Saturday, 18 July 2026

मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर (सोनम वांगचुक को समर्पित कविताएं) : गोलेन्द्र पटेल

सोनम वांगचुक : पढ़ाई, सत्याग्रह आ लोकतंत्र के चेतना
[तस्वीर साभार: फेसबुक]

सोनम वांगचुक के लड़ाई खाली एगो आदमी, एगो इलाका कऽ कवनो राजनीतिक दल के लड़ाई नइखे। ई लड़ाई पढ़ाई पर भरोसा, लोकतंत्र में बातचीत आ जनता के हक के बचावे खातिर बा। ऊ कहत बाड़ें कि अगर पढ़ाई में ईमानदारी, योग्यता आ पारदर्शिता ना रही, त सबसे बेसी नुकसान ओह लाखन लइका-लइकी के होई जे अपना मेहनत के भरोसे जिनगी बदले के सपना देखत बा। पेपर लीक, नकल आ परीक्षा में धांधली खाली सरकारी कमी ना ह, ई गरीब किसान, मजूर, रिक्शा चलावे वाला, छोट दुकानदार जइसन लोगन के ओह आस पर चोट ह, जवन आस लेके ऊ अपना बेटा-बेटी के पढ़ावेला। पढ़ाई तबहिए बराबरी के राह बन सकेला, जब सभे के एके जइसन मौका मिले आ सफलता के आधार खाली मेहनत आ काबिलियत होखे। सोनम वांगचुक के आंदोलन ई भी याद दिलावेला कि लोकतंत्र के जान बातचीत में बसल बा, चुप्पी में ना। असहमति हो सकेला, बाकिर आवाज के अनसुना कर देहल लोकतंत्र खातिर ठीक नइखे। असली लोकतंत्र ऊ ह, जहाँ सवाल सुने के, समझे के आ जवाब देवे के हिम्मत होखे। आज जरूरत खाली सोनम वांगचुक के साथ देवे के नइखे, बलुक ओह सोच के साथ खड़ा होखे के बा, जे पढ़ाई के न्याय, बराबरी आ समाज बदले के सबसे मजबूत जरिया मानेला। अगर लोगन के पढ़ाई पर से भरोसा उठ गइल, त गरीब परिवारन के सपना आ लोकतंत्र दुनो कमजोर पड़ जइहें। एही से सोनम वांगचुक के संदेश साफ बा देश के भविष्य खाली नारा से ना बची, बल्कि ईमानदार पढ़ाई, जवाबदेह शासन आ जागरूक नागरिक से बची। एहिए में लोकतंत्र के असली ताकत बसल बा। "मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर" जंतर-मंतर पर जनहित खातिर लड़त-जूझत जनचेतना के समर्पित बा।

मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर : गोलेन्द्र पटेल 

1). ज्ञान के उपवास

हिमगिरि के अँचरा सँ, उठल एक अरदास।
पढ़ई बाँचल रहय कहे, सोनम के विश्वास।
रिकसा, खेत, मजूर घर, सबकर एके आस।
मेहनत लिखी तकदीर हो, ना धन के निवास।
लीकल परचा फोरि दे, टूटल लाखन नेह।
रोवत बिटिया, रोवत पूत, सूखत भीतर सेह।
भूख न पेटे मात्र के, भूख भरोसा होय।
विद्या-माई रोवत फिरै, सुनय न कोऊ कोय।

कितबन में उजियार बा, साँच करै पहचान।
झूठ कमाई हारिहै, जीतिहै विद्यान।
जाति-पाँति सब दूर कर, देहु बराबर मान।
मेहनत के फल पाइहैं, गाँव-नगर इंसान।
जियत रहय विश्वास ई, बुझै न ज्ञानक जोत।
लोक कहय शिक्षा बची, तब बचिहैं सब ओत।

2). आखर के आस

किसनवा के बेटवा कहै पढ़ि बनब इंजीनियर।
रिकसा खींचे बाप कहै बिटिया बन अफसर।
दूकनिया के नन्हक लाल, देखै सपन अपार।
गुरु-गिरिहा के नेह पर, टिकले संसार।
जे दिन बिकिहैं प्रश्न सब, बिकिहैं सब सम्मान।
ओहि दिन रोई जायिहै, भारत के पहचान।
आखर मंदिर ढहि गइल, टूटल जन विश्वास।
तबहुँ चिरैयाँ गीत गवै आइत नयका भोरास।

परचा लीके रोपि के, फल ना होय महान।
ईमाने के खेत में, उपजै साँच किसान।
बालक मन में दीप धर, सीखै सोच-विचार।
रटला से ना होइहैं, जीवन के उद्धार।
लोक-जुबानी गूँज उठे राखऽ शिक्षा लाज।
न्याय-धरम के राह पर, चलै देश समाज।

3). लोकतंत्र के खामोसी

जंतर-मंतर धूप में, सूखत देह अकुलाय।
लोकतंतर के कान पर, मौनक ताला छाय।
कागज रोवे, किताब रोय, रोवय बालक आस।
लीकल परचा लूटि ले, मेहनत के विश्वास।
हिमगिरि से उठल पुकार, पहुँचल गंगा तीर।
साँच बचावऽ, ज्ञान बचावऽ, जागऽ देश अधीर।
राज-दुअरिया भीतरे, सन्नाटा के राज।
बाहर जनमन पूछतै कब सुनब आवाज?

मौन अगर सिंहासनन, बनि जावै पहचान।
सूखि जाई लोकतंत्र, रोवै हिन्दुस्तान।
संवादे से जीत है, बैर न देई फल।
बात सुनै जब राज तब, हरसै जन-आँचल।
लोकभाखा कहि उठी खोलऽ मन के द्वार।
साँच, करुणा, न्याय से, उजियारै संसार।

4). अकेल्ला मनई कब्बो अकेल्ला नइखे

अकेल्ला चलि राह पर, लागै जइसे एक।
पाछे लाखन नेह के, जगमग करत विवेक।
हाथ खाली हो सकैं, मनवा रहे अडिगाय।
साँचे के संग चलत जे, ऊ कब हारि न जाय।
गिरि-पहाड़ से गाम तक, गूँजै ओकर बोल।
बिटिया, किसान, मजूर सब, जोड़ैं अपना मोल।
दीया जरै अँधियार में, काँपत रहै लुआर।
एक किरिन से फूटि पड़ै, भोरक अपरंपार।

एक जनम के सत्य से, जागै लाखन प्रान।
बूँद-बूँद मिलि धार बनै, बदले सगर जहान।
संग चले विश्वास जब, टूटै भय के जाल।
छोटक पग से बनि उठै, जन-आंदोलन चाल।
लोक कहै मुसकाइ के, मत मानऽ खुद अकेल।
साँच संगतिया बनि रहै, जन-जन तोहर मेल।

5). आखर के भरोसा

गाम-गिरांव के बाट पर, जगल पढ़ाई आस।
रिकसा, हल अउ खेत से, उठल नयन विश्वास।
माय कहय पढ़ बेटवा, बदलिहे दिन-भाग।
बाबू पोंछैं पसीनवा, मन में नयका राग।
लीकल परचा, झूठ धन, काटै सपना-मूल।
मेहनत वाली जिनगिया, काहे झेले शूल।
एक मनई डटल अइँठ, आखर खातिर आज।
ओकर भूख न पेट के, ज्ञान-धरम के लाज।

