Sunday, 16 August 2026

बौद्ध नाग पंचशील पर्व || गोलेन्द्र पटेल

बौद्ध नाग पंचशील पर्व

नमो बुद्धाय। घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध।

श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बौद्ध नाग पंचशील पर्व को बौद्ध परंपरा में नागवंश, बुद्ध-धम्म, पंचशील, वर्षावास और सामुदायिक नैतिक जीवन की स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। इस दृष्टि में यह पर्व केवल सर्प-पूजा तक सीमित न होकर करुणा, अहिंसा, शील, समता और मानवता का संदेश देता है। ‘नाग’ शब्द को केवल सर्प के अर्थ में देखना उचित नहीं माना जाता। भारतीय इतिहास, बौद्ध साहित्य और लोकपरंपराओं में नाग एक प्राचीन समुदाय और राजवंश के रूप में भी वर्णित हैं। बुद्ध से जुड़े अनेक कलात्मक रूपों में नाग-छत्र दिखाई देता है। बौद्ध परंपरा में मूचुलिंद नाग की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें वे ध्यानमग्न बुद्ध की वर्षा से रक्षा करते हैं। इसलिए नाग-प्रतीक को बुद्ध-धम्म की करुणा, संरक्षण और लोकस्मृति के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।बौद्ध नाग पंचशील पर्व की लोक-स्मृति में शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नागवंशी राजाओं का उल्लेख मिलता है। परंपरा के अनुसार इन पाँच राजाओं को बुद्ध-रक्षक पंचमुखी नाग के प्रतीक से जोड़ा जाता है। व्यापक नाग-परंपरा में अनंत, वासुकी, तक्षक, करकोटक और ऐरावत सहित अनेक नागराजाओं के नाम भी मिलते हैं। इन ऐतिहासिक एवं लोकपरंपरागत स्मृतियों को प्रमाणों के साथ समझना नागवंश की विरासत के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण आधार है।

बुद्धकालीन वर्षावास भी इस पर्व की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने में महत्त्वपूर्ण है। वर्षा ऋतु में भिक्खु एक स्थान पर निवास करते, धम्म का अध्ययन-मनन करते और गृहस्थों को नैतिक जीवन का मार्ग बताते थे। ऐसे सामुदायिक वातावरण में पंचशील—प्राणी-हिंसा से विरति, चोरी से विरति, काम-दुराचार से विरति, असत्य वचन से विरति और मादक पदार्थों से विरति—व्यक्तिगत तथा सामाजिक अनुशासन का आधार बनता था। नाग पंचशील की स्मृति को इसी नैतिक चेतना से जोड़कर देखने पर पर्व का मूल संदेश अधिक व्यापक हो जाता है। इसका केंद्र किसी जीव के प्रति भय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि दया, करुणा, शांति, अहिंसा और सह-अस्तित्व होना चाहिए। साँपों को दूध पिलाने जैसी प्रथाओं के बजाय वैज्ञानिक समझ के साथ वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार आवश्यक है। इस पर्व का एक सुंदर लोक-संदेश पक्षी संरक्षण भी हो सकता है। सावन-भादों में पक्षियों के लिए दाना और स्वच्छ जल उपलब्ध कराना, पेड़-पौधों तथा प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना और जीव-जगत के प्रति करुणा रखना बुद्ध की करुणा-दृष्टि को व्यवहार में उतारने का सरल माध्यम है।

नागवंश से जुड़े अनेक ऐतिहासिक दावे लोकपरंपराओं और वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों में मिलते हैं। शेषनाग, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन और वंगर जैसे नामों तथा कन्हेरी आदि स्थलों से जुड़े नाग-प्रतीकों का उल्लेख भी मिलता है। किंतु ऐसे विशिष्ट ऐतिहासिक दावों को पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और साहित्यिक प्रमाणों के आधार पर अलग-अलग जाँचना आवश्यक है। लोकस्मृति और इतिहास दोनों का सम्मान तभी सार्थक है, जब आस्था के साथ प्रमाण और तर्क को भी स्थान दिया जाए। इसी प्रकार जातक कथाओं की संख्या से सीधे अठारह पुराणों की संख्या निकलने का दावा ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार करने से पहले प्रमाण की अपेक्षा करता है। इतिहास का पुनर्पाठ आवश्यक है, लेकिन पुनर्पाठ का आधार प्रमाण, तर्क और आलोचनात्मक विवेक होना चाहिए। आज नाग पंचशील पर्व को इसी व्यापक अर्थ में पुनर्जीवित किया जा सकता है—अतीत की स्मृति, बुद्ध का धम्म, पंचशील का आचरण, प्रकृति के प्रति करुणा और मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता। पर्व तभी सार्थक है, जब वह केवल अनुष्ठान न रहकर जीवन-व्यवहार में दिखाई दे।

