Sunday, 14 June 2026

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं
बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा 
कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास 
हमें खड़ा होने की जगह मिली
तब हम उतना ही ख़ुश हुए 
जितना हिंदी का कोई रचनाकार ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने पर प्रसन्न होता है 

रेलवे स्टेशन पर जो भीड़ दिखाई देती है
वह यात्रियों की भीड़ नहीं है
वे लोग घर लौटते मजदूर भी नहीं
न ही किसी मेले या तीर्थ की ओर जाते श्रद्धालु हैं
वे हाथों में प्रवेश-पत्र लिए
देश के वे युवा हैं
जो अपने भविष्य की तलाश में
एक शहर से दूसरे शहर धकेले जा रहे हैं।

उनकी पीठ पर टंगा बैग
सिर्फ कपड़ों का बोझ नहीं है
उसमें वर्षों की तैयारी
माता-पिता की उम्मीदें
उधार लेकर भरी गई फीस
और एक नौकरी का सपना रखा हुआ है
कहा जाता है
देश तरक्की कर रहा है
अवसर बढ़ रहे हैं
रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं
लेकिन फिर
कुछ हजार पदों के लिए
लाखों आवेदन क्यों आते हैं?
क्यों हर भर्ती परीक्षा
एक जनसैलाब में बदल जाती है?
क्यों ट्रेनों के दरवाज़ों से लटकते हुए
युवा दिखाई देते हैं?
क्यों खिड़कियों से घुसकर
उन्हें अपने सपनों तक पहुँचना पड़ता है?

एक लड़का
सासाराम से किशनगंज भेज दिया जाता है
एक लड़की
अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर
परीक्षा देने निकल पड़ती है
किसी की जेब में
बस किराए भर पैसे हैं
किसी ने
रास्ते के लिए घर से लाई रोटियाँ रखी हैं
किसी ने
दोस्तों के साथ मिलकर
एक समोसा चार हिस्सों में बाँट लिया है
और सरकार इसे
एक सामान्य परीक्षा कहती है
यह परीक्षा नहीं
यह सहनशक्ति का महोत्सव है
यहाँ ज्ञान से पहले
भूख की परीक्षा होती है
धैर्य की परीक्षा होती है
भीड़ में कुचलने से बचने की परीक्षा होती है
समय पर पहुँचने की परीक्षा होती है
और फिर कहीं जाकर
प्रश्नपत्र सामने आता है।

देश का बेरोज़गार युवा
अब केवल नौकरी नहीं खोज रहा
वह सम्मान खोज रहा है
अपने श्रम का मूल्य खोज रहा है
अपने जीवन का अर्थ खोज रहा है
वह पूछ रहा है
यदि मेरे लिए अवसर हैं
तो मैं लाखों की भीड़ में क्यों खड़ा हूँ?
यदि व्यवस्था मेरे साथ है
तो मुझे अपने ही देश में
एक परीक्षा देने के लिए
सैकड़ों किलोमीटर क्यों भटकना पड़ता है?
रेलवे स्टेशनों पर बैठा हुआ हर युवक
एक आँकड़ा नहीं है।

वह किसी किसान का बेटा है
किसी मज़दूर की बेटी है
किसी माँ की अधूरी नींद है
किसी पिता की अंतिम उम्मीद है
लेकिन व्यवस्था
उन्हें अक्सर संख्या की तरह देखती है
फॉर्मों की संख्या
रोल नंबरों की संख्या
कटऑफ की संख्या
और इसी बीच
उनकी उम्र बीतती रहती है
भर्तियाँ टलती रहती हैं
परीक्षाएँ रद्द होती रहती हैं
पेपर लीक होते रहते हैं
परिणाम अटकते रहते हैं
और सपनों की उम्र
धीरे-धीरे कम होती जाती है
फिर भी वे हार नहीं मानते
वे अगली भर्ती का इंतज़ार करते हैं
अगली ट्रेन पकड़ते हैं
अगला फॉर्म भरते हैं
अगला सपना देखते हैं।

