युवा कहानीकार गोलेन्द्र पटेल की चार कहानियाँ :-
1.
कहानी : पगली
कस्बे की वह सुबह साधारण थी, पर उसकी नियति में एक असाधारण कथा लिखी जा रही थी। धूल भरी गलियों, छोटे-छोटे घरों और रोज़मर्रा की जद्दोजहद के बीच एक लड़की थी, सब उसे “पगली” कहते थे। उसका असली नाम जैसे समय की धूल में कहीं दब गया था। बिखरे बाल, मैले कपड़े और आँखों में एक अजीब-सी मासूम चमक; वह इस दुनिया में होकर भी जैसे उससे अलग थी।
बचपन से ही उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। वह कभी हँसती, कभी बिना कारण रो पड़ती, तो कभी किसी अनजानी धुन पर खो जाती। समाज ने उसे समझने की कोशिश कम और ठुकराने की आदत अधिक पाल ली थी।
एक दिन वह बाजार की ओर भटकते-भटकते एक साइकिल की दुकान के पास जा पहुँची। वहाँ कई साइकिलें खड़ी थीं, कुछ नई, कुछ पुरानी। उसकी नजर एक पुरानी लेकिन सुंदर साइकिल पर ठहर गई। उसे लगा जैसे वह साइकिल उसे बुला रही हो। वह धीरे-धीरे उसके पास गई, हैंडल पकड़ा और बिना किसी भय या अपराध-बोध के उसे लेकर चल पड़ी।
उसके लिए यह कोई चोरी नहीं थी, वह तो बस एक आकर्षण था, एक अनजाना अपनापन।
घर पहुँचकर उसने साइकिल को आँगन में खड़ा कर दिया। परिवार वालों ने देखा तो चौंक पड़े।
“यह साइकिल कहाँ से लाई?”
पगली ने भोलेपन से उत्तर दिया, “मुझे नहीं मालूम…”
उसके उत्तर में न छल था, न डर, सिर्फ एक सच्चाई थी, जिसे कोई समझना नहीं चाहता था।
साइकिल कई दिनों तक वहीं खड़ी रही। कभी वह उसे छूकर मुस्कुरा देती, कभी यूँ ही उसे घूरती रहती। लेकिन एक दिन जैसे उसके भीतर कुछ बदला। वह साइकिल को लेकर फिर उसी दुकान की ओर चल पड़ी।
संयोग से उसी समय उस साइकिल की असली मालकिन वहाँ आ गई। उसने साइकिल को पहचान लिया और तुरंत अपने बड़े भाई को बुला लाई।
भाई का व्यक्तित्व दबंग था। मजबूत शरीर, ऊँची आवाज़, और अपने सामर्थ्य का अहंकार। देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। सबकी नजरें उस पगली पर टिक गईं, कोई उसे घूर रहा था, कोई फुसफुसा रहा था, तो कोई तमाशा देख रहा था।
अमीर युवक गुस्से में चिल्लाया,
“यही है चोर! मेरी बहन की साइकिल चुरा ली इसने!”
भीड़ में कुछ लोग उसकी बात का समर्थन करने लगे। कुछ के मन में पगली की असहायता का फायदा उठाने के कुत्सित विचार भी जन्म लेने लगे।
तभी पास के मजदूर और कर्मचारी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने स्थिति को समझने की कोशिश की। उनमें से एक बुजुर्ग मजदूर आगे बढ़ा और बोला,
“अरे, यह तो वही लड़की है… बेचारी ठीक नहीं है दिमाग से।”
उन्होंने पगली को भीड़ से बचाया और धीरे-धीरे उसे उसके घर पहुँचा दिया।
समय बीत गया, लेकिन घटना की छाया बनी रही।
कुछ दिनों बाद पगली अपने परिवार के साथ खेत की ओर जा रही थी। धान के छोटे-से खेत, चारों ओर हरियाली और कच्चे रास्ते, यह उसका अपना संसार था। परिवार के लोग अपनी-अपनी साइकिलों पर थे और वह भी उसी साइकिल के साथ चल रही थी।
तभी किसी ने आकर खबर दी,
“जिनकी साइकिल है, वे लोग गाड़ियों में आ रहे हैं!”
यह सुनते ही पगली के मन में डर समा गया। वह घबरा गई। उसने चारों ओर देखा और जल्दी-जल्दी साइकिल को पास के पानी भरे गड्ढे में छिपाने लगी। उस गड्ढे में कमल और कुमुदिनी खिले हुए थे, प्रकृति की सुंदरता के बीच उसका भय और भी गहरा लग रहा था।
तभी चार पहिया गाड़ियाँ आकर रुकीं। अमीर परिवार के लोग उतर पड़े। उनके चेहरे पर गुस्सा और अधिकार का भाव था।
कुछ ही क्षणों में पगली का परिवार भी वहाँ पहुँच गया। माहौल तनावपूर्ण हो गया।
अमीर युवक ने फिर चिल्लाकर कहा,
“यही है वह लड़की! चोर है यह!”
यह सुनते ही पगली का भाई तिलमिला उठा। उसने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया और दृढ़ स्वर में बोला,
“पहले इंसान बनना सीखो! धन से संस्कार नहीं खरीदे जाते।”
भीड़ सन्न रह गई।
उसने सबकी ओर देखते हुए कहा,
“तुम लोग इसे चोर कह रहे हो, पर कभी यह जानने की कोशिश की कि इसने ऐसा क्यों किया?”
भीड़ में खामोशी छा गई, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।
तब उसने अमीर परिवार की माँ को आगे बुलाया।
“माँ, आप आइए… और मेरी बात सुनिए।”
माँ आगे आई। उसके चेहरे पर कठोरता नहीं, करुणा थी।
पगली के भाई ने शांत स्वर में अपनी बहन की पूरी कहानी सुनाई, उसका बचपन, उसकी मानसिक अवस्था और उसका निष्कपट मन। फिर उसने विनम्रता से कहा,
“माँ, बस आज के लिए इसे अपनी बेटी मान लीजिए।”
माँ की आँखें भर आईं। उसने धीरे से अपने पर्स से कुछ पैसे निकाले और पगली के हाथ में रख दिए। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,
“बेटी…”
यह शब्द सुनते ही पगली की आँखों में एक अनजानी चमक आ गई। शायद उसने पहली बार अपने लिए स्नेह का यह रूप महसूस किया था।
उस क्षण जैसे दो दुनिया अमीर और गरीब, एक हो गईं। वहाँ न कोई ऊँच-नीच थी, न आरोप-प्रत्यारोप, सिर्फ मानवता थी।
पगली मुस्कुरा रही थी। उसके चेहरे पर एक शांति थी, जैसे उसे अपना स्थान मिल गया हो।
यह कथा केवल एक लड़की की नहीं, बल्कि उस संवेदना की है, जो आज भी इस समाज में कहीं जीवित है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची सभ्यता धन, शक्ति या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उस करुणा में बसती है, जो एक अनजाने को भी अपना बना ले।
ऐसी मातृत्व-भावना और मानवता को बार-बार प्रणाम।
★★★
2.
