Wednesday, 6 May 2026

समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी : गोलेन्द्र पटेल

समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी

तीन-चार ही प्रतिशत, ब्राह्मण का था मान।
पर शासन-शिक्षा सभी, उन पर था अधिकार।
सत्ता, ज्ञान, संसाधन, सीमित वर्ग अधीन।
बहुजन पीड़ा झेलता, अवसर हुए क्षीण॥

ब्राह्मण सत्ता जाल में, फँसा हुआ जनमान।
शिक्षा, शासन, व्यापार में, उनका ही अधिकार।
जनता की आवाज़ को, दबा दिया हर बार।
अल्प वर्ग के स्वार्थ से, बहुसंख्यक लाचार॥

शिक्षा पर भी रोक थी, ज्ञान हुआ सीमित।
अछूतों को दूर रख, किया उन्हें अपवित्र।
ब्राह्मण सत्ता के तले, डरता व्यापारी जन।
न्यायालय भी पक्षपाती, टूटे जन के मन॥

गाँव-शिखर तक व्याप्त था, उनका दृढ़ प्रभुत्व।
बिना आरक्षण न्याय का, संभव नहीं तत्त्व।
सदियों से जो पीड़िते, वंचित दलित समाज।
उनके हित आरक्षणे, खोले न्यायी राज॥

वंचित जन के हित बिना, सूना समाज विधान।
समानता का सूर्य भी, रहता सदा अजान।
शाहू ने तब देख कर, दुख का गहन स्वरूप।
नब्बे अंश जन वंचित, पाया सत्य अनूप॥

ऐसे घोर विषम काल में, प्रकटे शौर्य-निधान।
शाहू केवल नृप नहीं, थे जन-क्रांति विधान।
कोल्हापुर के राज में, नव इतिहास रचाय।
मनुवादी बंधन सभी, तोड़ समता लाय॥

शाहू जी ने सोचकर, किया महा अभियान।
उन्नीस सौ दो वर्ष में, बदला शासन ज्ञान।
सत्ता में हिस्सेदारी, पाया जिनने स्वप्न।
1902 में किया, आरक्षण का यज्ञ॥

ऊँच-नीच के जाल को, तोड़ा दृढ़ संकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, आरक्षण का विकल्प।
पचास प्रतिशत दे दिया, पिछड़ों को अधिकार।
टूटा ऊँच-नीच का, सदियों पुराना जाल॥

पचास अंश आरक्षण, पिछड़ों को दिलवाय।
मराठा, दलित, आदिवासी, सबको साथ मिलाय।
मराठा कुनबी संग ही, दलित-आदि सब लोग।
ब्राह्मण प्रभु शेवाई को, रखा अलग ही योग॥

ब्राह्मण-प्रभु-शेवाई को, रखा अलग स्थान।
शेष सभी को दे दिया, अधिकारों का मान।
सत्ता का जो केंद्र था, ऊँची जाति के पास।
शाहू ने वह बाँटकर, किया समत्व प्रकाश॥

शाहू के तर्कों में था, न्याय हेतु आधार।
पृथक प्रतिनिधित्व ही, करता जन उद्धार।
काउंसिल में प्रतिनिधि, जब होंगे समुदाय।
तब ही जन के हितों का, होगा सच्चा न्याय॥

नामांकन से लाभ क्या, जब न हो आत्मविश्वास।
निर्वाचित प्रतिनिधि बने, तब जागे विश्वास।
प्रतिनिधित्व समान हो, हर पद हर अधिकार।
तभी मिटेगा अन्यथा, यह विषम व्यवहार॥

ऊपर नीचे हर जगह, अनुपातिक हो भाग।
तभी सशक्त समाज का, होगा सच्चा जाग।
बीस बरस तक चाहिए, यह विशेष विधान।
तब जाकर समता मिले, जागे जन सम्मान॥

“शिक्षा से उद्धार है”, उद्घोषित यह बात।
जड़ समाज की चेतना, जग उठी दिन-रात।
शिक्षा को आधार मान, लिया बड़ा निर्णय।
निःशुल्क, अनिवार्य कर, किया जनों का श्रेय॥

