Saturday, 30 July 2022

प्रेमचंदनामा : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविताएँ / कथा सम्राट प्रेमचंद की 142 वीं जयंती पर स्मृति की कृति


 
प्रेमचंदनामा : गोलेन्द्र पटेल

1. प्रेम के प्रदीप प्रेमचंद


दुखिया चमार के चेहरे पर

दर्द का दाग है

उसे देखने वाली आँखों में आग है

जहाँ जड़ता की जड़ का फटना

सद्गति की सड़क पर अंतिम यात्रा करना है


संवेदना के श्यामपट पर लिखा है

सामंतवाद मुर्दाबाद!

प्रत्येक पंक्ति में प्रसव की पीड़ा है

कर्ज वह कीड़ा है

जो एक बार काट ले 

तो आदमी की मृत्यु निश्चित है

होरी इस बात का गवाह है


आज जो चरवाह है

वह सत्ता का चारा है

हर हलधर हालात का मारा है

आह! जीवन की रंगभूमि में खड़ा सूर

लाचार बेसहारा बेचारा है

मरजाद की बेड़ी से मुक्त किसान

हल्कू मजदूर

'पूस की रात' से हारा है


महाजनी व वर्णव्यवस्था का मुँह लाल है

जो क्रांतिकारिन धनिया के गाल का कमाल है

मालती व सोफिया प्रेम की ममतामयी मूर्ति हैं

मेहता व विनय की स्फूर्ति हैं

सिलिया वंचना के भीतर वंचना का शिकार है

विधवा झुनिया से गोबर को प्यार है

अपने मर्द द्वारा मार खाती स्त्री को 

उसकी छाती पर चढ़कर 

उसकी मूँछ उखाड़ने का अधिकार है


अब जब न्याय अमीर के लिए भोग है

गरीब के लिए रोग है

तब सब योग सोग है

यह शब्द और अर्थ का कैसा संयोग है!


बुधिया की चीख यह सीख है कि

भूख हर आदमी की मति हर लेती है

आह! घीसू और मावध 

असंवेदनशीलता की आँच में आलू भुनते रहें

शराब के नशे में कबीर के पद चुनते रहें


मुन्नी, गंगी, सोना, रूपा, सरोज, आनंदी, गोविंदी

मनोविज्ञान की दृष्टि से सार्थक पात्र हैं

सिमोन द बोउआर के प्रेमी-पथप्रदर्शक पॉल सा‌र्त्र हैं

(मालती व मेहता के बीच का संबंध

भारतीय व पश्चात संस्कृति की समन्वित गंध है)


'पंच परमेश्वर' के 'रामधन' का मन पढ़ना

असल में न्याय के पक्ष में खड़ा होना है

जाति और धर्म से मनुष्यता का बड़ा होना है


प्रेमचंद कहानी के छंद में प्रेम के प्रदीप हैं

करुणा की कसौटी पर कथा में कथ्य व कला की कीप हैं!


(©गोलेन्द्र पटेल

31-07-2022)


2. प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना


प्रिय धनपतराय!

अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ

मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि

काश कि सभी को पता होता कि

विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है

पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!


हे रव के रवि!

क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि

उद्देश्य की 'सौत' है?


जब भी देखा

जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा

फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा

शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे

बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित

कलम का सच्चा सिपाही देखा


जब भी सुना

'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 

'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना

'बुधिया' की चीख सुना

मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना


और सुना

'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 

सार्थक स्वर का स्वाभिमान

'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 

'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',

'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'

'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'

'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है

सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है


तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 

एक अलग तरह का स्वराज है

'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक

सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है

बहुत मिठी मिठाई मर्चा है

कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है

स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि

सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है

और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है

जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार


'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे

दिशाहारा तो तुम नहीं थे

राहहारा तो तुम नहीं थे

हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!

थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक

तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे

'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार


हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!

हे नर के नायक!

दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब

बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 

मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला

भला कौन नहीं सीखना चाहता है?

तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना

तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना


हे चेतना के चिराग!