कहानी : सुनहरे गेहूँ का संघर्षगीत
सांझ का समय था। आकाश में ढलता हुआ सूरज जैसे अपनी थकी हुई लालिमा को धरती पर बिखेर रहा था। गेहूँ के खेत सुनहरी रोशनी में डूबे हुए थे, पर उस चमक के भीतर एक अनकहा इतिहास भी था मेहनत का, असमानता का और उस श्रम का जिसे अक्सर नाम नहीं मिलता। वह किसान खेत के बीच खड़ा था। उसकी देह पर दिन भर की मेहनत की रेखाएँ थीं, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ़ थकान नहीं, एक पुरानी पीड़ा भी थी, पीढ़ियों से चली आ रही। वह उन हाथों का वारिस था जिन्होंने सदियों तक धरती को सींचा, पर अधिकार कभी पूरी तरह नहीं पाया। उसने धीरे से गेहूँ की बालियों को छुआ। बालियाँ झुकीं, जैसे उसकी भाषा समझती हों। उसके मन में शब्द उठे कविता की तरह, जो उसकी अपनी थी, उसके जीवन से निकली हुई,
“मेरी हथेली की रेखाओं में
हल की धार बसी है,
मैं खेत नहीं, इतिहास जोतता हूँ,
फिर भी मेरी पहचान फँसी है।”
उसने दूर देखा, जहाँ सूरज आधा डूब चुका था। उसे लगा जैसे यह डूबना सिर्फ़ दिन का अंत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक है जो हर बार उसकी रोशनी को आधा ही रहने देती है। वह जानता था, यह खेत सिर्फ़ अन्न नहीं देता, यह उसकी अस्मिता का हिस्सा है। लेकिन यही खेत उसे बार-बार उसकी सीमाएँ भी याद दिलाता है कर्ज, बिचौलियों का खेल और समाज की वह दीवार जो उसे बराबरी से दूर रखती है। हवा में अचानक बेचैनी घुलने लगी। उसने देखा, खेत के एक कोने से धुआँ उठ रहा है। वह दौड़ा। उसके कदमों में डर नहीं, बल्कि एक आदत थी, हर संकट से जूझने की आदत। लेकिन आग तेज थी। लपटें फैलती गईं, जैसे किसी ने उसके पूरे जीवन को एक साथ चुनौती दे दी हो।
वह मिट्टी फेंकता रहा, हाथों से आग दबाता रहा, पर आग सिर्फ़ फसल नहीं जला रही थी, वह उसकी उम्मीदों, उसके सपनों, उसके आने वाले कल को भी निगल रही थी। लपटों के बीच खड़ा वह अचानक ठहर गया। उसके भीतर से फिर एक स्वर उठा, टूटा हुआ, मगर सच्चा,
“जलते हैं खेत तो जलती है मेरी जात,
राख में बदलती है मेरी हर बात।
तुम कहते हो, यह बस एक हादसा है,
मैं जानता हूँ, यह सदियों का प्रसाद है।”
आग शांत होने लगी, पर जो बचा वह सन्नाटा था भारी, दबा हुआ और भीतर तक चुभने वाला। वह घुटनों के बल बैठ गया। उसकी उँगलियों में राख भर आई। उसने उसे देखा, जैसे अपनी ही मेहनत का अंतिम रूप हो। उसके मन में सवाल थे, क्यों हर बार उसका ही खेत सबसे पहले जलता है? क्यों उसकी मेहनत का मूल्य सबसे कम होता है? क्यों उसके हिस्से में संघर्ष ज़्यादा और सम्मान कम आता है? रात गहराने लगी। आसमान में तारे उभरे, पर उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी। फिर भी, उस अंधेरे में एक हल्की-सी जिद बाकी थी, जीने की, फिर से बोने की। वह धीरे-धीरे उठा। उसकी चाल में थकान थी, पर हार नहीं। उसने एक बार फिर राख को हाथ में लिया और धीरे से कहा,
“मैं राख से भी उगाऊँगा फसल,
मेरी जड़ें मिटती नहीं हैं,
तुम जितना दबाओगे मुझको,
उतना मैं उगता जाऊँगा।”
वह खेत से बाहर चला गया, लेकिन उसके भीतर एक नई चेतना जन्म ले चुकी थी, सिर्फ़ किसान की नहीं, बल्कि उस मनुष्य की जो अब अपने श्रम के साथ अपने अधिकार को भी पहचानने लगा था।
★★★
3.