दुगुने स्कूलों से बढ़ा, शिक्षा का विस्तार।
ज्ञान-समानता का हुआ, जन-जन में संचार।
अलग स्कूल सब बंद कर, किया एक समावेश।
जाति-धर्म सब भूलकर, शिक्षा का परिवेश॥

समान चिकित्सा का दिया, सबको एक विधान।
दलितों के हित खोल दिए, छात्रावास महान।
श्रम का जो अपमान था, उसको दिया सम्मान।
छात्रावास खोलकर, बदला शिक्षा-ज्ञान॥

भट्ट-जोशी के जाल से, मुक्त किया जन-धर्म।
अंतरात्मा को मिला, स्वतंत्रता का मर्म।
धर्मस्थल सब राज्य के, अधीन किए एक दिन।
पद दिए पिछड़ों को भी, तोड़ा जाति का बंधन॥

बंधुआ श्रम का अंत कर, दी श्रमिक को राह।
महारों की दासता हटी, टूटी हर एक चाह।
अंतरजातीय विवाह को, दी कानूनी छूट।
मनुवादी संहिता पर, यह था प्रबल प्रहार॥

नारी को अधिकार दे, संपत्ति-विवाह।
शाहू जी ने पूर्व ही, लिख दी नई चाह।
अस्पृश्यता मिटाने को, लिया कठोर प्रण।
अपमानित करने वाले, त्यागें पद तत्क्षण॥

मैसूर, मद्रास, बम्बई, अपनाया यह मार्ग।
आरक्षण की ज्योति से, मिटने लगा अंधार।
मैसूर, मद्रासादि ने, ली उनसे प्रेरणा।
न्याय-समता पथ पर बढ़ी, भारत की संरचना॥

बीस बरस के बाद जब, बदली शासन रीत।
गैर-ब्राह्मण बढ़ गए, टूटी अन्याय प्रीत।
आदर्शराज्य का स्वप्न था, दर्शन-राजा रूप।
शाहू जी में दिख गया, साकारित वह स्वरूप॥

अंधकार से मानव को, ले जाए जो पार।
ऐसे ही थे शाहू जी, जन-उद्धारक नार।
शाहू समता-सूर्य थे, जन-मन में उजियार।
छुआछूत के अंध पर, किया प्रखर प्रहार॥

“मनुष्य बने मनुष्य ही”, दिया सरल संदेश।
जाति-धर्म की ईर्ष्या, त्यागो मिथ्या क्लेश।
स्वाधीनता के बाद भी, धीमा रहा प्रयास।
ओबीसी को देर से, मिला अधिकार प्रकाश॥

आज समय फिर माँगता, वही प्रखर आवाज़।
आरक्षण से ही बने, समता का समाज।
स्मृति तभी सार्थक बने, जब उतरे व्यवहार।
समता-न्याय-बंधुत्व का, रचें नया संसार॥

ऐसा रचें समाज हम, जहाँ समान अधिकार।
मानवता सर्वोच्च हो, यही सत्य साकार।
रैदास के स्वप्न सा, हो जग का विधान।
छोट-बड़े सब एक हों, सुख पाए हर प्राण॥

जय भीम का घोष हो, संविधान महान।
मंडल-भारत गूँज उठे, समता का अभियान।
शाहू स्मृति दिवस पर, विनय सहित प्रणाम।
न्याय बिना आरक्षणे, कैसे मिले अविराम॥
★★★

नमो बुद्धाय। जय भीम। जय मूलनिवासी। जय मंडल। जय संविधान। जय भारत।
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, 5 May 2026

समता के क्रांतिसूर्य: राजर्षि शाहूजी महाराज और सामाजिक न्याय का पुनर्जागरण — गोलेन्द्र पटेल

 समता के क्रांतिसूर्य: राजर्षि शाहूजी महाराज और सामाजिक न्याय का पुनर्जागरण
लेखक: गोलेन्द्र पटेल

