रक्खा सुत्त बंधन : गोलेन्द्र पटेल
सांस्कृतिक परंपराएँ समय के साथ अपने मूल अर्थ और स्वरूप में परिवर्तन ग्रहण करती हैं। रक्षाबंधन का एक संभावित प्राचीन बौद्ध-सांस्कृतिक संदर्भ “रक्खा सुत्त बंधन” के रूप में देखा जा सकता है। सुत्त अर्थात् सूत्र/उपदेश और रक्खा अर्थात् रक्षा—अर्थात् धम्म-सूत्र को रक्षा-संकल्प के रूप में बाँधना।
रक्खा-सुत्त में कहा गया है—
“सब्बे बुद्धा बलप्पत्ता पच्चेकानञ्च यं बलं ।
अरहन्तानञ्च तेजेन रक्खं बन्धामि सब्बसो ।।”
अर्थात् बुद्धों, पच्चेकबुद्धों और अरहंतों के तेज से सब प्रकार की रक्षा का संकल्प किया जाता है।
इसी प्रकार धम्म-सूत्रों के संरक्षण की आवश्यकता को यह पद रेखांकित करता है—
“सुत्तन्तेसु असन्तेसु, पमुट्ठे विनयम्हि च।
तमो भविस्सति लोके, सूरिये अत्थङ्गते यथा ॥”
अर्थात् जब सुत्त उपलब्ध नहीं रहते और विनय विस्मृत हो जाता है, तब सूर्यास्त के समान संसार में अंधकार छा जाता है।
इस दृष्टि से “रक्खा सुत्त बंधन” केवल धागा बाँधने की क्रिया नहीं, बल्कि धम्म-सूत्र, सदाचार और मानवीय कल्याण की रक्षा के संकल्प का सांस्कृतिक प्रतीक माना जा सकता है। कालांतर में यही सांस्कृतिक प्रतीक लोकपरंपरा में रूपांतरित होकर रक्षाबंधन के वर्तमान स्वरूप से जुड़ता दिखाई देता है।
अतः “रक्खा सुत्त बंधन” से “रक्षाबंधन” तक की यात्रा सांस्कृतिक रूपांतरण का एक विचारणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है—जहाँ आध्यात्मिक-नैतिक सूत्र धीरे-धीरे सामाजिक और पारिवारिक उत्सव का रूप ग्रहण करता है।
रक्खा सुत्त बंधन — धम्म की रक्षा, मानवता का बंधन।
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