कहानी: बाँझिन की बददुआ
ज्ञान का आदिकोश वेद है। वेद केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि सृष्टि के अनुभव का संचित सार हैं। वेद चार हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन चारों वेदों में जीवन का आरंभ, विस्तार और अंत सब निहित है। ऋग्वेद में प्रकृति की ऋचाएँ हैं, यजुर्वेद में कर्मकांड की विधियाँ, सामवेद में स्वर और लय का अनंत विस्तार, और अथर्ववेद में लोकजीवन के दुःख-सुख, रोग-निवारण और जादुई-यथार्थ का संगम।
जब यज्ञ का सुयोग बनता था, तो इन चारों वेदों का पाठ क्रमशः होता। अध्वर्यु यज्ञ की क्रियाओं का संचालन करता, उद्गाता सामगान करता और ब्रह्मा समस्त प्रक्रिया का मौन पर्यवेक्षक बनकर उसकी शुद्धता सुनिश्चित करता। उस समय ऐसा प्रतीत होता था कि स्वयं ब्रह्मांड अपने अस्तित्व को पुनः रच रहा है; जैसे समय स्वयं अपने को दोहरा रहा हो। इसी वैदिक परंपरा में साय नामक एक ऋषि थे। वे केवल ज्ञान के साधक नहीं थे, बल्कि संवेदना के संरक्षक भी थे। उनका आश्रम केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि जीवन के अर्थ की खोज का स्थान था। उनके अनेक शिष्य थे, पर एक शिष्य ऐसा था, जिसने अपनी गुरुभक्ति से साय के हृदय को विशेष रूप से छू लिया था, वह था नंद।
नंद की गुरुभक्ति में कोई आडंबर नहीं था। वह सेवा करता था, पर सेवा के भीतर प्रश्न भी करता था। वह शास्त्र पढ़ता था, पर शास्त्रों के भीतर जीवन को खोजता था। उसकी दृष्टि में ज्ञान केवल शब्द नहीं था, वह कर्म था, संवेदना थी। साय उसकी इस प्रवृत्ति से प्रसन्न रहते थे। एक दिन उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, “वत्स नंद! तुम्हारी करुणा तुम्हें उस स्थान तक ले जाएगी, जहाँ तुम स्वयं भगवान विष्णु के पिता कहलाओगे।” यह आशीर्वाद एक साधारण वाक्य नहीं था, यह नंद के जीवन की दिशा बन गया। समय बीतता गया। एक दिन साय अपने शिष्यों के साथ नदी के मार्ग से वन की ओर जा रहे थे। नदी शांत थी; जैसे कोई साध्वी ध्यान में लीन हो। उसकी धारा में एक लय थी, एक स्थिरता थी। किनारों पर वृक्ष खड़े थे, जैसे वे इस यात्रा के साक्षी हों।
परंतु प्रकृति की शांति स्थायी नहीं होती; जैसे ही वे जंगल के मध्य पहुँचे, आकाश का रंग बदलने लगा। काले बादल घिर आए। हवा का स्वर बदल गया। धीरे-धीरे वह एक गर्जना में बदल गया। नदी की लहरें उठने लगीं। देखते-देखते जलप्लावन की स्थिति उत्पन्न हो गई। ऐसा लगा मानो प्रलय का एक अंश सामने खड़ा हो।द्वीप डूब गए। जंगल डूब गया। धरती और जल के बीच का अंतर मिटने लगा। स्थलीय जीवन का अस्तित्व संकट में पड़ गया। चारों ओर केवल जल ही जल दिखाई देने लगा।
इस विकट परिस्थिति में नंद ने तत्काल निर्णय लिया। उसने केले और बाँस का एक बेड़ा तैयार किया। उसने अपने गुरु और अन्य ऋषियों को उस पर बैठाया और स्वयं उसे संभालने लगा। वह उस समय केवल एक शिष्य नहीं था, वह जीवन का रक्षक था। बेड़ा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लहरें उसे डगमगातीं, पर नंद का संतुलन उसे स्थिर रखता। उसी समय उसने देखा, एक नाव विपरीत दिशा से आ रही है। उस नाव में कुछ मनुष्य थे। उनकी आँखों में भय था, पर उससे अधिक लालच था। उन्होंने अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ अपनी नाव में भर रखी थीं। जब लहरें तेज हुईं और नाव डगमगाने लगी, तो उन्हें लगा कि नाव डूब सकती है।
तब उन्होंने एक निर्णय लिया, अपने ही साथियों को पानी में फेंकना। एक-एक करके वे कमजोर लोगों को जलमग्न जंगल में फेंकने लगे। यह दृश्य केवल भयावह नहीं था, यह मनुष्यता के पतन का दृश्य था। इसी क्रम में उन्होंने दो बकरियों को भी पानी में फेंक दिया। वे बकरियाँ बूढ़ी थीं। उन्होंने कभी बियाया नहीं था। उनके जीवन में मातृत्व का कोई अनुभव नहीं था। वे केवल अस्तित्व थीं, बिना विस्तार के, बिना वंश के। जैसे ही वे पानी में गिरीं, लहरों की चोट से चीखने लगीं। उनकी चीखों में एक गहरा दर्द था, एक ऐसा दर्द, जो केवल शरीर का नहीं, आत्मा का था। वह चीख केवल जीवन बचाने की नहीं थी, वह अपने अस्तित्व के अपूर्ण रह जाने की पीड़ा थी।
उनकी पीड़ा धीरे-धीरे एक मंत्र में बदलने लगी। वे एक मंत्र का उच्चारण करने लगीं, एक ऐसा मंत्र, जो समय की गहराइयों से निकला था। कहा जाता है कि उसका सृजन स्वयं शिव ने किया था। बाद में ब्रह्मा ने उसमें कुछ परिवर्तन कर उसे अपना नवसृजन बताया। इस मंत्र को लेकर पार्वती और सरस्वती के बीच बहसें भी हुई थीं। और विष्णु अपने विभिन्न अवतारों में उन बहसों का आनंद लेते रहे थे, पर उस समय वह मंत्र किसी विवाद का विषय नहीं था। वह पीड़ा की आवाज था। वह मनुष्यता का मंत्र था। नंद ने जब यह दृश्य देखा, तो उसका हृदय भीतर तक हिल गया। उसके सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा था, क्या वह अपने गुरुजनों को सुरक्षित रखे या इन असहाय प्राणियों को बचाए?