शायद यही इस देश के युवाओं की सबसे बड़ी ताकत है
कि व्यवस्था बार-बार उन्हें निराश करती है
फिर भी वे उम्मीद करना नहीं छोड़ते
लेकिन किसी राष्ट्र की सभ्यता
इस बात से नहीं मापी जाती
कि उसके नेता कितने बड़े भाषण देते हैं
वह इस बात से मापी जाती है
कि उसके युवाओं को
अपने भविष्य तक पहुँचने के लिए
कितनी पीड़ा से गुजरना पड़ता है
आज भारत के रेलवे स्टेशन
एक मौन प्रश्न की तरह खड़े हैं
वे पूछ रहे हैं
क्या यह वही देश है
जिसका सपना इन युवाओं ने देखा था?
या यह
बेरोज़गारों का एक विशाल प्रतीक्षालय है
जहाँ करोड़ों सपने
अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं?

★★★
रचयिता: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com






कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता









Wednesday, 3 June 2026

अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व — गोलेन्द्र पटेल

जीवनकाल: 1953 से 2007
संघर्षकाल: 1978 से 2007


अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व

भारतीय समाज का इतिहास केवल राजसत्ताओं, युद्धों और शासकों का इतिहास नहीं है; वह उन असंख्य व्यक्तित्वों की स्मृतियों से भी निर्मित होता है जिन्होंने अपने समय की अन्यायपूर्ण संरचनाओं से टकराने का साहस किया। ऐसे व्यक्तित्व प्रायः इतिहास और लोककथा के मध्य खड़े दिखाई देते हैं, एक ओर वे कानून की दृष्टि में अपराधी घोषित किए जाते हैं, तो दूसरी ओर जनमानस उन्हें अपने दुखों, अपमानों और प्रतिरोध की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक बना लेता है। बुंदेलखंड की धरती पर उभरा ददुआ का व्यक्तित्व इसी द्वंद्व का एक ज्वलंत उदाहरण है। ददुआ (शिवकुमार पटेल) केवल एक नाम नहीं है; वह बुंदेलखंड के बीहड़ों में जन्मी उस बेचैन चेतना का नाम है जिसने सत्ता, सामंतवाद, भय और सामाजिक वर्चस्व के सामने घुटने टेकने से इनकार किया। उनकी जीवन-कथा के चारों ओर अनेक किंवदंतियाँ, जनश्रुतियाँ और विवाद जुड़े हुए हैं। कुछ लोग उन्हें हिंसा और आतंक का पर्याय मानते हैं, तो कुछ उन्हें उस व्यवस्था के विरुद्ध खड़े हुए व्यक्ति के रूप में देखते हैं जिसने सदियों से वंचित और कमजोर वर्गों को हाशिये पर धकेल रखा था। इसीलिए ददुआ का मूल्यांकन केवल न्यायालय की भाषा में नहीं किया जा सकता; उसे लोकस्मृति, सामाजिक मनोविज्ञान और ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी समझना आवश्यक है। बुंदेलखंड की कठोर भौगोलिक परिस्थितियाँ, वहाँ की आर्थिक विषमताएँ, जातिगत तनाव और प्रशासनिक उपेक्षा लंबे समय से सामाजिक असंतोष को जन्म देती रही हैं। जब किसी समाज में न्याय की संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं और आम मनुष्य स्वयं को असुरक्षित अनुभव करता है, तब वह ऐसे प्रतीकों की तलाश करता है जो उसके आत्मसम्मान और प्रतिरोध की आवाज़ बन सकें। बुंदेलखंड के वीरप्पन ददुआ का उदय इसी सामाजिक पृष्ठभूमि में हुआ। लोकविश्वासों में यह धारणा बार-बार व्यक्त होती है कि व्यक्तिगत अपमान और पारिवारिक त्रासदी ने उनके भीतर विद्रोह का बीज बोया। धीरे-धीरे वह बीज एक ऐसे वृक्ष में परिवर्तित हुआ जिसकी छाया में समर्थकों ने प्रतिरोध का स्वप्न देखा और विरोधियों ने भय का अनुभव किया।