साँच परीक्षा बचि रहै, तब बचिहैं अरमान।
गरीबन के अँगना खिलै, पढ़ल-लिखल बिहान।
बोलऽ, सुनऽ, समझऽ सबै, टूटै मन के फाट।
संवादन के सेतु पर, मिलै जनम के ठाठ।
लोक कहै मिलि एक सुर, राखऽ विद्या मान।
आखर बचिहैं तभिएँ बची, धरती अउ इंसान।

6). जागऽ रे जनमन

सुतल परल जन-चेतना, बजल न अंतर-घंट।
आखर रोवत दुआर पर, टूटत सपना-कंठ।
हाट-बजार चकाचकैं, बिकत नयन-उजियार।
साँच दबावल जाय है, झूठ करै व्यापार।
लइका पूछै गुरु सों, कइसन होई राह?
मेहनत जीतै कि फेर धन, लिखिहै सबके चाह?
हिमगिरि से उठल पुकार, गूँजल देस-दुआर।
पढ़ई बचा, विश्वास बचा, बोलै बारंबार।

जागत जन से जागिहै, लोकतंत्र के प्रान।
मिलि-जुलि राखऽ ज्ञान पर, अटूट भरोसा-थान।
द्वेष न बोवऽ खेत में, बोवऽ नेह विचार।
साँच-करुणा के जल बिना, सूखै हर संसार।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनुआ आज।
विद्या, श्रम अउ न्याय से, सजिहै देस समाज।

7). समता के मशाल

मजदूरन के हथवा में, धरती के इतिहास।
दलित, किसान, बहुजनन के, अँखियन जीवत आस।
बाबा के किताब कहै पढ़, संगठित, संघर्ष।
मेहनत के अधिकार बिना, सूखै जन के हर्ष।
मारकस के सुर बोलतैं श्रम के देहु सम्मान।
रोटी, विद्या, मान बराबर, एही साँच विधान।
जाति-जंजीर टूटि पड़ै, टूटै लोभक राज।
आखर बनि हथियार तब, जगमग होय समाज।

जाति अउ पूँजी मिलि जदि, करैं जनम पर चोट।
समता, श्रम अउ ज्ञान से, टूटै अन्याय-कोट।
विद्या सबके हक रहे, ई धरती के नेम।
ऊँच-नीच के भेद बिन, चमकै जन के प्रेम।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनई निर्भीक।
समता, बंधुता, न्याय से, लिखऽ नयका इतिहास-लीक।

8). बिटिया के आखर

माय कहय जा बिटिया, पढ़ि लिखि छूअऽ गगन।
टूटैं दे अब बंधन सब, खुलैं नयका भवन।
घूँघट, देहरी, डर-डगर, रोके कतना बेर।
आखर बनि पंखवा उठल, उड़ि गइल अँधेर।
रिकसा वाली माय के, अँखियन बसल उजास।
हमर लइकी अफसर बनै, ई हौ जिनगी आस।
पढ़ई नारी के हक हउ, दान न काहू केर।
समता के ई जोतिया, उजियारै घर-डेर।

बिटिया पढ़ली त गाँव के, खुलिहैं लाखे द्वार।
ज्ञान-जोत से मिटि जइहैं, भय, बंधन, अँधियार।
आधा गगन नापे बिना, पूरा कहाँ समाज?
नारी संग बराबर चले, तबे खिले सुराज।
लोकभाखा कहि उठी, बेटी धरती मान।
ओकर सपना बाँचि के, बाँचै हिन्दुस्तान।

9). जिंदा रहऽ लड़ाई खातिर

आँधी झकझोरै डारि, जड़ मत छोड़ऽ मीत।
जियत रहब त देखबें, फिनु उगिहैं नव प्रीत।
सूखल देह भले रहै, हिम्मत रहै अडिगाय।
दीया जइसन लोरि में, जोति न कबहुँ बुझाय।
इतिहासन के पन्नवा, साँसन से लिखलाय।
सपना जिन्दा राखिहऽ, तबे भोर मुस्काय।
अँधियरा लाखन घेरि ले, मन न हारऽ आज।
धरती माँ के कोख में, पलत नया समाज।

जीवन सबसे मूल धन, राखऽ एकर मान।
जियत रहब त जीतिहैं, साँच-नेह अभियान।
संवादन के राह से, बदलै जग के चाल।
क्रोध नय, धीरज बने, जन-मन के ढाल।
लोक कहै संघर्ष के, एही साँच विधान।
जिंदा रहि के जीतिहऽ, राखऽ आपन प्रान।

10). आखर जीतिहैं

बर्फीला पहाड़ सों, उठल जनक आवाज।
गाम-नगर सब पूछतैं कब मिलिहै सुराज?
विद्या मंदिर रोवतै, टूटत जन विश्वास।
साँच परीक्षा माँगतै, भारत के हर साँस।
दलित, किसान, मजदूर सब, जोरल एके डोर।
बिटिया, लइका, गुरु कहैं खोलऽ न्यायक भोर।
एक अकेल्ला दीप सों, लाखन बाती जाग।
साँच, समता, नेह के, फइलल दूर सुहाग।

जाति-धरम के भेद से, ऊँच न होई देस।
मेहनत, विद्या, न्याय से, खिलिहैं नयका केस।
लोकतंत्र तब फूलिहै, जब सुनि लेई बात।
जनमन के विश्वास से, बनिहै नयकी जात।
लोकभाखा असीस दे रहऽ अडिग इंसान।
आखर, श्रम अउ सत्य से, अमर रहै पहिचान।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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Monday, 6 July 2026

देश, देशप्रेम, देशभक्ति और मातृभूमि-प्रेम : एक मानवीय एवं राष्ट्रीय विमर्श

देश, देशप्रेम, देशभक्ति और मातृभूमि-प्रेम : एक मानवीय एवं राष्ट्रीय विमर्श

"वतन की खुशबू से महकते हैं हम, इसी भूमि पर हमने जन्म लिया है। हमारे हृदय में देशभक्ति का वह उज्ज्वल दीप सदैव प्रज्वलित रहता है, जो हमें अपने राष्ट्र, समाज और मानवता के प्रति उत्तरदायी बनाता है। शहीदों के बलिदान की स्मृति हमें निरंतर प्रेरित करती है कि हम अपने देश को अधिक न्यायपूर्ण, समृद्ध, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और मानवीय बनाने में अपना योगदान दें।"

मनुष्य और देश का संबंध केवल जन्म का नहीं, बल्कि अस्तित्व, पहचान, संस्कृति और उत्तरदायित्व का भी संबंध है। यही कारण है कि देश, देशप्रेम, देशभक्ति और मातृभूमि-प्रेम भारतीय चिंतन में अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ रही हैं। ये चारों परस्पर जुड़े हुए होने पर भी अपने-अपने अर्थ, स्वरूप और उद्देश्य में भिन्न हैं। इनका सम्यक् अध्ययन हमें राष्ट्र के प्रति संतुलित, संवेदनशील और विवेकपूर्ण दृष्टि प्रदान करता है।

देश क्या है?

देश केवल नक्शे पर अंकित सीमाओं, पर्वतों, नदियों, जंगलों या समुद्रों का नाम नहीं है। वह एक जीवंत सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और मानवीय इकाई है, जहाँ करोड़ों लोग साझा इतिहास, परंपराओं, संविधान, मूल्यों और भविष्य की आकांक्षाओं के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।

भौगोलिक दृष्टि से देश एक निश्चित भू-भाग है, किन्तु राजनीतिक दृष्टि से वह संप्रभु शासन, संविधान, न्याय व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से युक्त एक संगठित व्यवस्था है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर देश उन विविध समुदायों का व्यापक परिवार है जो अनेक भाषाओं, आस्थाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बावजूद एक साझा राष्ट्रीय पहचान से जुड़े रहते हैं।

इस प्रकार देश केवल भूमि नहीं, बल्कि भूमि और मनुष्य के बीच निर्मित विश्वास, सहभागिता, उत्तरदायित्व और सामूहिक चेतना का नाम है। जब किसी भू-भाग के निवासी स्वयं को एक साझा भाग्य, समान अधिकारों और सामूहिक भविष्य से जोड़ लेते हैं, तभी वह भू-भाग वास्तविक अर्थों में देश बनता है।

देशप्रेम क्या है?

