बहुजन चेतना : परंपरा से वर्तमान तक
बहुजन आंदोलन किसी एक काल या व्यक्ति की उपज नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे उस प्रतिरोध की निरंतरता है, जो बुद्ध की करुणा से शुरू होकर कबीर–रविदास की निर्भीक वाणी, फुले–सावित्रीबाई की शिक्षा-दृष्टि, शाहू की सामाजिक न्याय नीति और डॉ. अंबेडकर के संवैधानिक संघर्ष तक विकसित हुआ। पेरियार और कांशीराम ने इसे वैचारिक और राजनीतिक धार दी—जहाँ आत्मसम्मान, शिक्षा और सत्ता बहुजन मुक्ति के केंद्रीय औज़ार बने।
इसी ऐतिहासिक परंपरा में गोल्डेन दास एक समकालीन हस्तक्षेप के रूप में सामने आते हैं। वे बिहार में सक्रिय उस बहुजन नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सड़क, थाना और अदालत—तीनों स्तरों पर व्यवस्था से सीधा संवाद करता है। अनेक मुकदमे, बार-बार की जेल यात्राएँ और निरंतर विवाद—दरअसल उनके संघर्ष की सामाजिक कीमत हैं। गोल्डेन दास का नेतृत्व बहुजन समाज के उस आक्रोश को स्वर देता है, जो पुलिसिया दमन, जातिवादी अन्याय और संस्थागत चुप्पी के विरुद्ध खड़ा है।
बहुजन आंदोलन का लक्ष्य आज भी वही है—सामाजिक समानता, राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक प्राप्ति। यह आंदोलन न तो स्मृति है, न नारा; यह एक जीवित संघर्ष है, जो नए समय में नए रूप लेकर सामने आ रहा है। गोल्डेन दास जैसे युवा नेता, सामाजिक योद्धा इसी परिवर्तनशील बहुजन चेतना के समकालीन संकेत हैं।
गोल्डेन दास : बहुजन की अनवरत पदचाप
यह कोई एक नाम की कथा नहीं है
यह सदियों की चलती हुई पदचाप है
जिसमें तथागत की मौन करुणा है
और कबीर की आँखों में जलता प्रश्न।
रैदास ने सपने को
चर्मकार की झोपड़ी से उठाया
तुकाराम ने भक्ति को
ब्राह्मणवाद की कैद से छुड़ाया
फुले ने इतिहास को
पहली बार
शूद्र की आँख से पढ़ा
और सावित्रीबाई ने
ज्ञान को
स्त्री के हाथों में सौंप दिया।
शाहू ने सत्ता को
नीचे झुकना सिखाया
अंबेडकर ने संविधान में
बहुजन का हस्ताक्षर दर्ज किया
पेरियार ने ईश्वर से सवाल किया
कांशीराम ने कहा,
सत्ता ही सबसे बड़ा धर्म है।
यह परंपरा
किसी मंदिर में नहीं ठहरी
यह सड़क पर उतरी
थानों में दाख़िल हुई
और अदालतों से आँख मिलाकर बोली।
इसी परंपरा में
एक नाम और जुड़ता है
गोल्डेन दास।
वे किताब नहीं हैं
वे फ़ाइल भी नहीं
वे एफआईआर के पन्नों में
लिखा हुआ प्रतिरोध हैं
सत्तर मुक़दमे
दरअसल सत्तर बार
सिस्टम से की गई पूछताछ हैं
बीस जेल यात्राएँ
दरअसल बीस बार
अन्याय को दी गई चुनौती हैं।
वे थाने में जाते हैं
डर के साथ नहीं
संविधान लेकर
वे पूछते हैं
कानून किसके लिए है?
और जवाब न मिले तो
आवाज़ को और ऊँचा कर देते हैं।
बिहार की गलियों में
जब उनका नाम गूँजता है
तो दलित स्त्री की आँख
थोड़ी कम डरी होती है
पिछड़े मज़दूर की पीठ
थोड़ी कम झुकी होती है
अल्पसंख्यक बच्चे
थोड़ा सीधा चलते हैं।
वे विवाद हैं
क्योंकि अन्याय को
शांति पसंद नहीं आती
वे आक्रामक हैं
क्योंकि सदियों का अपमान
नरमी से नहीं टूटता।
बहुजन आंदोलन
कोई बीता हुआ अध्याय नहीं
यह वर्तमान का खुला घाव है
जो शिक्षा माँगता है
सम्मान माँगता है
और सत्ता में हिस्सेदारी माँगता है।
यह आंदोलन कहता है
हम 85 प्रतिशत हैं
फिर भी हाशिए पर क्यों?
यह आंदोलन कहता है
बहुजन हिताय
अब सिर्फ नारा नहीं
बहुजन सुखाय
अब नीति बनेगा।
इसलिए गोल्डेन दास
कोई अकेला व्यक्ति नहीं
वे एक निरंतरता हैं
बुद्ध से अंबेडकर तक
और अंबेडकर से
आज की सड़क तक।
यह क्रांतिकारी आवाज़
किसी महिमा का गीत नहीं
यह एक घोषणा है
कि बहुजन
अब इतिहास में नहीं
इतिहास के केंद्र में
खड़े होने आ रहे हैं
और यह यात्रा
अब लौटने वाली नहीं।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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