तुमने लगाई शोषकों के महल में आग

तुमने गाया सदा रोशनी का राग

तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को

सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया


हे सत्य के साधक!

परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!

स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!

ज़िन्दगी की तान के तूर्य!

तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,

खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग

और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है

शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है


हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!

अँधेरे में मानवता की मणि!

गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!

लमही से आ रही है जय की लय

तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए

और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'

तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है


हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!

तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो

तुम भविष्य द्रष्टा हो

तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 

____'नवजीवन' का तत्व

चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है

'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है

जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है


हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!

कहानी के अद्वितीय छंद!

संकल्प के अभियान में तब्दील होना

असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है

हवा नहीं है अनुकूल

परिवेश है प्रतिकूल

मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह

तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 


हे मानस के हंस!

'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!

नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!

मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ

'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे

आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी

'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 

मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़

कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!


(©गोलेन्द्र पटेल

30-07-2022)

3. यथार्थ के पार्थ प्रेमचंद


हे आकाशधर्मा अध्यापक! शिवरानी के सोहाग!
बहुत दिनों के बाद मिला है यह सौभाग्य
कि मैं लिखूँ काव्य में तुम्हारी रोशनी का राग
जाग! जाग!! महात्याग तू जाग!
अंतःकरण में आग लगी है लेकिन जल रही है लाग
भाग! भाग!! झाग तू भाग!
धारा की विपरीत दिशा में अनवरत
तैरने की कला है तेरे साथ
और हिम्मत के हाथ भी

हे उदात्त कलाकंद!
अवनि की आत्मा की आँख और आकाश का
पसंद---- प्रेमचंद!
तुम महाजनी मानसिकता एवं सामंती सोच के विरुद्ध
युद्ध हो
शांति की क्रांति का बुद्ध हो
जीवन के रंगमंच पर सामाजिक चित्त के चित्रकार हो
सांस्कृतिक टिप्पणीकार हो
भाषा में उदार हो
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के मंत्र हो
असली लोकतंत्र हो
प्रत्येक पाठक की पुतली हो

तुम्हारे सामने कल्पना और विचारधारा क्षुद्र सिद्ध हो चुकी हैं
आलोचना के अस्त्र-शस्त्र हो रहे हैं बेकार
तुम वेदना के वेत्ता व बुद्धि की वृष्टि हो
नवोन्मेषी इतिहास-दृष्टि हो
नवजागरण की सृष्टि हो

अंधेरे में 'आपका चित्र' आलोक है
'ख़ून सफे़द' दूध जैसा आर्यसमाज का श्लोक है
तुम्हारी लय का व्यापक लोक है
तुम प्रगतिशील जिज्ञासा के जहाज़ हो
तिमिर की तान के ताज हो

हे समय के शब्द! सत्य के स्वर!
मानवीय मशाल! स्मृति के बरगद विशाल!
काल-त्रिकाल सब मानते हैं कि तुम्हारी कृति अमर है
क्या ख़ूब किया तुम ने
समोज्ज्वल संवाद का इस्तेमाल!
सर्वप्रथम तुम ने देखा 'मनुष्यता का अकाल'
सत्ता से पूछा सवाल

हे संवेद्य, संवेदन, संवेदना व संवेदनशील के चतुष्टय!
अनुभव, ज्ञान, संकल्प व चेतनाधारी नज़र के नंद
--- प्रेमचंद!
मन की हिलोरें हँस रही हैं मंद-मंद
मैं डूब रहा हूँ तुम्हारे पसीने में जहाँ श्रम की सुगंध है
पहुँच गया हूँ 'कल्पकाया' के भीतर
ओ हो! यहाँ नीति और नीयत के बीच नियति है
मगर मष्तिष्क में मौजूद मति है

हे प्रयत्न के रत्न! यथार्थ के पार्थ!
तुम वैश्विक विश्वास हो
आधुनिक भारत का महाभारत लिखने वाले व्यास हो
सच कहूँ तो तुम एक अतृप्त प्यास हो
परम अभिव्यक्ति आलोकित आत्मा-सम्भवा हो
प्रत्येक पुनरुक्ति में पुनर्नवा हो

मैं चाहता हूँ____
तुम मुझे सृजन के 'संग्राम' में दाँव-पेंच सीखाओ!
मैं चाहता हूँ____
मैं तुम्हारे सम्मुख 'प्रेम प्रतिज्ञा' लूँ
कि अब 'नवजीवन' की 'कर्मभूमि' में श्रमरत रहूँगा!!