ददुआ की छवि का सबसे रोचक पक्ष यह है कि वह एकरेखीय नहीं है। वह जितना विवादास्पद है, उतना ही बहुआयामी भी है। उनके समर्थक उन्हें गरीबों का सहायक, वंचितों का संरक्षक और स्थानीय समाज की समस्याओं में हस्तक्षेप करने वाला व्यक्ति बताते हैं। अनेक लोककथाएँ उन्हें ऐसे पात्र के रूप में चित्रित करती हैं जो सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण के विरुद्ध खड़ा था। दूसरी ओर, उनके जीवन से जुड़े गंभीर आपराधिक आरोप यह भी स्मरण कराते हैं कि प्रतिरोध और हिंसा के बीच की रेखा अत्यंत जटिल होती है। यही द्वंद्व ददुआ को एक साधारण व्यक्ति से किंवदंती में बदल देता है। लोकजीवन की स्मृति में ददुआ उस प्रश्न की तरह उपस्थित हैं जिसका उत्तर आज भी निश्चित नहीं है। क्या वे केवल एक अपराधी थे या उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिक्रिया थे जिसने लाखों लोगों को अपमान और अभाव का जीवन दिया? क्या वे व्यवस्था-विरोधी विद्रोह के प्रतीक थे या फिर उस अराजकता के प्रतिनिधि जो न्याय के अभाव में जन्म लेती है? इन प्रश्नों का उत्तर व्यक्ति की वैचारिक दृष्टि के अनुसार बदल जाता है। यही कारण है कि उनके नाम पर आज भी तीखी बहसें होती हैं और उनके बारे में धारणाएँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न दिखाई देती हैं।

ददुआ और फूलन देवी जैसे व्यक्तित्वों की लोकप्रियता भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गहरे प्रश्न को भी उजागर करती है। जब समाज के किसी वर्ग को लगता है कि उसकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं है, तब वह अपने नायकों का निर्माण स्वयं करता है। ये नायक हमेशा आदर्श नहीं होते, पर वे उस मौन आक्रोश की अभिव्यक्ति अवश्य बन जाते हैं जिसे मुख्यधारा का इतिहास अक्सर अनदेखा कर देता है। इसी कारण ऐसे चरित्र केवल व्यक्ति नहीं रह जाते; वे सामाजिक असंतोष, आत्मसम्मान और संघर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बन जाते हैं। फिर भी यह समझना आवश्यक है कि विद्रोह और क्रांति में मौलिक अंतर होता है। विद्रोह तत्काल अन्याय के विरुद्ध उठी हुई प्रतिक्रिया हो सकता है, जबकि क्रांति एक व्यापक सामाजिक दर्शन, मानवीय दृष्टि और रचनात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया है। विद्रोह व्यवस्था को चुनौती देता है, किंतु क्रांति नई व्यवस्था की कल्पना भी प्रस्तुत करती है। इसलिए किसी भी बागी चरित्र के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी उसके ऐतिहासिक मूल्यांकन में विवेक और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। ददुआ का व्यक्तित्व इसी जटिलता का प्रतीक है। वे इतिहास के पन्नों में जितने विवादित हैं, लोकस्मृति में उतने ही जीवित। वे उस सामाजिक यथार्थ की उपज थे जहाँ अन्याय, असमानता और शक्ति-संघर्ष लगातार टकराते रहे। उनकी कथा हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि समाज में न्याय की स्थापना केवल कानून से नहीं होती; उसके लिए विश्वास, सम्मान और समान अवसरों की भी आवश्यकता होती है। जब ये तत्व अनुपस्थित हो जाते हैं, तब इतिहास के किनारों से ऐसे पात्र जन्म लेते हैं जो व्यवस्था के लिए चुनौती और जनता के लिए किंवदंती बन जाते हैं। इस अर्थ में शोषितों के मसीहा ददुआ का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। वह भारतीय ग्रामीण समाज के भीतर छिपे हुए उन अंतर्विरोधों का आख्यान है, जिनमें सत्ता और प्रतिरोध, भय और सम्मान, अपराध और लोकनायकत्व, व्यवस्था और विद्रोह निरंतर एक-दूसरे से संवाद करते रहते हैं। शायद इसी कारण ददुआ आज भी केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक प्रश्न हैं और कुछ प्रश्न इतिहास से अधिक समय तक जीवित रहते हैं।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

