Wednesday, 25 March 2026

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की 15 बहुजन कविताएँ

 युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की 15 बहुजन कविताएँ:-


“बुद्ध, कबीर, रैदास, तुकाराम एवं पलटूदास मेरे जीवन की पञ्चवाणी हैं। बुद्ध, गोरख, सरहपा, रैदास, कबीर, तुकाराम, पलटूदास मेरे जीवन के सप्त स्वर हैं, सप्त ऋषि हैं।”



1).
युद्ध की तुक बुद्ध

जब-जब युद्ध हुआ है
तब-तब याद आये हैं बुद्ध
सिर्फ़ तुक भर

बुद्ध पर केंद्रित है कविता
किन्तु बुद्ध
पूरी तरह से गायब हैं

जैसे बुद्ध
युद्ध से पहले गायब होते हैं
लेकिन युद्ध में उपस्थित
और
युद्ध के बाद पुनः गायब हो जाते हैं

बोधभूमि में बोया गया बीज
बोधिवृक्ष में तब्दील हो चुका है
उसकी जटाएँ चूम रही हैं
जड़ों को और
बगल में बैसाख का बादल झुका है

बुद्ध की धरती पर
जिस भिक्षुणी के पात्र में पीड़ा है
क्रुद्ध भाषा में शुद्ध करुणा
उसके लिए कीड़ा है

वह त्रिपिटक में स्वयं को ढूँढ रही है
उसकी मुक्ति से पहले ही बंकर में बुद्ध 
युद्ध के विरुद्ध
अहिंसा के अस्त्र और शांति के शस्त्र
तैयार कर रहे हैं

बुद्ध 
अब बुद्ध नहीं,
ईश्वर हैं यह उनकी प्रतिमाएँ बोलती हैं
बुद्ध पूर्णिमा के दिन
लेकिन रचनाओं में रोज़!


2).
भाषा का दर्द


भाषा का भी होता है दर्द
यह मैंने पालि से जाना

जो त्रिपिटकाचार्य हैं
मानो उन्होंने ठान लिया हो
कि पालि लँगड़ी ही रहे
उसकी बैसाखी भी
विद्यार्थियों के हाथ न लगे।

नहीं तो वह भी चल पड़ती
धीरे-धीरे, स्वच्छन्द
बुद्ध-वचनों को गुनगुनाती हुई
गाँव की पगडंडियों पर
संघाटी और चीवर संग
सरसराती समीर के सहारे
प्रातः-सायं
स्वस्थ होने की ओर।

हिन्दी मुझसे बोली,
“वत्स!
पालि के साथ संस्कृत भी पढ़ो
तभी ‘हिन्दी साहित्य में बुद्ध’
विषय पर शोध कर पाओगे
अन्यथा आज के भिक्षुओं-से
भटकते रहोगे
एक द्वार से दूसरे द्वार।”

मैं भी तो बीएचयू में
बी.ए. कोर में पालि
और डिप्लोमा में संस्कृत पढ़ रहा हूँ
किन्तु लगता है
मुझे भी बुद्ध ही बनना होगा
जैसे वे सिद्धार्थ से बुद्ध बने
बिना गुरु के।

क्या मैं समझ पाऊँगा
उनका उपदेश
तत्कालीन समाज का सत्य
बिना किसी पालि-गुरु के?

उत्तर खोजते-खोजते
न जाने कब पहुँच गया
तुलसी बाबा के पास
वहाँ से बाबा नागार्जुन तक
मीरा से आधुनिक मीरा तक
अज्ञेय से आधुनिक शुक्ल तक
परन्तु उलझनों में भटकने से अच्छा है
पुनः अपने विषय पर लौट आऊँ।

पालि-अध्ययन की समस्याएँ अनेक हैं
पुस्तकों का अभाव
सही मार्गदर्शन का न होना
स्नातक स्तर से नीचे
लगभग नगण्य उपस्थिति
इस भाषा पर संगोष्ठियों का अभाव
विद्यार्थियों और बौद्धाचार्यों के बीच
संवाद का न होना
इत्यादि, इत्यादि।

बुद्ध पर विमर्श
अन्य भाषाओं में अधिक होता है
इसलिए उनका साहित्य
समाज का दर्पण बन गया है

और हमारा पालि-साहित्य
चुपचाप
किसी आलमारी में
बैठा रो रहा है।

यह कितनी शर्म की बात है
हम सबके लिए
जो इसे पढ़ते और पढ़ाते हैं!

हे तथागत!
हे युगप्रवर्तक बुद्ध!
राग, द्वेष, लोभ और दोष से
चित्त को शुद्ध करो।

हे सत्यसाधक, महाश्रमण!
हमें पालि का ज्ञान दो
हमें योग्य गुरु दो
हे पालि-संरक्षक!
पालि पर अपना ध्यान दो!!


“नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स” (पालि मंत्र) का अर्थ है “उस भगवन्, अरहंत, पूर्ण सम्यक् बुद्ध को मैं नमस्कार करता हूँ।”

नमो = नमस्कार / वंदना

तस्स = उस (उनके)

भगवतो = भगवन् (गुणों से संपन्न)

अरहतो = अरहंत (क्लेशों का नाश करने वाले)

सम्मासम्बुद्धस्स = पूर्णतः सम्यक् ज्ञान प्राप्त बुद्ध

यह बौद्ध परंपरा में अत्यंत पवित्र वंदना है, जो बुद्ध के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करती है।




3).

महाछठ पर्व

थेरवाद मौन नहीं है 
घाट पर देखा हमने वैचारिक युद्ध
कि पालि-प्राकृत के शब्दों के बीच 
अगरौटा कहे ठेकुआ से 
कि छठ पूजा बौद्ध का महापर्व है 
छठी माई हैं महामाया 
और सूर्य हैं तथागत बुद्ध!


4).
बुद्ध की धरती कहाँ है?

सुख को साझा करने से 
दुख दीपक बन जाता है

भाषा में भय से मुक्त कौन है?

किसी ने कहा 
कि बुद्ध की धरती युद्ध नहीं,
शांति में विश्वास करती है

हम सोचने लगे 
कि बुद्ध की धरती कहाँ है?
हम खोजने लगे 
उनका धम्म कहाँ है?
ध्यान, ज्ञान और बोध कहाँ हैं?
और पाया 
कि प्रेम जीवन का सबसे मूल्यवान अनुभव है
प्रज्ञा करुणा से उपजती है 
सत्य से आगाह करना 
तथागत होना है 
और तृष्णा का भंजन करना 
भगवान होना है 

वज्रयानियों ने बुद्ध को भगवान में तब्दील किया 
बुद्ध गुफाओं में पथरा गये 

बुद्ध को धीरे-धीरे 
धरती से गायब किया गया
बुद्ध बन गए 
देवी-देवता 
अब बुद्ध किसी और धर्म की पूज्य प्रतिमा हैं 
उनके अवतार हैं, मुक्तिदाता हैं 
जिनके उपासक हमें मनुष्य नहीं समझते 
जिनकी नज़र में हम ब्रह्मा के पाँव से पैदा हुये हैं 
माँ के पेट से नहीं!

जो बौद्धमठों के मुखिया हैं 
उनके लोग 
बुद्ध से इतनी नफ़रत क्यों करते हैं?
उन्हें सम्यक दृष्टि से इतनी परेशानी क्यों है?
वे नागवंशियों के अपमान क्यों करते हैं?
वे क्यों घोलते हैं ज़हर 
बना रस में
पूछ रहे हैं रैदास-कबीर!

इस समय 
बुद्ध ढकने के विरुद्ध उघर रहे हैं 
वे जनमानस के मार्गदाता है न!



“अप्प दीपो भव‌।”—तथागत बुद्ध 

“ज्ञान सरीखा गुरू न मिल्या। चित्त सरीखा चेला।।”—गोरखनाथ 

“कहत कबीर मैं सो गुरु पाया जा का नाऊ विवेकु रे।”—कबीरदास 

“अनुभव अद्वितीय आचार्य है।”—गोलेन्द्र पटेल



5). 

