समता के क्रांतिसूर्य: राजर्षि शाहूजी महाराज और सामाजिक न्याय का पुनर्जागरण
लेखक: गोलेन्द्र पटेल
महाप्रतापी महानायक छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874 – 6 मई 1922) ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “अस्पृश्यता को कभी भी नहीं चला लिया जायेगा; उच्चवर्गीय लोगों को दलितों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही पड़ेगा, क्योंकि जब तक मनुष्य को मनुष्य नहीं समझा जायेगा, तब तक मानव समाज का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है” और साथ ही उन्होंने चेताया कि “जाति और धर्म के बहाने एक-दूसरे से ईर्ष्या करना बहुत गलत है।” इसी मानवीय और समतामूलक दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा, “धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए” तथा “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए,” और अंततः यह मूल सत्य स्थापित किया कि “मनुष्य महान बनता है अपने कर्मों से, न कि जन्म से,” अर्थात् मनुष्य की महानता उसके कर्मों में निहित होती है, जन्म में नहीं।
भारतीय समाज की संरचना को यदि गहराई से समझा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यहाँ सत्ता, ज्ञान और संसाधनों पर लंबे समय तक कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व बना रहा, जबकि बहुजन समाज; जिसमें दलित, पिछड़े, आदिवासी, किसान और श्रमिक समुदाय आते हैं, वंचना, अपमान और अवसरहीनता के दायरे में सीमित रहा। ऐसे जटिल और असमान सामाजिक परिदृश्य में राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज का उदय केवल एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति के प्रणेता के रूप में हुआ। उनका यह स्पष्ट और दूरदर्शी कथन, “शिक्षा से ही हमारा उद्धार संभव है, ऐसी मेरी मान्यता है।” भारतीय समाज की जड़ों तक उतरकर उसे बदलने की घोषणा थी।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में, जब क्रांतिसूर्य ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक परंपरा सामाजिक न्याय और समता का स्वप्न जगाकर जा चुकी थी, तब समाज पुनः जातिगत जकड़नों में उलझा हुआ था। धर्म और जाति के नाम पर विभाजन गहराता जा रहा था और सत्ता तथा प्रशासनिक अवसरों पर एक सीमित वर्ग का एकाधिकार था। ऐसे समय में कोल्हापुर राज्य के शासक के रूप में शाहूजी महाराज ने स्थिति का गंभीर अध्ययन कराया और पाया कि लगभग 90 प्रतिशत जनसंख्या उन अधिकारों से वंचित है, जो उनके मानवीय अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं।
यहीं से उनकी सामाजिक दृष्टि एक क्रांतिकारी दिशा लेती है। 26 जुलाई 1902 को उन्होंने अपने राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं था, बल्कि सदियों से जमी असमानता के ढांचे पर एक ऐतिहासिक प्रहार था। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछड़े वर्गों में मराठा, कुनबी, किसान, दलित और आदिवासी सभी शामिल होंगे और उच्च जातियों का वर्चस्व तोड़ा जाएगा। इस संदर्भ में उनका दृष्टिकोण अत्यंत स्पष्ट था। समान अवसर के बिना न्याय संभव नहीं।
उनकी यह पहल इतनी प्रभावशाली थी कि आगे चलकर मैसूर (1918), मद्रास (1921) और बंबई प्रेसीडेंसी (1925) जैसे क्षेत्रों ने भी आरक्षण की नीति अपनाई। यह वही बीज था, जिसने आगे चलकर भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय की अवधारणा को जन्म दिया। इसीलिए यह कहा जाना अत्यंत सार्थक है कि “आरक्षण के जनक ही नहीं, आदर्श दार्शनिक राजा थे शाहूजी महाराज।”
शाहूजी महाराज केवल नीतिगत परिवर्तन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक चेतना को भी बदलने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जातिवाद का अंत जरूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज में सबसे बड़ी बाधा जाति है।” यह कथन केवल सामाजिक आलोचना नहीं, बल्कि एक नैतिक आह्वान है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
उनकी दृष्टि में शिक्षा, सम्मान और अवसर एक-दूसरे से जुड़े हुए तत्व थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाया, छात्रावासों की स्थापना की, बेगारी प्रथा को समाप्त किया और छुआछूत पर प्रतिबंध लगाकर चिकित्सा सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाया। यह सब उस समय हुआ, जब भारत में ऐसी नीतियों की कल्पना भी दुर्लभ थी।
