बेरोज़गारी की पीड़ा ने नहीं
बल्कि पाँव की प्रसन्नता ने फेफड़े से कहा
कि जब जनरल डब्बे में पैखाने के पास
हमें खड़ा होने की जगह मिली
तब हम उतना ही ख़ुश हुए
जितना हिंदी का कोई रचनाकार ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने पर प्रसन्न होता है
रेलवे स्टेशन पर जो भीड़ दिखाई देती है
वह यात्रियों की भीड़ नहीं है
वे लोग घर लौटते मजदूर भी नहीं
न ही किसी मेले या तीर्थ की ओर जाते श्रद्धालु हैं
वे हाथों में प्रवेश-पत्र लिए
देश के वे युवा हैं
जो अपने भविष्य की तलाश में
एक शहर से दूसरे शहर धकेले जा रहे हैं।
उनकी पीठ पर टंगा बैग
सिर्फ कपड़ों का बोझ नहीं है
उसमें वर्षों की तैयारी
माता-पिता की उम्मीदें
उधार लेकर भरी गई फीस
और एक नौकरी का सपना रखा हुआ है
कहा जाता है
देश तरक्की कर रहा है
अवसर बढ़ रहे हैं
रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं
लेकिन फिर
कुछ हजार पदों के लिए
लाखों आवेदन क्यों आते हैं?
क्यों हर भर्ती परीक्षा
एक जनसैलाब में बदल जाती है?
क्यों ट्रेनों के दरवाज़ों से लटकते हुए
युवा दिखाई देते हैं?
क्यों खिड़कियों से घुसकर
उन्हें अपने सपनों तक पहुँचना पड़ता है?
एक लड़का
सासाराम से किशनगंज भेज दिया जाता है
एक लड़की
अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर
परीक्षा देने निकल पड़ती है
किसी की जेब में
बस किराए भर पैसे हैं
किसी ने
रास्ते के लिए घर से लाई रोटियाँ रखी हैं
किसी ने
दोस्तों के साथ मिलकर
एक समोसा चार हिस्सों में बाँट लिया है
और सरकार इसे
एक सामान्य परीक्षा कहती है
यह परीक्षा नहीं
यह सहनशक्ति का महोत्सव है
यहाँ ज्ञान से पहले
भूख की परीक्षा होती है
धैर्य की परीक्षा होती है
भीड़ में कुचलने से बचने की परीक्षा होती है
समय पर पहुँचने की परीक्षा होती है
और फिर कहीं जाकर
प्रश्नपत्र सामने आता है।
देश का बेरोज़गार युवा
अब केवल नौकरी नहीं खोज रहा
वह सम्मान खोज रहा है
अपने श्रम का मूल्य खोज रहा है
अपने जीवन का अर्थ खोज रहा है
वह पूछ रहा है
यदि मेरे लिए अवसर हैं
तो मैं लाखों की भीड़ में क्यों खड़ा हूँ?
यदि व्यवस्था मेरे साथ है
तो मुझे अपने ही देश में
एक परीक्षा देने के लिए
सैकड़ों किलोमीटर क्यों भटकना पड़ता है?
रेलवे स्टेशनों पर बैठा हुआ हर युवक
एक आँकड़ा नहीं है।
वह किसी किसान का बेटा है
किसी मज़दूर की बेटी है
किसी माँ की अधूरी नींद है
किसी पिता की अंतिम उम्मीद है
लेकिन व्यवस्था
उन्हें अक्सर संख्या की तरह देखती है
फॉर्मों की संख्या
रोल नंबरों की संख्या
कटऑफ की संख्या
और इसी बीच
उनकी उम्र बीतती रहती है
भर्तियाँ टलती रहती हैं
परीक्षाएँ रद्द होती रहती हैं
पेपर लीक होते रहते हैं
परिणाम अटकते रहते हैं
और सपनों की उम्र
धीरे-धीरे कम होती जाती है
फिर भी वे हार नहीं मानते
वे अगली भर्ती का इंतज़ार करते हैं
अगली ट्रेन पकड़ते हैं
अगला फॉर्म भरते हैं
अगला सपना देखते हैं।
शायद यही इस देश के युवाओं की सबसे बड़ी ताकत है
कि व्यवस्था बार-बार उन्हें निराश करती है
फिर भी वे उम्मीद करना नहीं छोड़ते
लेकिन किसी राष्ट्र की सभ्यता
इस बात से नहीं मापी जाती
कि उसके नेता कितने बड़े भाषण देते हैं
वह इस बात से मापी जाती है
कि उसके युवाओं को
अपने भविष्य तक पहुँचने के लिए
कितनी पीड़ा से गुजरना पड़ता है
आज भारत के रेलवे स्टेशन
एक मौन प्रश्न की तरह खड़े हैं
वे पूछ रहे हैं
क्या यह वही देश है
जिसका सपना इन युवाओं ने देखा था?
या यह
बेरोज़गारों का एक विशाल प्रतीक्षालय है
जहाँ करोड़ों सपने
अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं?
★★★
रचयिता: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता





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