसार सत्य ही मनुष्य का सर्वोच्च तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप, क्योंकि सच्चे हृदय में ही ईश्वर का वास होता है। इसी भाव को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी प्रतिध्वनित करते हुए 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में लिखा कि “सत्य के लिए किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’’ क्योंकि सत्य ही मनुष्य की सबसे बड़ी आध्यात्मिक और मानवीय शक्ति है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में संत कबीर निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी धारा के प्रमुख प्रवर्तक, धर्म-सुधारक और लोक-जागरण के महान चेतक हैं। उन्होंने अद्वैतवाद, सूफी प्रेमतत्त्व, हठयोग तथा वैष्णव भक्ति का समन्वय करते हुए सामाजिक आडंबर, जातिगत अहंकार और कर्मकांड का तीखा प्रतिरोध किया। शुक्ल जी कबीर की प्रखर प्रतिभा, तीक्ष्ण व्यंग्य, उलटबांसियों और कुछ अत्यंत मर्मस्पर्शी रूपकों की प्रशंसा करते हैं, किंतु तुलसी, सूर और जायसी की रसात्मक तथा कलात्मक परंपरा की तुलना में उनकी काव्य-सृष्टि को अपेक्षाकृत कम साहित्यिक और अधिक उपदेशप्रधान मानते हैं। उनके अनुसार कबीर की वाणी में भक्तिरस की सरसता सीमित है, भाषा कहीं-कहीं अव्यवस्थित तथा शैली फुटकल दोहों और पदों पर आधारित है; इसलिए वे कबीर को महान सामाजिक चेतना से संपन्न संत तो स्वीकार करते हैं, परंतु पूर्ण अर्थों में महाकवि नहीं मानते। इसके विपरीत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को बहुआयामी, क्रांतिकारी और गहन मानवतावादी व्यक्तित्व के रूप में देखा। द्विवेदी जी की दृष्टि में कबीर केवल संत या समाज-सुधारक नहीं, बल्कि अद्वितीय कवि, दार्शनिक और सांस्कृतिक समन्वयवादी थे। उन्होंने कबीर की भाषा, व्यंग्य-शक्ति और आध्यात्मिक चेतना को हिंदी साहित्य की अनुपम उपलब्धि मानते हुए उन्हें भारतीय चिंतन-परंपरा का स्वाभाविक और विराट विकास सिद्ध किया। इस प्रकार जहाँ शुक्ल जी की दृष्टि तुलसी-केंद्रित साहित्यिक आदर्शवाद से प्रभावित होकर अपेक्षाकृत सीमित प्रतीत होती है, वहीं द्विवेदी जी की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी दृष्टि कबीर के समग्र व्यक्तित्व को अधिक व्यापक और न्यायपूर्ण ढंग से उद्घाटित करती है।

मुझको संत कबीर की अँगुली पकड़ाने वाले लेखक हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। अर्थात् मेरे लिए संत कबीर तक पहुँचने का प्रथम वैचारिक सेतु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रहे। सन् 2018 में कबीर की ओर मेरी वैचारिक यात्रा का आरंभ उन्हीं की प्रसिद्ध कृति कबीर से हुआ, जिसे हिंदी साहित्य में कबीर-विमर्श की आधारशिला माना जाता है। द्विवेदी जी ने कबीर को केवल कवि, समाज-सुधारक अथवा सर्वधर्म-समन्वयकारी व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा, बल्कि मूलतः एक ऐसे भक्त और धर्मगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया, जिनके अन्य सभी रूप उनकी भक्ति-साधना की अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं। उन्होंने कबीर के बहुआयामी व्यक्तित्व, निर्गुण भक्ति, नाथपंथ और सहजमार्ग से उनके संबंध, उलटबाँसियों की आध्यात्मिक गहनता तथा उनके अक्खड़, निर्भीक और मस्तमौला स्वभाव का अत्यंत संतुलित एवं समग्र विश्लेषण किया। द्विवेदी जी किसी भी संकीर्ण वैचारिक घेरे में कबीर को बाँधने के विरोधी थे। उनकी दृष्टि में कबीर ऐसे स्वतंत्र चेतना-संपन्न संत थे, जो हिंदू होकर भी मात्र हिंदू नहीं थे और मुसलमान होकर भी केवल मुसलमान नहीं थे। उन्होंने कबीर की भाषा-सामर्थ्य को “वाणी का डिक्टेटर” कहकर उसकी अद्वितीय अभिव्यक्ति-शक्ति को रेखांकित किया तथा यह स्थापित किया कि कबीर की वाणी में आध्यात्मिक साहस, सामाजिक प्रतिरोध और मानवीय करुणा का अप्रतिम समन्वय विद्यमान है। इसी कारण द्विवेदी जी की व्याख्या कबीर को एकांगी दृष्टियों से मुक्त कर समग्र भक्त-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करती है और आज भी कबीर-आलोचना की सबसे विश्वसनीय तथा प्रभावशाली आधारभूमि मानी जाती है।