देशप्रेम अपने देश, उसकी प्रकृति, संस्कृति, भाषा, संविधान, नागरिकों और जीवन-मूल्यों के प्रति आत्मीय प्रेम, सम्मान और अपनत्व की सहज मानवीय भावना है। यह किसी आदेश, भय या दबाव से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन से स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

देशप्रेम का अर्थ केवल राष्ट्रीय गौरव का अनुभव करना नहीं है, बल्कि देश की विविधता, सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक संपदा और सामाजिक जीवन के प्रति संवेदनशील होना भी है। सच्चा देशप्रेम देश की उपलब्धियों पर गर्व करता है, किंतु उसकी समस्याओं से आँखें नहीं मूँदता। वह अन्याय, असमानता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, पर्यावरण-क्षरण और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों को दूर करने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार देशप्रेम एक सकारात्मक, रचनात्मक और मानवीय भावना है, जो व्यक्ति को अपने राष्ट्र के विकास में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करती है।

देशभक्ति क्या है?

यदि देशप्रेम भावना है, तो देशभक्ति उस भावना का कर्मरूप है। देशभक्ति का वास्तविक अर्थ केवल भावनात्मक घोषणाएँ करना या राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान व्यक्त करना नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ पालन करना है।

देशभक्ति सीमा पर शत्रु से संघर्ष करने वाले सैनिक के साहस में दिखाई देती है, तो उसी प्रकार विद्यालय में निष्ठापूर्वक शिक्षा देने वाले शिक्षक, निष्पक्ष न्याय करने वाले न्यायाधीश, संवेदनशील चिकित्सक, ईमानदार किसान, परिश्रमी श्रमिक, वैज्ञानिक, कलाकार, सफाईकर्मी और प्रत्येक उत्तरदायी नागरिक के कार्यों में भी प्रकट होती है।

सच्चा देशभक्त संविधान का सम्मान करता है, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करता है, कानून का पालन करता है, करों का ईमानदारी से भुगतान करता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, पर्यावरण संरक्षण में योगदान देता है तथा समाज में समानता, न्याय और बंधुत्व को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है।

देशभक्ति का अर्थ अंधानुकरण या संकीर्ण राष्ट्रवाद नहीं है। विवेकपूर्ण आलोचना, सामाजिक सुधार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा मानव गरिमा की रक्षा भी सच्ची देशभक्ति के अनिवार्य आयाम हैं। जो व्यक्ति अपने राष्ट्र को अधिक न्यायपूर्ण, समतामूलक और मानवीय बनाने का प्रयास करता है, वही वास्तविक अर्थों में देशभक्त कहलाने का अधिकारी है।

मातृभूमि-प्रेम क्या है?

मातृभूमि-प्रेम मनुष्य की सबसे गहरी और आत्मीय भावनाओं में से एक है। "मातृभूमि" शब्द स्वयं इस बात का प्रतीक है कि जन्मभूमि हमारे लिए केवल भूमि नहीं, बल्कि पालन-पोषण करने वाली माँ के समान है।

जिस मिट्टी में हमारा जन्म हुआ, जहाँ हमारे बचपन की स्मृतियाँ बसती हैं, जहाँ हमारी भाषा, लोकसंस्कृति, परंपराएँ और पूर्वजों की विरासत जीवित है, उसके प्रति जो सहज श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मीय लगाव उत्पन्न होता है, वही मातृभूमि-प्रेम है।

यह भावना व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ती है। चाहे वह संसार के किसी भी भाग में क्यों न चला जाए, अपनी जन्मभूमि की स्मृतियाँ, लोकगीत, बोली, संस्कृति और मिट्टी की सुगंध उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी रहती हैं। मातृभूमि-प्रेम अपनी सांस्कृतिक धरोहर, प्राकृतिक संपदा और स्थानीय परंपराओं के संरक्षण की प्रेरणा भी देता है।

देश, देशप्रेम, देशभक्ति और मातृभूमि-प्रेम का पारस्परिक संबंध

इन चारों अवधारणाओं को यदि एक सूत्र में समझा जाए, तो कहा जा सकता है कि देश हमारा साझा राष्ट्रीय घर है; मातृभूमि-प्रेम उस घर की मिट्टी और जड़ों से हमारा आत्मीय संबंध है; देशप्रेम उस घर, उसके लोगों और उसकी संस्कृति के प्रति हमारा स्नेह है; और देशभक्ति उस घर को सुरक्षित, समृद्ध, न्यायपूर्ण और विकसित बनाए रखने के लिए किया गया हमारा सतत कर्म है।

देशप्रेम भावना देता है, मातृभूमि-प्रेम संवेदना देता है और देशभक्ति उन दोनों को कर्म तथा उत्तरदायित्व में रूपांतरित करती है। इन तीनों का आधार देश है, और इनका अंतिम उद्देश्य राष्ट्र तथा मानव समाज का समग्र कल्याण है।

उपसंहार

आज वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और सामाजिक चुनौतियों के युग में देशभक्ति की परिभाषा और अधिक व्यापक हो गई है। अब केवल सीमाओं की रक्षा ही पर्याप्त नहीं, बल्कि संविधान की गरिमा, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक विविधता, आर्थिक समानता और मानवाधिकारों की रक्षा भी देशभक्ति का महत्वपूर्ण स्वरूप है।

सच्चा देशप्रेम किसी अन्य राष्ट्र के प्रति घृणा नहीं सिखाता, बल्कि अपने राष्ट्र को उत्कृष्ट बनाते हुए समस्त मानवता के प्रति सम्मान और सद्भाव का संदेश देता है। वही राष्ट्र महान बनता है जिसके नागरिक प्रेम, कर्तव्य, समानता, न्याय और बंधुत्व के आदर्शों को अपने जीवन में उतारते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि देश केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, पहचान, संस्कृति और भविष्य का नाम है। देशप्रेम उसका हृदय है, मातृभूमि-प्रेम उसकी आत्मा है और देशभक्ति उसका कर्म है। जब ये तीनों एक साथ विकसित होते हैं, तभी एक सशक्त, समृद्ध, लोकतांत्रिक और मानवीय राष्ट्र का निर्माण संभव होता है।