नाग पंचशील का संदेश यही हो—
अहिंसा हमारे कर्म में, सत्य हमारे वचन में,
करुणा हमारे हृदय में और मानवता हमारे जीवन में हो।

नमो बुद्धाय।
जय करुणा। जय समता। जय मानवता।

नाग पंचशील : बुद्ध, नाग और मानवता का महापर्व

नमो बुद्ध, करुणा-धन, नमो धम्म उजियार।
नमो संघ समता-सुधा, मिटे तिमिर-अंधकार॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर आँगन हो ज्ञान।
मित्रता, मुहब्बत, मनुजता—यही बने अभियान॥

दया धर्म का मूल है, करुणा जीवन-प्राण।
अहिंसा से विश्व में, जागे नव सम्मान॥

श्रावण शुक्ल की पंचमी, पर्व पुरातन गान।
नाग-पंचशील नाम से, जागे बुद्ध-विधान॥

बुद्ध-वचन की छाँह में, हो जीवन अनुशास।
शील-साधना से मिटे, मन का तम और त्रास॥

नागवंश की लोक-स्मृति, रखे पुराना मान।
इतिहासों की धूल में, खोजे अपना ज्ञान॥

कथा-कहानी के परे, देखो मानव रूप।
नाग कहे जिस जाति को, उसमें मन का धूप॥

जो भी मानव जन्म ले, मानव उसका नाम।
जाति-वर्ण की दीवारें, करतीं जग बदनाम॥

शेष भोगिन चंद्रांशु, धम्मवर्मन वंगार।
अनंत वासुकी तक्षक, करकोटक ऐरावत॥

बुद्ध धम्म की राह में, नाग हुए अनुरक्त।
समता, मैत्री, शील से, जीवन हुआ आसक्त॥

कहीं शेष की गाथा है, कहीं वासुकी नाम।
अनंत, पद्म, कंबलादि—लोक-स्मृति में धाम॥

कालिय, शंखपाल भी, कथाओं में विख्यात।
नागवीरों की लोक में, गूँज रही सौगात॥

परंपराओं के अर्थ को, पढ़ना होगा आज।
साँपों के मिथ में कहीं, छिपा हुआ है राज॥

रूपक के आवरण तले, इतिहासों की छाप।
पढ़ने वाला खोलता, सदियों का संताप॥

बुद्ध-मूर्ति के शीश पर, नाग-छत्र जब होय।
करुणा-रक्षक स्मृति का, अर्थ नया तब होय॥

मूचुलिंद की लोककथा, देती यही संदेश।
बुद्ध-विचार की छाँह में, सेवा सबसे विशेष॥

प्राणी-हिंसा से रहो, मन-वचन-कर्म विरत।
सत्य-वचन को धारकर, जीवन रखो निर्मल॥

दुराचार से दूर रहो, संयम अपना धर्म।
लोभ-मोह के बंधनों, से रखो जीवन वर्म॥

मदिरा-मादक से बचो, जाग्रत रखो विवेक।
पंचशील की साधना, मन को करती नेक॥

नहीं किसी पर क्रोध हो, नहीं किसी से द्वेष।
मैत्री का दीपक जले, मिटे हृदय का क्लेश॥