बेड़े पर स्थान सीमित था। वह जानता था कि यदि वह बकरियों को बेड़े पर चढ़ाएगा, तो गुरुजनों का जीवन संकट में पड़ सकता है। और यदि वह उन्हें छोड़ देगा, तो उसकी आत्मा उसे कभी क्षमा नहीं करेगी। क्षण भर के लिए समय जैसे ठहर गया। फिर नंद ने निर्णय लिया। उसने बेड़े से छलांग लगा दी। उसने बकरियों को अपने सहारे में लिया और प्रवाह के विरुद्ध तैरने लगा। यह केवल तैरना नहीं था, यह संवेदना का संघर्ष था। यह मनुष्य के भीतर के मनुष्य का संघर्ष था। लहरें उसे पीछे धकेलती रहीं, पर उसका संकल्प उसे आगे बढ़ाता रहा।
वह तैरता रहा लगातार, बिना रुके।
एक घंटा… दो घंटे… दिन… रात…
समय का बोध खो गया।
वह छिहत्तर घंटे तक तैरता रहा।
उसका शरीर थक चुका था। साँसें भारी हो चुकी थीं, पर उसकी आत्मा अभी भी जाग रही थी। उसकी पकड़ ढीली नहीं पड़ी। अंततः दूर उसे एक पहाड़ दिखाई दिया, हिमालय जैसा। स्थिर, अडिग, और धैर्यवान। वहाँ पहुँचने से पहले उसे एक डूबे हुए गाँव से गुजरना पड़ा। घरों की छतें पानी में डूबी हुई थीं। कहीं कोई आवाज नहीं थी। केवल जल का शोर था। उसी गाँव की एक छत पर एक नाव बंधी हुई थी। नंद ने सोचा, कुछ देर विश्राम कर लिया जाए। बकरियों को उस पर बैठाकर उनकी थकान दूर कर दे।
जैसे ही उसने बकरियों को नाव पर चढ़ाना चाहा, एक स्वर गूँजा, “हे मनुष्य! यह मेरी नाव है। इन बकरियों को नीचे उतारो।” नंद ने ऊपर देखा। एक अप्सरा खड़ी थी। उसके स्वर में अधिकार था, और आँखों में घृणा। नंद चुप रहा। वह कुछ नहीं बोला। उसके भीतर शब्द थे, पर वे लहरों के शोर में कहीं डूब गए थे। अप्सरा की आँखों में घृणा थी; जैसे करुणा उसके लिए कोई दोष हो।
“क्या सुनाई नहीं देता? यह मेरी नाव है!”, अप्सरा ने फिर कहा। नंद ने बकरियों की ओर देखा। वे थक चुकी थीं। उनके शरीर काँप रहे थे। उनकी आँखों में भय और भरोसा एक साथ तैर रहा था। वह जानता था कि यह नाव केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं है, यह जीवन और मृत्यु के बीच की एक पतली रेखा है, पर वह मौन ही रहा।
तभी जल के भीतर से कुछ और हलचल हुई। कुछ देवगण वहाँ प्रकट हुए। वे अप्सरा की ओर देख रहे थे, उनकी दृष्टि में एक अजीब-सा असंतोष था। अप्सराएँ सुंदर थीं, पर उनकी सुंदरता कभी-कभी देवताओं को भी सुई की तरह चुभती थी। उनमें से एक देवता आगे बढ़ा और बोला, “यदि यह नाव तुम्हारी है, तो हमारा भी कुछ कर्तव्य है।”
उन्होंने अपनी नाव को आगे बढ़ाया, “इन बकरियों को इसमें बैठा दो।” नंद ने एक क्षण के लिए उन्हें देखा। यह दृश्य विचित्र था, देवगण स्वयं जल में उतर रहे थे और बकरियों को स्थान दे रहे थे। बकरियाँ नाव पर बैठ गईं। नंद ने राहत की साँस ली। अब वह भी उनके साथ तैरने लगा। देवगण भी उसके साथ थे। तैरना केवल शरीर का श्रम नहीं था, यह लहरों से संवाद था। हर लहर एक प्रश्न की तरह आती, हर साँस एक उत्तर की तरह जाती।
धीरे-धीरे वे किनारे की ओर बढ़ने लगे। जब वे किनारे पहुँचे, तो वहाँ का वातावरण अलग था। जल पीछे छूट गया था, पर उसकी स्मृति अभी भी हवा में थी। उसी किनारे पर एक व्यक्ति खड़ा था—वात्स्यायन। उन्होंने नंद को देखा और मुस्कराते हुए पूछा, “मित्र, आपकी कुशलता कैसी है? सब ठीक है न? और यह क्या, उम्र की इस उमस में ये बूढ़ी बकरियाँ? इनकी मूत से तो बहुत बदबू आती है!”
उनके शब्दों में व्यंग्य था, और व्यंग्य में एक प्रकार का अस्वीकार। नंद ने उनकी ओर देखा, पर कुछ नहीं कहा। उसका मौन अब उसकी भाषा बन चुका था। हवा में तरह-तरह की बातें फैलने लगीं। बकरियों की गंध को लेकर लोग बातें करने लगे। कोई हँसता, कोई नाक सिकोड़ता।उसी क्षण अचानक एक विचित्र प्रकाश फैला। साय की आत्मा वहाँ प्रकट हुई। नंद ने तुरंत उनके चरणों में प्रणाम किया। साय ने उसे देखा, उनकी दृष्टि में गर्व था, पर उसके भीतर एक गहरा रहस्य भी छिपा था। उन्होंने कहा, “वत्स, तुमने अपने कर्म से विमुख नहीं हुए। तुमने धर्म का पालन किया है। अब समय है गुरु-दक्षिणा का।” नंद ने सिर झुका दिया, “आज्ञा दें, गुरुदेव।” साय बोले, “मुझे ये बकरियाँ दे दो।”
नंद के भीतर एक हल्की-सी हलचल हुई। पर उसने बिना प्रश्न किए बकरियों को उनके हवाले कर दिया। साय उन्हें लेकर चले गए। नंद वहीं खड़ा रह गया मौन, किंतु भीतर से प्रश्नों से भरा हुआ। दिन बीतते गए। उसके मन में एक ही प्रश्न घूमता रहा, गुरुदेव ने बकरियाँ ही क्यों माँगीं?उसकी चिंता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। एक दिन जब वह अकेला बैठा था, तभी एक मधुर वीणा की ध्वनि सुनाई दी।
देवऋषि नारद प्रकट हुए। नंद ने उन्हें प्रणाम किया। नारद मुस्कराए, “वत्स, तुम्हारे मन में प्रश्न है।” नंद ने कहा, “हे देवऋषि! ये बकरियाँ कौन थीं? गुरुदेव ने इन्हें ही क्यों माँगा?” नारद ने गम्भीर होकर कहा, “वत्स, ये साधारण बकरियाँ नहीं थीं। ये साय की पुत्रियाँ थीं—देवकन्याएँ।यज्ञ से प्राप्त हुई थीं। एक बाँझिन की बददुआ के कारण इन्हें यह रूप मिला।”
नंद स्तब्ध रह गया। उसने पूछा, “पर ऐसा क्या हुआ था?” नारद ने कहना शुरू किया, “वत्स, वह बाँझिन स्त्री तुलसी माता की भक्तिन थी। वह प्रतिदिन पूजा करती थी।
हर वर्ष तुलसी का विवाह कराती थी, पर उसके अपने जीवन में दुःख का अथाह सागर था। विवाह के कुछ ही दिनों बाद उसके पति की मृत्यु हो गई। हर वर्ष वह सफेद साड़ी पहनती, सफेद रंग, जो सारे रंगों को अपने भीतर समेट लेता है, जैसे दुःख का दीपक संसार के अंधकार को पी लेता है।”
नारद की वाणी धीमी हो गई, “लोक में कोई स्त्री बाँझ नहीं होती, वत्स। लोक उसे माई, मौसी, चाची, बहन, बेटी; किसी न किसी रूप में पूर्ण मानता है, पर मनुष्य की दृष्टि जब संकुचित हो जाती है, तब वह स्त्री को केवल उसके गर्भ से मापने लगता है।” नंद ध्यान से सुन रहा था। नारद आगे बोले, “एक दिन वह बाँझिन पुष्प लेने आश्रम आई।
पुष्प वही सँभालती थी, वह उस आश्रम की खानदानी मालिन थी, पर उन देवकन्याओं को अपनी आभा का अभिमान हो गया था। उन्होंने उसे ‘बाँझ’ कहकर पुष्प तोड़ने से रोक दिया। उनकी बातों ने उसके हृदय को चीर दिया। वह पीड़ा से काँप उठी और उसी पीड़ा में उसने कह दिया, ‘जाओ, तुम भी बाँझ हो जाओ।’”
नंद ने धीरे से कहा, “फिर?”