वन्दे मातरम्। जय हिन्द। जय भारत।


टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com




कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता

Monday, 29 June 2026

राजर्षि शाहूजी महाराज के जन्मोत्सव को सामाजिक न्याय दिवस के रूप में मनाया गया

खजूरगाँव में सामाजिक न्याय दिवस पर राजर्षि शाहूजी महाराज की जयंती समारोह सम्पन्न
चंदौली, 26 जून। “छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान” के तत्वावधान में जनपद चंदौली के ग्रामसभा खजूरगाँव स्थित संत रविदास मंदिर परिसर में "एक शाम बहुजन महापुरुषों के नाम" कार्यक्रम के अंतर्गत सामाजिक न्याय दिवस (राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले एवं राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज संयुक्त जयंती) का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम सायं 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक चला, जिसमें सामाजिक न्याय, संविधान, शिक्षा, आरक्षण तथा बहुजन महापुरुषों के योगदान पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ बुद्ध वंदना से हुआ। मंच संचालन संस्थान के संस्थापक एवं बहुजन कवि गोलेन्द्र पटेल ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने राजर्षि शाहूजी महाराज को सामाजिक न्याय, समता और शिक्षा के महान अग्रदूत बताते हुए उनके विचारों को वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक बताया। युवा कवि गोलेन्द्र पटेल ने कहा कि शाहूजी महाराज व्यक्ति नहीं, विचार हैं, दर्शन हैं। उनकी चेतना समता, स्वतंत्रता एवं वैश्विक बंधुत्व की एक सशक्त अभिव्यक्ति हैं‌। शोषितों, वंचितों, दलितों, उपेक्षितों, किसानों, मज़दूरों की आवाज़ है। सही अर्थों में, शाहूजी महाराज समतामूलक समाज के संगतराश हैं। आरक्षण के जनक ही नहीं, आदर्श दार्शनिक राजा हैं शाहूजी महाराज। शाहूजी महाराज केवल नीतिगत परिवर्तन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक चेतना को भी बदलने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज में सबसे बड़ी बाधा जाति है।” यह कथन केवल सामाजिक आलोचना नहीं, बल्कि एक नैतिक आह्वान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनकी दृष्टि में शिक्षा, सम्मान और अवसर एक-दूसरे से जुड़े हुए तत्व थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाया, छात्रावासों की स्थापना की, बेगारी प्रथा को समाप्त किया और छुआछूत पर प्रतिबंध लगाकर चिकित्सा सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाया। यह सब उस समय हुआ, जब भारत में ऐसी नीतियों की कल्पना भी दुर्लभ थी। अध्यक्षीय वक्तव्य में मूलचंद प्रसाद ने पेरियार ललई सिंह यादव की जयंती मनाने की घोषणा की। मंजीत कुमार सुमन ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। वक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए बुद्ध, कबीर, रैदास, तुका, फूले, शाहू बिरसा, बसवन्ना, अंबेडकर, पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, कांशीराम, सावित्रीबाई फुले, नांगेली, फुलन देवी के सामाजिक परिवर्तनकारी योगदान पर प्रकाश डाला। चन्द्रिका प्रसाद ने शाहूजी महाराज के जीवन और भारतीय संविधान की पृष्ठभूमि पर विचार रखे। बी.आर. अम्बेडकर ने अंग्रेजी शासनकाल में शाहूजी महाराज की सामाजिक भूमिका, ईवीएम और जाति जनगणना जैसे समकालीन मुद्दों के साथ ओबीसी महापुरुषों तथा बहुजन समाज की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की। रामबली सत्यार्थी ने शाहूजी महाराज की सामाजिक दृष्टि को रेखांकित किया। नामवर प्रसाद बागी ने बहुजन मिशन गीत प्रस्तुत करते हुए डॉ. अम्बेडकर की वैश्विक दृष्टि तथा सामाजिक आंदोलनों पर अपने विचार व्यक्त किए। हरिओम आनंद ने माता नांगेली, दलित कवि हीराडोम तथा संवैधानिक वर्गीकरण (एससी, एसटी, ओबीसी एवं सामान्य वर्ग) पर प्रकाश डाला। स्व. बाबूलाल लोहार ने मनुवादी विचारधारा एवं ब्राह्मणवाद की आलोचना करते हुए बाबा साहब अम्बेडकर और शाहूजी महाराज के संघर्षों का उल्लेख किया। ज्ञान प्रकाश रावण ने बहुजन मिशन गीत प्रस्तुत कर वातावरण को प्रेरणादायी बनाया। कार्यक्रम के अंत में संस्थान के अध्यक्ष विनोद कुमार पटेल ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, सहयोगियों एवं उपस्थित जनसमुदाय का आभार व्यक्त किया। समारोह सामाजिक न्याय, शिक्षा, समता, बंधुत्व और संवैधानिक मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने के संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जिला पंचायत सदस्य अजित यादव सहित विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक एवं जनसंगठनों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, वक्ताओं और जनप्रतिनिधियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रमुख रूप से स्व. बाबूलाल लोहार, कमलेश यादव, पेरियार बुल्लु यादव, नामवर प्रसाद बागी, अमरनाथ कुशवाहा, रामबली सत्यार्थी, बी.आर. अम्बेडकर, हरिओम आनंद, ललित कुमार भारती सहित अनेक अतिथियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन संस्थापक एवं युवा कवि-लेखक गोलेन्द्र पटेल ने किया, जबकि स्वागत व्यवस्था में मृदुल कान्त पुष्कर, विनोद कुमार पटेल, रमेश कुमार भारती, चन्द्रिका राम पासवान, मंजित कुमार सुमन, मुलचन्द प्रसाद, ज्ञान प्रकाश रावण तथा अन्य सहयोगियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समारोह में आसपास के क्षेत्रों से आए लगभग दो से ढाई सौ ग्रामवासी, युवाओं, महिलाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की उत्साहपूर्ण उपस्थिति ने कार्यक्रम को जनभागीदारी और सामाजिक चेतना का सशक्त स्वरूप प्रदान किया।





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Sunday, 14 June 2026

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं
बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा 
कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास 
हमें खड़ा होने की जगह मिली
तब हम उतना ही ख़ुश हुए 
जितना हिंदी का कोई रचनाकार ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने पर प्रसन्न होता है 

रेलवे स्टेशन पर जो भीड़ दिखाई देती है
वह यात्रियों की भीड़ नहीं है
वे लोग घर लौटते मजदूर भी नहीं
न ही किसी मेले या तीर्थ की ओर जाते श्रद्धालु हैं
वे हाथों में प्रवेश-पत्र लिए
देश के वे युवा हैं
जो अपने भविष्य की तलाश में
एक शहर से दूसरे शहर धकेले जा रहे हैं।

उनकी पीठ पर टंगा बैग
सिर्फ कपड़ों का बोझ नहीं है
उसमें वर्षों की तैयारी
माता-पिता की उम्मीदें
उधार लेकर भरी गई फीस
और एक नौकरी का सपना रखा हुआ है
कहा जाता है
देश तरक्की कर रहा है
अवसर बढ़ रहे हैं
रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं
लेकिन फिर
कुछ हजार पदों के लिए
लाखों आवेदन क्यों आते हैं?
क्यों हर भर्ती परीक्षा
एक जनसैलाब में बदल जाती है?
क्यों ट्रेनों के दरवाज़ों से लटकते हुए
युवा दिखाई देते हैं?
क्यों खिड़कियों से घुसकर
उन्हें अपने सपनों तक पहुँचना पड़ता है?