प्रगतिशील होना 

ठहरना 
जड़ होना है, 
लेकिन चलना 
जड़ता के विरुद्ध प्रगतिशील होना है! 
कोई भी कल्पना,
कोई भी यथार्थ, 
कोई भी धर्म, 
कोई भी दर्शन, 
कोई भी वाद, 
कोई भी विचारधारा, 
कोई भी इंसान, 
कोई भी विज्ञान मेरा स्थायी पड़ाव नहीं है।

[मैं अल्लाह-ईश्वर, ईसा-यीशु, देवी-देवता, गॉड, ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव), गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, भगवती, हनुमान, राम, कृष्ण से लेकर तथागत बुद्ध, महावीर स्वामी, रविदास, कबीरदास, तुकाराम, तुलसीदास, सूरदास, जायसी, चंदनबाला, मीराँबाई, आंडाल, अक्क महादेवी, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बाबा साहब अम्बेडकर, ई०वी० रामास्वामी नायकर पेरियार, कांशीराम, बिरसा मुंडा, तिलका माँझी, बसवन्ना, मोहनदास कर्मचंद गाँधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, कार्ल मार्क्स, लेनिन, फ्रायड, सार्त्र, डार्विन, कोपरनिकस, अल्बर्ट आइंस्टीन, न्यूटन, एडिशन, सी०वी० रमन, रविन्द्र नाथ टैगोर, पिताश्री नन्दलाल पटेल इत्यादि का केवल और केवल पाठक हूँ,  मैं किसी का भी पुजारी नहीं हूँ। इनके पास जो भी मेरे काम की चीज़ें होंगी, उन्हें कृतज्ञ भाव से ग्रहण करूँगा और आगे बढूँगा।]


6).

बुद्धत्व 
प्रेम  मेरी  आत्मा  है  
और  ज्ञान शरीर।
मन में हैं रैदास 
और अंतर्मन में कबीर।।


7).

भयावह समय

कोई बुद्ध का चीवर लपेटे है,
पर भीतर हिंसा का साँप पाले हुए।
कोई कबीर की झीनी चादर में,
जात की गाँठें कसकर बाँधे हुए।

कोई अंबेडकर का चोला पहने,
पर संविधान को गिरवी रखे।
कोई मार्क्स का मुखौटा लगाए,
पर पूँजी के चरणों में झुके।

कोई अशोक का मुकुट चमकाए,
पर युद्ध की भूख न छोड़े।
कोई प्रगतिशीलता का पैरहन पहने,
पर मन के कोने में सामंती जोड़े।

कोई सावित्रीबाई फुले की साड़ी में,
पर लड़कियों की कलम तोड़े।
कोई वर्जीनिया वुल्फ के वस्त्र में,
पर स्त्री-स्वर को दबा छोड़े।

कोई तलवा चाटते हुए चोटी काटने का सौदा कर रहा है,
कोई पत्थर पूजकर पाखंड-मुक्त होने का नाटक।
कोई रविदास के रव में मनुष्य होने का दावा,
पर गली में जात पूछकर रास्ता काटे।

कोई तुकोबा की वाणी का जप करे,
पर भूखे पेट को नहीं देखे।
कोई नांगेली-निर्भया का आँसू रचे,
पर स्त्री के घाव पर नमक छिड़के।

कोई अक्क महादेवी का अध्यात्म बेचता है,
कोई अंडाल के नाम पर शोषण ढकता है।
कोई मीराँ पर भजन गाता है,
पर बेड़ियाँ पाँव में ही रखता है।

कोई संकीर्णता की कोठरी में सनातनी है,
कोई भाषा की जेल में भारतीय।
और इस तरह
सज-धज, मुखौटे, प्रतीकों के मेले में
हम जी रहे हैं
सबसे भयावह समय में।


8).
पिता शब्द संवाहक श्रमिक हैं

इस फ़ादर्स डे पर पिता ने कहा,
उजड्ड और उद्दंड भी उदात्त चरित्र हो जाते हैं समय आने पर 
पर, इस समय हर संबंध कमज़ोर नज़र आ रहे हैं 

पिता कबीर तो नहीं हैं 
पर, वे "मसि कागद छुयौ नाहिं,
कलम गह्यौ नाहिं हाथ" वाली परंपरा में आते हैं 
उनके पास जीवन का अनुभव है 
बिल्कुल कबीर की तरह 
रव है 

उनका पेशा भी कबीर का पेशा रहा 
वे बोलते भी कबीर की तरह हैं
पर, वे कबीर नहीं हैं 
न ही वे कबीर का वारिस होने का दावा करते हैं 

हाँ, यह ज़रूर दावा करते हैं 
कि जितना कबीर उनके कंठ में हैं
उतना ही तुलसी भी हैं 
उनकी नस-नस में उनके दोहे और चौपाइयाँ हैं 

पर, वे तुलसी की तरह तंदुरुस्त नहीं हैं
क्योंकि वे कबीर की भाँति कर्मी हैं, लोकधर्मी हैं!

पिता गाँव में गणितज्ञ के रूप में जाने जाते हैं 
वे ग्रामकवि हैं
वे शब्द संवाहक श्रमिक हैं 
वे संतानों के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं 
वे बोधिसत्व हैं 
उनके पास कैवल्य का कुआँ है

उनको सुनना 
साक्षात रैदास व तुकाराम को सुनना है 
वे भाषा में महामानव हैं, बुद्ध हैं 

पिता जब जलते हैं 
तब माँ रोशनी बन जाती हैं
उनका प्रेम 
अँधेरे में प्रदीप है 
उनकी करुणा 
अमर प्रगीत है
हम उनकी वात्सल्यता के बारे में क्या कहें?
वे हमसे अमीर खुसरो की तरह पहेलियाँ पूछते हैं
वे हमारे लिए पानी की भाँति चट्टानों से जूझते हैं 

वे हमारे हीरो हैं 
हम उन्हें फॉलो करते हैं हृदय से

क्योंकि पिता संतान के संगीत के स्वर होते हैं!


9).
तीन जातियाँ

राजनीति की ऐसी-तैसी!

इस शोर-शराबा में परिवर्तन का बहुत मद्धिम रव है 
जाति समीकरण को समझे बिना 
चुनाव जीतना किसी भी पार्टी के लिए असंभव है

ख़ैर, खोज़ जारी है 

हिन्दी हैं हम 
लेकिन अभी तक हमें एक भी अमरदेसवा के नागरिक नहीं मिले
हाँ, कबीर के वक्ता ज़रूर मिले हैं 
मिले हैं बुद्ध के वारिस भी!

उस वक्त हम सबसे अधिक अपमानित महसूस करते हैं 
जब कोई हमारी जाति का ही हमें अछूत समझता है 

हमें जो तीन जातियाँ हर जगह मिलती हैं 
बी०एच०यू० से परास्नातक करने के बाद 
हम उन पर भरोसा नहीं करते हैं 
चाहें वे हमारी शुभचिंतक ही क्यों न हों?

वे भाषा में प्रगतिशील होती हैं 
लेकिन भाव में नहीं,
वे प्रगतिशीलता का पैरहन पहनकर मिलती हैं 

हमें लगता है कि वे हमारा शुभ चाहती हैं 
लेकिन वे भीतर से हमारा शत्रु होती हैं
यह हमें तब पता चलता है 
जब वे अपने दिनों को हमारे बेदिनों से जोड़ती हैं 

जब वे कहती हैं कि हमें तुम्हारी चिंता है
तुम संघर्ष जारी रखना
हमारी पृष्ठभूमि भी तुम्हारी जैसी थी 
ठीक उसी समय 
हम उनके चेहरे की चमक पढ़ते हैं 
और पाते हैं कि उधार की उदासी क्षणिक होती है 
कि वे संस्कार से सागर नहीं, सरोवर हैं 

हमें सुतही की बात याद आती है 
कि सरोवर में शंख नहीं, 
सिर्फ़ मोतीविहीन सीप पायी जाती है 

वे हमसे नदी की तरह मिलती हैं 
लेकिन वे भीतर से गड़ही होती हैं 
उनकी शुभकामना 
हमारे लिए शोककामना होती है 

यह जितना सनातन सच है, उतना ही अद्यतन सच भी 
वे पेशे से प्रखर प्रवक्ता हैं, हमारी शिक्षिकायें हैं
लेकिन वे कट्टर जातिवादी हैं, संकुचित सोच हैं
उनके बारे में यह हमारा ख़ुद का ही नहीं,
बल्कि एक समाज का अनुभव है 
क्या तुम जानते हो, वे तीनों कौन हैं?