महाप्रतापी महानायक छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874 – 6 मई 1922) ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “अस्पृश्यता को कभी भी नहीं चला लिया जायेगा; उच्चवर्गीय लोगों को दलितों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही पड़ेगा, क्योंकि जब तक मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जायेगा, तब तक मानव समाज का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है” और साथ ही उन्होंने चेताया कि “जाति और धर्म के बहाने एक-दूसरे से ईर्ष्या करना बहुत गलत है।” इसी मानवीय और समतामूलक दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा, “धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए” तथा “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए,” और अंततः यह मूल सत्य स्थापित किया कि “मनुष्य महान बनता है अपने कर्मों से, न कि जन्म से,” अर्थात् मनुष्य की महानता उसके कर्मों में निहित होती है, जन्म में नहीं।

भारतीय समाज की संरचना को यदि गहराई से समझा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ सत्ता, ज्ञान और संसाधनों पर लंबे समय तक कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व बना रहा, जबकि बहुजन समाज; जिसमें दलित, पिछड़े, आदिवासी, किसान और श्रमिक समुदाय आते हैं, वंचना, अपमान और अवसरहीनता के दायरे में सीमित रहा। ऐसे जटिल और असमान सामाजिक परिदृश्य में राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज का उदय केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति के प्रणेता के रूप में हुआ। उनका यह स्पष्ट और दूरदर्शी कथन, “शिक्षा से ही हमारा उद्धार संभव है, ऐसी मेरी मान्यता है।” भारतीय समाज की जड़ों तक उतरकर उसे बदलने की घोषणा थी।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में, जब क्रांतिसूर्य ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक परंपरा सामाजिक न्याय और समता का स्वप्न जगाकर जा चुकी थी, तब समाज पुनः जातिगत जकड़नों में उलझा हुआ था। धर्म और जाति के नाम पर विभाजन गहराता जा रहा था और सत्ता तथा प्रशासनिक अवसरों पर एक सीमित वर्ग का एकाधिकार था। ऐसे समय में कोल्हापुर राज्य के शासक के रूप में शाहूजी महाराज ने स्थिति का गंभीर अध्ययन कराया और पाया कि लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या उन अधिकारों से वंचित है, जो उनके मानवीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।

यहीं से उनकी सामाजिक दृष्टि एक क्रांतिकारी दिशा लेती है। 26 जुलाई 1902 को उन्होंने अपने राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं था, बल्कि सदियों से जमी असमानता के ढांचे पर एक ऐतिहासिक प्रहार था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछड़े वर्गों में मराठा, कुनबी, किसान, दलित और आदिवासी सभी शामिल होंगे और उच्च जातियों का वर्चस्व तोड़ा जाएगा। इस संदर्भ में उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। समान अवसर के बिना न्याय संभव नहीं।

उनकी यह पहल इतनी प्रभावशाली थी कि आगे चलकर मैसूर (1918), मद्रास (1921) और बंबई प्रेसीडेंसी (1925) जैसे क्षेत्रों ने भी आरक्षण की नीति अपनाई। यह वही बीज था, जिसने आगे चलकर भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय की अवधारणा को जन्म दिया। इसीलिए यह कहा जाना अत्यंत सार्थक है कि “आरक्षण के जनक ही नहीं, आदर्श दार्शनिक राजा थे शाहूजी महाराज।”

शाहूजी महाराज केवल नीतिगत परिवर्तन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक चेतना को भी बदलने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज में सबसे बड़ी बाधा जाति है।” यह कथन केवल सामाजिक आलोचना नहीं, बल्कि एक नैतिक आह्वान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

उनकी दृष्टि में शिक्षा, सम्मान और अवसर एक-दूसरे से जुड़े हुए तत्व थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाया, छात्रावासों की स्थापना की, बेगारी प्रथा को समाप्त किया और छुआछूत पर प्रतिबंध लगाकर चिकित्सा सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाया। यह सब उस समय हुआ, जब भारत में ऐसी नीतियों की कल्पना भी दुर्लभ थी।

शाहूजी महाराज की महानता का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनका बहुजन नेतृत्व के प्रति विश्वास और समर्थन था। जब उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के संघर्ष को देखा, तो न केवल उनकी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी, बल्कि उनके सामाजिक अभियान को भी सशक्त किया। 21 मार्च 1920 को माणगांव सम्मेलन में उनका ऐतिहासिक वक्तव्य आज भी गूंजता है, “बहुजनों तुमको डॉ० अम्बेडकर के रूप में तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे तुम्हारे गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देंगे…”