(©गोलेन्द्र पटेल
01-08-2022)



कवि : गोलेन्द्र पटेल

🙏संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Friday, 29 July 2022

प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना : गोलेन्द्र पटेल / प्रेमचंद पर कविता


 *प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना*

प्रिय धनपतराय!
अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ
मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि
काश कि सभी को पता होता कि
विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है
पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!

हे रव के रवि!
क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि
उद्देश्य की 'सौत' है?

जब भी देखा
जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा
फटे जूते में अनंत 'समर-यात्रा' का पथिक देखा
शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे
बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित
कलम का सच्चा सिपाही देखा

जब भी सुना
'सूरा' और 'होरी' की तबाही सुना 
'गोबर' और 'धनिया' की गवाही सुना
'बुधिया' की चीख सुना
मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुना

और सुना
'सोजेवतन' में 'बलिदान' का गान 
सार्थक स्वर का स्वाभिमान
'अफसाना कुहन', 'कफ़न' ,'सद्गति', 'सेवादसदन', 'निर्मला' 
'प्रेरणा', 'कायाकल्प', 'सवा सेर गेहूँ', 'प्रेम-पचीसी',
'ईदगाह', 'पंच-परमेश्वर', 'परीक्षा' , 'बालक' , 'नमक का दरोगा', 'प्रेमाश्रम'
'बड़े घर की बेटी', 'दो बैलों की कथा', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'गबन' व 'कर्बला'
'आत्माराम'! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है
सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है

तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में 
एक अलग तरह का स्वराज है
'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक
सभी के बीच 'गोविंदी' के गुणों की चर्चा है
बहुत मिठी मिठाई मर्चा है
कुर्सी पर 'जॉन' की जगह 'जयसिंह' का परचा है
स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि
सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है
और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है
जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार

'सर्वहारा वीर' तो तुम नहीं थे
दिशाहारा तो तुम नहीं थे
राहहारा तो तुम नहीं थे
हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!
थे तुम 'बलिदान-पथ' के चिरंजीवी चिंतक
तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे
'गोर्की' और 'लूशुन' के विचार

हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!
हे नर के नायक!
दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब
बूढ़ी महाजनी सभ्यता और 
मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला
भला कौन नहीं सीखना चाहता है?
तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना
तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना

हे चेतना के चिराग!
तुमने लगाई शोषकों के महल में आग
तुमने गाया सदा रोशनी का राग
तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को
सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया

हे सत्य के साधक!
परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!
स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!
ज़िन्दगी की तान के तूर्य!
तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,
खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग
और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है
शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है

हे 'शतरंज के खिलाड़ी'!
अँधेरे में मानवता की मणि!
गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!
लमही से आ रही है जय की लय
तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए
और तुम्हारी प्रोक्ति 'लाल फीता' का बंधन तोड़ने की 'प्रेम-प्रतिज्ञा'
तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है

हे 'प्रेम सरोवर' के अरुण कमल!
तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो
तुम भविष्य द्रष्टा हो
तुमने बताया, 'एक गिलास पानी' का महत्व 
____'नवजीवन' का तत्व
चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है
'गंगी' के पति 'जोखू' के सामने मौत का कुआँ है
जी हाँ, जो एक 'ठाकुर का कुआँ' है

हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!
कहानी के अद्वितीय छंद!
संकल्प के अभियान में तब्दील होना
असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है
हवा नहीं है अनुकूल
परिवेश है प्रतिकूल
मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह
तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत! 