किन्तु भारतीय समाज और साहित्य की बहुजन परंपरा में कबीर को केवल भक्त कवि के रूप में नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, धार्मिक पाखंड और पुरोहितवादी सत्ता के विरुद्ध एक महान विद्रोही चेतना के रूप में देखा जाता है। दलित, बहुजन और अंबेडकरवादी चिंतकों की दृष्टि में कबीर उस श्रमण-परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने मनुष्य की गरिमा, श्रम की प्रतिष्ठा, अनुभव-आधारित ज्ञान और सामाजिक समानता को धर्म का वास्तविक आधार माना। उनकी निर्गुण भक्ति मूर्तिपूजा, वेद-पुराण आधारित आध्यात्मिक एकाधिकार और जातिगत ऊँच-नीच के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध है, जो शोषित समुदायों को प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अधिकार प्रदान करती है। “जाति न पूछो साधु की” जैसी उनकी उद्घोषणा मनुष्यता और ज्ञान को जन्माधारित श्रेष्ठता से ऊपर स्थापित करती है। यही कारण है कि बौद्ध-श्रमण परंपरा में कबीर को बहुजन मुक्ति-चेतना का अग्रदूत माना गया। अनेक चिंतक बुद्ध, कबीर और आंबेडकर को समानता, तर्कशीलता और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक श्रृंखला के रूप में देखते हैं, जहाँ बुद्ध ने सामाजिक-आध्यात्मिक विद्रोह की नींव रखी, कबीर ने मध्यकाल में उसे लोकभाषा और निर्भीक वाणी प्रदान की और आंबेडकर ने उसे आधुनिक राजनीतिक तथा संवैधानिक संघर्ष का स्वरूप दिया। धर्मवीर जैसे विचारकों ने कबीर को दलित-बहुजन परंपरा का केंद्रीय स्तंभ मानते हुए उन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों धार्मिक रूढ़ियों से अलग स्वतंत्र जनचेतना का प्रतिनिधि बताया, जबकि कंवल भारती ने कबीर और आंबेडकर के ब्राह्मणवाद-विरोध तथा वंचितों के पक्षधर मानवीय दृष्टिकोण की समानताओं को रेखांकित किया। कबीर की वाणी में पंडित और मौलवी दोनों की आलोचना, कर्मकांड का निषेध तथा “ना हिंदू, ना मुसलमान” जैसी उद्घोषणाएँ उन्हें किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान से परे सार्वभौमिक मानवीय विद्रोह का प्रतीक बनाती हैं। बौद्ध धम्म के साथ भी उनकी वैचारिक निकटता स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि दोनों परंपराएँ तर्क, अनुभव, समानता और अंधविश्वास-विरोध पर बल देती हैं। यद्यपि कबीर स्वयं किसी संगठित धर्म के अनुयायी नहीं थे, फिर भी उनकी चेतना श्रमण, सिद्ध, सहज और लोकधर्मी परंपराओं के गहरे प्रभाव से निर्मित प्रतीत होती है। ‘मगहर’ का बौद्ध परंपरा से जुड़ा शब्दार्थ भी इस विमर्श को और अर्थपूर्ण बनाता है। पालि साहित्य की कुछ व्याख्याओं में ‘मगहर’ शब्द को ‘बौद्धों का गाँव’ अथवा बौद्ध चेतना से जुड़े स्थल के रूप में देखा गया है, जहाँ ‘मग’ का संबंध बौद्ध समुदाय या मग/बर्मा की बौद्ध परंपरा से तथा ‘हर’ का अर्थ गाँव या बस्ती से जोड़ा जाता है। संत कबीर का अपने अंतिम दिनों में मगहर जाना और वहीं निर्वाण प्राप्त करना इस स्थल को विशेष आध्यात्मिक एवं वैचारिक महत्त्व प्रदान करता है। यह भी उल्लेखनीय है कि मगहर, सारनाथ से अधिक दूर नहीं है, जहाँ गौतम बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। इसलिए अनेक बहुजन और श्रमण चिंतक कबीर के मगहर-गमन को केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी रूढ़ियों और मोक्ष-संबंधी अंधविश्वासों के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक उद्घोषणा के रूप में भी देखते हैं। ‘मगहर’ शब्द की ध्वनि और तुकांत—जैसे हर, नैहर, पीहर और शहर—भी लोकभाषा में इसकी सांस्कृतिक आत्मीयता को और गहरा करते हैं। इस प्रकार बहुजन, अंबेडकरवादी और मूलनिवासी विमर्श में कबीर केवल संत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय मुक्ति और वैचारिक प्रतिरोध की एक जीवित परंपरा हैं, जिनकी वाणी आज भी जाति-विरोधी संघर्षों और लोकतांत्रिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करती है।
★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Wednesday, 13 May 2026

पेरियार पर केंद्रित कविताएँ : गोलेन्द्र पटेल

तर्क और विद्रोह के पुरोधा : पेरियार

—गोलेन्द्र पटेल


भारतीय समाज का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है; यह उन विचारों का भी इतिहास है जिन्होंने मनुष्य की चेतना को झकझोरा, समाज की जड़ताओं को चुनौती दी और बराबरी की नई संभावनाएँ निर्मित कीं। दक्षिण भारत में बीसवीं शताब्दी के दौरान एक ऐसा ही व्यक्तित्व उभरा जिसने धर्म, जाति, पितृसत्ता और सामाजिक वर्चस्व की संरचनाओं पर तीखा प्रहार किया। वह व्यक्तित्व था ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’। पेरियार केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वे एक वैचारिक आंदोलन के प्रतीक बन गए। उन्होंने समाज को यह प्रश्न पूछने के लिए विवश किया कि मनुष्य की गरिमा क्या है, जाति क्यों बनी हुई है, धर्म और सत्ता का संबंध क्या है तथा सामाजिक न्याय की लड़ाई किन आधारों पर लड़ी जानी चाहिए। उनके विचारों से सहमति और असहमति दोनों संभव हैं, किंतु यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने भारतीय समाज में बहस और प्रतिरोध की एक नई परंपरा को जन्म दिया।

पेरियार ई. वी. रामास्वामी का जन्म 17 सितम्बर 1879 को तमिलनाडु के इरोड में एक संपन्न परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक जीवन में वे धार्मिक संस्कारों से परिचित थे और सार्वजनिक जीवन में आने के बाद उन्होंने कांग्रेस के साथ भी कार्य किया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उन्होंने कांग्रेस संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई, किंतु शीघ्र ही उन्हें यह महसूस हुआ कि राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न सामाजिक समानता से अलग नहीं हो सकता। उनके अनुसार यदि जाति, ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभाव कायम रहे, तो केवल अंग्रेजों के जाने से आम मनुष्य की मुक्ति संभव नहीं होगी। यही विचार आगे चलकर उन्हें कांग्रेस से अलग ले गया। पेरियार ने दक्षिण भारत में चल रहे गैर-ब्राह्मण आंदोलन को नई दिशा दी। उन्होंने “आत्मसम्मान आंदोलन” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य का सम्मान जन्म से नहीं, बल्कि उसके श्रम, बुद्धि और मानवीय गुणों से तय होना चाहिए। वे जाति व्यवस्था को भारतीय समाज की सबसे बड़ी त्रासदी मानते थे। उनका तर्क था कि जाति केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि मानसिक गुलामी की व्यवस्था है, जो मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊँचा और नीचा घोषित करती है। इसीलिए उन्होंने जाति-विरोध को अपने आंदोलन का केंद्र बनाया। पेरियार की सबसे बड़ी विशेषता उनका निर्भीक तर्कवाद था। उन्होंने अंधविश्वास, कर्मकांड और धार्मिक पाखंड की तीखी आलोचना की। उनका कहना था कि किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि वह प्राचीन है या धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया है। वे मनुष्य की बुद्धि और वैज्ञानिक दृष्टि को सर्वोपरि मानते थे। इसी कारण उन्होंने ईश्वर, धर्म और शास्त्रों की उन व्याख्याओं का विरोध किया जो सामाजिक असमानता को वैधता देती थीं।

