Tuesday, 4 August 2026

जीवन में अकेलापन ज़रूरी है

चर्चित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ:—
1).
अकेलापन : दर्शन की पहली कक्षा

समय सापेक्ष सच!
मैं एकांत प्रिय जन हूँ
दिल और दिमाग़ से दुखबोध ने कहा 
कि मैं दिशा, दृष्टि, दर्शन और दृष्टिकोण का जंक्शन हूँ
मेरे लिए 
अकेलापन
कोई खाली कमरा नहीं
जहाँ मनुष्य टूटता है
यह वह शून्य है
जहाँ शोर से थका हुआ मन
अपने ही प्रश्नों के सामने
निःशब्द खड़ा हो जाता है

जब रिश्तों की आवाज़ें
और समाज की तालियाँ
धीरे-धीरे
पीछे छूट जाती हैं
तब मनुष्य
पहली बार
ख़ुद से मिलता है
बिना परिचय
बिना भूमिका
बिना मुखौटे।

अकेलापन
मज़बूरी नहीं
एक अनुशासन है
चेतना का
यहीं
जीवन
अपने जैविक खोल को
चीरकर बाहर आता है
और मनुष्य
सोचने लगता है
कि वह केवल जी रहा है
या जीने का अर्थ भी जानता है

यहाँ प्रश्न जन्म लेते हैं
मैं कौन हूँ?
मेरा समाज क्या है?
और यह संसार
किसके लिए रचा गया है?
इन प्रश्नों का कोई उत्सव नहीं
कोई त्वरित उत्तर नहीं
बस
लंबी चुप्पियाँ हैं
जो धीरे-धीरे
दर्शन में बदल जाती हैं।

अकेलापन
न तो बीमारी है
न पराजय
यह वह गुरुकुल है
जहाँ मनुष्य
अपने भीतर
चेतना का पाठ पढ़ता है
यहीं
वह भीड़ से ऊपर उठकर
विचार करने वाला
असहमति करने वाला
और अर्थ खोजने वाला
मनुष्य बनता है।

दर्शन
किसी सभा में नहीं जन्मता
वह पैदा होता है
उस सामाजिक एकांत में
जहाँ मनुष्य
अपने होने की
पूरी जिम्मेदारी
स्वयं उठाता है

इसलिए
अकेलापन
समस्या नहीं
एक शिक्षक है
जो मनुष्य को
शांत
सार्थक
और
दार्शनिक बना देता है।
★★★
2).

अकेलापन: अंतर्यात्रा का आलोक

कहते हैं—
जब शब्द थक जाते हैं
तब मौन बोलता है
जब सारे रास्ते लौट जाते हैं
तब भीतर का पथ खुलता है
और जब मनुष्य सचमुच अकेला होता है
तभी वह अपने सबसे निकट होता है...

अकेला हूँ, मगर सुनसान बिल्कुल भी नहीं हूँ
मेरे भीतर अनगिनत संवाद अब भी जी रहे हैं
भीड़ जितनी दूर करती जा रही पहचान मेरी
उतने गहरे सत्य मुझमें दीप बनकर जी रहे हैं

चल रहा हूँ
धूप, वर्षा, शूल, पथरीली डगर में
मैं अकेला हूँ
मगर अपने ही विस्तृत समुंदर में।

जब सभी आवाज़ें थककर लौट जाती हैं
साँझ अपनी देह पर चुप्पी सजाती है
एक खिड़की मन के भीतर खुल ही जाती है
जहाँ न कोई प्रश्न छोटा, न कोई उत्तर बड़ा।

वहीं बैठा हुआ मैं अपने ही चेहरे से मिलता हूँ
अपने ही आँसुओं में अपना ही आकाश सिलता हूँ।

अकेला हूँ
मगर यह हार की पहचान कब है
यह तो मेरी चेतना का मौन अभिनंदन सब है
जो नहीं मिलता किसी उत्सव, किसी बाज़ार में
वह अकेलेपन की गहराई का ही धन सब है।

भीड़ ने मुझको बहुत समझाना चाहा
हँसने, गाने और बहलाना चाहा
मैंने देखा— 
चेहरे सारे मुस्कुराते थे
लेकिन भीतर अपने-अपने शून्य ढोते थे।

मैंने तब जाना
सबसे कठिन सफ़र भीतर की ओर जाता है
जिसे जगत तन्हाई कहता है
वही मनुष्य को अपने घर ले जाता है।