हे मानस के हंस!
'नवनिधि' के 'मंगल सूत्र'!
नये 'संग्राम' में 'प्रेम की वेदी' पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!
मैं 'कर्मभूमि' में 'पूस की रात' का 'हल्कू' हूँ
'प्रेम-प्रमोद' की गोद में ले लो मुझे
आज 'प्रेम-पंचमी' है परसों नागपंचमी
'प्रेम-तीर्थ' के पथ पर 
मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़
कि हर सुबह हर घर खिले 'सप्तसुमन' व 'सप्त सरोज'!

(©गोलेन्द्र पटेल
30-07-2022)

नाम : गोलेन्द्र पटेल
🙏संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com




Monday, 18 July 2022

कुर्मी समाज : एकता की राह—श्रेष्ठता-बोध से समता-बोध तक || जागो कुर्मियों, जागो! || गोलेंद्र पटेल

कुर्मी समाज : एकता की राह—श्रेष्ठता-बोध से समता-बोध तक

कुर्मी समाज की सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान अत्यंत विस्तृत और विविध है, जिसमें अलग-अलग प्रदेशों, भाषाई परंपराओं, ऐतिहासिक परिस्थितियों तथा स्थानीय सामाजिक संरचनाओं के कारण अनेक जाति-सूचक नाम, उपनाम, शाखाएँ, उपाधियाँ और क्षेत्रीय संबोधन प्रचलित दिखाई देते हैं। कुर्मी, कुनबी/कुणबी/कणबी, कुलमी/कुल्मी, कुम्भी, कूर्म, कूर्मवंशी, कुडुम्बी, कुडुम्बर, कुडुम्बि, कुटुम्बी, कुंबी, कुम्बि, कुरु, कुरुम, कुरुम्बा, कुरुम्बि, कुरुमनायक, कुलुम्बि, कापू, कम्मा, वेलमा, रेड्डी, नायडू, वोक्कालिगा/वक्कलिगार, गौड़ा/गौर, खंडायत, कुडुमी, पटेल, पाटीदार, लेवा पाटीदार, कड़वा, पाटील, पवार, मराठा/मराठे, कुनबी-मराठा, भोंसले, गायकवाड़, शिंदे/सिंधिया, होल्कर, चव्हाण, मोरे, सावंत, देशमुख, देसाई, वानखेड़े, वाघेला, बघेल, चौहान, चंदेल, चंद्रवंशी, चंद्राकर/चंद्रराकर, चंद्रौल, चंद्रनाहू, राठौर, परिहार, बैस/बैसवार, जैसवार/जयसवार, बंसवार, बारवार, समसवार, सैंथवार, सिंगरौर/सिंगरौल, गंगवार, गंगापारी, सचान, कटियार, कन्नौजिया/कनौजिया, अवधिया, पटनवार, पतरिहा/पतरिया, पुरबिया, चनऊ/चनउ, कोचैसा/कुचैसा, घमैला/घमालिए, मनवा/मनवार, महतो/मेहतो, धाकड़, उमराव, वर्मा, चौधरी, राय, राव, रावत, राजवाड़े, मल्ल, मुराव, लोधा-कुर्मी, महालोधी, धानुक, गंगौता, कोलीय, शाक्य, मौर्य, कश्यप, सिंह, निरंजन, राघव, यदुवंशी, जादौन/जादौनवंशी, लिच्छबी, गहोई, महापात्रा, महेसरी, उत्तम, गबेल/गवेल, खुरासिया/खुरसिया, खाटी, कौसिक, आर्य, कुरुसेन्य, केराती, ब्रजवासी, कच्छवार, कछार, कछवाहा, ठाकुरिया, मल्लीथारू, जिचकर, जोशवर, कांत, कोप्पिकर, मेने, मोहंती, तिहाड़, सनाड्य, सनोडिया, अथरिया, सरेठी, पटोले, पांनड़ी, कुसमरिया, मलैया, चोल, उसरेठा/उसरठा, खरबिंद, अजुदया, कटवार, रारह, चांदपुरिया, अकरेठिया, औधार, बाछर/बाछिल, बेहमनिया, बर्धिहा/बर्दिया, बरगेयान, बाथवा, भंडारी, भुकारसी, भुर/भर, भरती, बिरतिया, बोट/बोटा/भोट, घोई, गोइट, गोंडाल, हार्दिया/हार्दिहा, हरदबारी/हरदवरिया, जरूहार, जामैया, झुरा, कारजवा, खापरिबंध, लकारिया, लोहट, मेवार, पत्थारिहा, सहजन, सकरवार, समाना, संसोयल, संकट/संकटा, संखवार, संधाउवा, सिम्मल, सिरकीबंद, तरमला, तोगड़िया