एक लड़का
सासाराम से किशनगंज भेज दिया जाता है
एक लड़की
अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर
परीक्षा देने निकल पड़ती है
किसी की जेब में
बस किराए भर पैसे हैं
किसी ने
रास्ते के लिए घर से लाई रोटियाँ रखी हैं
किसी ने
दोस्तों के साथ मिलकर
एक समोसा चार हिस्सों में बाँट लिया है
और सरकार इसे
एक सामान्य परीक्षा कहती है
यह परीक्षा नहीं
यह सहनशक्ति का महोत्सव है
यहाँ ज्ञान से पहले
भूख की परीक्षा होती है
धैर्य की परीक्षा होती है
भीड़ में कुचलने से बचने की परीक्षा होती है
समय पर पहुँचने की परीक्षा होती है
और फिर कहीं जाकर
प्रश्नपत्र सामने आता है।

देश का बेरोज़गार युवा
अब केवल नौकरी नहीं खोज रहा
वह सम्मान खोज रहा है
अपने श्रम का मूल्य खोज रहा है
अपने जीवन का अर्थ खोज रहा है
वह पूछ रहा है
यदि मेरे लिए अवसर हैं
तो मैं लाखों की भीड़ में क्यों खड़ा हूँ?
यदि व्यवस्था मेरे साथ है
तो मुझे अपने ही देश में
एक परीक्षा देने के लिए
सैकड़ों किलोमीटर क्यों भटकना पड़ता है?
रेलवे स्टेशनों पर बैठा हुआ हर युवक
एक आँकड़ा नहीं है।

वह किसी किसान का बेटा है
किसी मज़दूर की बेटी है
किसी माँ की अधूरी नींद है
किसी पिता की अंतिम उम्मीद है
लेकिन व्यवस्था
उन्हें अक्सर संख्या की तरह देखती है
फॉर्मों की संख्या
रोल नंबरों की संख्या
कटऑफ की संख्या
और इसी बीच
उनकी उम्र बीतती रहती है
भर्तियाँ टलती रहती हैं
परीक्षाएँ रद्द होती रहती हैं
पेपर लीक होते रहते हैं
परिणाम अटकते रहते हैं
और सपनों की उम्र
धीरे-धीरे कम होती जाती है
फिर भी वे हार नहीं मानते
वे अगली भर्ती का इंतज़ार करते हैं
अगली ट्रेन पकड़ते हैं
अगला फॉर्म भरते हैं
अगला सपना देखते हैं।

शायद यही इस देश के युवाओं की सबसे बड़ी ताकत है
कि व्यवस्था बार-बार उन्हें निराश करती है
फिर भी वे उम्मीद करना नहीं छोड़ते
लेकिन किसी राष्ट्र की सभ्यता
इस बात से नहीं मापी जाती
कि उसके नेता कितने बड़े भाषण देते हैं
वह इस बात से मापी जाती है
कि उसके युवाओं को
अपने भविष्य तक पहुँचने के लिए
कितनी पीड़ा से गुजरना पड़ता है
आज भारत के रेलवे स्टेशन
एक मौन प्रश्न की तरह खड़े हैं
वे पूछ रहे हैं
क्या यह वही देश है
जिसका सपना इन युवाओं ने देखा था?
या यह
बेरोज़गारों का एक विशाल प्रतीक्षालय है
जहाँ करोड़ों सपने
अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं?

★★★
रचयिता: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता









Wednesday, 3 June 2026

अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व — गोलेन्द्र पटेल

जीवनकाल: 1953 से 2007
संघर्षकाल: 1978 से 2007


अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व

भारतीय समाज का इतिहास केवल राजसत्ताओं, युद्धों और शासकों का इतिहास नहीं है; वह उन असंख्य व्यक्तित्वों की स्मृतियों से भी निर्मित होता है जिन्होंने अपने समय की अन्यायपूर्ण संरचनाओं से टकराने का साहस किया। ऐसे व्यक्तित्व प्रायः इतिहास और लोककथा के मध्य खड़े दिखाई देते हैं, एक ओर वे कानून की दृष्टि में अपराधी घोषित किए जाते हैं, तो दूसरी ओर जनमानस उन्हें अपने दुखों, अपमानों और प्रतिरोध की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक बना लेता है। बुंदेलखंड की धरती पर उभरा ददुआ का व्यक्तित्व इसी द्वंद्व का एक ज्वलंत उदाहरण है। ददुआ (शिवकुमार पटेल) केवल एक नाम नहीं है; वह बुंदेलखंड के बीहड़ों में जन्मी उस बेचैन चेतना का नाम है जिसने सत्ता, सामंतवाद, भय और सामाजिक वर्चस्व के सामने घुटने टेकने से इनकार किया। उनकी जीवन-कथा के चारों ओर अनेक किंवदंतियाँ, जनश्रुतियाँ और विवाद जुड़े हुए हैं। कुछ लोग उन्हें हिंसा और आतंक का पर्याय मानते हैं, तो कुछ उन्हें उस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने सदियों से वंचित और कमजोर वर्गों को हाशिये पर धकेल रखा था। इसीलिए ददुआ का मूल्यांकन केवल न्यायालय की भाषा में नहीं किया जा सकता; उसे लोकस्मृति, सामाजिक मनोविज्ञान और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझना आवश्यक है। बुंदेलखंड की कठोर भौगोलिक परिस्थितियाँ, वहाँ की आर्थिक विषमताएँ, जातिगत तनाव और प्रशासनिक उपेक्षा लंबे समय से सामाजिक असंतोष को जन्म देती रही हैं। जब किसी समाज में न्याय की संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं और आम मनुष्य स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है, तब वह ऐसे प्रतीकों की तलाश करता है जो उसके आत्मसम्मान और प्रतिरोध की आवाज़ बन सकें। बुंदेलखंड के वीरप्पन ददुआ का उदय इसी सामाजिक पृष्ठभूमि में हुआ। लोकविश्वासों में यह धारणा बार-बार व्यक्त होती है कि व्यक्तिगत अपमान और पारिवारिक त्रासदी ने उनके भीतर विद्रोह का बीज बोया। धीरे-धीरे वह बीज एक ऐसे वृक्ष में परिवर्तित हुआ जिसकी छाया में समर्थकों ने प्रतिरोध का स्वप्न देखा और विरोधियों ने भय का अनुभव किया।

ददुआ की छवि का सबसे रोचक पक्ष यह है कि वह एकरेखीय नहीं है। वह जितना विवादास्पद है, उतना ही बहुआयामी भी है। उनके समर्थक उन्हें गरीबों का सहायक, वंचितों का संरक्षक और स्थानीय समाज की समस्याओं में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति बताते हैं। अनेक लोककथाएँ उन्हें ऐसे पात्र के रूप में चित्रित करती हैं जो सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण के विरुद्ध खड़ा था। दूसरी ओर, उनके जीवन से जुड़े गंभीर आपराधिक आरोप यह भी स्मरण कराते हैं कि प्रतिरोध और हिंसा के बीच की रेखा अत्यंत जटिल होती है। यही द्वंद्व ददुआ को एक साधारण व्यक्ति से किंवदंती में बदल देता है। लोकजीवन की स्मृति में ददुआ उस प्रश्न की तरह उपस्थित हैं जिसका उत्तर आज भी निश्चित नहीं है। क्या वे केवल एक अपराधी थे या उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया थे जिसने लाखों लोगों को अपमान और अभाव का जीवन दिया? क्या वे व्यवस्था-विरोधी विद्रोह के प्रतीक थे या फिर उस अराजकता के प्रतिनिधि जो न्याय के अभाव में जन्म लेती है? इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्ति की वैचारिक दृष्टि के अनुसार बदल जाता है। यही कारण है कि उनके नाम पर आज भी तीखी बहसें होती हैं और उनके बारे में धारणाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न दिखाई देती हैं।