अकेलापन अभिशाप नहीं
यह प्रश्नों का प्रथम विद्यालय है
यहीं विचार जन्म लेते हैं
यहीं मनुष्य अपने होने का अर्थ पढ़ता है।

रात गहरी है
मगर रातों से रिश्ता पुराना है
एक तारा रोज़ मेरे द्वार पर चुपचाप आना है।

मैं उसी की लौ से अपने स्वप्न लिखता हूँ
टूटे हुए दिनों में भी नई सुबह का नाम लिखता हूँ।

यदि सभी दीप बुझ जाएँ
तो आँखें दीप बन जाएँ
यदि सभी स्वर सो जाएँ
तो धड़कन गीत बन जाए।

अकेला हूँ
मगर संसार मुझमें साँस लेता है
हर अधूरी प्रार्थना का स्वर मुझी में चेतता है
मौन मेरा शत्रु नहीं
वह मेरा प्रथम सहचर है
जिसकी उँगली थामकर मन सत्य की ओर बढ़ता है।

समय नदी था बहता आया
मैं तट की चुप रेत नहीं था
हर लहरों ने नाम मिटाया
फिर भी अपना खेत नहीं था
मैंने पगडंडी से पूछा,
“कितने पाँव गुज़रते होंगे?”
वह बोली, “जो लौट न पाएँ
वे ही मुझमें ठहरते होंगे।”

बूढ़ा बरगद हँसकर बोला,
“छाया देना धर्म वृक्ष का
फल मिल जाए या न मिले पर
सूख न जाए मर्म वृक्ष का।”
तब से मैंने सीख लिया है,
अपनी जड़ में जल भरना है
दुनिया चाहे फूल चुने या
मुझको केवल वृक्ष बनना है।

सूरज हर दिन नया निकलता
फिर भी अग्नि वही रहती है
देह बदलती रहती लेकिन
भीतर की ऋतु नहीं बहती है
जो भी मेरे साथ चला था
उसको अपनी राह मिली है
मैंने किसी हाथ को रोका?
इतनी कब परवाह मिली है!

रिश्ते यदि पंछी हैं तो फिर
उनको नभ का मान रहने दो
प्रेम अगर सचमुच निर्मल है
उसको निर्बन्ध उड़ने दो
मैंने बंधन कम ही बाँधे
मन को खुला गगन सौंपा है
जिसने मुझको छोड़ दिया
वह अपने भीतर ही रोपा है।

अब मैं कोई प्रश्न नहीं हूँ
उत्तर भी घोषित न करूँगा
जीवन जितना खोल सकेगा
उतना ही उद्घाटित करूँगा
शब्द नहीं हैं मेरे हथियार
शब्द धधकते हुए अंगारे
इनसे पहले खुद को गढ़ना
फिर जग से करना संवाद रे।

यदि इतिहास अँधेरा लिख दे
मैं भविष्य की स्याही बनूँगा
यदि कोई स्वर मौन पड़े तो
उसका पहला गायक बनूँगा
अकेलापन पथ का काँटा नहीं
यात्रा का पहला अनुशासन है
जो अपने भीतर दीप जलाए
वही मनुष्य स्वयं का दर्शन है।

धूल पड़ी थी मेज़ किनारे
एक पुरानी डायरी पर
कुछ अक्षर आधे जाग रहे थे
कुछ सोए थे अंतिम स्वर पर
मैंने उनको हाथ लगाया
जैसे कोई बीज जगाता
सूखी मिट्टी की नस-नस में
फिर से हरियाली भर जाता।

कितनी बातें लिखी न जातीं
फिर भी भीतर जीवित रहतीं
नदियाँ पहले मन में बहतीं
फिर धरती पर राहें कहतीं
मैंने देखा—
रचना केवल कागज़ भर नहीं होती
पहले जीवन गलता है
तब कोई पंक्ति जन्म लेती।

कुम्हारों के चाक सरीखा
दिन भर मन घूमता रहता
टूटे घड़ों की किरचों से भी
नया आकार निकलता रहता
हथेली की कठोर रेखाएँ
भाग्य नहीं, परिश्रम लिखतीं
पसीने की बूँदें अक्सर
पत्थर की भाषा भी पढ़तीं।

मैंने अपने घाव सहेजे
ज्यों लोहार सँभाले भट्ठी
दर्द पिघलकर ढलता देखा
नव औज़ारों की आकृति
अब मैं रोने नहीं बैठता
आँसू का उपयोग बदलता
जिस बूँद से दृष्टि धुँधलाती
उसी बूँद से शब्द सँवरता।

कल जो टूटा, वही कलम है
कल जो बिखरा, वही कथन है
जिसे समय ने मौन समझा
वह आने वाले कल का वचन है
मैं अपने श्रम का साक्षी हूँ
फल का कोई मोह नहीं
जो भीतर आकार बना ले
उससे बड़ा विजयोत्सव नहीं।

वह भी अपने हिस्से भर की
धूप हथेली पर रखती है
हँसते चेहरे की तह के नीचे
एक चुप्पी भी तो रखती है
दिनभर घर की साँस सँभाले
सबकी थाली, सबकी बातें
संध्या होते, अपने भीतर
कौन सुने उसके जज़्बातें?