और घुड़चढ़े आदि नाम विभिन्न सूचियों तथा क्षेत्रीय संदर्भों में मिलते हैं। इनमें से कुछ नाम व्यापक जातीय पहचान को व्यक्त करते हैं, कुछ क्षेत्रीय या भाषाई पहचान हैं, कुछ पारिवारिक उपनाम अथवा सामाजिक उपाधियाँ हैं और कुछ ऐसे नाम भी हैं जो अन्य समुदायों में समान रूप से प्रचलित हैं; इसलिए केवल उपनाम के आधार पर किसी व्यक्ति की जातीय पहचान निर्धारित करना उचित नहीं है तथा उपर्युक्त सभी नामों को स्वतः कुर्मी समाज की स्वतंत्र और सर्वमान्य उपजातियाँ मानना भी ऐतिहासिक दृष्टि से सावधानी की अपेक्षा रखता है। इसी प्रकार ‘कुर्मी (खत्तिय) वंश की 1488 उपशाखाओं’ का उल्लेख ‘Castes and Tribes’ जैसे स्रोतों के संदर्भ में किया जाता है, किंतु इस संख्या की प्रामाणिकता के लिए मूल ग्रंथ, संस्करण, खंड और संबंधित पृष्ठ का सत्यापन आवश्यक है। वस्तुतः इतनी व्यापक नाम-विविधता कुर्मी समाज के लंबे सामाजिक इतिहास, क्षेत्रीय विस्तार और आंतरिक विभाजन की जटिलता को सामने रखती है; अनेक स्थानों पर अलग-अलग उपजातीय और क्षेत्रीय समूह अपनी विशिष्ट पहचान को प्राथमिकता देते हैं तथा कभी-कभी उनमें पारस्परिक श्रेष्ठता-बोध भी दिखाई देता है, जिसके कारण व्यापक सामुदायिक एकता और संगठन का निर्माण कठिन होता है। समस्या केवल उपनामों की अधिकता नहीं, बल्कि उन नामों को लेकर विकसित होने वाला ऊँच-नीच, श्रेष्ठता और अलगाव का भाव है; जब कोई उपसमूह स्वयं को दूसरे से अधिक श्रेष्ठ समझता है, तब साझा सामाजिक पहचान कमजोर होती है और समाज संगठनात्मक रूप से बिखरा हुआ दिखाई देता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि उपनामों और उपशाखाओं को विभाजन का आधार बनाने के बजाय उन्हें ऐतिहासिक एवं क्षेत्रीय विविधता के रूप में स्वीकार किया जाए तथा समानता, शिक्षा, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारस्परिक सम्मान को व्यापक एकता का आधार बनाया जाए। कुर्मी समाज अपने गौरवशाली पुरखों और महापुरुषों—राष्ट्रसंत तुकाराम महाराज, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज, भारतरत्न लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और महामना रामस्वरूप वर्मा—के जीवन, विचारों, संघर्षों और सामाजिक सरोकारों को केवल जातीय गौरव के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समानता, स्वाभिमान, शिक्षा, सामाजिक न्याय और मानव-मुक्ति के प्रेरक स्रोत के रूप में आत्मसात करे। यदि समाज इन साझा मूल्यों को अपनी सामूहिक चेतना का आधार बनाता है, तो उपजातीय श्रेष्ठता-बोध से ऊपर उठकर समता-बोध विकसित किया जा सकता है और बिखरी हुई सामाजिक पहचान को संगठित, शिक्षित तथा प्रगतिशील सामुदायिक शक्ति में बदला जा सकता है। इस दृष्टि से कुर्मी समाज की वास्तविक एकता उपनामों की समानता में नहीं, बल्कि समान सम्मान, समान अवसर, साझा हित, सामाजिक न्याय और समतामूलक चेतना में निहित है।