नारद बोले,
“शब्द लौटते नहीं, वत्स।
वे भाग्य बन जाते हैं।
उसे तुरंत पछतावा हुआ।
वह रोई,
‘मैंने क्या कर दिया… स्त्री होकर स्त्री को बददुआ…!’
तीनों साय के पास गईं। साय त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने सब जान लिया। उन्होंने अपनी पुत्रियों को मुक्ति का मंत्र दिया और कहा, ‘समय आने पर यह मंत्र तुम्हें बचाएगा।’” नारद ने नंद की ओर देखा, “वत्स, वही समय जलप्लावन का था। वही मंत्र तुम्हें उनके पास बुला रहा था। तुम्हारी करुणा ही उनकी मुक्ति बनी।”
नंद की आँखों से आँसू बहने लगे। अब उसे सब समझ में आ गया था। नारद ने अंत में कहा, “वत्स, यह नारी को बचाने का नक्षत्र है। हर नर के भीतर की नारी को जीवित करना ही धर्म है। स्त्री केवल शरीर नहीं है, वह पृथ्वी है और पृथ्वी कभी बाँझ नहीं होती।” नंद मौन हो गया। उसका मौन अब शून्य नहीं था, वह समझ से भरा हुआ था। वह जान चुका था, संवेदना ही सच्चा ज्ञान है और “बाँझिन की बददुआ” केवल एक कथा नहीं, एक चेतावनी है कि शब्दों में आग भी होती है और मुक्ति भी और यह कि स्त्री का अपमान, अंततः सृष्टि का अपमान है।
★★★
4.
कहानी: सत्यार्थिन
1).
गाँव की सुबह हमेशा एक जैसी नहीं होती। कभी वह धूप से भरी होती है, कभी धुएँ से और कभी किसी अनकहे दुःख की गंध से। उस गाँव की सुबह भी कुछ ऐसी ही थी, जहाँ खेतों की हरियाली के पीछे एक घर था और उस घर के भीतर एक ऐसा अँधेरा, जो किसी को दिखाई नहीं देता था।
उस किसान के पास चौबीस बीघा जोतू ज़मीन थी। लोग उसे सम्पन्न कहते थे, इज्ज़त से उसका नाम लेते थे और पंचायत में उसकी बात सुनी जाती थी। उसका नाम परशुराम था। नाम में धर्म, लेकिन स्वभाव में हिंसा का ऐसा बीज, जो धीरे-धीरे पूरे घर को निगल रहा था।
मैं उस किसान को जानता हूँ। उसके पिता को भी जानता हूँ। उसके दादा की कहानी भी मैंने बुज़ुर्गों से सुनी है। वे लोग अलग थे। उनमें श्रम था, आत्मसम्मान था और परिवार के प्रति एक सहज जिम्मेदारी थी। परशुराम उस वंश का उत्तराधिकारी तो था, पर उस परंपरा का नहीं।
उसकी पत्नी सत्यवती। एक साधारण, सुंदर और सहनशील स्त्री; उस घर को संभाले हुए थी। उसकी आँखों में हमेशा एक थकान रहती थी, लेकिन उस थकान के पीछे एक अजीब-सी शांति भी थी, जैसे वह हर दुःख को स्वीकार करने की अभ्यस्त हो चुकी हो।
चार बच्चे थे—दुर्वासा, सत्यार्थनी, मांडव और सबसे छोटा उदयन।
दुर्वासा: सबसे बड़ा, अपने पिता की आँखों का तारा था, क्योंकि उसमें वही कठोरता थी, वही अकड़, वही निर्दयता।
सत्यार्थनी: घर की धड़कन थी।
मांडव: शांत, संवेदनशील, भीतर से नरम।
और उदयन: अभी इतना छोटा कि दुनिया को समझने के लिए भी उसे किसी की उँगली चाहिए थी।
लेकिन यह घर धीरे-धीरे घर नहीं रहा। एक ऐसी जगह बन गया, जहाँ हर दिन एक नया घाव जुड़ता था।
परशुराम सुबह खा-पीकर निकल जाता था। वह कहाँ जाता था, यह कोई नहीं जानता था या शायद सब जानते थे, लेकिन बोलते नहीं थे। शाम को लौटता, तो उसका चेहरा थका हुआ नहीं, बल्कि किसी अजीब संतोष से भरा होता।
घर आते ही उसका पहला सवाल होता,
“खाना कहाँ है?”
और अगर खाना तैयार न हो, तो उसका दूसरा रूप सामने आ जाता। लाठी, डंडा, हाथ—जो भी मिलता, वह बच्चों पर टूट पड़ता। सत्यवती बीच में आती, तो वह भी पिटती। धीरे-धीरे वह पिटाई, वह अपमान, वह निरंतर तनाव, उसके शरीर को खा गया। जब उदयन तीन साल का था, एक दिन सत्यवती चुपचाप लेटी रह गई। उस दिन घर में कोई शोर नहीं हुआ। कोई रोया भी नहीं पहले, क्योंकि बच्चों को समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है। सत्यार्थनी ने सबसे पहले माँ को छुआ, उसका शरीर ठंडा था! उसने हिलाया, कोई जवाब नहीं। वह चिल्लाई नहीं, बस चुप हो गई! उस दिन से वह बच्ची नहीं रही!!