मैं भी शब्दों का मज़दूर हूँ
चेहरों के बाज़ार से लौटा
जिसको सबने सफल कहा था
वह भीतर से कितना टूटा
वह चूड़ी की खनक बचाती
मैं स्वर की लय थामे रहता
दोनों अपने-अपने हिस्से
एक अधूरा मौसम सहते।

वह तकिए में सिर रखती है
नींद मगर आँखों तक कब है?
मैं काग़ज़ पर झुक जाता हूँ
उत्तर फिर भी हाथ न अब है
किसने किसको कम समझा है?
दर्द न स्त्री का, न नर का
पीड़ा का कोई लिंग नहीं है
रंग वही हर अंतःस्वर का।

यदि वह रोती घर भी रोता
यदि मैं चुप हूँ दिन भी चुप है
एक-दूजे की धड़कन में ही
जीवन का संगीत रूप है
चलो किसी निर्णय पर न आएँ
कौन अधिक या कौन अकेला
प्रेम तभी संपूर्ण बनेगा
जब दोनों का बँटे झमेला।

तुम अपनी निस्तब्धता लाना
मैं अपना अव्यक्त कथन लाऊँ
दो अधूरे स्वर मिल जाएँ
शायद पूरा जीवन गाऊँ
किसको लेकर कौन चला है?
किसको यहीं ठहरना होगा?
जन्म किसी की मुट्ठी में कब,
मृत्यु किसी से डरना होगा?

हम सब अपने-अपने क्षण के
क्षणभंगुर उत्सव के प्रहरी
साँस-साँस की पूँजी लेकर
लौट चलेंगे राह सुनहरी
जिसने पाया, उसने खोया
यही समय का सीधा लेखा
रिक्त हथेली आई जग में
रिक्त हथेली ने ही देखा।

स्त्री हो अथवा पुरुष, अंततः
दुःख का रंग एक ही होता
प्रेम अगर निष्काम न हो तो
मन भीतर ही भीतर रोता
जिसको अपने सत्य मिले हों
वह किससे फिर वैर करेगा?
जो अपने ही घाव समझ ले
वह किसका अपमान करेगा?

जीवन कोई युद्ध नहीं है
जिसमें केवल जीत बची हो
जीवन वह संगीत, जहाँ पर
हर चुप्पी की भी एक ऋचा हो
रोटी जितनी भूख की अपनी
उतनी ही सम्मान की चाह
प्रेम तभी पूरा कहलाए
जब सबको मिल जाए निगाह।

देना ही यदि सीख लिया तो
किसका घर निर्धन रह पाए?
दीप स्वयं जलने का साहस
सैकड़ों दिशाओं तक जाए
मैं अब अपने नाम से आगे
मानव होने का स्वर लिखता
हर चेहरे में अपना चेहरा
हर पीड़ा में अपना दुख दिखता।

यदि मेरी धड़कन से आगे
किसी अपरिचित का मन धड़के
समझूँगा, मेरे होने के
अर्थ समय से बाहर चमके
अकेला आया, अकेला जाऊँ
इतना भर जीवन का फल नहीं
जो अपने भीतर जग को जी ले
उससे बड़ा कोई संबल नहीं।

चलो, न कोई आगे-पीछे
न ऊँचा-नीचा, न अपना-पराया
हाथों में हाथ, हृदय में मानव
यही शिखर है, यही सरमाया
मैं भी तुम हूँ, तुम भी मैं हो
यही सत्य अंतिम उद्घोष है
प्रेम जहाँ निष्काम ठहरता
वहीं मनुष्य का वास्तविक वास है।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


जीवन में अकेलापन ज़रूरी है

चर्चित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ:— 1). अकेलापन : दर्शन की पहली कक्षा समय सापेक्ष सच! मैं एकांत प्रिय जन हूँ दिल और दिमाग़ से दुख...