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ईमेल : corojivi@gmail.com






कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता


कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में यदि किसी समाज ने सबसे अधिक श्रम किया, सबसे अधिक उत्पादन किया, सबसे अधिक संगठन खड़े किए, सबसे अधिक संघर्ष किए और फिर भी अपनी वास्तविक शक्ति के अनुरूप स्थान प्राप्त नहीं किया, तो उनमें कुर्मी समाज प्रमुख है।

यह लेख किसी दल के पक्ष या विपक्ष का लेख नहीं है। यह कुर्मी समाज के आत्ममंथन का लेख है। यह प्रशंसा का नहीं, चेतना का लेख है। यह ताली बजाने का नहीं, आईना दिखाने का लेख है।

आज कुर्मी समाज को सबसे पहले अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए—

क्या हम सचमुच उतने शक्तिशाली हैं, जितना हम स्वयं को समझते हैं?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो फिर हमारी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति हमारी जनसंख्या और योगदान के अनुपात में क्यों नहीं है?

नेताओं की लंबी सूची, लेकिन समाज की छोटी उपलब्धियाँ

कुर्मी समाज के पास नेताओं की कमी कभी नहीं रही।

बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेता हुए, जिन्होंने वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन किया।

गुजरात में केशुभाई पटेल, आनंदीबेन पटेल, भूपेंद्र पटेल जैसे मुख्यमंत्री हुए।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने।

उत्तर प्रदेश में बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. सोनेलाल पटेल, अनुप्रिया पटेल, पल्लवी पटेल, जंग बहादुर पटेल, राम लखन वर्मा, बरखू राम वर्मा, राम पूजन पटेल, लालजी वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, केसरी देवी पटेल, आर. के. पटेल, नंदलाल पटेल, रामसेवक पटेल, हीरामणि पटेल, रामदेव पटेल, सुखदेव वर्मा, दीपक पटेल, राजेंद्र प्रसाद चौधरी, अरविंद चौधरी, संग्राम सिंह वर्मा, संतोष गंगवार, पंकज चौधरी जैसे अनेक नाम राजनीति में दिखाई देते हैं। इनमें कुछ स्मृति शेष चुके हैं।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कुर्मी विधायकों में प्रमुख नामों में शामिल हैं राजेंद्र चौधरी, कविंद्र चौधरी, पटेल दयाराम चौधरी, गंगवार, सत सिंह, संत सिंह, वीरेंद्र चौधरी, राजेंद्र वर्मा, रुधौली, फरेंदा, कप्तानगंज, मुंगरा, बादशाहपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, महाराजगंज, जौनपुर, पीलीभीत सदर, भोगनीपुर, मिनगा, गौरा, उतराला, अविनाश चंद्र द्विवेदी, आरके पटेल, संजय गंगवार, शैलेंद्र सिंह गंगवार, सकेंद्र प्रताप, राकेश कुमार वर्मा, पल्लवी पटेल, पूजा सरोज, रागिनी सोनकर, लालजी वर्मा, स्वतंत्र देव सिंह, ओम प्रकाश सिंह, पंकज चौधरी, संतोष गंगवार जैसे नेताओं से जुड़े क्षेत्रों के विधायक तथा अन्य कई कुर्मी/पटेल/चौधरी/वर्मा/गंगवार उपनाम वाले विधायक जो कुल संख्या को 40-43 तक ले जाते हैं और वर्तमान में यूपी से कुर्मी समुदाय के सांसदों में समाजवादी पार्टी से रामप्रसाद चौधरी (बस्ती), उत्कर्ष वर्मा (लखीमपुर खीरी), नरेश चंद्र उत्तम पटेल (फतेहपुर), लालजी वर्मा (अंबेडकर नगर), राम शिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती), शिवपाल सिंह पटेल (प्रतापगढ़), कृष्णा देवी पटेल (बांदा); भाजपा से पंकज चौधरी (महाराजगंज) और अन्य कुर्मी/पटेल चेहरे जैसे कुछ क्षेत्रीय नाम; तथा अपना दल (सोनेलाल) से अनुप्रिया पटेल (मिर्जापुर) शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 11 के आसपास कुर्मी सांसदों की संख्या को पूरा करते हैं।

