बौद्ध नाग पंचशील पर्व
श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बौद्ध नाग पंचशील पर्व को बौद्ध परंपरा में नागवंश, बुद्ध-धम्म, पंचशील, वर्षावास और सामुदायिक नैतिक जीवन की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। इस दृष्टि में यह पर्व केवल सर्प-पूजा तक सीमित न होकर करुणा, अहिंसा, शील, समता और मानवता का संदेश देता है। ‘नाग’ शब्द को केवल सर्प के अर्थ में देखना उचित नहीं माना जाता। भारतीय इतिहास, बौद्ध साहित्य और लोकपरंपराओं में नाग एक प्राचीन समुदाय और राजवंश के रूप में भी वर्णित हैं। बुद्ध से जुड़े अनेक कलात्मक रूपों में नाग-छत्र दिखाई देता है। बौद्ध परंपरा में मूचुलिंद नाग की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें वे ध्यानमग्न बुद्ध की वर्षा से रक्षा करते हैं। इसलिए नाग-प्रतीक को बुद्ध-धम्म की करुणा, संरक्षण और लोकस्मृति के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।बौद्ध नाग पंचशील पर्व की लोक-स्मृति में शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नागवंशी राजाओं का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार इन पाँच राजाओं को बुद्ध-रक्षक पंचमुखी नाग के प्रतीक से जोड़ा जाता है। व्यापक नाग-परंपरा में अनंत, वासुकी, तक्षक, करकोटक और ऐरावत सहित अनेक नागराजाओं के नाम भी मिलते हैं। इन ऐतिहासिक एवं लोकपरंपरागत स्मृतियों को प्रमाणों के साथ समझना नागवंश की विरासत के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण आधार है।
बुद्धकालीन वर्षावास भी इस पर्व की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने में महत्त्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु में भिक्खु एक स्थान पर निवास करते, धम्म का अध्ययन-मनन करते और गृहस्थों को नैतिक जीवन का मार्ग बताते थे। ऐसे सामुदायिक वातावरण में पंचशील—प्राणी-हिंसा से विरति, चोरी से विरति, काम-दुराचार से विरति, असत्य वचन से विरति और मादक पदार्थों से विरति—व्यक्तिगत तथा सामाजिक अनुशासन का आधार बनता था। नाग पंचशील की स्मृति को इसी नैतिक चेतना से जोड़कर देखने पर पर्व का मूल संदेश अधिक व्यापक हो जाता है। इसका केंद्र किसी जीव के प्रति भय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि दया, करुणा, शांति, अहिंसा और सह-अस्तित्व होना चाहिए। साँपों को दूध पिलाने जैसी प्रथाओं के बजाय वैज्ञानिक समझ के साथ वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार आवश्यक है। इस पर्व का एक सुंदर लोक-संदेश पक्षी संरक्षण भी हो सकता है। सावन-भादों में पक्षियों के लिए दाना और स्वच्छ जल उपलब्ध कराना, पेड़-पौधों तथा प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना और जीव-जगत के प्रति करुणा रखना बुद्ध की करुणा-दृष्टि को व्यवहार में उतारने का सरल माध्यम है।
नागवंश से जुड़े अनेक ऐतिहासिक दावे लोकपरंपराओं और वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों में मिलते हैं। शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नामों तथा कन्हेरी आदि स्थलों से जुड़े नाग-प्रतीकों का उल्लेख भी मिलता है। किंतु ऐसे विशिष्ट ऐतिहासिक दावों को पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर अलग-अलग जाँचना आवश्यक है। लोकस्मृति और इतिहास दोनों का सम्मान तभी सार्थक है, जब आस्था के साथ प्रमाण और तर्क को भी स्थान दिया जाए। इसी प्रकार जातक कथाओं की संख्या से सीधे अठारह पुराणों की संख्या निकलने का दावा ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करने से पहले प्रमाण की अपेक्षा करता है। इतिहास का पुनर्पाठ आवश्यक है, लेकिन पुनर्पाठ का आधार प्रमाण, तर्क और आलोचनात्मक विवेक होना चाहिए। आज नाग पंचशील पर्व को इसी व्यापक अर्थ में पुनर्जीवित किया जा सकता है—अतीत की स्मृति, बुद्ध का धम्म, पंचशील का आचरण, प्रकृति के प्रति करुणा और मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता। पर्व तभी सार्थक है, जब वह केवल अनुष्ठान न रहकर जीवन-व्यवहार में दिखाई दे।
नाग पंचशील : बुद्ध, नाग और मानवता का महापर्व
शेष भोगिन चंद्रांशु, धम्मवर्मन वंगार।
अनंत वासुकी तक्षक, करकोटक ऐरावत॥
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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#संक्षिप्त_परिचय:-
नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि', 'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।
जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.
जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।
भाषा : हिंदी व भोजपुरी।
विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।
माता : श्रीमती उत्तम देवी
पिता : श्री नन्दलाल
पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :
कविताएँ और आलेख - 'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस', 'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।
प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)
काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।
सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023", "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।
संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव
संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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व्हाट्सएप नं. : 8429249326
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