शाहूजी महाराज की महानता का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनका बहुजन नेतृत्व के प्रति विश्वास और समर्थन था। जब उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के संघर्ष को देखा, तो न केवल उनकी शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी, बल्कि उनके सामाजिक अभियान को भी सशक्त किया। 21 मार्च 1920 को माणगांव सम्मेलन में उनका ऐतिहासिक वक्तव्य आज भी गूंजता है, “बहुजनों तुमको डॉ० अम्बेडकर के रूप में तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे तुम्हारे गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देंगे…”
यह घोषणा केवल एक व्यक्ति की प्रशंसा नहीं थी, बल्कि बहुजन समाज के नेतृत्व को वैधता प्रदान करने वाला ऐतिहासिक क्षण था। यही कारण है कि आगे चलकर डॉ. अंबेडकर ने भी कहा, “शाहूजी महाराज सामाजिक लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं… हमें उनका जन्मदिन त्योहार की तरह मनाना चाहिए।”
उनका व्यक्तित्व व्यवहार में भी उतना ही महान था जितना विचारों में। जब डॉ. अंबेडकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटे, तो शाहूजी महाराज स्वयं उनसे मिलने उनके घर पहुँचे। अंबेडकर ने आश्चर्य व्यक्त किया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “हम किस बात के राजा? हम तो परंपरा से राजा बने हैं… आप ज्ञान के राजा हो।” यह संवाद भारतीय समाज में ज्ञान की सर्वोच्चता और समानता के मूल्य को स्थापित करता है।
उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि विरोध और धमकियों के बावजूद वे अपने मार्ग से नहीं हटे। उन्होंने स्पष्ट कहा, “वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से पीछे नहीं हट सकते।” यह कथन केवल साहस नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उनकी अटूट आस्था का प्रमाण है।
शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण संतुलित और मानवीय था। वे जानते थे कि समाज में अन्याय हुआ है, परंतु वे यह भी मानते थे कि समाधान सामूहिक चेतना और सुधार से ही संभव है। इसीलिए यह प्रश्न “छुआछूत किसने किया, प्लीज़ कोई बताओ?” हमें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है। इतिहास में अनेक व्यक्तियों और समुदायों ने शिक्षा और सामाजिक उन्नति में योगदान दिया, जैसे सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा अंबेडकर को छात्रवृत्ति देना या उनके शिक्षकों द्वारा प्रेरणा प्रदान करना। शाहूजी महाराज का दृष्टिकोण यही था कि समाज को दोषारोपण के बजाय परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब सत्ता जनकल्याण के लिए समर्पित होती है, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शासन का अर्थ केवल प्रशासन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना है। इसीलिए कहा जाता है, “कोटि-कोटि नमन उस महापुरुष को जिन्होंने कहा नहीं, करके दिखाया कि सत्ता का असली अर्थ समाज के अंतिम व्यक्ति को ऊपर उठाना है।”
आज जब हम उनके परिनिर्वाण दिवस 6 मई को स्मरण करते हैं, तो यह केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का भी समय है। उन्होंने जो मार्ग दिखाया, शिक्षा, समता, न्याय और बंधुत्व का वही एक सशक्त और मानवीय समाज की नींव है।
यदि आज बहुजन समाज का कोई भी बच्चा शिक्षा प्राप्त कर पा रहा है, यदि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा पा रहा है, यदि वह सत्ता में अपनी हिस्सेदारी की बात कर रहा है, तो यह शाहूजी महाराज के उस ऐतिहासिक संघर्ष का परिणाम है, जिसकी शुरुआत उन्होंने एक सदी पहले कर दी थी।
उनकी स्मृति में झुकना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें और उस समाज के निर्माण में योगदान दें, जहाँ समानता केवल आदर्श नहीं, बल्कि वास्तविकता हो। यही उनके प्रति सच्ची आदरांजलि होगी। एक ऐसा समाज, जहाँ हर व्यक्ति को शिक्षा, सम्मान और अवसर समान रूप से प्राप्त हो और जहाँ मानवता ही सर्वोच्च मूल्य हो। यही हमारे पुरखों का सपना है, “ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।/छोट-बड़ो सब सम बसे रविदास रहे प्रसन्न।।”
जय भीम। जय संविधान। जय मंडल। जय भारत।
लेखक: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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तस्वीर साभार: गूगल
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