मध्य प्रदेश में भीम सिंह पटेल, बुद्धसेन पटेल, विद्यावती पटेल जैसे नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई।

संगठनात्मक क्षेत्र में इंजीनियर बलिहारी पटेल, चौधरी विकास पटेल, डॉ. आर.एस. पटेल जैसे नाम भी संघर्ष की पहचान बने।

लेकिन एक प्रश्न आज भी खड़ा है, इतने नेताओं के बावजूद समाज कहाँ है?

क्या केवल नेताओं का बड़ा होना ही समाज का बड़ा होना है?

यदि ऐसा होता तो आज कुर्मी समाज देश का सबसे संगठित, सबसे प्रभावशाली और सबसे निर्णायक समाज होता।

सच्चाई यह है कि नेताओं की सफलता और समाज की सफलता दो अलग-अलग बातें हैं।

सबसे बड़ी बीमारी, व्यक्ति पूजा

कुर्मी समाज की सबसे बड़ी समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक है।

हम व्यक्ति को समाज से बड़ा बना देते हैं।

कोई नेता मंत्री बन गया, तो हम उसे अपनी उपलब्धि मान लेते हैं।

कोई सांसद बन गया, तो हम खुश हो जाते हैं।

कोई मुख्यमंत्री बन गया, तो हम समझ लेते हैं कि समाज का उद्धार हो गया।

लेकिन क्या कभी हमने यह हिसाब लगाया कि इन सबके बावजूद समाज की सामूहिक ताकत कितनी बढ़ी?

कितने विश्वविद्यालय बने?

कितने बड़े विद्यालय बने?

कितने शोध संस्थान बने?

कितने राष्ट्रीय समाचार पत्र बने?

कितने बड़े उद्योगपति पैदा हुए?

कितने राष्ट्रीय विचारक तैयार हुए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर कमजोर है, तो हमें अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

वोट हमारा, एजेंडा किसी और का

यह कटु सत्य है कि कुर्मी समाज ने अनेक दलों को ताकत दी।

कभी समाजवादी राजनीति को।

कभी बहुजन राजनीति को।

कभी कांग्रेस को।

कभी भाजपा को।

लेकिन हर दल में कुर्मी समाज ने दूसरों के एजेंडे को आगे बढ़ाया, अपना स्वतंत्र सामाजिक एजेंडा बहुत कम बनाया।

आज भी अधिकांश लोग किसी दल की पहचान से स्वयं को परिभाषित करते हैं, समाज की पहचान से नहीं।

यही कारण है कि चुनाव समाप्त होते ही समाज फिर वही पुराना प्रश्न पूछता है, "हमें क्या मिला?"