ददुआ और फूलन देवी जैसे व्यक्तित्वों की लोकप्रियता भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गहरे प्रश्न को भी उजागर करती है। जब समाज के किसी वर्ग को लगता है कि उसकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है, तब वह अपने नायकों का निर्माण स्वयं करता है। ये नायक हमेशा आदर्श नहीं होते, पर वे उस मौन आक्रोश की अभिव्यक्ति अवश्य बन जाते हैं जिसे मुख्यधारा का इतिहास अक्सर अनदेखा कर देता है। इसी कारण ऐसे चरित्र केवल व्यक्ति नहीं रह जाते; वे सामाजिक असंतोष, आत्मसम्मान और संघर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बन जाते हैं। फिर भी यह समझना आवश्यक है कि विद्रोह और क्रांति में मौलिक अंतर होता है। विद्रोह तत्काल अन्याय के विरुद्ध उठी हुई प्रतिक्रिया हो सकता है, जबकि क्रांति एक व्यापक सामाजिक दर्शन, मानवीय दृष्टि और रचनात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया है। विद्रोह व्यवस्था को चुनौती देता है, किंतु क्रांति नई व्यवस्था की कल्पना भी प्रस्तुत करती है। इसलिए किसी भी बागी चरित्र के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी उसके ऐतिहासिक मूल्यांकन में विवेक और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। ददुआ का व्यक्तित्व इसी जटिलता का प्रतीक है। वे इतिहास के पन्नों में जितने विवादित हैं, लोकस्मृति में उतने ही जीवित। वे उस सामाजिक यथार्थ की उपज थे जहाँ अन्याय, असमानता और शक्ति-संघर्ष लगातार टकराते रहे। उनकी कथा हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि समाज में न्याय की स्थापना केवल कानून से नहीं होती; उसके लिए विश्वास, सम्मान और समान अवसरों की भी आवश्यकता होती है। जब ये तत्व अनुपस्थित हो जाते हैं, तब इतिहास के किनारों से ऐसे पात्र जन्म लेते हैं जो व्यवस्था के लिए चुनौती और जनता के लिए किंवदंती बन जाते हैं। इस अर्थ में शोषितों के मसीहा ददुआ का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। वह भारतीय ग्रामीण समाज के भीतर छिपे हुए उन अंतर्विरोधों का आख्यान है, जिनमें सत्ता और प्रतिरोध, भय और सम्मान, अपराध और लोकनायकत्व, व्यवस्था और विद्रोह निरंतर एक-दूसरे से संवाद करते रहते हैं। शायद इसी कारण ददुआ आज भी केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक प्रश्न हैं और कुछ प्रश्न इतिहास से अधिक समय तक जीवित रहते हैं।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में यदि किसी समाज ने सबसे अधिक श्रम किया, सबसे अधिक उत्पादन किया, सबसे अधिक संगठन खड़े किए, सबसे अधिक संघर्ष किए और फिर भी अपनी वास्तविक शक्ति के अनुरूप स्थान प्राप्त नहीं किया, तो उनमें कुर्मी समाज प्रमुख है।

यह लेख किसी दल के पक्ष या विपक्ष का लेख नहीं है। यह कुर्मी समाज के आत्ममंथन का लेख है। यह प्रशंसा का नहीं, चेतना का लेख है। यह ताली बजाने का नहीं, आईना दिखाने का लेख है।

आज कुर्मी समाज को सबसे पहले अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए—

क्या हम सचमुच उतने शक्तिशाली हैं, जितना हम स्वयं को समझते हैं?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो फिर हमारी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति हमारी जनसंख्या और योगदान के अनुपात में क्यों नहीं है?

नेताओं की लंबी सूची, लेकिन समाज की छोटी उपलब्धियाँ

कुर्मी समाज के पास नेताओं की कमी कभी नहीं रही।

बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेता हुए, जिन्होंने वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन किया।

गुजरात में केशुभाई पटेल, आनंदीबेन पटेल, भूपेंद्र पटेल जैसे मुख्यमंत्री हुए।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने।

उत्तर प्रदेश में बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. सोनेलाल पटेल, अनुप्रिया पटेल, पल्लवी पटेल, जंग बहादुर पटेल, राम लखन वर्मा, बरखू राम वर्मा, राम पूजन पटेल, लालजी वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, केसरी देवी पटेल, आर. के. पटेल, नंदलाल पटेल, रामसेवक पटेल, हीरामणि पटेल, रामदेव पटेल, सुखदेव वर्मा, दीपक पटेल, राजेंद्र प्रसाद चौधरी, अरविंद चौधरी, संग्राम सिंह वर्मा, संतोष गंगवार, पंकज चौधरी जैसे अनेक नाम राजनीति में दिखाई देते हैं। इनमें कुछ स्मृति शेष चुके हैं।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कुर्मी विधायकों में प्रमुख नामों में शामिल हैं राजेंद्र चौधरी, कविंद्र चौधरी, पटेल दयाराम चौधरी, गंगवार, सत सिंह, संत सिंह, वीरेंद्र चौधरी, राजेंद्र वर्मा, रुधौली, फरेंदा, कप्तानगंज, मुंगरा, बादशाहपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, महाराजगंज, जौनपुर, पीलीभीत सदर, भोगनीपुर, मिनगा, गौरा, उतराला, अविनाश चंद्र द्विवेदी, आरके पटेल, संजय गंगवार, शैलेंद्र सिंह गंगवार, सकेंद्र प्रताप, राकेश कुमार वर्मा, पल्लवी पटेल, पूजा सरोज, रागिनी सोनकर, लालजी वर्मा, स्वतंत्र देव सिंह, ओम प्रकाश सिंह, पंकज चौधरी, संतोष गंगवार जैसे नेताओं से जुड़े क्षेत्रों के विधायक तथा अन्य कई कुर्मी/पटेल/चौधरी/वर्मा/गंगवार उपनाम वाले विधायक जो कुल संख्या को 40-43 तक ले जाते हैं और वर्तमान में यूपी से कुर्मी समुदाय के सांसदों में समाजवादी पार्टी से रामप्रसाद चौधरी (बस्ती), उत्कर्ष वर्मा (लखीमपुर खीरी), नरेश चंद्र उत्तम पटेल (फतेहपुर), लालजी वर्मा (अंबेडकर नगर), राम शिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती), शिवपाल सिंह पटेल (प्रतापगढ़), कृष्णा देवी पटेल (बांदा); भाजपा से पंकज चौधरी (महाराजगंज) और अन्य कुर्मी/पटेल चेहरे जैसे कुछ क्षेत्रीय नाम; तथा अपना दल (सोनेलाल) से अनुप्रिया पटेल (मिर्जापुर) शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 11 के आसपास कुर्मी सांसदों की संख्या को पूरा करते हैं।

मध्य प्रदेश में भीम सिंह पटेल, बुद्धसेन पटेल, विद्यावती पटेल जैसे नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई।

संगठनात्मक क्षेत्र में इंजीनियर बलिहारी पटेल, चौधरी विकास पटेल, डॉ. आर.एस. पटेल जैसे नाम भी संघर्ष की पहचान बने।

लेकिन एक प्रश्न आज भी खड़ा है, इतने नेताओं के बावजूद समाज कहाँ है?

क्या केवल नेताओं का बड़ा होना ही समाज का बड़ा होना है?

यदि ऐसा होता तो आज कुर्मी समाज देश का सबसे संगठित, सबसे प्रभावशाली और सबसे निर्णायक समाज होता।

सच्चाई यह है कि नेताओं की सफलता और समाज की सफलता दो अलग-अलग बातें हैं।

सबसे बड़ी बीमारी, व्यक्ति पूजा

कुर्मी समाज की सबसे बड़ी समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक है।

हम व्यक्ति को समाज से बड़ा बना देते हैं।

कोई नेता मंत्री बन गया, तो हम उसे अपनी उपलब्धि मान लेते हैं।

कोई सांसद बन गया, तो हम खुश हो जाते हैं।

कोई मुख्यमंत्री बन गया, तो हम समझ लेते हैं कि समाज का उद्धार हो गया।

लेकिन क्या कभी हमने यह हिसाब लगाया कि इन सबके बावजूद समाज की सामूहिक ताकत कितनी बढ़ी?