यह घोषणा केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि बहुजन समाज के नेतृत्व को वैधता प्रदान करने वाला ऐतिहासिक क्षण था। यही कारण है कि आगे चलकर डॉ. अंबेडकर ने भी कहा, “शाहूजी महाराज सामाजिक लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं… हमें उनका जन्मदिन त्योहार की तरह मनाना चाहिए।”

उनका व्यक्तित्व व्यवहार में भी उतना ही महान था जितना विचारों में। जब डॉ. अंबेडकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटे, तो शाहूजी महाराज स्वयं उनसे मिलने उनके घर पहुँचे। अंबेडकर ने आश्चर्य व्यक्त किया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “हम किस बात के राजा? हम तो परंपरा से राजा बने हैं… आप ज्ञान के राजा हो।” यह संवाद भारतीय समाज में ज्ञान की सर्वोच्चता और समानता के मूल्य को स्थापित करता है।

उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि विरोध और धमकियों के बावजूद वे अपने मार्ग से नहीं हटे। उन्होंने स्पष्ट कहा, “वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से पीछे नहीं हट सकते।” यह कथन केवल साहस नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उनकी अटूट आस्था का प्रमाण है।

शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण संतुलित और मानवीय था। वे जानते थे कि समाज में अन्याय हुआ है, परंतु वे यह भी मानते थे कि समाधान सामूहिक चेतना और सुधार से ही संभव है। इसीलिए यह प्रश्न “छुआछूत किसने किया, प्लीज़ कोई बताओ?” हमें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है। इतिहास में अनेक व्यक्तियों और समुदायों ने शिक्षा और सामाजिक उन्नति में योगदान दिया, जैसे सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा अंबेडकर को छात्रवृत्ति देना या उनके शिक्षकों द्वारा प्रेरणा प्रदान करना। शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण यही था कि समाज को दोषारोपण के बजाय परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब सत्ता जनकल्याण के लिए समर्पित होती है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शासन का अर्थ केवल प्रशासन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना है। इसीलिए कहा जाता है, “कोटि-कोटि नमन उस महापुरुष को जिन्होंने कहा नहीं, करके दिखाया कि सत्ता का असली अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति को ऊपर उठाना है।”

आज जब हम उनके परिनिर्वाण दिवस 6 मई को स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का भी समय है। उन्होंने जो मार्ग दिखाया, शिक्षा, समता, न्याय और बंधुत्व का वही एक सशक्त और मानवीय समाज की नींव है।

यदि आज बहुजन समाज का कोई भी बच्चा शिक्षा प्राप्त कर पा रहा है, यदि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा पा रहा है, यदि वह सत्ता में अपनी हिस्सेदारी की बात कर रहा है, तो यह शाहूजी महाराज के उस ऐतिहासिक संघर्ष का परिणाम है, जिसकी शुरुआत उन्होंने एक सदी पहले कर दी थी।

उनकी स्मृति में झुकना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें और उस समाज के निर्माण में योगदान दें, जहाँ समानता केवल आदर्श नहीं, बल्कि वास्तविकता हो। यही उनके प्रति सच्ची आदरांजलि होगी। एक ऐसा समाज, जहाँ हर व्यक्ति को शिक्षा, सम्मान और अवसर समान रूप से प्राप्त हो और जहाँ मानवता ही सर्वोच्च मूल्य हो। यही हमारे पुरखों का सपना है, “ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।/छोट-बड़ो सब सम बसे रविदास रहे प्रसन्न।।”

जय भीम। जय संविधान। जय मंडल। जय भारत।
लेखक: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


तस्वीर साभार: गूगल 


समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी : गोलेन्द्र पटेल

समता के क्रांतिसूर्य शाहूजी तीन-चार ही प्रतिशत, ब्राह्मण का था मान। पर शासन-शिक्षा सभी, उन पर था अधिकार। सत्ता, ज्ञान, संसाधन, सीमित वर्ग अध...