केवल जातीय गौरव नहीं, सामाजिक क्रांति चाहिए

कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि केवल जातीय गौरव के नारे समाज को आगे नहीं बढ़ाते।

यदि केवल गौरव से समाज आगे बढ़ते, तो इतिहास में कोई भी समुदाय पिछड़ा नहीं रहता।

समाज को आगे बढ़ाती है—

शिक्षा।

संगठन।

आर्थिक शक्ति।

वैचारिक स्पष्टता।

अनुशासन।

दीर्घकालिक रणनीति।

और इन क्षेत्रों में अभी बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. सोनेलाल पटेल का अधूरा प्रश्न

जब डॉ. सोनेलाल पटेल ने पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया था, तब वह केवल चुनावी टिकट का प्रश्न नहीं था।

वह सम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक शक्ति का प्रश्न था।

आज भी वह प्रश्न जीवित है।

लेकिन दुखद यह है कि समाज उस प्रश्न को आंदोलन में बदलने के बजाय अक्सर व्यक्तियों और दलों की बहस में उलझ जाता है।

यदुनाथ सिंह पटेल की विरासत

स्मृति शेष बाबू यदुनाथ सिंह पटेल जैसे नेताओं की चर्चा केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वे विधायक थे।

उनकी चर्चा इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने स्वाभिमान की राजनीति का संदेश दिया।

जिस समाज में स्वाभिमान मर जाता है, वहाँ संख्या भी बेकार हो जाती है और जिस समाज में स्वाभिमान जीवित रहता है, वहाँ छोटी संख्या भी इतिहास बदल देती है।

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है।

सबसे बड़ा संकट है, सामूहिक दृष्टि का अभाव। हर क्षेत्र में व्यक्ति हैं, लेकिन सामूहिक परियोजना नहीं है। हर जिले में नेता हैं, लेकिन राष्ट्रीय दृष्टि नहीं है। हर चुनाव में सक्रियता है, लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक कार्यक्रम नहीं है।

अब क्या करना होगा?

कुर्मी समाज को अगले 25 वर्षों का कार्यक्रम बनाना होगा। सैकड़ों छात्रावास बनाने होंगे। हजारों मेधावी छात्रों को सहायता देनी होगी। पुस्तकालय स्थापित करने होंगे। शोध संस्थान बनाने होंगे। सामाजिक इतिहास लिखना होगा। अपने महापुरुषों पर शोध कराना होगा।

युवाओं को प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता की ओर ले जाना होगा।

राजनीति को अंतिम लक्ष्य नहीं, साधन मानना होगा।

अंतिम चेतावनी

इतिहास किसी समाज को बार-बार अवसर नहीं देता। जो समाज समय रहते नहीं जागते, वे दूसरों की राजनीति का स्थायी ईंधन बन जाते हैं।

आज कुर्मी समाज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है नारों का, भावनाओं का, चुनावी उत्साह का।

दूसरा रास्ता है शिक्षा, संगठन, विचार और स्वाभिमान का।

पहला रास्ता भीड़ बनाता है।

दूसरा रास्ता इतिहास बनाता है।

निर्णय कुर्मी समाज को करना है।

क्या वह केवल वोट बैंक बना रहेगा?

क्या वह केवल दूसरों की रैलियाँ भरता रहेगा?

क्या वह केवल नेताओं की जय-जयकार करता रहेगा?

या फिर वह ज्ञान, संगठन, संघर्ष और आत्मसम्मान के आधार पर नई सामाजिक क्रांति का निर्माण करेगा?

याद रखो,

जिस दिन कुर्मी समाज ने अपनी संख्या को संगठन में, संगठन को विचार में और विचार को सामाजिक शक्ति में बदल दिया, उस दिन भारतीय राजनीति का नक्शा बदल जाएगा और उस दिन इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कुर्मी समाज के कितने मंत्री थे।

इतिहास यह लिखेगा कि कुर्मी समाज ने एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दिया था।

टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक सह सामाजिक कार्यकर्ता)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
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बेरोज़गारों का देश

बेरोज़गारों का देश बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा  कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास  हमें खड़ा होने ...