तीन-चार ही प्रतिशत, ब्राह्मण का था मान।
पर शासन-शिक्षा सभी, उन पर था अधिकार।
सत्ता, ज्ञान, संसाधन, सीमित वर्ग अधीन।
बहुजन पीड़ा झेलता, अवसर हुए क्षीण॥
ब्राह्मण सत्ता जाल में, फँसा हुआ जनमान।
शिक्षा, शासन, व्यापार में, उनका ही अधिकार।
जनता की आवाज़ को, दबा दिया हर बार।
अल्प वर्ग के स्वार्थ से, बहुसंख्यक लाचार॥
शिक्षा पर भी रोक थी, ज्ञान हुआ सीमित।
अछूतों को दूर रख, किया उन्हें अपवित्र।
ब्राह्मण सत्ता के तले, डरता व्यापारी जन।
न्यायालय भी पक्षपाती, टूटे जन के मन॥
गाँव-शिखर तक व्याप्त था, उनका दृढ़ प्रभुत्व।
बिना आरक्षण न्याय का, संभव नहीं तत्त्व।
सदियों से जो पीड़िते, वंचित दलित समाज।
उनके हित आरक्षणे, खोले न्यायी राज॥
वंचित जन के हित बिना, सूना समाज विधान।
समानता का सूर्य भी, रहता सदा अजान।
शाहू ने तब देख कर, दुख का गहन स्वरूप।
नब्बे अंश जन वंचित, पाया सत्य अनूप॥
ऐसे घोर विषम काल में, प्रकटे शौर्य-निधान।
शाहू केवल नृप नहीं, थे जन-क्रांति विधान।
कोल्हापुर के राज में, नव इतिहास रचाय।
मनुवादी बंधन सभी, तोड़ समता लाय॥
शाहू जी ने सोचकर, किया महा अभियान।
उन्नीस सौ दो वर्ष में, बदला शासन ज्ञान।
सत्ता में हिस्सेदारी, पाया जिनने स्वप्न।
1902 में किया, आरक्षण का यज्ञ॥
ऊँच-नीच के जाल को, तोड़ा दृढ़ संकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, आरक्षण का विकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, पिछड़ों को अधिकार।
टूटा ऊँच-नीच का, सदियों पुराना जाल॥
पचास अंश आरक्षण, पिछड़ों को दिलवाय।
मराठा, दलित, आदिवासी, सबको साथ मिलाय।
मराठा कुनबी संग ही, दलित-आदि सब लोग।
ब्राह्मण प्रभु शेवाई को, रखा अलग ही योग॥
ब्राह्मण-प्रभु-शेवाई को, रखा अलग स्थान।
शेष सभी को दे दिया, अधिकारों का मान।
सत्ता का जो केंद्र था, ऊँची जाति के पास।
शाहू ने वह बाँटकर, किया समत्व प्रकाश॥
शाहू के तर्कों में था, न्याय हेतु आधार।
पृथक प्रतिनिधित्व ही, करता जन उद्धार।
काउंसिल में प्रतिनिधि, जब होंगे समुदाय।
तब ही जन के हितों का, होगा सच्चा न्याय॥
नामांकन से लाभ क्या, जब न हो आत्मविश्वास।
निर्वाचित प्रतिनिधि बने, तब जागे विश्वास।
प्रतिनिधित्व समान हो, हर पद हर अधिकार।
तभी मिटेगा अन्यथा, यह विषम व्यवहार॥
ऊपर नीचे हर जगह, अनुपातिक हो भाग।
तभी सशक्त समाज का, होगा सच्चा जाग।
बीस बरस तक चाहिए, यह विशेष विधान।
तब जाकर समता मिले, जागे जन सम्मान॥
“शिक्षा से उद्धार है”, उद्घोषित यह बात।
जड़ समाज की चेतना, जग उठी दिन-रात।
शिक्षा को आधार मान, लिया बड़ा निर्णय।
निःशुल्क, अनिवार्य कर, किया जनों का श्रेय॥
दुगुने स्कूलों से बढ़ा, शिक्षा का विस्तार।
ज्ञान-समानता का हुआ, जन-जन में संचार।
अलग स्कूल सब बंद कर, किया एक समावेश।
जाति-धर्म सब भूलकर, शिक्षा का परिवेश॥
समान चिकित्सा का दिया, सबको एक विधान।
दलितों के हित खोल दिए, छात्रावास महान।
श्रम का जो अपमान था, उसको दिया सम्मान।
छात्रावास खोलकर, बदला शिक्षा-ज्ञान॥
भट्ट-जोशी के जाल से, मुक्त किया जन-धर्म।
अंतरात्मा को मिला, स्वतंत्रता का मर्म।
धर्मस्थल सब राज्य के, अधीन किए एक दिन।
पद दिए पिछड़ों को भी, तोड़ा जाति का बंधन॥
बंधुआ श्रम का अंत कर, दी श्रमिक को राह।
महारों की दासता हटी, टूटी हर एक चाह।
अंतरजातीय विवाह को, दी कानूनी छूट।
मनुवादी संहिता पर, यह था प्रबल प्रहार॥
नारी को अधिकार दे, संपत्ति-विवाह।
शाहू जी ने पूर्व ही, लिख दी नई चाह।
अस्पृश्यता मिटाने को, लिया कठोर प्रण।
अपमानित करने वाले, त्यागें पद तत्क्षण॥
मैसूर, मद्रास, बम्बई, अपनाया यह मार्ग।
आरक्षण की ज्योति से, मिटने लगा अंधार।
मैसूर, मद्रासादि ने, ली उनसे प्रेरणा।
न्याय-समता पथ पर बढ़ी, भारत की संरचना॥
बीस बरस के बाद जब, बदली शासन रीत।
गैर-ब्राह्मण बढ़ गए, टूटी अन्याय प्रीत।
आदर्शराज्य का स्वप्न था, दर्शन-राजा रूप।
शाहू जी में दिख गया, साकारित वह स्वरूप॥
अंधकार से मानव को, ले जाए जो पार।
ऐसे ही थे शाहू जी, जन-उद्धारक नार।
शाहू समता-सूर्य थे, जन-मन में उजियार।
छुआछूत के अंध पर, किया प्रखर प्रहार॥
“मनुष्य बने मनुष्य ही”, दिया सरल संदेश।
जाति-धर्म की ईर्ष्या, त्यागो मिथ्या क्लेश।
स्वाधीनता के बाद भी, धीमा रहा प्रयास।
ओबीसी को देर से, मिला अधिकार प्रकाश॥
आज समय फिर माँगता, वही प्रखर आवाज़।
आरक्षण से ही बने, समता का समाज।
स्मृति तभी सार्थक बने, जब उतरे व्यवहार।
समता-न्याय-बंधुत्व का, रचें नया संसार॥
ऐसा रचें समाज हम, जहाँ समान अधिकार।
मानवता सर्वोच्च हो, यही सत्य साकार।
रैदास के स्वप्न सा, हो जग का विधान।
छोट-बड़े सब एक हों, सुख पाए हर प्राण॥
जय भीम का घोष हो, संविधान महान।
मंडल-भारत गूँज उठे, समता का अभियान।
शाहू स्मृति दिवस पर, विनय सहित प्रणाम।
न्याय बिना आरक्षणे, कैसे मिले अविराम॥
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नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मूलनिवासी। जय मंडल। जय संविधान। जय भारत।
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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