जो भय और भूख की भूमि पर 
भटई भाषा के प्रतिनिधि हैं!


10).
राम भिक्षाटन पर हैं

राम जब कटोरा लेकर शिव की नगरी में भिक्षा माँग रहे हैं
तब मैंने करियायी गंगा के घाटों पर सोचा
कि वेदों के महानायक राम-कृष्ण नहीं,
इन्द्र हैं यानी मेरा प्रत्यय

वाल्मीकि के राम परमात्मा हैं,
और तुलसी के राम मर्यादापुरुषोत्तम,
निराला के राम पूज्य पुरुष हैं
और नरेश मेहता के राम संशयग्रस्त सामान्य पुरुष

देवों की भाषा से लोकभाषा में राम का आना
उनका ईश्वर से मनुष्य होना है
लेकिन अब वे राष्ट्रवाद का राग अलापने वाले हिंदुत्व के रूपक हैं

मैं नयी रामकथा का वाचक हूँ

मुझ पर भरोसा करो 
मैं राम नाम नहीं जप रहा
केवल उनके त्याग की ओर संकेत कर रहा हूँ;

जहाँ
कृष्ण—
राजनीति के हाथों में
धर्म के सिक्के हैं
और राम— 
जुआरियों के हाथों में
हुक्म के इक्के हैं

वहाँ भला कोई भक्त कैसे हो सकता है?

क्या रविदासिया रामनामी को कबीर के राम से ख़तरा है?
क्या हनुमान के राम सरकार को लेकर आ रहे हैं? 
क्या बौद्धों के राम चुप रहेंगे?
क्या जैनों के राम कुछ कहेंगे?
क्या सबके अपने-अपने राम हैं?
इस वक्त विपक्ष में खड़े कवि का क्या काम है?

राम मेरी कुटिया में कब आयेंगे?
मैंने पूछा
आत्मीय राम-भक्तिन से
तो उन्होंने बताया कि जब मेरी नौकरी लगेगी
तब आयेंगे राम मेरी कुटिया में
फिलहाल अयोध्या आ रहे हैं राम!

राम पर सवाल दागे जाएंगे
पर, राम मौन रहेंगे!

राम के बारे में विष्णु-भक्त नारद ने बताया है 
कि उनके जैसा न कोई उदार है
न कोई कृपालु है, न कोई प्रजापालक है, 
न कोई वीर है, न कोई सुंदर है, न कोई पत्नीव्रता है...

राम को बड़ा मन नहीं, बड़ा मंदिर चाहिए
उन्हें हृदय नहीं, हिदुस्तान चाहिए
वे धर्म के रक्षक कम, राजनीति के रक्षक अधिक हैं
उनके दर्शन हेतु काली पूँजी के पुजारी
इस ठंड में बर्फ़ीले पथ के पथिक हैं
उनको लेकर देशभर में अजीब सी दीवानगी है
वे नीति, नीयत, नेतृत्व और ट्रैक रिकॉर्ड की गारंटी हैं
इस सरकार के लिए

राजा राम से बड़ा दिख रहा है
वह नोट को छोड़कर सभी जगह दिख रहा है
वह पतंग पर दिख रहा है
वह पुल पर दिख रहा है
वह प्लेटफार्म पर दिख रहा है
वह सड़क पर दिख रहा है
वह सोशल मीडिया पर दिख रहा है
वह कलम पर दिख रहा है
वह कमल पर दिख रहा है

वह कमल पर ब्रह्मा जैसा दिख रहा है
उसने राम को अपने आगे तुच्छ सिद्ध कर दिया है
इस वक्त लोग राम-राम नहीं,
बल्कि उसी का नाम जप रहे हैं!


11).
“रैदास की कठौती और कबीर के करघे के बीच
तुलसी का दुख एक सेतु की तरह है
जिस पर से गुज़रने पर
हमें प्रसाद, प्रेमचंद व धूमिल आदि के दर्शन होते हैं!

यह काशी
बेगमपुरा, अमरदेसवा और रामराज्य की नाभि है।” 
(कवितांश : ‘कठौती और करघा’ से/ कवि : गोलेन्द्र पटेल)


12).
खजूरगाँव में बुद्ध के पदचिह्न हैं

निःसंदेह भाषा में मानवता की अथाह मात्रा है

एलोरा की गुफा-12 में कौन हैं?
अजंता की गुफा-9 में कौन हैं?
अर्धचंद्राकार में अजंता की गुफाएँ हैं 
अर्धचंद्राकार में बोधगया से सारनाथ की धम्म यात्रा है 

इसी यात्रा के दौरान बुद्ध रुके थे खजूरगाँव में 
यहाँ उनके पदचिह्न हैं, प्रभाव है 

पीपल में भूत नहीं रहते हैं
गूलर में दैत्य नहीं रहते हैं 
क्योंकि उनका संबंध बुद्धत्व से है 
उनके प्रत्येक पत्ते पर लिखा है— ‘अप्प दीपो भव।
चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय
लोकानुकंपाय...।’

बुद्ध कोई देवता नहीं हैं  
फिर भी वे हमारी आस्था की एकमात्र शरणस्थली हैं
उन्हें देखते ही मन श्रद्धा से भर उठता है
हृदय की शांति, दया, करुणा, मैत्री, ममता, प्रेम, प्रज्ञा और दुख अर्क बन जाते हैं 
लेकिन उनके पास ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्’ जैसा कुछ नहीं है 
वे ‘एहिपस्सिको’* के पक्षधर हैं 
उनसे संवाद करने का अर्थ है अनुभव को महत्त्व देना 
उदात्त चरित्र होना, बोधिसत्व होना 
उनका ‘अनित्य’ ही सनातन सत्य है!

हे महोपासक श्रमजीवी संत कबीर! 
हमने तुम्हारी निर्वाणभूमि ‘मगहर’ का सही मायने समझने की प्रक्रिया में जाना 
कि बनारस का रस सारनाथ है 

हे महामानव! महाभिक्खु! 
तुम्हरे ही वारिस हैं गुरु रैदास और गुरु तुकोबा
आज भी किसी अंगुलिमाल के अहिंसक होने में तुम्हारा ही हाथ है 
तुम्हारा वचन सार्थक ज्ञान है 
क्योंकि तुमने कहा है, 
मानव-मानव एक सामान है!


* स्वाक्खातो भगवतो धम्मो सन्दिट्ठीको अकालिको।एहिपस्सिको ओपनायिको पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूहीति।।

[ एहिपस्सिको ≠ एहि, पश्य ]



14).
रविदास का प्रकाश

ज्ञान की गुफा में
यह कैसा अंधेरा घुप है?
बेगमपुर में आया वाया बसंत
उड़ रहे हैं शब्दों के रंग
इस शिशिर की कठुआती धूप चुप है
राग अमर अनुराग अमर
इस नए समय में लहरा उठी रविदासी उमंग

ओ समुज्ज्वल भाषा के मुनीश्वर!
धर्म की ध्वनि, संत के स्वर
वेदना के वैभव, वाणी-वंदना प्रखर
जाति की ज्योति अक्षर-अक्षर
सहज चिंतन और सहज संवेदना के कवि
श्रम की प्रतिष्ठा करने वाले रवि
तुम्हारे संकल्प की डगर पर
चलना सीखला रहे हैं गुरुवर
तुम सदा जीवित रहना मेरे भीतर

ओ मृत्युंजय चर्मकार!
मैंने तुम्हें सच के सूत्र में साध ली है
नाम की प्रार्थना से पीड़ा के प्रगीत में बाध लिया है
मन के धागे में मुक्ति के मंत्र सा तुम्हारे विचार

मैंने अपने कंधे पर नाध लिया है
जीवन का जुआ
तुम्हारा लोकव्यवहार अद्वितीय है
तुम मेरी आत्मा को इसी तरह प्रकाशित करना
मैं तुम्हारा भक्त नहीं, साधक हूँ!