शील जहाँ व्यवहार में, वहीं धम्म साकार।
केवल पूजा से नहीं, बदलो जीवन-व्यवहार॥

बरखा आई, राह में, नदियाँ उठीं उफान।
भिक्खु एक ही स्थान पर, करते धम्म-ध्यान॥

वर्षावास के समय में, रुकता था परिव्राज।
सुनते जन उपदेश तब, खुलता मन का राज॥

गाँव-गाँव में बैठकर, बुद्ध-वचन पर बात।
शील, करुणा, मैत्री की, होती थी बरसात॥

घर-घर जागे चेतना, जन-जन पाए ज्ञान।
मानवता की साधना, बने लोक-अभियान॥

श्रावण की उस साधना, में सामूहिक भाव।
एक-दूसरे के लिए, बढ़ता प्रेम-सद्भाव॥

नगर बसाने वालों की, स्मृति कहती बात।
नाग-नाम से जुड़ गए, नगर और भू-भाग॥

इतिहासों में खोजिए, लोक-स्मृति के सूत्र।
नाम, शिलालेख, कथाएँ—सब हैं अपने पूरक॥

राज्य, गण और संघ में, चलता था व्यवहार।
योग्य व्यक्ति को चुनने का, होता था अधिकार॥

कहीं कुश्ती, कहीं धनुष, कहीं अश्व की चाल।
साहस, कौशल, शक्ति का, होता था प्रतिपाल॥

आज दंगल, खेल और, कौशल के उत्सव।
लोक-स्मृति में जीवित हैं, बीते युग के स्वर॥

वीरता का अर्थ है, निर्बल का सम्मान।
शक्ति वही सार्थक बने, जो रखती कल्याण॥

इतिहासों की धूल में, दबे अनेक प्रसंग।
पढ़ने से खुलते कभी, स्मृति-ग्रंथ के रंग॥

किताबें चेतन-मन की, धूल हटातीं आज।
प्राचीनों से जोड़तीं, वर्तमान का राज॥

तर्क-प्रमाण की रोशनी, रखो सदैव साथ।
अंधविश्वासों से नहीं, सत्य बनेगा पथ॥

जो प्रमाण से सिद्ध हो, उसको दो सम्मान।
जो केवल आख्यान हो, उसको मानो ज्ञान॥

प्रश्न करो निर्भीक हो, यही विवेक-विधान।
जिज्ञासा से ही खुले, इतिहासों का ज्ञान॥

नाग शब्द के अर्थ को, केवल सर्प न मान।
लोक-परंपरा में मिले, अर्थ अनेक महान॥

कथा जहाँ प्रतीक बने, अर्थ वहाँ बहुतेर।
रूपक के भीतर छिपे, इतिहासों के फेर॥

सर्पों को दूध पिलाना, तर्क नहीं स्वीकार।
प्रकृति-विज्ञान समझकर, करो जीव से प्यार॥

जीव-जगत के प्राणियों, पर मत करना अत्याचार।
दूध चढ़ाने से अधिक, दया करो अपार॥

साँप भी धरती के जीव हैं, उनका भी संसार।
अंधविश्वासों से उन्हें, मत देना उपहार॥

नाग कहे तो मानव हो, सर्प कहे तो जीव।
दोनों की अपनी जगह, दोनों के अधिकार॥

शेष, भोगिन, चंद्रांशु, धम्मवर्मन, वंगर नाम।
लोक-स्मृति में आज भी, गूँज रहे हैं धाम॥

राजाओं की गाथा को, प्रमाणों से परखो।
सिक्के, शिलालेख, पुरातत्त्व—सबसे सत्य परखो॥

कन्हेरी की गुफाओं में, नाग-छत्र का रूप।
बुद्ध-प्रतिमा के साथ है, स्मृति का सुंदर धूप॥

पाँच फनों की छाँह में, पाँच प्रतीकों की बात।
लोककथा और इतिहास में, खोजो उनके अर्थ॥

सात-फनों की छवि मिले, तो भी प्रश्न करो।
प्रतीकों के मूल अर्थ को, तर्क-ज्योति से धरो॥

