Friday, 20 February 2026

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल

शिवाजी, फुले और स्वराज का पुनर्पाठ : गोलेन्द्र पटेल 

भारतीय इतिहास में कई ऐसे प्रसंग हैं जिन्हें समय, सत्ता और वर्चस्व ने ढँक दिया। बहुजन चिंतन का एक महत्वपूर्ण कार्य उन दबे हुए अध्यायों को सामने लाना है। इसी संदर्भ में
राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले (11 अप्रैल 1827 - 28 नवम्बर 1890) का योगदान अत्यंत निर्णायक माना जाता है।

फुले और स्मृति की पुनर्खोज

उन्नीसवीं सदी में जब समाज पर वर्ण-आधारित वर्चस्व गहरा था, तब फुले ने इतिहास को बहुजन नजर से पढ़ने का साहस किया। 1869 में रायगढ़ स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज (19 फरवरी 1630 – 3 अप्रैल 1680) की समाधि की खोज और उसके सार्वजनिक स्मरण का कार्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं था—वह प्रतीक था कि इतिहास पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं हो सकता।

फुले ने शिवाजी पर पोवाड़ा लिखकर यह स्थापित किया कि शिवाजी की स्मृति केवल दरबारों की नहीं, जनता की भी है। 1870 में शिवजयंती का सार्वजनिक आयोजन दरअसल सामाजिक आत्मसम्मान का आयोजन था—एक संदेश कि शासक की विरासत को जनता अपने अर्थों में पुनर्परिभाषित कर सकती है।


शिवाजी और सामाजिक संरचना

बहुजन दृष्टि शिवाजी को केवल महिमामंडित व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर देखती है।

  • उन्होंने विभिन्न जातियों, समुदायों और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपनी सेना और प्रशासन में स्थान दिया।
  • किसानों (रयत) के संरक्षण, कर-व्यवस्था में सुधार और सैनिकों को वेतन-आधारित प्रणाली देने जैसे कदम उठाए।

इन पहलों ने उन्हें “रयत का राजा” कहलाने का आधार दिया।

परंतु बहुजन विमर्श केवल उपलब्धियों की सूची तक सीमित नहीं रहता। वह यह भी पूछता है:
क्या उस दौर की सत्ता संरचना जाति-आधारित भेदभाव से पूर्णतः मुक्त थी?
क्या शिक्षा और निर्णय-प्रक्रिया में बहुजन समुदाय की समान भागीदारी थी?

ऐसे प्रश्न किसी व्यक्तित्व को कमतर करने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए होते हैं।


हिंदवी स्वराज की अवधारणा

शिवाजी द्वारा प्रतिपादित “हिंदवी स्वराज” को बहुजन चिंतन इस अर्थ में पढ़ता है कि यह विदेशी प्रभुत्व और अन्याय के विरुद्ध स्वशासन का विचार था।

यह अवधारणा उस समय के राजनीतिक आत्मसम्मान का प्रतीक थी। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक दृष्टि से यह भी महत्वपूर्ण है कि स्वराज का अर्थ केवल सत्ता-परिवर्तन न होकर सामाजिक समानता भी हो।


धर्म और शासन

इतिहास में कई दस्तावेज़ यह संकेत देते हैं कि शिवाजी ने धार्मिक स्थलों की रक्षा और सम्मान का आदेश दिया। प्रशासन में विभिन्न धर्मों के लोगों की भागीदारी थी।

बहुजन दृष्टि यहाँ भी संतुलन रखती है—
धार्मिक सम्मान और सामाजिक न्याय, दोनों को साथ देखने की आवश्यकता है।

आज के संवैधानिक भारत में राज्य का आधार धर्म नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार हैं—यह दृष्टि हमें विश्वरत्न बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर के विचारों से मिलती है।


राजतंत्र और लोकतंत्र का प्रश्न

बहुजन समाज के सामने एक वैचारिक प्रश्न भी है—
यदि आज हम संविधान-आधारित लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, तो ऐतिहासिक राजाओं का स्मरण किस रूप में करें?

क्या वह सांस्कृतिक स्मृति है?
क्या वह आत्मसम्मान का प्रतीक है?
या क्या उसे आलोचनात्मक विवेक के साथ पढ़ा जाना चाहिए?

बहुजन दृष्टि कहती है—
सम्मान और आलोचना विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।


वर्तमान संदर्भ

आज शिवाजी की जयंती विभिन्न वैचारिक धाराएँ अलग-अलग अर्थों में मनाती हैं।

  • कुछ उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
  • कुछ सामाजिक न्याय और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में।
  • कुछ उनके प्रशासनिक कौशल और सैन्य नेतृत्व पर बल देते हैं।

बहुजन दृष्टि इन सभी दावों के बीच संतुलन साधते हुए यह आग्रह करती है कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को एकांगी प्रतीक में सीमित न किया जाए।


परिवार और वंश

शिवाजी का पारिवारिक और राजवंशीय इतिहास भी महत्वपूर्ण है। उनके पिता शाहजी राजे और माता जीजाबाई ने उनके व्यक्तित्व-निर्माण में भूमिका निभाई। उनके पश्चात संभाजी और राजाराम ने सत्ता संभाली, जिससे मराठा साम्राज्य की अलग-अलग शाखाएँ विकसित हुईं।

आज भी महाराष्ट्र में भोसले वंश की विभिन्न शाखाएँ सामाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं।


निष्कर्ष: बहुजन पुनर्पाठ का आग्रह

बहुजन दृष्टि का उद्देश्य किसी को देवत्व देना या नकार देना नहीं है।

उसका आग्रह है:

  • इतिहास को जनकेंद्रित नजर से पढ़ा जाए
  • सत्ता और समाज के संबंधों को समझा जाए
  • संविधान-आधारित समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को अंतिम आदर्श माना जाए

शिवाजी का स्मरण यदि सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और संगठन-शक्ति की प्रेरणा देता है, तो वह बहुजन चेतना का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन यदि स्मरण आलोचना से मुक्त होकर केवल महिमामंडन बन जाए, तो वह इतिहास की जटिलता को सीमित कर देता है।

इसलिए बहुजन दृष्टि कहती है—
इतिहास को श्रद्धा और प्रश्न, दोनों के साथ पढ़ें।
तभी स्वराज का विचार वर्तमान में सार्थक होगा।



रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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