“चेतना के धरातल पर तुकाराम कबीर से अधिक रविदास के करीब हैं, उनके विठ्ठल रविदास के राम हैं, उनके पांडुरंग रविदास के निरंजन हैं और ये दोनों शब्द (पांडुरंग और निरंजन) बौद्ध साहित्य में बुद्ध के लिए प्रयोग हुए हैं। एक भयंकर साज़िश के तहत जैसे बुद्ध को विष्णु का अवतार बताया गया है, वैसे ही विठ्ठल को भी विष्णु का अवतार बताया गया है !”—गोलेन्द्र पटेल (चंदौली, उत्तर प्रदेश)

“कहते हैं गुरु रविदास 
कि सगुण का प्रकाश है निर्गुण का भास
कर्म पर करो विश्वास 
धम्म की धरती पर छुओ आकाश।”
―गोलेन्द्र पटेल 



15).
बुद्ध


अहिंसा के आलोक में 
विचारों के बीज अंकुरित हो रहे हैं 

मनोभूमि में 
एक ऐसा प्रज्ञा का पेड़ उगा है 
जिसमें दया, करुणा, ममता, मानवता
प्रेम, शांति और समानता फलती-फूलती है 
हर मौसम में, हर क्षण 

जिसके तने तर्क करना सिखाते हैं 
और पत्तियाँ प्रतीत्यसमुत्पाद की बातें 
जिसकी शाखाओं के पास सम्यक दृष्टि है 
और जड़ों में अनुभव का रस 

जिसकी खुराक है अँधेरा
जिसकी छाये में शांतिप्रिय और अहिंसक पथिक 
शील और सत्य से संवाद करते हैं
जो युद्ध की आँधियों के विरुद्ध खड़ा रहता है 
वह भावभूमि में कौन है?
जिसकी हरियाली को जानने के लिए 
हृदय में पीड़ा का होना 
अनिवार्य है!

©गोलेन्द्र पटेल

★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com





















Wednesday, 11 March 2026

कथा-सम्राट के आलोक में : ‘प्रेमचंदनामा’ की ग्यारह कविताओं की वैचारिक और काव्यात्मक समीक्षा

कथा-सम्राट के आलोक में : ‘प्रेमचंदनामा’ की ग्यारह कविताओं की वैचारिक और काव्यात्मक समीक्षा

Munshi Premchand आधुनिक हिंदी-उर्दू साहित्य के ऐसे युगनिर्माता लेखक हैं जिन्होंने कथा-साहित्य को जनजीवन की वास्तविकताओं से जोड़ा। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को Lamhi गाँव (निकट Varanasi) में हुआ और उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। साधारण परिवार में जन्म लेने के कारण उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक विघ्नों और सामाजिक विषमताओं के बीच बीता। यही जीवनानुभव आगे चलकर उनके साहित्य की संवेदनात्मक शक्ति और सामाजिक दृष्टि का आधार बने।

प्रेमचंद ने प्रारंभ में उर्दू में “नवाब राय” नाम से लेखन आरम्भ किया, किंतु औपनिवेशिक शासन द्वारा उनकी देशभक्तिपरक कृति Soz-e-Watan पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद उन्होंने “प्रेमचंद” नाम अपनाया और हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं में सृजन किया। शिक्षक और शिक्षा विभाग के अधिकारी के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1921 में Mahatma Gandhi के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर सरकारी नौकरी त्याग दी और साहित्य को ही अपना मुख्य कर्मक्षेत्र बना लिया।

उनकी रचनाओं में भारतीय समाज का बहुआयामी यथार्थ दिखाई देता है। किसान-जीवन की दयनीयता, जातिगत भेदभाव, स्त्री-पीड़ा, दहेज-प्रथा, जमींदारी शोषण और औपनिवेशिक व्यवस्था की विसंगतियाँ उनके कथा-साहित्य के प्रमुख विषय रहे। इस कारण उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद का महत्वपूर्ण प्रवर्तक माना जाता है। उनकी भाषा सहज, संवादपूर्ण और लोकानुभव से संपृक्त है, जिससे उनकी रचनाएँ व्यापक पाठक-समाज तक पहुँचीं।

प्रेमचंद ने लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास और तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनके महत्वपूर्ण उपन्यासों में Sevasadan, Rangbhumi, Nirmala, Gaban, Karmabhumi और विशेष रूप से Godaan उल्लेखनीय हैं। वहीं “कफन”, “पूस की रात”, “ईदगाह” और “दो बैलों की कथा” जैसी कहानियाँ हिंदी कहानी परंपरा की अमर धरोहर मानी जाती हैं।

8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया, किंतु उनका साहित्य आज भी भारतीय समाज के इतिहास और संवेदना का जीवंत दस्तावेज माना जाता है। प्रेमचंद की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने साहित्य को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और परिवर्तन की शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसी कारण हिंदी कथा-साहित्य के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत ऊँचा और स्थायी माना जाता है।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित काव्य–श्रृंखला “प्रेमचंदनामा” में प्रस्तुत ये ग्यारह कविताएँ हिंदी कथा–परंपरा के महान यथार्थवादी लेखक मुंशी प्रेमचंद को समर्पित एक विशिष्ट काव्यात्मक आलोचना के रूप में सामने आती हैं। यह केवल श्रद्धांजलि या स्तुतिगान नहीं है, बल्कि साहित्य, समाज और इतिहास के त्रिकोण में खड़े प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व का संवेदनात्मक पुनर्पाठ भी है। इन कविताओं में कवि ने प्रेमचंद के साहित्यिक संसार, उनके पात्रों, उनके विचार और उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता को इस तरह समेटा है कि कविता आलोचना का रूप धारण कर लेती है और आलोचना कविता का।


1. प्रेमचंद की परंपरा का काव्यात्मक पुनर्पाठ

“प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना” कविता पूरी श्रृंखला का वैचारिक द्वार खोलती है। यहाँ कवि प्रेमचंद को केवल एक लेखक नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखता है। प्रेमचंद के वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव को संबोधित करते हुए कवि उनसे संवाद करता है।

कविता में प्रेमचंद की रचनाओं और पात्रों की लंबी सूची केवल स्मरण नहीं है; वह एक सांस्कृतिक मानचित्र है। गोदान, गबन, रंगभूमि, सेवासदन और निर्मला जैसे ग्रंथों के माध्यम से कवि यह दिखाता है कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज का जीवंत अभिलेख है।

यहाँ कविता एक तरह से यह स्थापित करती है कि प्रेमचंद का साहित्य केवल कथाओं का संग्रह नहीं बल्कि सामाजिक इतिहास का संवेदनात्मक दस्तावेज है।


2. यथार्थवाद की वैचारिक प्रतिष्ठा

दूसरी कविता “यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद” में कवि प्रेमचंद को आधुनिक भारतीय यथार्थवाद का अर्जुन घोषित करता है। यहाँ प्रेमचंद को सामाजिक संघर्ष के योद्धा के रूप में देखा गया है।

कवि के अनुसार प्रेमचंद सामंती मानसिकता और महाजनी सभ्यता के विरुद्ध एक साहित्यिक युद्ध हैं। यह विचार प्रेमचंद के प्रगतिशील साहित्यिक दृष्टिकोण से मेल खाता है, जिसे आगे चलकर प्रगतिशील लेखक आंदोलन ने भी विकसित किया।

कविता में प्रेमचंद को “आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाला व्यास” कहा जाना उनके रचनात्मक महत्त्व को मिथकीय ऊँचाई प्रदान करता है।


3. साहित्यिक आस्था का मंत्र

तीसरी कविता “ॐ प्रेमचंदाय नमः” में कवि प्रेमचंद को एक साहित्यिक देवता की तरह स्मरण करता है। यहाँ आस्था का स्वर है, पर यह आस्था अंधभक्ति नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों की आस्था है।

कवि गाँव के जीवन, खेत, किसान और प्रकृति के दृश्य के माध्यम से यह दिखाता है कि प्रेमचंद की रचनात्मक चेतना ग्रामीण भारत से गहराई से जुड़ी हुई है। यह वही दुनिया है जिसमें होरी, हल्कू, गोबर, धनिया जैसे पात्र जन्म लेते हैं।