उनके आलोचक उन्हें अत्यधिक आक्रामक और धार्मिक भावनाओं के प्रति असंवेदनशील मानते रहे हैं। वास्तव में पेरियार की भाषा कई बार बेहद तीखी और उत्तेजक हो जाती थी। उन्होंने रामायण, मनुस्मृति और अनेक धार्मिक प्रतीकों की आलोचना करते हुए ऐसे वक्तव्य दिए जिनसे व्यापक विवाद उत्पन्न हुए। उनके समर्थकों का मानना था कि यह तीखापन उस सामाजिक क्रूरता के विरुद्ध था जिसने सदियों तक दलितों, स्त्रियों और वंचित समुदायों को अपमानित किया। दूसरी ओर, उनके विरोधियों ने इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं पर हमला माना। यही कारण है कि पेरियार का व्यक्तित्व आज भी तीखी बहसों का विषय बना हुआ है। पेरियार और महात्मा गांधी के संबंध भी इसी जटिलता को प्रकट करते हैं। दोनों सामाजिक सुधार की बात करते थे, लेकिन उनके रास्ते अलग थे। गांधी धर्म और आध्यात्मिकता के भीतर रहकर परिवर्तन चाहते थे, जबकि पेरियार धर्म की संरचनाओं को ही सामाजिक असमानता का स्रोत मानते थे। गांधी अस्पृश्यता के विरोधी थे, परंतु पेरियार जाति व्यवस्था के संपूर्ण विनाश की बात करते थे। इस वैचारिक दूरी ने दोनों को अलग-अलग ध्रुवों पर खड़ा कर दिया। पेरियार का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका स्त्री-विमर्श है। उन्होंने उस दौर में स्त्रियों की स्वतंत्रता, विवाह संस्था, विधवा-विवाह, तलाक, संपत्ति में अधिकार और जन्म नियंत्रण जैसे विषयों पर खुलकर लिखा, जब भारतीय समाज इन मुद्दों पर बात करने से भी कतराता था। वे मानते थे कि पितृसत्ता केवल पुरुषों का निजी व्यवहार नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना का हिस्सा है। उन्होंने स्त्री को “परिवार की इज्जत” के रूप में देखने की मानसिकता का विरोध किया और स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता तथा पारस्परिक सम्मान पर बल दिया।

उनके विचारों में प्रेम को भी उन्होंने सामाजिक यथार्थ से जोड़कर देखा। उनके अनुसार यदि संबंध बराबरी और सम्मान पर आधारित नहीं हैं, तो प्रेम केवल भ्रम बनकर रह जाता है। यही कारण है कि दक्षिण भारत में स्त्री-अधिकार आंदोलनों ने पेरियार को एक महत्त्वपूर्ण प्रेरणा स्रोत के रूप में देखा। पेरियार का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रश्नों पर भी गहरी बहस छेड़ी। द्रविड़ आंदोलन के माध्यम से उन्होंने दक्षिण भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक अस्मिता को नई राजनीतिक शक्ति दी। तमिल समाज में उनका प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि बाद के लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल किसी न किसी रूप में उनकी वैचारिक विरासत से जुड़ते दिखाई देते हैं। आज तमिलनाडु में सामाजिक न्याय, आरक्षण और क्षेत्रीय अस्मिता की जो मजबूत राजनीतिक परंपरा दिखाई देती है, उसमें पेरियार की निर्णायक भूमिका रही है। हालाँकि, पेरियार के विचारों पर आलोचनाएँ भी लगातार होती रही हैं। कुछ विद्वानों और सामाजिक समूहों का आरोप रहा कि उनका आंदोलन कई बार “ब्राह्मण-विरोध” की अतिशयता में बदल गया। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि उनकी शैली समाज में संवाद की जगह टकराव को बढ़ाती थी। उनके विरोधियों ने यह आरोप लगाया कि उन्होंने धार्मिक प्रतीकों की आलोचना करते हुए सामान्य आस्थावान लोगों की भावनाओं की उपेक्षा की। दूसरी ओर, उनके समर्थक कहते हैं कि किसी भी गहरे सामाजिक परिवर्तन के लिए स्थापित सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देना आवश्यक होता है और पेरियार ने वही किया।

पेरियार के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि उनकी औपचारिक शिक्षा बहुत सीमित थी। फिर भी उन्होंने जिस तरह समाज, राजनीति, धर्म और इतिहास पर गंभीर चिंतन किया, वह यह सिद्ध करता है कि ज्ञान केवल डिग्रियों का परिणाम नहीं होता। अनुभव, संघर्ष, अध्ययन और सामाजिक संवेदना भी मनुष्य को विचारक बना सकती है। इसी कारण उन्हें केवल एक नेता नहीं, बल्कि जनचेतना के निर्माता के रूप में देखा जाता है। भारतीय समाज में तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टि की परंपरा बहुत पुरानी रही है। तथागत बुद्ध, रैदास, कबीर से लेकर राहुल सांकृत्यायन, डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा रामस्वरूप वर्मा तक अनेक विचारकों ने अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। पेरियार इसी व्यापक परंपरा के एक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि थे। उन्होंने समाज से यह आग्रह किया कि किसी भी व्यवस्था को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार न किया जाए, बल्कि उसे न्याय और मानवता की कसौटी पर परखा जाए। आज जब समाज में फिर से धार्मिक कट्टरता, मिथ्या गौरव और सामाजिक विभाजन की प्रवृत्तियाँ बढ़ती दिखाई देती हैं, तब पेरियार की विरासत नए प्रश्नों के साथ हमारे सामने उपस्थित होती है। उनके विचारों से असहमति हो सकती है, उनके कई वक्तव्यों की आलोचना भी की जा सकती है, लेकिन यह असंभव है कि उन्हें पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाए। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को यह सिखाया कि सामाजिक न्याय केवल कानूनों से नहीं आता; उसके लिए समाज की चेतना में परिवर्तन आवश्यक है। पेरियार का जीवन इस बात का उदाहरण है कि विचार कभी निष्क्रिय नहीं होते। वे समाज को बदलते हैं, विवाद पैदा करते हैं, प्रतिरोध खड़ा करते हैं और नई पीढ़ियों को सोचने के लिए मजबूर करते हैं। इसलिए पेरियार को समझना केवल एक व्यक्ति को समझना नहीं, बल्कि भारतीय समाज की उन गहरी अंतर्विरोधी परतों को समझना है जिनमें समानता, आस्था, तर्क, परंपरा और विद्रोह लगातार टकराते रहते हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि पेरियार ई.वी.रामास्वामी आधुनिक भारत के उन महान सामाजिक क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, अंधविश्वास और धार्मिक रूढ़ियों के विरुद्ध तर्क, विज्ञान, आत्मसम्मान और सामाजिक समानता का व्यापक आंदोलन खड़ा किया। तमिलनाडु के ईरोड में जन्मे पेरियार ने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के माध्यम से द्रविड़ अस्मिता, बहुजन मुक्ति और सामाजिक न्याय की चेतना को नई दिशा दी। वे मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक समाज जाति, ऊँच-नीच और पुरोहितवादी शोषण से मुक्त न हो जाए। उन्होंने धर्म और ईश्वर की अवधारणा को सामाजिक असमानता का औजार मानते हुए मानववाद, बुद्धिवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सर्वोपरि रखा। पेरियार का संघर्ष केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि वह समूचे भारतीय बहुजन आंदोलन की वैचारिक धारा का महत्वपूर्ण हिस्सा था, जिसका गहरा संबंध बुद्ध, कबीर, रैदास, तुका, फुले, शाहू और अंबेडकर की सामाजिक न्याय परंपरा से जुड़ता है। 24 दिसंबर 1973 को उनका परिनिर्वाण हुआ, किंतु समानता, आत्मसम्मान और सामाजिक मुक्ति का उनका विचार आज भी जनचेतना को प्रेरित करता है।