माँ की मृत्यु के बाद घर जैसे खुला छोड़ दिया गया, जैसे किसी ने दीवारें तोड़ दी हों, लेकिन छत अभी भी टिकी हो। परशुराम अब और भी बेपरवाह हो गया। उसने घर में एक औरत को रख लिया, जिसे गाँव वाले जानते थे, लेकिन कोई खुलकर कुछ नहीं कहता था। पंचायतें हुईं, बातें हुईं, पर अंत में सब चुप हो गए, क्योंकि परशुराम के पास ज़मीन थी और ज़मीन के साथ सत्ता आती है। दुर्वासा अब खुलकर पिता की तरह बनने लगा था। वह शराब पीता, छोटे भाईयों को मारता और घर में डर का एक स्थायी वातावरण बनाए रखता।
सत्यार्थनी अब माँ थी, वह सुबह उठती, चूल्हा जलाती, मांडव और उदयन को तैयार करती और फिर उन्हें लेकर खेतों की ओर निकल जाती। दिन भर वह पशु चराती, घास काटती और छोटे भाईयों को सँभालती। शाम को लौटकर खाना बनाती और रात को, जब सब सो जाते, वह चुपचाप रोती। उसकी उम्र तब कितनी थी, शायद दस या ग्यारह साल। लेकिन उसकी आँखों में उम्र से कहीं ज्यादा थकान थी। एक दिन, जब मार सहन से बाहर हो गई, वह ननिहाल चली गई। वहाँ उसे कुछ सुकून मिला और फिर जल्दी ही उसका विवाह कर दिया गया। जब वह विदा हो रही थी, उदयन उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था। वह रो रहा था,
“दीदी, मत जाओ…”
लेकिन सत्यार्थनी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शायद अगर वह मुड़ती, तो जा नहीं पाती। उसके जाने के बाद घर पूरी तरह टूट गया। अब मांडव और उदयन अकेले थे। दुर्वासा की मार, पिता की क्रूरता और बीच में कोई नहीं जो उन्हें बचा सके। एक दिन, जब वे सिवान में बैल चरा रहे थे, मांडव ने अचानक कहा,
“चल भाग चलते हैं…”
उदयन ने पूछा,
“कहाँ?”
मांडव ने कहा,
“कहीं भी…”
वे दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर बिना कुछ सोचे, बिना कुछ समझे, वे चल पड़े। सिवान से स्टेशन तक का रास्ता उन्हें याद नहीं रहा, बस इतना याद रहा कि वे भाग रहे थे। एक ट्रेन खड़ी थी, वे उसमें चढ़ गए। उनके पास टिकट नहीं था, पैसा नहीं था और मंज़िल भी नहीं थी। लेकिन उनके पास एक चीज़ थी, घर से दूर जाने की इच्छा। ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से बाहर खेत पीछे भाग रहे थे, जैसे उनका अतीत उनसे दूर जा रहा हो। कुछ समय बाद, वे अलग हो गए,
कैसे, कब, उन्हें खुद नहीं पता!
उदयन एक दिशा में चला गया, मांडव दूसरी दिशा में। दोनों की ज़िंदगियाँ अब अलग-अलग कहानियाँ बनने वाली थीं। उदयन शहर दर शहर भटकता रहा। कभी स्टेशन पर सोता, कभी किसी ढाबे के पीछे। लोग उसे देखते, कुछ दया से, कुछ शक से और कुछ बिल्कुल नहीं देखते। आख़िरकार वह पटना पहुँचा, बारह साल का एक दुबला-पतला बच्चा, जिसकी आँखों में डर और भूख दोनों थे। एक चाय वाले ने उसे रख लिया,
गिलास धोने के लिए। वह सुबह से रात तक काम करता और बदले में उसे खाना और सोने की जगह मिलती। लेकिन वह जगह घर नहीं थी, वह एक कोना था, जहाँ वह थककर गिर जाता था। कुछ महीने बाद, उसे एक हलवाई के यहाँ काम मिल गया। वहाँ काम ज़्यादा था और बंदिशें भी। रात ग्यारह बजे के बाद उसे दुकान में बंद कर दिया जाता। सुबह चार बजे उसे जगाया जाता, “उठ! भट्टी जलानी है…”
उसकी नींद अधूरी रहती, उसका शरीर थका रहता, लेकिन काम कभी खत्म नहीं होता। रात में जब उसे पेशाब लगती, तो वह बाहर नहीं जा सकता था। वह एक पॉलिथीन में पेशाब करता और सुबह शटर खुलते ही उसे बाहर फेंक देता। यह उसकी ज़िंदगी थी, एक ऐसी ज़िंदगी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकता था। हर रात, जब सब सो जाते, वह चुपचाप रोता। उसे अपनी माँ याद आती, बहन याद आती, मांडव याद आता। एक दिन, वह इतना बीमार पड़ गया कि काम नहीं कर सका। मालिक ने डाँटा, “नाटक मत कर!”
लेकिन उसका शरीर जवाब दे चुका था। कुछ दिनों बाद, उसने भागने की कोशिश की। वह शौच का बहाना बनाकर बाहर निकला और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ा। वह चलता रहा, दो किलोमीटर, तीन किलोमीटर, लेकिन कहीं कोई स्टेशन नहीं मिला। वह थक गया, डर गया और वापस लौट आया। मालकिन ने उसे खूब पीटा। रात में मालिक ने भी। उसकी पीठ पर नीले निशान पड़ गए, लेकिन उसकी आँखों में आँसू नहीं थे अब। शायद आँसू भी खत्म हो चुके थे। कुछ दिन बाद रक्षाबंधन था। मालकिन मायके चली गई। मालिक दुकान में व्यस्त था। उसने उदयन को भैंस का चारा डालने भेजा। उदयन गया, लेकिन इस बार वह वापस नहीं आया। वह दौड़ा, रेलवे लाइन की ओर।
नंगे पैर,
पत्थरों पर,
धूप में,
उसके पैर कट रहे थे,
ख़ून बह रहा था,
लेकिन वह रुका नहीं।
वह दौड़ता रहा, जब तक कि उसका शरीर ज़वाब नहीं दे गया। आगे एक गड्ढा था, जिसमें भैंसें पानी में खेल रही थीं। वह प्यास से बेहाल था। उसने वही गंदा पानी पिया, अपने गमछे से छानकर। उसी समय एक चरवाहा वहाँ आया। उसने उदयन को देखा, उसकी हालत समझी और बिना कुछ पूछे, उसे अपने साथ ले गया। उसने उसके पैर धोए, मरहम लगाया, उसे खाना दिया। उस रात, बहुत दिनों बाद, उदयन ने चैन की नींद सोई। सुबह, वह चरवाहा उसे साइकिल पर बैठाकर स्टेशन ले गया। उसने टिकट कटवाया और कहा, “घर जा…”
उदयन ने उसकी ओर देखा, जैसे वह पहली बार किसी इंसान को देख रहा हो। ट्रेन चली और वह अपने गाँव की ओर लौटने लगा।
★
2).