4. करुणा और प्रतिरोध की कथा

“प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद” कविता प्रेमचंद के साहित्य की केंद्रीय शक्ति—करुणा—को रेखांकित करती है।

सद्गति का दुखी चमार, कफन के घीसू-माधव, और ठाकुर का कुआँ की गंगी जैसे पात्रों के माध्यम से कवि यह दिखाता है कि प्रेमचंद का साहित्य शोषित समाज की आवाज है।

कवि का यह कथन कि “कर्ज वह कीड़ा है जो एक बार काट ले तो मृत्यु निश्चित है” दरअसल प्रेमचंद के किसान–जीवन की त्रासदी का सार है।


5. किसान जीवन का महाकाव्यात्मक चित्र

“होरी का चरित्र चित्रण” कविता में कवि ने प्रेमचंद के अमर पात्र होरी का पुनर्सृजन किया है।

यहाँ होरी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि भारतीय किसान की सामूहिक नियति है। उसकी गरीबी, उसकी मर्यादा, उसका श्रम और उसकी करुणा—ये सब मिलकर किसान जीवन की महागाथा रचते हैं।

कवि की दृष्टि में होरी का चरित्र भारतीय कृषि–संस्कृति की नैतिक आत्मा है।


6–7. लमही का अनुभव और प्रतीकात्मकता

कविताएँ “मैं लमही में हूँ” और “फटे जूते का जादू” अत्यंत सूक्ष्म और व्यंग्यात्मक हैं।

यहाँ लमही केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक स्मृति है। कवि कहता है कि लोग प्रेमचंद के घर तो जाते हैं, पर उनके पात्रों के घर नहीं जाते।

यह कथन साहित्य के वास्तविक उद्देश्य की ओर संकेत करता है—लेखक की पूजा नहीं, बल्कि उसके पात्रों की पीड़ा को समझना।


8. सामाजिक विडंबना का तीखा व्यंग्य

“हल्कू का कर्ज” कविता अत्यंत छोटी होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है।

तीन रुपये के कर्ज से पीड़ित हल्कू का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि हमने प्रेमचंद को तीस रुपये की माला पहना दी। यह आधुनिक समाज की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है—हम लेखक का सम्मान करते हैं, पर उसकी बातों को जीवन में नहीं उतारते।


9. पाठक और लेखक का संबंध

“लेखक का घर पाठक का हृदय है” कविता अत्यंत दार्शनिक है।

यहाँ कवि यह स्थापित करता है कि किसी लेखक का वास्तविक घर उसकी कृतियों में नहीं बल्कि उसके पाठकों के हृदय में होता है।

इस संदर्भ में संत परंपरा के महान कवि कबीर की पंक्ति “मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे…” का संकेत देकर कवि गुरु-शिष्य परंपरा को भी जोड़ देता है।


10. पात्रों की अमरता

“पात्र जीवित हैं” कविता प्रेमचंद की रचनात्मक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण प्रस्तुत करती है।

कवि का कथन कि “प्रेमचंद का दुर्भाग्य है कि उनके पात्र जीवित हैं” एक गहरी साहित्यिक सच्चाई को व्यक्त करता है—जब तक समाज में वही अन्याय और विषमता मौजूद है, तब तक प्रेमचंद के पात्र भी जीवित रहेंगे।


11. आलोचना और पुनर्पाठ

अंतिम कविता “प्रकाशस्तंभ हैं प्रेमचंद” समकालीन आलोचना की बहसों को सामने लाती है।

यह कविता बताती है कि प्रेमचंद पर लगातार नए दृष्टिकोणों से बहस हो रही है—दलित विमर्श, स्त्री विमर्श और अन्य आलोचनात्मक दृष्टियों के माध्यम से।

कवि का निष्कर्ष यह है कि बहसें प्रेमचंद को छोटा नहीं करतीं; बल्कि उनके कद को और ऊँचा करती हैं।


समग्र मूल्यांकन

इन ग्यारह कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे प्रेमचंद को केवल स्मरण नहीं करतीं, बल्कि उन्हें वर्तमान में पुनर्जीवित करती हैं।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल ने यहाँ तीन स्तरों पर काम किया है—

  1. साहित्यिक पुनर्पाठ – प्रेमचंद की रचनाओं और पात्रों का पुनर्मूल्यांकन।
  2. सामाजिक आलोचना – शोषण, जाति और गरीबी की संरचनाओं का उद्घाटन।
  3. काव्यात्मक श्रद्धांजलि – प्रेमचंद की मानवीय चेतना को सम्मान।

भाषा के स्तर पर कविताएँ मुक्तछंद में होते हुए भी लयात्मक हैं। उनमें प्रतीक, रूपक और व्यंग्य का सुंदर संयोजन है।


निष्कर्ष

“प्रेमचंदनामा” की ये ग्यारह कविताएँ हिंदी साहित्य में एक अनूठा प्रयोग हैं। यहाँ कविता, आलोचना और स्मृति एक साथ मिलकर एक नई साहित्यिक विधा का रूप लेती हैं।

कवि ने यह सिद्ध किया है कि मुंशी प्रेमचंद केवल अतीत के लेखक नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के भी मार्गदर्शक हैं। उनके पात्र, उनकी करुणा और उनका यथार्थ आज भी भारतीय समाज की धड़कन में मौजूद है।

इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि प्रेमचंदनामा प्रेमचंद की परंपरा का काव्यात्मक पुनर्जन्म है—जहाँ साहित्य, समाज और मनुष्यता एक ही प्रकाश में दिखाई देते हैं।


समग्र रूप से देखा जाए तो ‘प्रेमचंदनामा’ की ये कविताएँ श्रद्धा, आलोचना और संवाद—इन तीनों तत्वों का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत करती हैं। इन रचनाओं में प्रेमचंद केवल अतीत के लेखक नहीं हैं; वे आज भी सामाजिक न्याय, मानवीय समानता और साहित्यिक प्रतिबद्धता के प्रकाशस्तंभ के रूप में उपस्थित हैं।

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे प्रेमचंद को किसी दैवीय महापुरुष की तरह नहीं, बल्कि जनता के लेखक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि में प्रेमचंद का साहित्य खेतों की गंध, श्रम की गरिमा और मनुष्य की गरिमा का साहित्य है। यही कारण है कि ये कविताएँ केवल स्मरण नहीं, बल्कि समकालीन समाज को उसकी नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाने वाली रचनाएँ बन जाती हैं।

इस प्रकार ‘प्रेमचंदनामा’ की ये ग्यारह कविताएँ प्रेमचंद की रचनात्मक परंपरा को नए संदर्भों में समझने का सार्थक प्रयास हैं। इनमें श्रद्धा की ऊष्मा, आलोचना की दृष्टि और मानवीय करुणा का गहरा स्वर मौजूद है—और यही इनकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।


—भागीरथी सिंह 

चंदौली, उत्तर प्रदेश।


Thursday, 5 March 2026

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत || गोलेन्द्र पटेल

 क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की अग्रदूत

❝जो व्यक्ति राष्ट्रमाता क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले के संघर्ष और विचारों से अनभिज्ञ है, उसके साथ जीवन साझा करने से बेहतर है कि हम अकेले रहना स्वीकार करें।❞ — गोलेन्द्र पटेल


भारतीय समाज में यह एक गंभीर प्रश्न है कि कितने लोग, विशेषतः अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग, यह जानते हैं कि भारत की प्रथम महिला शिक्षिका कौन थीं। यह तथ्य अक्सर भुला दिया जाता है कि भारत की पहली महिला शिक्षिका किसी उच्च वर्ण से नहीं, बल्कि समाज के वंचित तबकों से आईं। वे थीं क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने शिक्षा और समानता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की नई दिशा दी।

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ। उनके पिता खंडोजी नैवसे और माता लक्ष्मीबाई थीं। किशोरावस्था में उनका विवाह समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ। ज्योतिराव ने उन्हें शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया और यही शिक्षा आगे चलकर एक बड़े सामाजिक आंदोलन का आधार बनी। सावित्रीबाई ने 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय प्रारम्भ किया और स्वयं उसकी शिक्षिका बनीं। इस प्रकार वे भारतीय इतिहास में पहली महिला शिक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।