पेरियार पर केंद्रित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की तीन कविताएँ:-


1).
पेरियार : विद्रोह की अग्निशिखा


इरोड की धरती से उगा क्रांतिसूर्य 
धर्म के अंधे गलियारों में
जहाँ जाति का ज़हर इंसान को कुचल रहा था
जहाँ स्त्री की देह पर पितृसत्ता का पहरा था
वहाँ गूँजी एक ललकार— पेरियार!

नाम, जो पाखंड को चीरता है
चेहरा, जो असमानता को ध्वस्त करता है
विचार, जो शूद्र–दलित–स्त्रियों के लिए
आत्मसम्मान की मशाल बनता है।

यूनेस्को ने उन्हें कहा,
“नए युग का पैग़म्बर
दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात
समाज सुधार आंदोलन का पिता
अंधविश्वास का शत्रु।”
और सचमुच, यही थे— ई.वी. रामास्वामी पेरियार।

गड़ेरिये कुल में जन्मा बालक
काशी के पाखंड से टूटा
और लौटा नास्तिक बनकर,
“ईश्वर को मानना मूर्खता है
ईश्वर को नकारना विद्रोह है!”
उसकी कलम तर्क की तलवार बनी
हर सवाल आग था
हर उत्तर क्रांति।

कांग्रेस की चमक से मोहभंग हुआ
वायकोम के आंदोलन में जेल गया
कांचीपुरम में आरक्षण की माँग उठाई
ब्राह्मणवाद के नकाब को उतारा
घोषणा की,
“भारत तब तक आज़ाद नहीं हो सकता
जब तक जाति और ब्राह्मणवाद का अंत न हो!”

और जन्मा
आत्म-सम्मान आंदोलन
काली कमीज़ें सड़कों पर उतरीं
नारा गूँजा,
“हम इंसान हैं!
हम बराबर हैं!
हम पर कोई मुहर नहीं लगेगी!”
स्त्रियों से कहा,
“हँसुली गुलामी है
सुहाग नहीं।”
“औरत न रसोइया है
न प्रजनन मशीन
न सजावटी गुड़िया
वह बराबरी का इंसान है।”

बाल विवाह तोड़ा
विधवाओं को जीने का अधिकार दिया
शिक्षा का द्वार स्त्रियों के लिए खोला
देवदासी प्रथा को चकनाचूर किया
उन्होंने बताया
पितृसत्ता और जातिवाद
एक ही ज़ंजीर के दो छल्ले हैं।

धर्म के बाज़ार को ललकारा,
“ईश्वर का आविष्कार मूर्खता है
उसका प्रचार धूर्तता
और उसकी पूजा जंगलीपन!”
मूर्तियाँ तोड़ीं
कहा, “इनमें प्राण नहीं!”
‘सच्ची रामायण’ लिखी
जिसने मनुवादी मिथकों की जड़ें हिलाईं
सत्ता ने प्रतिबंध लगाया
पर ललई सिंह यादव ने मशाल
उत्तर भारत में भी जलाई।

राजनीति ने ठुकराया
पर तमिलनाडु की धरती ने
उनके बीज से
डीएमके और एआईएडीएमके जैसे वृक्ष उगाए
हर पिछड़े, हर दलित की साँस में
आज भी गूँजता है
पेरियार का विद्रोह।

उन्होंने सवाल उठाए,
“क्यों जन्म से बँटा इंसान?
क्यों औरत बनी दासी?
क्यों देवता मंदिरों में अमर
और इंसान भूख से मृत?”
और उत्तर दिया,
“क्योंकि विवेक खो गया है
समय है सोचने का
समय है तोड़ने का
समय है गढ़ने का!”

94 बरस तक जिया यह ज्वालामुखी
हर साँस विद्रोह थी
हर शब्द चुनौती
हर कदम क्रांति
उसकी अंतिम वसीयत,
“जाति और पितृसत्ता का विनाश
अनिवार्य है
अगर तुम चुप हो
तो जान लो
तुम भी अन्याय के साझेदार हो।”

आज भी जब मनु के ग्रंथ घर-घर पढ़े जाते हैं
जब स्त्री की देह पर पहरा है
जब जाति के नाम पर खून बहता है
पेरियार की पुकार
पहले से भी ऊँची गूँजती है,
“उठो!
सोचो!
सवाल करो!
पाखंड को तोड़ो
जाति को जलाओ
मानवता को गढ़ो!”

पेरियार, तुम्हें नमन नहीं
विद्रोह का प्रण!
तुम्हारी मशाल से ही
हम उजाले की राह पाएँगे
क्रांति आएगी
आएगी जरूर!
★★★

2).

आग के अक्षरों में लिखा एक नाम : पेरियार

वे कहते थे
ईश्वर नहीं है
और यह कहते समय
उनकी आवाज़ में
किसी मंदिर की घंटियाँ नहीं
एक भूखे मनुष्य की कराह थी
एक अपमानित जाति की चीख थी
एक स्त्री की टूटी हुई चूड़ियों की खनक थी
एक दलित बच्चे के फटे हुए बस्ते की धूल थी।

उन्होंने देवताओं से पहले
मनुष्य को देखा
और पूछा
यदि तुम्हारे भगवान इतने महान हैं
तो फिर
क्यों एक मनुष्य
दूसरे मनुष्य की छाया से भी डरता है?