नागकन्या का अर्थ हो, केवल सर्प न जान।
लोक-संदर्भ के भीतर, देखो मानव-प्राण॥

नागमणि की चमक से अधिक, ज्ञान-मणि अनमोल।
मुनि बने जो साधना से, उसका ऊँचा मोल॥

नागमुनि की लोककथा, साधक की पहचान।
ज्ञान-ध्यान से श्रेष्ठ हो, ऐसा हो इंसान॥

मिथक अगर मनुष्य को, बाँटें ऊँच-नीच।
ऐसी कथा पर प्रश्न हो, विवेक रहे सदा नींव॥

मानव को मानव समझना, सबसे ऊँचा धर्म।
दया, शांति, समता बने, जीवन का सत्कर्म॥

आज पर्व का अर्थ हो, केवल पूजा-पाठ।
जीव-जगत की रक्षा में, बढ़े मनुष्य का हाथ॥

आँगन में दाना रखो, छत पर रखो अन्न।
वृक्ष तले जल भी रखो, जीव रहें प्रसन्न॥

चावल, गेहूँ, चना रखो, मटर रखो सम्मान।
भूखे पंछी लौटकर, पाएँ अपना स्थान॥

बरखा में जब अन्न कम, तब बनो उनका मित्र।
दाना देकर बचाइए, जीवन का यह चित्र॥

जो पंछी कल दिखते थे, आज न दिखते पास।
उनकी घटती संख्या पर, मन में जागे आस॥

बचे हुए जो जीव हैं, उनको दो संरक्षण।
करुणा ही सच्चा बने, मानव का आभूषण॥

नहीं किसी को मारना, नहीं किसी को छल।
सत्य-संयम साथ लेकर, जीवन करना सफल॥

लोभ-मोह से दूर हो, निर्मल हो व्यवहार।
मादकता से मुक्त मन, जागे विवेक-विचार॥

जाति-वर्ण का भेद मिटे, मिटे घृणा-अभिमान।
मानव-मानव एक हों, यही धर्म की शान॥

नारी, नर, श्रमिक, कृषक, सबका हो सम्मान।
जिसके श्रम से जग चले, उसका ऊँचा मान॥

धर्म वही जो जोड़ता, धर्म वही जो शील।
धर्म वही जो दुख हरे, करुणा जिसकी नील॥

धम्म-ज्योति फिर जल उठे, मिटे अज्ञान-तम।
बुद्ध-विचारों से बने, मानवता का क्रम॥

नहीं किसी के वर्चस्व की, चाह रहे संसार।
समता, न्याय, बंधुत्व से, हो जन-जन उद्धार॥

बुद्ध न केवल नाम हैं, बुद्ध विचार महान।
तर्क, करुणा, शील से, निर्मित हो इंसान॥

नहीं अतीत की अंधभक्ति, नहीं वर्तमान-विस्मार।
सत्य जहाँ प्रमाणित हो, उसको दें स्वीकार॥

अतीत से सीखें मगर, भविष्य करें निर्माण।
ज्ञान-विवेक के दीप से, रोशन हो हिंदुस्तान॥

नाग पंचशील पर्व पर, यही रहे संकल्प।
मन में बुद्ध-विचार हो, जीवन हो निष्कलंक॥

घर-घर बुद्ध-विचार हो, हर घर पंचशील।
द्वेष-दंभ सब दूर हों, मन हो निर्मल-नील॥

पक्षी, पशु, वन, जल, धरा—सबका हो अधिकार।
जीवन के हर रूप पर, बरसे प्रेम अपार॥

जाति-धर्म की सीम से, ऊपर उठता मानव।
करुणा जिसकी शक्ति हो, सत्य बने उसका धन॥

मित्रता में मूल हो, मुहब्बत में विस्तार।
मानवता में सार हो, मुक्ति बने उद्गार॥

बुद्ध-वचन की राह पर, चलना हो अभियान।
मानव-मानव एकसम, यही हमारा गान॥

नमो बुद्धाय मंत्र से, जागे जन-जन प्राण।
नमो धम्म, नमो संघ, नमो मानव सम्मान॥

नागवंश की लोक-स्मृति, बुद्ध धम्म का मान।
तर्क, करुणा, शील से, गढ़ें नया इंसान॥

जय करुणा, जय शांति हो, जय समता का ज्ञान।
घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध—मानवता महान॥
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, क्रांतिकारी जनपक्षधर्मी मूलनिवासी बहुजन किसान अर्जक कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