उनका संघर्ष केवल विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्त्री-शिक्षा, विधवा-उद्धार, जाति-भेद के विरोध और मानवीय समानता के लिए निरंतर काम किया। समाज में व्याप्त कुरीतियों—बाल विवाह, छुआछूत, स्त्री-अशिक्षा और विधवाओं के उत्पीड़न—के विरुद्ध उन्होंने खुलकर आवाज उठाई। फुले दंपती ने ऐसे आश्रय-गृह भी स्थापित किए जहाँ असहाय महिलाओं और नवजात शिशुओं को सुरक्षा और देखभाल मिल सके।

सावित्रीबाई ने महिलाओं को संगठित करने के लिए महिला मंडलों का निर्माण किया, जहाँ अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वाभिमान जैसे विषयों पर चर्चा होती थी। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के लिए समान अधिकार की भावना को व्यवहार में उतारा—यहाँ तक कि अपने घर का कुआँ भी सभी जातियों के लिए खोल दिया, जो उस समय सामाजिक समानता का साहसिक कदम था।

वे केवल समाजसेवी ही नहीं, बल्कि साहित्यकार भी थीं। वे मराठी की पहली कवयित्री हैं, उनकी कृतियों में शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के विचार स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनकी लेखनी सरल भाषा में समाज के वंचित वर्गों को जागरूक करने का माध्यम बनी।

1897 में पुणे में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने रोगियों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। एक बीमार बच्चे को उपचार के लिए ले जाते समय वे स्वयं संक्रमण का शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उनका जीवन सेवा, साहस और समर्पण की अद्वितीय मिसाल बन गया।

सावित्रीबाई फुले की विरासत आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा है। स्त्री-शिक्षा, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की जो मशाल उन्होंने जलाई, वह आज भी संघर्ष और परिवर्तन की राह को प्रकाशमान करती है। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति का सबसे सशक्त साधन है।

सावित्री ज्ञान-ज्योति


सावित्री के ज्ञान से, जो जन अब भी दूर।
ऐसे अज्ञानित संग से, रहना अच्छा दूर॥
तीन जनवरी जन्म दिन, उन्नीसवीं सदी भोर।
ज्ञान-ज्योति बन जल उठीं, जन-मन के हर छोर॥

खंदोजी की संतति थीं, लक्ष्मी माँ की लोर।
संघर्षों की गोद में, पला क्रांति का जोर॥
भारत की प्रथम शिक्षिका, ब्राह्मण कुल की नाहिं।
ओबीसी की बेटी थी, सावित्री की चाहिं॥

ज्योतिराव संग बंध गया, जीवन का अभियान।
शिक्षा, समता, स्वाभिमान, बन गया पहचान॥
भिड़े वाड़ा के द्वार से, खुला नया इतिहास।
बालिकाओं की पाठशाला, तोड़ा अंधा त्रास॥

काँटे, पत्थर, तिरस्कार, सहती रहीं निडर।
ज्ञान-पथ पर बढ़ चलीं, बनकर दीप प्रखर॥
अठारह विद्यालय से, फैला शिक्षा-धाम।
नारी, शूद्र, अनाथ सब, पाए नव-अभिराम॥

मुस्लिम मित्रों ने दिया, घर-आँगन का साथ।
लहुजी की पहरेदरी, बनी संघर्ष की थात॥
कुएँ का जल खोलकर, तोड़ी जाति दीवार।
प्यासे होंठों तक पहुँचा, मानवता का प्यार॥

विधवा-पीड़ा देख कर, खोला आश्रय-द्वार।
ममता से पाले शिशु को, दिया नया संसार॥
सत्यशोधक विवाह से, टूटी रूढ़ि-कमान।
बिना पुरोहित बंध गए, समता के अरमान॥

‘काव्यफुले’ की पंक्तियाँ, जगा रहीं स्वाभिमान।
‘रत्नाकर’ में गूँजता, शिक्षा-समता गान॥
स्त्री स्वर बन मंच पर, बोली निर्भय बात।
घर की सीमाएँ तोड़कर, बदली जग की जात॥

जाति, वर्ग, जेंडर सभी, देखे एक ही साथ।
सावित्री की दृष्टि में, मानवता की बात॥
प्लेग-काल में कंध पर, रोगी बालक लाय।
सेवा-पथ में प्राण दे, अमर कथा बन जाय॥

दस मार्च अठारह सौ, सत्तानबे का दिन।
सेवा में बलिदान से, अमर हुआ वह क्षण॥
विद्यालय, मंडल, गृह, जल— रचना दी समाज।
संघर्षों की यह धरोहर, बदले युग का आज॥

नारी यदि शिक्षित हुई, जागे घर परिवार।
ज्ञान-सूर्य से मिट गया, अज्ञानों का अँधियार॥
सावित्री की राह पर, जो भी बढ़ता जाय।
समता, शिक्षा, मानवता, जीवन में फल पाय॥



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


Monday, 2 March 2026

लघु कथा: चंदन की होली

 

चंदन की होली : गोलेन्द्र पटेल 

होली आने वाली थी और गाँव में रंगों की धूम मची थी।
गोलेन्द्र ने चौपाल पर खड़े होकर गंभीर स्वर में घोषणा की, “मित्रों! मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप दिया है कि मैं प्रेमिका के अलावा किसी के साथ होली नहीं खेल सकता। और कृपया, कोई भी कृत्रिम रंग, अबीर-गुलाल लेकर मेरे पास न आए। मेंहदी या चंदन ही स्वीकार्य है!”
लोग पहले तो चौंके, फिर मुस्कुरा उठे।
उधर मन ही मन गोलेन्द्र को याद आया कि कुछ दिन पहले महर्षि अगस्त्य ने आशीर्वाद दिया था, “वत्स! शीघ्र ही तुम्हारी GF से भेंट होगी।”
गोलेन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था, “भगवन्! मुझे किसी God Father से नहीं मिलना, आप ही मेरे पथप्रदर्शक हैं। मैं आपका ही गोलेन्द्र हूँ!”
होली के दिन सब लोग चमकीले रंगों से सराबोर थे, पर गोलेन्द्र सफेद कुर्ते में शांत खड़ा था। तभी एक बालिका आई, हाथ में चंदन लिए। उसने मुस्कुराकर उसके माथे पर तिलक लगाया और बोली, “सच्चा रंग वही है जो मन को रंग दे।”
गोलेन्द्र समझ गया, श्राप रंगों का नहीं, अहंकार का था। प्रेमिका कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि निर्मल प्रेम की अनुभूति थी।
उस दिन उसने जाना कि होली बाहर नहीं, भीतर खेली जाती है।

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (चंदौली, उत्तर प्रदेश।)

Sunday, 22 February 2026

एक दोस्त का आख़िरी पत्र : गोलेन्द्र पटेल

एक दोस्त का आख़िरी पत्र 


यह अंतर्मन की शुद्धतम पुकार है—
मेरे प्रिय मित्र!

यदि कभी मेरी किसी बात, व्यवहार या अनजानी भूल से तुम्हारे हृदय को ठेस पहुँची हो, तो उदार मन से मुझे क्षमा कर देना। मेरी सच्ची प्रार्थना है कि तुम्हारे जीवन के समस्त दुःख मेरे हिस्से आ जाएँ और मेरे हिस्से का समस्त सुख तुम्हारी झोली में भर जाए।

तुम जहाँ भी रहो, सदा आनंदित रहो, उल्लास से भरे रहो, अपने स्वप्नों और साहस के साथ आगे बढ़ते रहो। जीवन की किसी भी घड़ी में निराशा को अपने पास मत ठहरने देना, मत उदास होना।

और हाँ, मेरे लिए कभी मत रोना—
क्योंकि मैं देह से अधिक स्मृति हूँ, और स्मृति से भी अधिक एक रचनात्मक स्पंदन।
मुझे समय की धूल में नहीं, शब्दों की रोशनी में सँभाल कर रखना।
मुझे भाषा और कला के हवाले कर देना—
वहीं मैं जीवित रहूँगा, शांत, मुक्त और उज्ज्वल।