दक्षिण की तपती हुई धरती पर
एक बूढ़ा आदमी
अपने शब्दों से
सदियों पुराने अंधेरों में
माचिस की तीली रगड़ रहा था
वह कहता था
जाति केवल नाम नहीं
मनुष्य की गर्दन में
पड़ी हुई लोहे की जंजीर है।

वह कहता था
धर्म यदि बराबरी नहीं देता
तो वह प्रार्थना नहीं
सत्ता का हथियार है
और लोग डरते थे उससे
क्योंकि वह
प्रश्न पूछता था
प्रश्न हमेशा
सिंहासन को डराते हैं।

वह कांग्रेस की गलियों से गुज़रा
स्वाधीनता के नारों के बीच चला
लेकिन उसने देखा
राजनीति के मंच पर
स्वतंत्रता की बातें करने वाले लोग
अपने घरों में
जाति के कुएँ अलग रखते हैं
उसने देखा
आज़ादी की मशाल लिए हाथ
अब भी
ऊँच-नीच की राख से सने हुए हैं
तब उसने रास्ता बदल लिया
उसने कहा
यदि समाज की आत्मा गुलाम है
तो झंडे बदलने से
मनुष्य आज़ाद नहीं होता।

उसके शब्द
कई बार आँधी जैसे थे
कई बार हथौड़े जैसे
कई बार इतने कठोर
कि लोग काँप उठते थे
उसने रामायण पढ़ी
तो उसमें देवता नहीं
राजनीति देखी
उसने इतिहास पढ़ा
तो उसमें
राजाओं की जय-जयकार नहीं
शूद्रों की चुप्पियाँ सुनीं।

उसने पूछा
क्यों मंदिर का दरवाज़ा
सबके लिए नहीं खुलता?
क्यों जन्म
भाग्य का कारागार बन जाता है?
उसके सवालों से
पुजारियों की नींद टूटती थी
सभाओं में बेचैनी भर जाती थी।

कुछ लोग उसे
विद्रोही कहते थे
कुछ नास्तिक
कुछ संस्कृति-विरोधी
कुछ उसे
दक्षिण का तूफ़ान कहते थे
लेकिन
उसके भीतर
एक ही आग जलती थी
मनुष्य को मनुष्य बनाने की आग।

जब भगत सिंह फाँसी पर चढ़े
तो उसने अपने शब्दों में
शोक नहीं
क्रोध लिखा
उसने लिखा
सत्ता हमेशा
उन युवाओं से डरती है
जो प्रश्न पूछते हैं
उसने स्त्रियों से कहा
तुम केवल
घर की दीवार नहीं हो
तुम्हारी इच्छाएँ भी
मनुष्य की इच्छाएँ हैं।

उसने कहा
विवाह यदि जेल है
तो उसे तोड़ दो
प्रेम यदि सम्मान नहीं देता
तो वह प्रेम नहीं
स्वामित्व है
उस समय
जब स्त्री की आवाज़
रसोई के धुएँ में दबा दी जाती थी
एक बूढ़ा आदमी
मंच से कह रहा था
स्त्री कोई संपत्ति नहीं।

उसकी आवाज़
कई पुरुषों को असहज करती थी
वह धर्म पर प्रहार करता था
लेकिन
उसका असली युद्ध
अन्याय से था
उसने देखा था
कैसे एक बच्चा
केवल जन्म के कारण
विद्यालय से बाहर कर दिया जाता है
कैसे एक स्त्री
सिंदूर के नाम पर
अपना जीवन खो देती है
कैसे एक मजदूर
मंदिर बना सकता है
पर मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकता।

वह चिल्लाया
यह कैसा समाज है?
उसकी भाषा
अक्सर कठोर हो जाती थी
उसके विरोधी कहते
वह परंपरा का शत्रु है
उसके समर्थक कहते
वह सदियों के अपमान का उत्तर है।

सच शायद
इन दोनों के बीच कहीं था
क्योंकि
हर बड़ा विद्रोह
अपने भीतर
अतिशयोक्ति की आँधी भी रखता है
लेकिन यह भी सच है
उसने लाखों लोगों को
पहली बार
अपने भीतर मनुष्य होने का साहस दिया
उसने कहा
डिग्रियाँ ही ज्ञान नहीं होतीं
ज्ञान वह है
जो अन्याय को पहचान सके
उसने उन लोगों को आवाज़ दी
जो सदियों से
धीरे बोलना सीखाए गए थे।

उसने कहा
यदि कोई तुम्हें नीचा कहे
तो पहले
उस व्यवस्था को नकारो
जो ऊँचाई और नीचाई बनाती है
उसकी सभाओं में
सिर्फ भाषण नहीं होते थे
वहाँ
आत्मसम्मान जन्म लेता था
उसने जाति से कहा
मैं तुम्हें स्वीकार नहीं करता
उसने अंधविश्वास से कहा
मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ
उसने सत्ता से कहा
तुम्हारी दीवारें
एक दिन गिरेंगी
और आज
जब फिर से
इतिहास को मिथकों की पालिश से चमकाया जा रहा है
जब प्रश्न पूछने वालों को
देशद्रोही कहा जाता है
जब तर्क की जगह
नारों का शोर बढ़ता जा रहा है

तब
दक्षिण की उस तपती हुई धरती से
एक आवाज़ फिर उठती है
मनुष्य को
भगवान से नहीं
मनुष्य से प्रेम करना सीखो
जाति की राख से बाहर निकलो
अपने भीतर
एक नया समाज बनाओ
जहाँ कोई ऊँचा न हो
कोई नीचा न हो
जहाँ मंदिर से पहले
भूखे बच्चे की रोटी जरूरी हो
जहाँ स्त्री की हँसी
किसी मर्यादा की कैदी न हो
जहाँ किताबें
प्रश्न पूछने से न डरें।

वह बूढ़ा आदमी
अब इस दुनिया में नहीं है
लेकिन उसकी आवाज़
अब भी
बहसों में जलती है
सभाओं में गूंजती है
विश्वविद्यालयों की दीवारों पर लिखी जाती है
और हर उस मनुष्य के भीतर जीवित है
जो अन्याय के सामने
चुप रहने से इंकार करता है।