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए उदयन को पहली बार लगा कि रास्ते भी कभी-कभी घर बन जाते हैं। पटरियों के किनारे भागते पेड़, दूर-दूर तक फैले खेत, छोटे-छोटे स्टेशन, सब कुछ उसे एक साथ बुला भी रहे थे और धक्का भी दे रहे थे। उसके भीतर डर था कि घर पहुँचकर क्या होगा? और एक उम्मीद भी कि शायद इस बार सब ठीक हो जाए।
जब वह अपने गाँव के स्टेशन पर उतरा, तो उसे लगा जैसे वह कोई और जगह है। वही प्लेटफॉर्म, वही चाय की दुकान, वही भीड़, पर उसके लिए सब कुछ बदला हुआ था। वह धीरे-धीरे पगडंडी पकड़कर गाँव की ओर चला। रास्ते में मिलने वाले लोग उसे देख रहे थे, पर पहचान नहीं पा रहे थे। उसकी देह दुबली हो चुकी थी, रंग झुलस गया था, आँखों में बचपन की जगह थकान आ गई थी।
घर के सामने पहुँचते ही उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। आँगन में वही नीम का पेड़ था, पर उसकी छाँव अब वैसी नहीं लग रही थी। उसने धीरे से आवाज़ दी,
“बाबू…”
अंदर से परशुराम निकला। उसने कुछ क्षण उदयन को देखा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। फिर अचानक उसके चेहरे पर एक अजीब-सी नरमी आई,
“उदयन?”
उस एक शब्द में जितनी आश्चर्य, उतनी ही राहत भी थी। दुर्वासा भी बाहर आया। उसने उदयन को ऊपर से नीचे तक देखा,
“कहाँ था तू?”
उदयन ने झूठ गढ़ लिया, “हमको कुछ लोग पकड़ लिए थे… सिवान से… ट्रेन से ले गए… बेच दिए…” यह वही कहानी थी, जो उसने रास्ते में सोच ली थी। “लकड़सूँघ” का नाम उसने लोगों से सुना था और अब वही उसकी सच्चाई बन गई। कुछ दिनों तक घर में उसके प्रति सहानुभूति रही। उसे खाना ठीक से मिला, मार नहीं पड़ी और कुछ देर के लिए लगा कि शायद जीवन बदल सकता है।
लेकिन यह समय बहुत छोटा था। धीरे-धीरे सब कुछ फिर से पहले जैसा हो गया। परशुराम का स्वभाव नहीं बदला। दुर्वासा की क्रूरता और बढ़ गई। उदयन को समझ आ गया कि यह घर अब उसके लिए नहीं है, यह केवल एक जगह है, जहाँ उसका जन्म हुआ था, लेकिन जहाँ उसके लिए कोई स्थान नहीं बचा। एक रात, जब वह चुपचाप लेटा था, उसने फैसला किया,
वह फिर भागेगा।
इस बार वह पहले जैसा बच्चा नहीं था। वह जानता था कि दुनिया कैसी है! कुछ दिनों बाद, उसे एक ट्रक ड्राइवर मिला। उसने उससे काम माँगा। ड्राइवर ने उसे देखा, “काम कर पाएगा?”
उदयन ने सिर हिलाया,
“कर लेंगे…”
वह उसके साथ चल पड़ा। अब सड़क उसकी ज़िंदगी बन गई। ट्रक के साथ उसने शहर दर शहर देखा, पटना, वाराणसी, कानपुर, दिल्ली, मुंबई…
हर शहर में एक नई कहानी थी, एक नया संघर्ष। धीरे-धीरे उसने गाड़ी चलाना सीख लिया। पहले छोटे-छोटे रास्तों पर, फिर लंबी सड़कों पर। पंद्रह-सोलह साल की उम्र में वह खुद ड्राइवर बन गया। अब वह किसी का नौकर नहीं था, वह खुद अपने रास्ते का मालिक था। लेकिन यह आज़ादी भी अधूरी थी। हर शहर में उसे कुछ मिलता, लेकिन कुछ छूट भी जाता।
रात में, जब वह किसी ढाबे पर गाड़ी खड़ी करता और आसमान की ओर देखता, तो उसे अपना गाँव याद आता। माँ का चेहरा, सत्यार्थनी की आवाज़,
मांडव की हँसी, सब कुछ धुंधला-सा होकर भी उसके भीतर जिंदा था। वह हर पाँच-सात साल में गाँव लौटता। कुछ दिन रुकता, फिर चला जाता। घर अब भी वही था, पर उसके भीतर कोई अपनापन नहीं था।
दुर्वासा की शादी हो चुकी थी। उसकी पत्नी आई थी,
लेकिन उसने भी उदयन को कभी अपनाया नहीं। वह घर में एक अजनबी की तरह रहता, जिसे सब जानते थे, पर कोई स्वीकार नहीं करता था। उसी बीच, परशुराम ने उससे शादी के लिए पैसे माँगने शुरू कर दिए। “इतना कमाता है… अपने बाप के लिए कुछ नहीं करेगा?” उदयन चुप रहता। वह जानता था, यह माँग केवल पैसे की नहीं है, यह उस रिश्ते की कीमत है, जो कभी बना ही नहीं। आख़िरकार, उसने खुद ही शादी कर ली— प्रेम विवाह।
उसने सोचा, शायद वह अपना घर खुद बना सके। उसकी पत्नी आई, कुछ समय तक सब ठीक चला। एक बेटा हुआ, एक बेटी हुई। लेकिन उसके भीतर जो खालीपन था, वह भर नहीं सका। वह खुद को “मूलनिवासी” कहने लगा, जैसे वह अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहता हो, उस पहचान से दूर, जो उसे जन्म से मिली थी। लेकिन जीवन फिर भी आसान नहीं हुआ। उसकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई। वह फिर अकेला रह गया, सड़कों पर, ट्रक के साथ।
दूसरी ओर, मांडव की कहानी एक अलग दिशा में बह रही थी। जब वह उदयन से बिछड़ा, तब वह भी एक बच्चा ही था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी ज़िद थी, जीने की, टिके रहने की। भटकते-भटकते वह लखनऊ पहुँचा। वहाँ उसने रिक्शा चलाना शुरू किया। सुबह से शाम तक; गर्मियों की धूप, सर्दियों की ठंड, बारिश की कीचड़, सब कुछ उसके हिस्से में था। लेकिन उसने हार नहीं मानी। एक दिन, उसके रिक्शे पर एक आदमी बैठा, साफ-सुथरे कपड़े, गंभीर चेहरा।
वह इलाहाबाद के एक विद्यालय का प्रधानाचार्य था। उसने रास्ते में मांडव से बातें कीं,
“पढ़े हो?”