कितने विश्वविद्यालय बने?

कितने बड़े विद्यालय बने?

कितने शोध संस्थान बने?

कितने राष्ट्रीय समाचार पत्र बने?

कितने बड़े उद्योगपति पैदा हुए?

कितने राष्ट्रीय विचारक तैयार हुए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर कमजोर है, तो हमें अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

वोट हमारा, एजेंडा किसी और का

यह कटु सत्य है कि कुर्मी समाज ने अनेक दलों को ताकत दी।

कभी समाजवादी राजनीति को।

कभी बहुजन राजनीति को।

कभी कांग्रेस को।

कभी भाजपा को।

लेकिन हर दल में कुर्मी समाज ने दूसरों के एजेंडे को आगे बढ़ाया, अपना स्वतंत्र सामाजिक एजेंडा बहुत कम बनाया।

आज भी अधिकांश लोग किसी दल की पहचान से स्वयं को परिभाषित करते हैं, समाज की पहचान से नहीं।

यही कारण है कि चुनाव समाप्त होते ही समाज फिर वही पुराना प्रश्न पूछता है, "हमें क्या मिला?"

केवल जातीय गौरव नहीं, सामाजिक क्रांति चाहिए

कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि केवल जातीय गौरव के नारे समाज को आगे नहीं बढ़ाते।

यदि केवल गौरव से समाज आगे बढ़ते, तो इतिहास में कोई भी समुदाय पिछड़ा नहीं रहता।

समाज को आगे बढ़ाती है—

शिक्षा।

संगठन।

आर्थिक शक्ति।

वैचारिक स्पष्टता।

अनुशासन।

दीर्घकालिक रणनीति।

और इन क्षेत्रों में अभी बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. सोनेलाल पटेल का अधूरा प्रश्न

जब डॉ. सोनेलाल पटेल ने पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया था, तब वह केवल चुनावी टिकट का प्रश्न नहीं था।

वह सम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक शक्ति का प्रश्न था।

आज भी वह प्रश्न जीवित है।

लेकिन दुखद यह है कि समाज उस प्रश्न को आंदोलन में बदलने के बजाय अक्सर व्यक्तियों और दलों की बहस में उलझ जाता है।

यदुनाथ सिंह पटेल की विरासत

स्मृति शेष बाबू यदुनाथ सिंह पटेल जैसे नेताओं की चर्चा केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वे विधायक थे।

उनकी चर्चा इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने स्वाभिमान की राजनीति का संदेश दिया।

जिस समाज में स्वाभिमान मर जाता है, वहाँ संख्या भी बेकार हो जाती है और जिस समाज में स्वाभिमान जीवित रहता है, वहाँ छोटी संख्या भी इतिहास बदल देती है।

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है।

सबसे बड़ा संकट है, सामूहिक दृष्टि का अभाव। हर क्षेत्र में व्यक्ति हैं, लेकिन सामूहिक परियोजना नहीं है। हर जिले में नेता हैं, लेकिन राष्ट्रीय दृष्टि नहीं है। हर चुनाव में सक्रियता है, लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक कार्यक्रम नहीं है।

अब क्या करना होगा?

कुर्मी समाज को अगले 25 वर्षों का कार्यक्रम बनाना होगा। सैकड़ों छात्रावास बनाने होंगे। हजारों मेधावी छात्रों को सहायता देनी होगी। पुस्तकालय स्थापित करने होंगे। शोध संस्थान बनाने होंगे। सामाजिक इतिहास लिखना होगा। अपने महापुरुषों पर शोध कराना होगा।

युवाओं को प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता की ओर ले जाना होगा।

राजनीति को अंतिम लक्ष्य नहीं, साधन मानना होगा।

अंतिम चेतावनी

इतिहास किसी समाज को बार-बार अवसर नहीं देता। जो समाज समय रहते नहीं जागते, वे दूसरों की राजनीति का स्थायी ईंधन बन जाते हैं।

आज कुर्मी समाज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है नारों का, भावनाओं का, चुनावी उत्साह का।

दूसरा रास्ता है शिक्षा, संगठन, विचार और स्वाभिमान का।

पहला रास्ता भीड़ बनाता है।

दूसरा रास्ता इतिहास बनाता है।

निर्णय कुर्मी समाज को करना है।

क्या वह केवल वोट बैंक बना रहेगा?

क्या वह केवल दूसरों की रैलियाँ भरता रहेगा?

क्या वह केवल नेताओं की जय-जयकार करता रहेगा?

या फिर वह ज्ञान, संगठन, संघर्ष और आत्मसम्मान के आधार पर नई सामाजिक क्रांति का निर्माण करेगा?

याद रखो,

जिस दिन कुर्मी समाज ने अपनी संख्या को संगठन में, संगठन को विचार में और विचार को सामाजिक शक्ति में बदल दिया, उस दिन भारतीय राजनीति का नक्शा बदल जाएगा और उस दिन इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कुर्मी समाज के कितने मंत्री थे।

इतिहास यह लिखेगा कि कुर्मी समाज ने एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दिया था।

टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक सह सामाजिक कार्यकर्ता)

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Monday, 18 May 2026

कबीर : भक्ति, विद्रोह और बहुजन चेतना — गोलेन्द्र पटेल

कबीर : भक्ति, विद्रोह और बहुजन चेतना

“सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।/जाके हिरदै सांच है, ताके हिरदै आप॥” अर्थात् कबीर के अनुसार सत्य ही मनुष्य का सर्वोच्च तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप, क्योंकि सच्चे हृदय में ही ईश्वर का वास होता है। इसी भाव को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी प्रतिध्वनित करते हुए 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में लिखा कि “सत्य के लिए किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’’ क्योंकि सत्य ही मनुष्य की सबसे बड़ी आध्यात्मिक और मानवीय शक्ति है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में संत कबीर निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी धारा के प्रमुख प्रवर्तक, धर्म-सुधारक और लोक-जागरण के महान चेतक हैं। उन्होंने अद्वैतवाद, सूफी प्रेमतत्त्व, हठयोग तथा वैष्णव भक्ति का समन्वय करते हुए सामाजिक आडंबर, जातिगत अहंकार और कर्मकांड का तीखा प्रतिरोध किया। शुक्ल जी कबीर की प्रखर प्रतिभा, तीक्ष्ण व्यंग्य, उलटबांसियों और कुछ अत्यंत मर्मस्पर्शी रूपकों की प्रशंसा करते हैं, किंतु तुलसी, सूर और जायसी की रसात्मक तथा कलात्मक परंपरा की तुलना में उनकी काव्य-सृष्टि को अपेक्षाकृत कम साहित्यिक और अधिक उपदेशप्रधान मानते हैं। उनके अनुसार कबीर की वाणी में भक्तिरस की सरसता सीमित है, भाषा कहीं-कहीं अव्यवस्थित तथा शैली फुटकल दोहों और पदों पर आधारित है; इसलिए वे कबीर को महान सामाजिक चेतना से संपन्न संत तो स्वीकार करते हैं, परंतु पूर्ण अर्थों में महाकवि नहीं मानते। इसके विपरीत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को बहुआयामी, क्रांतिकारी और गहन मानवतावादी व्यक्तित्व के रूप में देखा। द्विवेदी जी की दृष्टि में कबीर केवल संत या समाज-सुधारक नहीं, बल्कि अद्वितीय कवि, दार्शनिक और सांस्कृतिक समन्वयवादी थे। उन्होंने कबीर की भाषा, व्यंग्य-शक्ति और आध्यात्मिक चेतना को हिंदी साहित्य की अनुपम उपलब्धि मानते हुए उन्हें भारतीय चिंतन-परंपरा का स्वाभाविक और विराट विकास सिद्ध किया। इस प्रकार जहाँ शुक्ल जी की दृष्टि तुलसी-केंद्रित साहित्यिक आदर्शवाद से प्रभावित होकर अपेक्षाकृत सीमित प्रतीत होती है, वहीं द्विवेदी जी की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी दृष्टि कबीर के समग्र व्यक्तित्व को अधिक व्यापक और न्यायपूर्ण ढंग से उद्घाटित करती है।