पेरियार
शायद केवल एक नाम नहीं
एक बेचैन प्रश्न हैं
क्या मनुष्य
कभी सचमुच
मनुष्य बन पाएगा?
★★★

3).
उत्तर भारत के पेरियार : ललई

यह बौद्धिक क्रांति का ही नहीं
बल्कि जाति से मुक्ति के ऐलान का भी समय है
हमारा इतिहास लहूलुहान
भविष्य लिखने को हम खड़े
मिथकों की राख में दबे सच
अब अंगारों-सा जल उठे।

वे अंगारा हैं
ललई सिंह यादव के विचार
जिन्होंने जाति के अंधकार को
शब्दों की मशाल से चीर डाला
कठारा की मिट्टी से उगा पौधा
सेना की वर्दी में भी विद्रोही
जिन्होंने कहा,
“बलिदान सिंह का है
भेड़ों की तरह मरना नहीं।”
हर नारा, हर किताब
गोला-बारूद बनी
हर पन्ना
जंजीरें तोड़ने का विस्फोट।

शास्त्र पढ़े, पर इंसानियत न मिली
मिला केवल षड्यंत्र और दासता
तब कलम उठी तलवार बनकर,
“ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद!”
इतिहास काँप उठा
दक्षिण से उठी पेरियार की आग
उत्तर में ललई के हाथ पहुँची
अनुवाद बना युद्ध-घोष— ‘सच्ची रामायण’
सरकार काँपी, धर्मठेकेदार बौखलाए
किताब जब्त हुई
पर अदालत ने कहा,
“सत्य पर प्रतिबंध असंभव है।”
यह जीत किताब की नहीं
स्वाभिमान और बौद्धिक क्रांति की थी।

उन्होंने घोषणा की,
“अब मैं केवल ललई हूँ
न यादव, न सिंह, न चौधरी
जाति की बेड़ियाँ तोड़कर
मनुष्य कहलाऊँगा।”
यह उद्घोष था
हजारों साल की गुलामी ठुकराने का
मानवता को धर्म मानने का।

उनकी कलम से गूँजे
शम्बूक वध, अंगुलीमाल, एकलव्य
नाग यज्ञ, संत माया बलिदान
हर रचना ने खोला
धार्मिक डकैती का सच
राजनीतिक डकैती का सच
सामाजिक विषमता का सच।

अशोक पुस्तकालय, सस्ता प्रेस
जहाँ से निकलती हर पुस्तक
बहुजन चेतना की बारूद थी
ललई ने कहा,
“सुधार नहीं, अलगाव चाहिए
शास्त्र नहीं, संविधान चाहिए
जाति नहीं, समता चाहिए।”

नागपुर की दीक्षा भूमि की गूँज
उनकी साँसों में धधकती रही
उनमें बुद्ध-कबीर-फुले-अंबेडकर-पेरियार प्रतिबिंबित होते रहें
वे बहुजनों से कहते रहे,
“संघर्ष करो, संगठित हो, शिक्षित बनो।”
ललई का जीवन पुकारता है,
“विद्रोह ही जीवन है
समता ही धर्म है
मानवता ही अंतिम सत्य है।”

आज हम शपथ लेते हैं
ब्राह्मणवाद की हर दीवार गिराएँगे
जाति की हर जंजीर तोड़ेंगे
संविधान को हथियार बनाएँगे
सत्य और समता की मशाल जलाएँगे।

जय भीम! जय पेरियार ललई!
क्रांति अब—क्रांति हमेशा!
★★★

नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मूलनिवासी। जय मंडल। जय संविधान। जय भारत।

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


[ तस्वीरें साभार: गूगल ]

Tuesday, 5 May 2026

समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी : गोलेन्द्र पटेल

समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी

तीन-चार ही प्रतिशत, ब्राह्मण का था मान।
पर शासन-शिक्षा सभी, उन पर था अधिकार।
सत्ता, ज्ञान, संसाधन, सीमित वर्ग अधीन।
बहुजन पीड़ा झेलता, अवसर हुए क्षीण॥

ब्राह्मण सत्ता जाल में, फँसा हुआ जनमान।
शिक्षा, शासन, व्यापार में, उनका ही अधिकार।
जनता की आवाज़ को, दबा दिया हर बार।
अल्प वर्ग के स्वार्थ से, बहुसंख्यक लाचार॥

शिक्षा पर भी रोक थी, ज्ञान हुआ सीमित।
अछूतों को दूर रख, किया उन्हें अपवित्र।
ब्राह्मण सत्ता के तले, डरता व्यापारी जन।
न्यायालय भी पक्षपाती, टूटे जन के मन॥

गाँव-शिखर तक व्याप्त था, उनका दृढ़ प्रभुत्व।
बिना आरक्षण न्याय का, संभव नहीं तत्त्व।
सदियों से जो पीड़िते, वंचित दलित समाज।
उनके हित आरक्षणे, खोले न्यायी राज॥

वंचित जन के हित बिना, सूना समाज विधान।
समानता का सूर्य भी, रहता सदा अजान।
शाहू ने तब देख कर, दुख का गहन स्वरूप।
नब्बे अंश जन वंचित, पाया सत्य अनूप॥

ऐसे घोर विषम काल में, प्रकटे शौर्य-निधान।
शाहू केवल नृप नहीं, थे जन-क्रांति विधान।
कोल्हापुर के राज में, नव इतिहास रचाय।
मनुवादी बंधन सभी, तोड़ समता लाय॥

शाहू जी ने सोचकर, किया महा अभियान।
उन्नीस सौ दो वर्ष में, बदला शासन ज्ञान।
सत्ता में हिस्सेदारी, पाया जिनने स्वप्न।
1902 में किया, आरक्षण का यज्ञ॥

ऊँच-नीच के जाल को, तोड़ा दृढ़ संकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, आरक्षण का विकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, पिछड़ों को अधिकार।
टूटा ऊँच-नीच का, सदियों पुराना जाल॥

पचास अंश आरक्षण, पिछड़ों को दिलवाय।
मराठा, दलित, आदिवासी, सबको साथ मिलाय।
मराठा कुनबी संग ही, दलित-आदि सब लोग।
ब्राह्मण प्रभु शेवाई को, रखा अलग ही योग॥

ब्राह्मण-प्रभु-शेवाई को, रखा अलग स्थान।
शेष सभी को दे दिया, अधिकारों का मान।
सत्ता का जो केंद्र था, ऊँची जाति के पास।
शाहू ने वह बाँटकर, किया समत्व प्रकाश॥