प्रिय साथी,
यह पत्र लिखते समय शब्द काँप रहे हैं, पर मन अद्भुत रूप से शांत है—जैसे कोई उदास मौसम स्वयं बोल उठे।

आज उसी मौसम ने मुझसे कहा—
कि मैं उस कली के लिए कार्तिक का बादल था,
जो तपते सूरज के प्रकोप से कुम्हला रही थी;
जिसे वसंत के स्वागत में एक प्रेम-पुष्प बनना था।

यदि कभी तुम्हें मेरी उपस्थिति में शीतलता मिली हो,
यदि मेरे शब्दों ने तुम्हारी थकान पर हल्की-सी छाया रखी हो,
तो समझ लेना—मैं उसी बादल की क्षणिक छाया था।
बादल ठहरते नहीं, वे केवल बरस कर आगे बढ़ जाते हैं।

इस उदास मौसम ने मुझसे यह भी कहा—
कि हम स्मृतियों के उजड़े हुए चमन हैं।
हमारी आँखों में जो चमकता हुआ मोती है,
वह दो फूलों का रोना है—
एक तुम, एक मैं।

लेकिन प्रिय, रोना ही अंत नहीं होता।
कुछ प्रेम खिलने के लिए नहीं,
स्मृति बनने के लिए जन्म लेते हैं।
कुछ साथियाँ जीवन-पथ पर हाथ थामने नहीं,
आत्मा को दिशा देने आते हैं।

यदि मेरी किसी भूल से तुम्हारा मन आहत हुआ हो,
तो उसे भी इस मौसम की धूल समझकर क्षमा कर देना।
तुम्हें हँसते देखना ही मेरी अंतिम इच्छा है।
तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा वसंत तुम्हें अवश्य मिले—
तुम प्रेम-पुष्प बनो, पूर्ण, प्रस्फुटित, सुगंधित।

मेरे लिए मत रुकना, मत रोना।
मैं कोई विरह का बोझ नहीं,
मैं केवल एक रचनात्मक स्मृति हूँ—
मुझे शब्दों के हवाले कर देना,
कला की शांत शरण में छोड़ देना।

जब कभी कार्तिक का बादल घिर आए,
या आँखों में कोई मोती चमक उठे—
समझ लेना, वह मैं नहीं,
हमारे प्रेम का शुद्धतम अंश है
जो तुम्हें आशीष देने आया है।

अंतिम प्रणाम सहित,
तुम्हारा
— गोलेन्द्र पटेल

चंदौली, उत्तर प्रदेश।


Friday, 20 February 2026

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल 

भारतीय इतिहास में कई ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें समय, सत्ता और वर्चस्व ने ढँक दिया। बहुजन चिंतन का एक महत्वपूर्ण कार्य उन दबे हुए अध्यायों को सामने लाना है। इसी संदर्भ में
राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले (11 अप्रैल 1827 - 28 नवम्बर 1890) का योगदान अत्यंत निर्णायक माना जाता है।

फुले और स्मृति की पुनर्खोज

उन्नीसवीं सदी में जब समाज पर वर्ण-आधारित वर्चस्व गहरा था, तब फुले ने इतिहास को बहुजन नजर से पढ़ने का साहस किया। 1869 में रायगढ़ स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज (19 फरवरी 1630 – 3 अप्रैल 1680) की समाधि की खोज और उसके सार्वजनिक स्मरण का कार्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था—वह प्रतीक था कि इतिहास पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं हो सकता।

फुले ने शिवाजी पर पोवाड़ा लिखकर यह स्थापित किया कि शिवाजी की स्मृति केवल दरबारों की नहीं, जनता की भी है। 1870 में शिवजयंती का सार्वजनिक आयोजन दरअसल सामाजिक आत्मसम्मान का आयोजन था—एक संदेश कि शासक की विरासत को जनता अपने अर्थों में पुनर्परिभाषित कर सकती है।


शिवाजी और सामाजिक संरचना

बहुजन दृष्टि शिवाजी को केवल महिमामंडित व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर देखती है।

  • उन्होंने विभिन्न जातियों, समुदायों और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपनी सेना और प्रशासन में स्थान दिया।
  • किसानों (रयत) के संरक्षण, कर-व्यवस्था में सुधार और सैनिकों को वेतन-आधारित प्रणाली देने जैसे कदम उठाए।

इन पहलों ने उन्हें “रयत का राजा” कहलाने का आधार दिया।

परंतु बहुजन विमर्श केवल उपलब्धियों की सूची तक सीमित नहीं रहता। वह यह भी पूछता है:
क्या उस दौर की सत्ता संरचना जाति-आधारित भेदभाव से पूर्णतः मुक्त थी?
क्या शिक्षा और निर्णय-प्रक्रिया में बहुजन समुदाय की समान भागीदारी थी?

ऐसे प्रश्न किसी व्यक्तित्व को कमतर करने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए होते हैं।


हिंदवी स्वराज की अवधारणा

शिवाजी द्वारा प्रतिपादित “हिंदवी स्वराज” को बहुजन चिंतन इस अर्थ में पढ़ता है कि यह विदेशी प्रभुत्व और अन्याय के विरुद्ध स्वशासन का विचार था।

यह अवधारणा उस समय के राजनीतिक आत्मसम्मान का प्रतीक थी। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि स्वराज का अर्थ केवल सत्ता-परिवर्तन न होकर सामाजिक समानता भी हो।


धर्म और शासन

इतिहास में कई दस्तावेज़ यह संकेत देते हैं कि शिवाजी ने धार्मिक स्थलों की रक्षा और सम्मान का आदेश दिया। प्रशासन में विभिन्न धर्मों के लोगों की भागीदारी थी।

बहुजन दृष्टि यहाँ भी संतुलन रखती है—
धार्मिक सम्मान और सामाजिक न्याय, दोनों को साथ देखने की आवश्यकता है।

आज के संवैधानिक भारत में राज्य का आधार धर्म नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार हैं—यह दृष्टि हमें विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के विचारों से मिलती है।


राजतंत्र और लोकतंत्र का प्रश्न

बहुजन समाज के सामने एक वैचारिक प्रश्न भी है—
यदि आज हम संविधान-आधारित लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो ऐतिहासिक राजाओं का स्मरण किस रूप में करें?

क्या वह सांस्कृतिक स्मृति है?
क्या वह आत्मसम्मान का प्रतीक है?
या क्या उसे आलोचनात्मक विवेक के साथ पढ़ा जाना चाहिए?

बहुजन दृष्टि कहती है—
सम्मान और आलोचना विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।


वर्तमान संदर्भ

आज शिवाजी की जयंती विभिन्न वैचारिक धाराएँ अलग-अलग अर्थों में मनाती हैं।

  • कुछ उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • कुछ सामाजिक न्याय और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में।
  • कुछ उनके प्रशासनिक कौशल और सैन्य नेतृत्व पर बल देते हैं।

बहुजन दृष्टि इन सभी दावों के बीच संतुलन साधते हुए यह आग्रह करती है कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को एकांगी प्रतीक में सीमित न किया जाए।


परिवार और वंश

शिवाजी का पारिवारिक और राजवंशीय इतिहास भी महत्वपूर्ण है। उनके पिता शाहजी राजे और माता जीजाबाई ने उनके व्यक्तित्व-निर्माण में भूमिका निभाई। उनके पश्चात संभाजी और राजाराम ने सत्ता संभाली, जिससे मराठा साम्राज्य की अलग-अलग शाखाएँ विकसित हुईं।

आज भी महाराष्ट्र में भोसले वंश की विभिन्न शाखाएँ सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं।


निष्कर्ष: बहुजन पुनर्पाठ का आग्रह

बहुजन दृष्टि का उद्देश्य किसी को देवत्व देना या नकार देना नहीं है।

उसका आग्रह है:

  • इतिहास को जनकेंद्रित नजर से पढ़ा जाए
  • सत्ता और समाज के संबंधों को समझा जाए
  • संविधान-आधारित समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को अंतिम आदर्श माना जाए

शिवाजी का स्मरण यदि सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और संगठन-शक्ति की प्रेरणा देता है, तो वह बहुजन चेतना का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन यदि स्मरण आलोचना से मुक्त होकर केवल महिमामंडन बन जाए, तो वह इतिहास की जटिलता को सीमित कर देता है।