मुझको संत कबीर की अँगुली पकड़ाने वाले लेखक हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। अर्थात् मेरे लिए संत कबीर तक पहुँचने का प्रथम वैचारिक सेतु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रहे। सन् 2018 में कबीर की ओर मेरी वैचारिक यात्रा का आरंभ उन्हीं की प्रसिद्ध कृति कबीर से हुआ, जिसे हिंदी साहित्य में कबीर-विमर्श की आधारशिला माना जाता है। द्विवेदी जी ने कबीर को केवल कवि, समाज-सुधारक अथवा सर्वधर्म-समन्वयकारी व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा, बल्कि मूलतः एक ऐसे भक्त और धर्मगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया, जिनके अन्य सभी रूप उनकी भक्ति-साधना की अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं। उन्होंने कबीर के बहुआयामी व्यक्तित्व, निर्गुण भक्ति, नाथपंथ और सहजमार्ग से उनके संबंध, उलटबाँसियों की आध्यात्मिक गहनता तथा उनके अक्खड़, निर्भीक और मस्तमौला स्वभाव का अत्यंत संतुलित एवं समग्र विश्लेषण किया। द्विवेदी जी किसी भी संकीर्ण वैचारिक घेरे में कबीर को बाँधने के विरोधी थे। उनकी दृष्टि में कबीर ऐसे स्वतंत्र चेतना-संपन्न संत थे, जो हिंदू होकर भी मात्र हिंदू नहीं थे और मुसलमान होकर भी केवल मुसलमान नहीं थे। उन्होंने कबीर की भाषा-सामर्थ्य को “वाणी का डिक्टेटर” कहकर उसकी अद्वितीय अभिव्यक्ति-शक्ति को रेखांकित किया तथा यह स्थापित किया कि कबीर की वाणी में आध्यात्मिक साहस, सामाजिक प्रतिरोध और मानवीय करुणा का अप्रतिम समन्वय विद्यमान है। इसी कारण द्विवेदी जी की व्याख्या कबीर को एकांगी दृष्टियों से मुक्त कर समग्र भक्त-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करती है और आज भी कबीर-आलोचना की सबसे विश्वसनीय तथा प्रभावशाली आधारभूमि मानी जाती है।

किन्तु भारतीय समाज और साहित्य की बहुजन परंपरा में कबीर को केवल भक्त कवि के रूप में नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, धार्मिक पाखंड और पुरोहितवादी सत्ता के विरुद्ध एक महान विद्रोही चेतना के रूप में देखा जाता है। दलित, बहुजन और अंबेडकरवादी चिंतकों की दृष्टि में कबीर उस श्रमण-परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने मनुष्य की गरिमा, श्रम की प्रतिष्ठा, अनुभव-आधारित ज्ञान और सामाजिक समानता को धर्म का वास्तविक आधार माना। उनकी निर्गुण भक्ति मूर्तिपूजा, वेद-पुराण आधारित आध्यात्मिक एकाधिकार और जातिगत ऊँच-नीच के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध है, जो शोषित समुदायों को प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अधिकार प्रदान करती है। “जाति न पूछो साधु की” जैसी उनकी उद्घोषणा मनुष्यता और ज्ञान को जन्माधारित श्रेष्ठता से ऊपर स्थापित करती है। यही कारण है कि बौद्ध-श्रमण परंपरा में कबीर को बहुजन मुक्ति-चेतना का अग्रदूत माना गया। अनेक चिंतक बुद्ध, कबीर और आंबेडकर को समानता, तर्कशीलता और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक श्रृंखला के रूप में देखते हैं, जहाँ बुद्ध ने सामाजिक-आध्यात्मिक विद्रोह की नींव रखी, कबीर ने मध्यकाल में उसे लोकभाषा और निर्भीक वाणी प्रदान की और आंबेडकर ने उसे आधुनिक राजनीतिक तथा संवैधानिक संघर्ष का स्वरूप दिया। धर्मवीर जैसे विचारकों ने कबीर को दलित-बहुजन परंपरा का केंद्रीय स्तंभ मानते हुए उन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों धार्मिक रूढ़ियों से अलग स्वतंत्र जनचेतना का प्रतिनिधि बताया, जबकि कंवल भारती ने कबीर और आंबेडकर के ब्राह्मणवाद-विरोध तथा वंचितों के पक्षधर मानवीय दृष्टिकोण की समानताओं को रेखांकित किया। कबीर की वाणी में पंडित और मौलवी दोनों की आलोचना, कर्मकांड का निषेध तथा “ना हिंदू, ना मुसलमान” जैसी उद्घोषणाएँ उन्हें किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान से परे सार्वभौमिक मानवीय विद्रोह का प्रतीक बनाती हैं। बौद्ध धम्म के साथ भी उनकी वैचारिक निकटता स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि दोनों परंपराएँ तर्क, अनुभव, समानता और अंधविश्वास-विरोध पर बल देती हैं। यद्यपि कबीर स्वयं किसी संगठित धर्म के अनुयायी नहीं थे, फिर भी उनकी चेतना श्रमण, सिद्ध, सहज और लोकधर्मी परंपराओं के गहरे प्रभाव से निर्मित प्रतीत होती है। ‘मगहर’ का बौद्ध परंपरा से जुड़ा शब्दार्थ भी इस विमर्श को और अर्थपूर्ण बनाता है। पालि साहित्य की कुछ व्याख्याओं में ‘मगहर’ शब्द को ‘बौद्धों का गाँव’ अथवा बौद्ध चेतना से जुड़े स्थल के रूप में देखा गया है, जहाँ ‘मग’ का संबंध बौद्ध समुदाय या मग/बर्मा की बौद्ध परंपरा से तथा ‘हर’ का अर्थ गाँव या बस्ती से जोड़ा जाता है। संत कबीर का अपने अंतिम दिनों में मगहर जाना और वहीं निर्वाण प्राप्त करना इस स्थल को विशेष आध्यात्मिक एवं वैचारिक महत्त्व प्रदान करता है। यह भी उल्लेखनीय है कि मगहर, सारनाथ से अधिक दूर नहीं है, जहाँ गौतम बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। इसलिए अनेक बहुजन और श्रमण चिंतक कबीर के मगहर-गमन को केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी रूढ़ियों और मोक्ष-संबंधी अंधविश्वासों के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक उद्घोषणा के रूप में भी देखते हैं। ‘मगहर’ शब्द की ध्वनि और तुकांत—जैसे हर, नैहर, पीहर और शहर—भी लोकभाषा में इसकी सांस्कृतिक आत्मीयता को और गहरा करते हैं। इस प्रकार बहुजन, अंबेडकरवादी और मूलनिवासी विमर्श में कबीर केवल संत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय मुक्ति और वैचारिक प्रतिरोध की एक जीवित परंपरा हैं, जिनकी वाणी आज भी जाति-विरोधी संघर्षों और लोकतांत्रिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करती है।
★★★


रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com






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