शाहू के तर्कों में था, न्याय हेतु आधार।
पृथक प्रतिनिधित्व ही, करता जन उद्धार।
काउंसिल में प्रतिनिधि, जब होंगे समुदाय।
तब ही जन के हितों का, होगा सच्चा न्याय॥

नामांकन से लाभ क्या, जब न हो आत्मविश्वास।
निर्वाचित प्रतिनिधि बने, तब जागे विश्वास।
प्रतिनिधित्व समान हो, हर पद हर अधिकार।
तभी मिटेगा अन्यथा, यह विषम व्यवहार॥

ऊपर नीचे हर जगह, अनुपातिक हो भाग।
तभी सशक्त समाज का, होगा सच्चा जाग।
बीस बरस तक चाहिए, यह विशेष विधान।
तब जाकर समता मिले, जागे जन सम्मान॥

“शिक्षा से उद्धार है”, उद्घोषित यह बात।
जड़ समाज की चेतना, जग उठी दिन-रात।
शिक्षा को आधार मान, लिया बड़ा निर्णय।
निःशुल्क, अनिवार्य कर, किया जनों का श्रेय॥

दुगुने स्कूलों से बढ़ा, शिक्षा का विस्तार।
ज्ञान-समानता का हुआ, जन-जन में संचार।
अलग स्कूल सब बंद कर, किया एक समावेश।
जाति-धर्म सब भूलकर, शिक्षा का परिवेश॥

समान चिकित्सा का दिया, सबको एक विधान।
दलितों के हित खोल दिए, छात्रावास महान।
श्रम का जो अपमान था, उसको दिया सम्मान।
छात्रावास खोलकर, बदला शिक्षा-ज्ञान॥

भट्ट-जोशी के जाल से, मुक्त किया जन-धर्म।
अंतरात्मा को मिला, स्वतंत्रता का मर्म।
धर्मस्थल सब राज्य के, अधीन किए एक दिन।
पद दिए पिछड़ों को भी, तोड़ा जाति का बंधन॥

बंधुआ श्रम का अंत कर, दी श्रमिक को राह।
महारों की दासता हटी, टूटी हर एक चाह।
अंतरजातीय विवाह को, दी कानूनी छूट।
मनुवादी संहिता पर, यह था प्रबल प्रहार॥

नारी को अधिकार दे, संपत्ति-विवाह।
शाहू जी ने पूर्व ही, लिख दी नई चाह।
अस्पृश्यता मिटाने को, लिया कठोर प्रण।
अपमानित करने वाले, त्यागें पद तत्क्षण॥

मैसूर, मद्रास, बम्बई, अपनाया यह मार्ग।
आरक्षण की ज्योति से, मिटने लगा अंधार।
मैसूर, मद्रासादि ने, ली उनसे प्रेरणा।
न्याय-समता पथ पर बढ़ी, भारत की संरचना॥

बीस बरस के बाद जब, बदली शासन रीत।
गैर-ब्राह्मण बढ़ गए, टूटी अन्याय प्रीत।
आदर्शराज्य का स्वप्न था, दर्शन-राजा रूप।
शाहू जी में दिख गया, साकारित वह स्वरूप॥

अंधकार से मानव को, ले जाए जो पार।
ऐसे ही थे शाहू जी, जन-उद्धारक नार।
शाहू समता-सूर्य थे, जन-मन में उजियार।
छुआछूत के अंध पर, किया प्रखर प्रहार॥

“मनुष्य बने मनुष्य ही”, दिया सरल संदेश।
जाति-धर्म की ईर्ष्या, त्यागो मिथ्या क्लेश।
स्वाधीनता के बाद भी, धीमा रहा प्रयास।
ओबीसी को देर से, मिला अधिकार प्रकाश॥

आज समय फिर माँगता, वही प्रखर आवाज़।
आरक्षण से ही बने, समता का समाज।
स्मृति तभी सार्थक बने, जब उतरे व्यवहार।
समता-न्याय-बंधुत्व का, रचें नया संसार॥

ऐसा रचें समाज हम, जहाँ समान अधिकार।
मानवता सर्वोच्च हो, यही सत्य साकार।
रैदास के स्वप्न सा, हो जग का विधान।
छोट-बड़े सब एक हों, सुख पाए हर प्राण॥

जय भीम का घोष हो, संविधान महान।
मंडल-भारत गूँज उठे, समता का अभियान।
शाहू स्मृति दिवस पर, विनय सहित प्रणाम।
न्याय बिना आरक्षणे, कैसे मिले अविराम॥
★★★

नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मूलनिवासी। जय मंडल। जय संविधान। जय भारत।
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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ईमेल : corojivi@gmail.com

समता के क्रांतिसूर्य: राजर्षि शाहूजी महाराज और सामाजिक न्याय का पुनर्जागरण — गोलेन्द्र पटेल

 समता के क्रांतिसूर्य: राजर्षि शाहूजी महाराज और सामाजिक न्याय का पुनर्जागरण
लेखक: गोलेन्द्र पटेल

महाप्रतापी महानायक छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874 – 6 मई 1922) ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “अस्पृश्यता को कभी भी नहीं चला लिया जायेगा; उच्चवर्गीय लोगों को दलितों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही पड़ेगा, क्योंकि जब तक मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जायेगा, तब तक मानव समाज का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है” और साथ ही उन्होंने चेताया कि “जाति और धर्म के बहाने एक-दूसरे से ईर्ष्या करना बहुत गलत है।” इसी मानवीय और समतामूलक दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा, “धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए” तथा “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए,” और अंततः यह मूल सत्य स्थापित किया कि “मनुष्य महान बनता है अपने कर्मों से, न कि जन्म से,” अर्थात् मनुष्य की महानता उसके कर्मों में निहित होती है, जन्म में नहीं।

भारतीय समाज की संरचना को यदि गहराई से समझा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ सत्ता, ज्ञान और संसाधनों पर लंबे समय तक कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व बना रहा, जबकि बहुजन समाज; जिसमें दलित, पिछड़े, आदिवासी, किसान और श्रमिक समुदाय आते हैं, वंचना, अपमान और अवसरहीनता के दायरे में सीमित रहा। ऐसे जटिल और असमान सामाजिक परिदृश्य में राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज का उदय केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति के प्रणेता के रूप में हुआ। उनका यह स्पष्ट और दूरदर्शी कथन, “शिक्षा से ही हमारा उद्धार संभव है, ऐसी मेरी मान्यता है।” भारतीय समाज की जड़ों तक उतरकर उसे बदलने की घोषणा थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में, जब क्रांतिसूर्य ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक परंपरा सामाजिक न्याय और समता का स्वप्न जगाकर जा चुकी थी, तब समाज पुनः जातिगत जकड़नों में उलझा हुआ था। धर्म और जाति के नाम पर विभाजन गहराता जा रहा था और सत्ता तथा प्रशासनिक अवसरों पर एक सीमित वर्ग का एकाधिकार था। ऐसे समय में कोल्हापुर राज्य के शासक के रूप में शाहूजी महाराज ने स्थिति का गंभीर अध्ययन कराया और पाया कि लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या उन अधिकारों से वंचित है, जो उनके मानवीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।