कुर्मी समाज की एकता केवल जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, समान हित, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अधिक टिकाऊ बन सकती है। इसके लिए कुछ ठोस कदम महत्वपूर्ण हैं:

  1. साझी पहचान विकसित हो — अलग-अलग उपजातियों, शाखाओं और क्षेत्रीय उपनामों को लेकर श्रेष्ठता-बोध छोड़कर “हम सब एक व्यापक कुर्मी समाज का हिस्सा हैं” की भावना विकसित हो।

  2. उपनाम और उपशाखा को श्रेष्ठता का आधार न बनाया जाए — पटेल, कुनबी, सचान, कटियार, गंगवार, सैंथवार आदि नामों को लेकर आपसी ऊँच-नीच के बजाय उनके ऐतिहासिक और क्षेत्रीय संदर्भों को समझा जाए।

  3. महापुरुषों को साझा विरासत माना जाए — राष्ट्रसंत तुकाराम, छत्रपति वीर शिवाजी महाराज, राजर्षि शाहूजी महाराज, सरदार वल्लभभाई पटेल, महामना रामस्वरूप वर्मा, सोनेलाल पटेल और नीतीश कुमार जैसे व्यक्तित्वों को किसी एक उपसमूह की संपत्ति न मानकर उनके सामाजिक विचारों, संघर्षों और योगदान को व्यापक रूप से पढ़ा जाए।

  4. संगठन जाति-विरोधी नहीं, भेदभाव-विरोधी हो — समाज के भीतर उपजातीय भेदभाव, ऊँच-नीच और आपसी श्रेष्ठता की मानसिकता को समाप्त करना एकता की पहली शर्त हो।

  5. शिक्षा को केंद्रीय आधार बनाया जाए — विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, प्रतियोगी परीक्षा मार्गदर्शन, डिजिटल शिक्षा और शोध-संस्थानों का निर्माण किया जाए।

  6. आर्थिक सहयोग बढ़े — किसान, मजदूर, उद्यमी, कर्मचारी और पेशेवर एक-दूसरे के आर्थिक हितों में सहयोग करें। सहकारी संस्थाएँ और सामुदायिक विकास मंच इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।

  7. महिलाओं और युवाओं की बराबर भागीदारी हो — केवल पारंपरिक नेतृत्व के भरोसे संगठन मजबूत नहीं होता। महिलाओं और युवाओं को निर्णय लेने की वास्तविक भूमिका मिलनी चाहिए।

  8. वैचारिक मतभेद को दुश्मनी न बनाया जाए — अलग-अलग राजनीतिक विचार रखने वाले लोग भी सामाजिक और शैक्षिक मुद्दों पर साथ काम कर सकते हैं। संगठन किसी एक राजनीतिक दल का उपकरण बनने के बजाय समुदाय के दीर्घकालिक हितों पर केंद्रित रहे।

  9. साझे कार्यक्रम बनाए जाएँ — अलग-अलग क्षेत्रों के संगठनों को जोड़कर शिक्षा सम्मेलन, किसान सम्मेलन, साहित्यिक आयोजन, युवा संवाद और सामाजिक सुधार अभियान चलाए जाएँ।

  10. सोशल मीडिया पर संयम और संवाद — उपजातीय विवाद, अपमानजनक भाषा और श्रेष्ठता के दावों को बढ़ाने के बजाय इतिहास, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक एकता से संबंधित प्रमाणित सामग्री साझा की जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात: कुर्मी समाज की एकता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सभी लोग एक जैसा सोचें; बल्कि इसका अर्थ यह होना चाहिए कि मतभेदों के बावजूद समान सम्मान, समान अधिकार और साझा हितों के लिए साथ खड़े होने की क्षमता विकसित हो।

एक प्रभावी सूत्र हो सकता है:

“उपनाम अलग हो सकते हैं, क्षेत्र अलग हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं; लेकिन सम्मान, शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए हमारा साझा मंच एक हो।”

 

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (अध्ययनरत, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
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