लिंक: https://golendragyan.blogspot.com/2026/08/blog-post_15.html

##अर्जक #अर्जकवाद #अर्जकसंघ #रामस्वरूपवर्मा #महामना_रामस्वरूपवर्मा #अर्जकसाहित्य #जयअर्जक #जयसंविधान #जयमानववाद #मानववाद #मानवतावाद #सामाजिकन्याय #समानता #समतामूलकसमाज #जातिविरोध #जातिउन्मूलन #श्रमकीप्रतिष्ठा #श्रमजीवी #किसान #मजदूर #बहुजन #बहुजनचेतना #वैज्ञानिकदृष्टिकोण #वैज्ञानिकचेतना #तर्कवाद #विवेकवाद #अंधविश्वासविरोध #सामाजिकक्रांति #सांस्कृतिकक्रांति #मानवमुक्ति #मानवगरिमा #स्वाभिमान #संवैधानिकलोकतंत्र #संवैधानिकमूल्य #स्वतंत्रता #बंधुत्व #प्रतिनिधित्व #आरक्षण #महिलासमानता #पेरियार #ज्योतिबाफुले #डॉआंबेडकर #बाबूजगदेवप्रसाद #शोषितसमाज #शोषितसमाजदल #बहुजनआंदोलन #क्रांतिचेतना #प्रगतिशीलचिंतन #तर्कशीलसमाज #श्रमकासम्मान #मनुष्य_मनुष्य_एकसमानअकेलापन #एकांत #अंतर्यात्रा #आत्मसंवाद #आत्मबोध #मौन #मौन_का_आलोक #जीवनदर्शन #दार्शनिक_चिंतन #अस्तित्व #चेतना #मानवता #प्रेम #करुणा #संवेदना #मनुष्यता #स्वयं_की_खोज #आत्मखोज #अंतःस्वर #आत्मिक_शांति #विचार #सृजन #नवगीत #हिंदी_कविता #काव्य #गीत #साहित्य #लेखन #चिंतन #एकांत_का_आलोक #अकेलापन_अंतर्यात्रा_का_आलोक #आत्मसंवादकीकविता #आत्मबोधकीकविता #एकांत #मौन #चिंतन #जीवनदर्शन #अस्तित्व #मानवता #प्रेम #करुणा #संवेदना #सृजन #लेखन #नवगीत #हिंदी_कविता #साहित्य #काव्य #गीत #Poetry #HindiPoetry #Poet #WritersOfInstagram #Literature #Solitude #SelfDiscovery #InnerJourney #Philosophy #Life #Motivation #Inspiration #Explore #Trending #Viral #Foryou #FBViral #NonFollowers #CreativeWriting #Thoughts #Mindfulness #SelfReflection #Reading #Books #Author #ArtOfWords #शिक्षा_ही_शक्ति_है #शिक्षित_बनो #वैज्ञानिक_सोच #ज्ञान_ही_ताकत_है #समानता #संविधान #सामाजिक_जागरूकता #जयभीम #कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता  #GolendraPatel #गोलेन्द्र_पटेल #गोलेन्द्रपटेल #GolendraPatelPoetry #YuvaKavi #HindiKavita #Kavita #HindiSahitya #AdhunikHindiKavita #NayiKavita #HindiPoets #ContemporaryHindiPoetry #YuvaSahityakar #KaviSammelan #KavitaKosh #KaviGolendraPatel #GolendraGyan #गोलेंद्रज्ञान #युवाकिसानकवि #हिंदीकविताकागोल्डेनबॉय #काशीमेंहिंदीकाहीरा #किसानकवि #युवकवि #गोलेन्द्रपेरियार #आँसूकेआशुकवि #आर्द्रताकीआँचकेकवि #अग्निधर्माकवि #निराशामेंनिराकरणकेकवि #दूसरेदूमिल #काव्यानुप्रासाधिराज #रूपकराज #ऋषिकवि #कोरोजयीकवि #आलोचनाकेकवि #महास्थविर #अद्यतनकबीर #शब्दसुश्रुत #दिव्यांगसेवी #आदिवासीकवि #बहुजनकवि #मूलनिवासीकवि #मूलनिवासीबहुजनकवि #आदिवासीमूलनिवासीबहुजनकवि #क्रांतिकारीकवि #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेन्द्रवादी  #विश्व_मूलनिवासी_दिवस #IndigenousPeoplesDay #मूलनिवासी #आदिवासी #अस्मिता #समानता #मानवाधिकार #सांस्कृतिक_विरासत #जय_जोहार  

#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com




No comments:

Post a Comment

बौद्ध नाग पंचशील पर्व || गोलेन्द्र पटेल

बौद्ध नाग पंचशील पर्व नमो बुद्धाय। घर-घर बुद्ध, हर घर बुद्ध। श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बौद्ध नाग पंचशील पर्व को बौद्ध परंपरा मे...