युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ:-
1).
एकलव्य अभी ज़िंदा है
एकलव्य कमज़ोर नहीं है
कमज़ोर हुई है
वह व्यवस्था
जो अंगूठा माँगती है
और उसे गुरुदक्षिणा कहती है
हर जगह द्रोणाचार्य हैं
क्लासरूम में
कैंपस के गलियारों में
इंटरव्यू पैनल की कुर्सियों पर
और उस फ़ाइल में
जिस पर लिखा है— NFS
(योग्य, पर अनुपयुक्त!)
वे कहते हैं
“मेरिट”
और तीर निशाने से पहले
अंगूठा काट लेते हैं
महाभारत कोई बीता ग्रंथ नहीं
यह आज का नोटिफ़िकेशन है
जिसमें
राजकुमारों के लिए
मार्ग प्रशस्त है
और निषाद के लिए
सिर्फ़ आत्मसम्मान त्यागने का विकल्प
एकलव्य ने मूर्ति बनाकर सीखा था
आज का एकलव्य
PDF पढ़कर सीखता है
फॉर्म भरता है
फीस देता है
फिर भी सुनता है,
“सीट खाली रहेगी।”
दलित
आदिवासी
पिछड़ा
ये शब्द नहीं
ये वे कंधे हैं
जिन पर टिकी है
इस देश की इमारत
लेकिन प्रवेश द्वार पर
अब भी लिखा है,
“पहचान जाँच अनिवार्य।”
कैंपस में
जाति फुसफुसाहट में रहती है
मेरिट के भाषणों में छुपी
और
कभी-कभी
होस्टल की छत से गिरती हुई
ख़ामोशी बन जाती है
UGC का नया नियम
कोई दया-पत्र नहीं
यह उस सवाल की दस्तक है
क्यों हर बार योग्य वही होता है
जो पहले से अंदर है?
यह नियम कहता है
अब अँगूठा नहीं माँगा जाएगा
अब हर खाली सीट
अपना हिसाब देगी
अब “Not Found Suitable”
सिर्फ़ बहाना नहीं होगा
बल्कि सवालों के कटघरे में खड़ा होगा
लेकिन सावधान!
समता समिति
अगर सिर्फ़ नाम की हुई
अगर अधिकार
फ़ाइलों में बंद रहे
अगर न्याय
प्रशासन की कृपा बन गया
तो यह समता नहीं
नई किस्म की चुप्पी होगी
संविधान
किसी कमेटी का परिशिष्ट नहीं
वह सड़क पर लिखा गया
एक जीवित वाक्य है
जिसे लागू करना
अनिवार्य है
वैकल्पिक नहीं
क्यों
किसी के रंग
किसी की भाषा
किसी के नाम पर
लिंचिंग को छूट मिले?
क्यों
किसी क्षेत्र
किसी जाति
किसी जेंडर के नाम पर
अपमान को वैधता मिले?
कानून झूठे मुक़दमे से नहीं डरता
डरता है
लागू न होने से
इसलिए
हे एकलव्य!
अब मूर्ति मत बनाना
संविधान पढ़ना
नियम पूछना
हिसाब माँगना
और हे द्रोण!
अब अँगूठा माँगने से पहले
तैयार रहना
क्योंकि
यह समय
गुरुदक्षिणा का नहीं
जवाबदेही का है
एकलव्य अभी ज़िंदा है
और इस बार
उसका निशाना
सिर्फ़ तीर नहीं
व्यवस्था है।
★★★
2).
बराबरी अभी बाक़ी है
मैं चाहता हूँ
गिनती हो
सिर्फ़ साँसों की नहीं
सत्ता की भी
जाति की गिनती
संपत्ति की गिनती
कुर्सियों पर बैठे चेहरों की गिनती
चपरासी से लेकर
चीफ़ जस्टिस तक
किसके हाथ में
कितनी ताक़त है
यह भी दर्ज हो
किताबों में छपे नामों की गिनती
पाठ्यक्रम में घुसे देवताओं की गिनती
और बाहर खड़े
एकलव्यों की गिनती
अगर तुम शोषक नहीं
तो गिनती से डर क्यों?
अगर बराबरी में यक़ीन है
तो आँकड़े तुम्हें
काँप क्यों देते हैं?
सौ में नब्बे
भूखे हैं
नंगे हैं
अपमानित हैं
और वही नब्बे
आज पूछ रहे हैं
धन, धरती और राजपाठ
कब तक तुम्हारी जागीर रहेंगे?
UGC कोई काग़ज़ नहीं
यह उन आँखों का सवाल है
जो क्लासरूम में
झुकी रखी जाती हैं
यह उन ज़ुबानों का सवाल है
जिन्हें
जाति सूचक गालियों से
चुप कराया जाता है
तुम जो साधु-संन्यासी का मुखौटा
ओढ़े घूमते हो
बताओ
क्या तुम्हारा धर्म
सिर्फ़ वर्चस्व की पूजा है?
क्या तुम्हारा न्याय
वर्ण की चारदीवारी से
आगे नहीं बढ़ता?
सोशल मीडिया पर
जब प्रधानमंत्री की जाति उछाली जाती है
जब मुख्यमंत्री को
नीचा दिखाने के लिए
कुलनाम खोजा जाता है
तो सोचो
विद्यालयों में
हमारे बच्चों के साथ
क्या होता होगा?
रोहित वेमुला
एक नाम नहीं था
वह चेतावनी था
कि संस्थान
जब जाति बन जाते हैं
तो छात्र
लाशों में बदल दिए जाते हैं
UGC का समर्थन
किसी सरकार का समर्थन नहीं
यह उस आख़िरी उम्मीद का समर्थन है
कि कम से कम
ज्ञान के परिसर में
इंसान को
इंसान समझा जाए
तुम कहते हो,
“हम सब एक हैं”
लेकिन बराबरी आते ही
तुम्हारा हिंदुत्व
हकलाने लगता है
बताओ
SC, ST, OBC
क्या इस देश के नागरिक नहीं?
गिनती से भागो मत
इतिहास गवाह है
जब-जब हिस्सेदारी की बात आई
विरोध सवर्ण गलियों से ही निकला
अब वक़्त है
पुरखों की गंदी विरासत छोड़ने का
ऊँच-नीच की नशा उतारने का
और इंसान बनने का
UGC इक्विटी रेगुलेशन्स
कोई अंतिम जीत नहीं
यह सिर्फ़ शुरुआत है
संघर्ष अभी बाक़ी है
क्योंकि बराबरी
क़ानून से नहीं
लगातार प्रतिरोध से आती है
हम गिनती माँगते रहेंगे
जब तक शिक्षा
जाति से मुक्त नहीं होती
और इंसान
पूरा इंसान नहीं बन जाता।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी बहुजन कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मोबाइल नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
No comments:
Post a Comment