इसलिए बहुजन दृष्टि कहती है—
इतिहास को श्रद्धा और प्रश्न, दोनों के साथ पढ़ें।
तभी स्वराज का विचार वर्तमान में सार्थक होगा।



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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Wednesday, 11 February 2026

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026, सामाजिक न्याय और उत्तर प्रदेश की राजनीति : एक संक्षिप्त विश्लेषण || डॉ. पल्लवी पटेल की भूमिका और राजनीतिक पृष्ठभूमि : गोलेन्द्र पटेल

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026, सामाजिक न्याय और उत्तर प्रदेश की राजनीति : एक संक्षिप्त विश्लेषण

(तस्वीर साभार: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म)

उच्च शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है; यह सामाजिक गतिशीलता, आत्मसम्मान और लोकतांत्रिक चेतना का आधार भी है। जब विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भेदभाव, असमान अवसर या संस्थागत उपेक्षा के प्रश्न उठते हैं, तो वे सीधे संविधान की मूल भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—से जुड़ जाते हैं। इसी व्यापक संदर्भ में UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 का मुद्दा राष्ट्रीय और प्रांतीय राजनीति के केंद्र में आया।

1. UGC इक्विटी रेगुलेशन : उद्देश्य और बहस

प्रस्तावित विनियमों का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव-निरोधक तंत्र को सुदृढ़ करना, शिकायत-निवारण प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना तथा SC, ST, OBC, महिलाओं, दिव्यांगजनों, अल्पसंख्यकों, ट्रांसजेंडर समुदाय और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों को सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराना है।

समर्थकों का तर्क है कि यह कदम ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को वास्तविक समान अवसर देने की दिशा में आवश्यक है। विरोधियों की आशंका है कि इससे संस्थानों की स्वायत्तता या प्रशासनिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इस प्रकार, यह विवाद केवल एक नियम का नहीं, बल्कि शिक्षा की सामाजिक भूमिका को लेकर दो दृष्टिकोणों का है।

(वीडियो साभार: Dr. Pallavi Patel के फेसबुक पेज़ से )

2. डॉ. पल्लवी पटेल की भूमिका और राजनीतिक पृष्ठभूमि

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डॉ. पल्लवी पटेल एक प्रमुख नाम हैं। वे सिराथू विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक हैं और अपना दल (कमेरावादी) की अग्रणी नेता के रूप में जानी जाती हैं। वे दिवंगत डॉ. सोनेलाल पटेल की पुत्री हैं, जिन्होंने पिछड़े और वंचित समुदायों की राजनीतिक चेतना को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

सोनेलाल पटेल की चार बेटियों—पारुल, पल्लवी, अनुप्रिया और अमन—में राजनीतिक सक्रियता विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। परिवार के भीतर समय-समय पर वैचारिक और राजनीतिक मतभेद भी सामने आए, किंतु सामाजिक न्याय की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा प्रत्येक धड़ा करता रहा है।

डॉ. पल्लवी पटेल ने स्वयं को जनपक्षधर राजनीति से जोड़ा है—चाहे वह शिक्षा का प्रश्न हो, स्कूलों के विलय का मुद्दा, किसी हिंसक घटना के पीड़ित परिवार से मिलना हो या छात्र आंदोलनों में भागीदारी।

3. “चलो लखनऊ” और आंदोलन की राजनीति

10 फरवरी 2026 को UGC इक्विटी रेगुलेशन को लागू करने की मांग के समर्थन में लखनऊ में एक मार्च और धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस आंदोलन का आह्वान करते हुए डॉ. पल्लवी पटेल ने इसे केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का प्रयास बताया।

मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। बैरिकेडिंग, रोक-टोक और हिरासत की घटनाओं ने आंदोलन को और अधिक चर्चा में ला दिया। समर्थकों ने इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर कठोर कार्रवाई बताया, जबकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता का हवाला दिया।

यहाँ प्रश्न केवल पुलिस-प्रदर्शनकारी टकराव का नहीं था, बल्कि उस प्रतीकात्मक अर्थ का था जो एक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के साथ हुए व्यवहार से जुड़ गया। नारी-सम्मान, लोकतांत्रिक अधिकार और राजनीतिक असहमति—ये सभी मुद्दे एक साथ उभर आए।

4. सामाजिक न्याय बनाम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

आंदोलन के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों पर आरोप-प्रत्यारोप लगे। कुछ नेताओं पर यह आरोप लगाया गया कि वे वंचित समाज के वोट तो चाहते हैं, परंतु उनके मुद्दों पर खुलकर साथ नहीं देते। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगे—कि अलग-अलग समूहों के विरोध प्रदर्शनों के प्रति प्रशासनिक रवैया समान नहीं रहता।

हालाँकि लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि प्रत्येक दल अपनी राजनीतिक रणनीति के अनुसार प्रतिक्रिया दे। किंतु दीर्घकालिक समाधान के लिए आवश्यक है कि शिक्षा और समान अवसर जैसे मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर देखा जाए।

5. महिला नेतृत्व और प्रतीकात्मकता

डॉ. पल्लवी पटेल के आंदोलन ने महिला नेतृत्व के प्रश्न को भी केंद्र में ला दिया। भारतीय समाज में नारी-सम्मान का आदर्श अक्सर उद्धृत किया जाता है, परंतु वास्तविक राजनीतिक परिस्थितियों में महिला नेताओं को अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

जब किसी महिला प्रतिनिधि के साथ सार्वजनिक स्थल पर बलपूर्वक व्यवहार की खबरें सामने आती हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत घटना नहीं रह जाती; वह व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बन जाती है। समर्थकों ने इसे महिला अस्मिता से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने इसे राजनीतिक नाटकीयता बताया।

6. शिक्षा, संविधान और भविष्य

डॉ. पल्लवी पटेल ने अपने वक्तव्यों में बार-बार संविधान का उल्लेख किया—विशेषतः शिक्षा के अधिकार, समान अवसर और सामाजिक न्याय के संदर्भ में। उनका कहना रहा कि लोकतंत्र की असली कसौटी यह है कि क्या वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को भी समान अवसर देता है।

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 की बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उच्च शिक्षा अब केवल अकादमिक नीति का विषय नहीं रही; यह सामाजिक संरचना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक मूल्यों का भी प्रश्न बन चुकी है।

7. निष्कर्ष : संघर्ष, संवाद और लोकतांत्रिक मर्यादा

इस पूरे घटनाक्रम से तीन प्रमुख निष्कर्ष निकलते हैं—

  1. समानता का प्रश्न जीवंत है – उच्च शिक्षा में भेदभाव-निरोधक तंत्र को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
  2. राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है – किंतु उसका समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए।
  3. नेतृत्व की परीक्षा संघर्ष में होती है – चाहे वह सत्तापक्ष हो या विपक्ष, जनप्रतिनिधियों को मर्यादा और जिम्मेदारी दोनों निभानी पड़ती हैं।

डॉ. पल्लवी पटेल का यह रुख उनके समर्थकों के लिए साहस और प्रतिबद्धता का प्रतीक है। वहीं, विरोधियों के लिए यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। किंतु निर्विवाद तथ्य यह है कि UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026 ने सामाजिक न्याय, महिला नेतृत्व और लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक व्यापक बहस को जन्म दिया है।

अंततः, किसी भी लोकतंत्र की शक्ति इस बात में निहित होती है कि वह विरोध और समर्थन—दोनों को स्थान दे, और अंतिम निर्णय जनता तथा संवैधानिक संस्थाओं की सामूहिक बुद्धि से निकले।

जय संविधान। जय लोकतंत्र।

लिंक पर पढ़ें:- https://golendragyan.blogspot.com/2026/02/we-support-ugc-act-2026-ugc-golendra.html


मंडल कमीशन से लेकर UGC बिल 2026 तक की राजनीतिक चुप्पियों का सामाजिक विश्लेषण : गोलेन्द्र पटेल 

लिंक: https://golendragyan.blogspot.com/2026/01/ugc-2026.html


लिंक: https://golendragyan.blogspot.com/2026/01/nfs-not-found-suitable.html

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रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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