यहीं से उनकी सामाजिक दृष्टि एक क्रांतिकारी दिशा लेती है। 26 जुलाई 1902 को उन्होंने अपने राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं था, बल्कि सदियों से जमी असमानता के ढांचे पर एक ऐतिहासिक प्रहार था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछड़े वर्गों में मराठा, कुनबी, किसान, दलित और आदिवासी सभी शामिल होंगे और उच्च जातियों का वर्चस्व तोड़ा जाएगा। इस संदर्भ में उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। समान अवसर के बिना न्याय संभव नहीं।

उनकी यह पहल इतनी प्रभावशाली थी कि आगे चलकर मैसूर (1918), मद्रास (1921) और बंबई प्रेसीडेंसी (1925) जैसे क्षेत्रों ने भी आरक्षण की नीति अपनाई। यह वही बीज था, जिसने आगे चलकर भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय की अवधारणा को जन्म दिया। इसीलिए यह कहा जाना अत्यंत सार्थक है कि “आरक्षण के जनक ही नहीं, आदर्श दार्शनिक राजा थे शाहूजी महाराज।”

शाहूजी महाराज केवल नीतिगत परिवर्तन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक चेतना को भी बदलने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज में सबसे बड़ी बाधा जाति है।” यह कथन केवल सामाजिक आलोचना नहीं, बल्कि एक नैतिक आह्वान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

उनकी दृष्टि में शिक्षा, सम्मान और अवसर एक-दूसरे से जुड़े हुए तत्व थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाया, छात्रावासों की स्थापना की, बेगारी प्रथा को समाप्त किया और छुआछूत पर प्रतिबंध लगाकर चिकित्सा सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाया। यह सब उस समय हुआ, जब भारत में ऐसी नीतियों की कल्पना भी दुर्लभ थी।

शाहूजी महाराज की महानता का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनका बहुजन नेतृत्व के प्रति विश्वास और समर्थन था। जब उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के संघर्ष को देखा, तो न केवल उनकी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी, बल्कि उनके सामाजिक अभियान को भी सशक्त किया। 21 मार्च 1920 को माणगांव सम्मेलन में उनका ऐतिहासिक वक्तव्य आज भी गूंजता है, “बहुजनों तुमको डॉ० अम्बेडकर के रूप में तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे तुम्हारे गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देंगे…”

यह घोषणा केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि बहुजन समाज के नेतृत्व को वैधता प्रदान करने वाला ऐतिहासिक क्षण था। यही कारण है कि आगे चलकर डॉ. अंबेडकर ने भी कहा, “शाहूजी महाराज सामाजिक लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं… हमें उनका जन्मदिन त्योहार की तरह मनाना चाहिए।”

उनका व्यक्तित्व व्यवहार में भी उतना ही महान था जितना विचारों में। जब डॉ. अंबेडकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटे, तो शाहूजी महाराज स्वयं उनसे मिलने उनके घर पहुँचे। अंबेडकर ने आश्चर्य व्यक्त किया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “हम किस बात के राजा? हम तो परंपरा से राजा बने हैं… आप ज्ञान के राजा हो।” यह संवाद भारतीय समाज में ज्ञान की सर्वोच्चता और समानता के मूल्य को स्थापित करता है।

उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि विरोध और धमकियों के बावजूद वे अपने मार्ग से नहीं हटे। उन्होंने स्पष्ट कहा, “वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से पीछे नहीं हट सकते।” यह कथन केवल साहस नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उनकी अटूट आस्था का प्रमाण है।

शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण संतुलित और मानवीय था। वे जानते थे कि समाज में अन्याय हुआ है, परंतु वे यह भी मानते थे कि समाधान सामूहिक चेतना और सुधार से ही संभव है। इसीलिए यह प्रश्न “छुआछूत किसने किया, प्लीज़ कोई बताओ?” हमें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है। इतिहास में अनेक व्यक्तियों और समुदायों ने शिक्षा और सामाजिक उन्नति में योगदान दिया, जैसे सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा अंबेडकर को छात्रवृत्ति देना या उनके शिक्षकों द्वारा प्रेरणा प्रदान करना। शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण यही था कि समाज को दोषारोपण के बजाय परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब सत्ता जनकल्याण के लिए समर्पित होती है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शासन का अर्थ केवल प्रशासन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना है। इसीलिए कहा जाता है, “कोटि-कोटि नमन उस महापुरुष को जिन्होंने कहा नहीं, करके दिखाया कि सत्ता का असली अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति को ऊपर उठाना है।”

आज जब हम उनके परिनिर्वाण दिवस 6 मई को स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का भी समय है। उन्होंने जो मार्ग दिखाया, शिक्षा, समता, न्याय और बंधुत्व का वही एक सशक्त और मानवीय समाज की नींव है।

यदि आज बहुजन समाज का कोई भी बच्चा शिक्षा प्राप्त कर पा रहा है, यदि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा पा रहा है, यदि वह सत्ता में अपनी हिस्सेदारी की बात कर रहा है, तो यह शाहूजी महाराज के उस ऐतिहासिक संघर्ष का परिणाम है, जिसकी शुरुआत उन्होंने एक सदी पहले कर दी थी।

उनकी स्मृति में झुकना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें और उस समाज के निर्माण में योगदान दें, जहाँ समानता केवल आदर्श नहीं, बल्कि वास्तविकता हो। यही उनके प्रति सच्ची आदरांजलि होगी। एक ऐसा समाज, जहाँ हर व्यक्ति को शिक्षा, सम्मान और अवसर समान रूप से प्राप्त हो और जहाँ मानवता ही सर्वोच्च मूल्य हो। यही हमारे पुरखों का सपना है, “ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।/छोट-बड़ो सब सम बसे रविदास रहे प्रसन्न।।”

जय भीम। जय संविधान। जय मंडल। जय भारत।
लेखक: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


तस्वीर साभार: गूगल 


बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...