मांडव ने सिर झुका लिया,
“नहीं…”
प्रधानाचार्य ने कुछ देर सोचा,
फिर कहा,
“काम करोगे?”
मांडव ने तुरंत हामी भर दी। वह उसके साथ इलाहाबाद चला आया। विद्यालय में उसे माली का काम मिला। वह पेड़-पौधों की देखभाल करता, फूल लगाता, घास काटता और साथ ही, बच्चों को पढ़ते हुए देखता। धीरे-धीरे उसने अक्षर पहचानना शुरू किया। उसने अपना नाम लिखना सीखा— “मांडव”
यह उसके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। लेकिन यह सुख भी ज़्यादा दिन नहीं टिक सका। एक दिन विद्यालय में एक घटना हुई, एक माली ने एक छात्रा के साथ बदसलूकी की। जाँच शुरू हुई और शक मांडव पर भी गया, क्योंकि वह उसी माली के साथ रहता था। बिना पूरी सच्चाई जाने, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया। दो साल तक वह जेल में रहा। दो साल, जहाँ हर दिन एक जैसा होता है और हर रात बहुत लंबी। आख़िरकार, असली अपराधी पकड़ा गया। मांडव निर्दोष साबित हुआ, लेकिन तब तक बहुत कुछ खो चुका था। जेल से निकलकर वह पहले जैसा नहीं रहा। उसके भीतर एक गहरा खालीपन था और एक सवाल,
“मैं कौन हूँ?”
इसी सवाल ने उसे आगे धकेला। वह फिर भटकने लगा। इस बार उसकी भटकन केवल रोटी के लिए नहीं थी, वह अपने अस्तित्व की तलाश में था। उसी दौरान, वह एक लड़की से मिला। वह एक निम्न जाति की थी। समाज की नजर में “छोटी और अछूत”, लेकिन मांडव की नजर में वह एक इंसान थी। दोनों करीब आए और उन्होंने शादी कर ली। कुछ दिन साथ रहे, सपनों के साथ। लेकिन समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। घरवालों को जब पता चला, तो विरोध हुआ, अपमान हुआ। मांडव उस लड़की को लेकर अपने एक रिश्तेदार के यहाँ आया, लेकिन वहाँ भी उसे अपनाया नहीं गया। आख़िरकार, वह रिश्ता टूट गया या टूटने पर मजबूर कर दिया गया। उसके बाद, मांडव ने दुनिया से दूरी बना ली। वह चित्रकूट के जंगलों में चला गया। वहाँ उसने साधु का जीवन अपनाया। घास, पत्ते, जड़ें; जो मिला, खाया। दिनों तक मौन रहा, रातों तक जागता रहा। वह कहता है,
“मैंने तपस्या की… मुझे सिद्धि मिली…”
सिद्धि मिली या नहीं; यह कोई नहीं जानता, लेकिन इतना ज़रूर था, वह अब पहले वाला मांडव नहीं रहा। वह एक जोगी बन चुका था, जिसकी आँखों में संसार का दुःख बस गया था।
सत्रह साल बाद; वह अपने गाँव लौटा।
हाथ में सारंगी थी,
कंधे पर झोला
और चेहरे पर एक अजीब-सी शांति।
वह गा रहा था,
अपने जीवन की कहानी।
गाँव के लोग उसे घेरकर खड़े हो गए। कुछ उसे पहचानने की कोशिश कर रहे थे, कुछ उसे केवल एक जोगी समझ रहे थे। लेकिन उसकी आवाज़, उसमें कुछ ऐसा था, जो सीधे दिल तक पहुँच रहा था। उसी समय, एक स्त्री भीड़ को चीरते हुए आगे आई, वह सत्यार्थनी थी। उसने एक नज़र मांडव को देखा और तुरंत पहचान लिया।
“मांडव…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी। मांडव ने उसकी ओर देखा और उसकी आँखों में आँसू आ गए। सत्रह साल बाद; भाई-बहन आमने-सामने थे, लेकिन यह मिलन अधूरा था, क्योंकि अभी घर बाकी था।
★
3).
सत्यार्थनी की आवाज़ जैसे समय की परतों को चीरती हुई आई थी, “मांडव…” भीड़ कुछ क्षण के लिए थम गई। सारंगी की धुन रुक गई। हवा में जैसे एक अनकहा कंपन फैल गया। मांडव ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आँखों में पहले संदेह, फिर पहचान और फिर एक गहरी पीड़ा तैर गई।
“दीदी…”
बस इतना ही कहा उसने और यह एक शब्द सत्रह वर्षों की दूरी को पाटने के लिए काफ़ी था। सत्यार्थनी आगे बढ़ी, पर उसने मांडव को छुआ नहीं। जैसे उसे डर हो कि कहीं यह सपना न हो, कहीं यह छवि टूट न जाए। भीड़ अब कानाफूसी कर रही थी,
“अरे, ये तो परशुराम का बेटा मांडव है…”
“हाँ, वही… जो बचपन में भाग गया था…”
“अब देखो, जोगी बनकर लौटा है…”
लेकिन यह पहचान जितनी जल्दी गाँव के लोगों में फैल रही थी, उतनी ही सख्ती से घर के भीतर नकार दी जा रही थी। जब यह खबर परशुराम और दुर्वासा तक पहुँची, वे भी आँगन में आए। मांडव ने उन्हें देखा,
वही चेहरे, बस समय ने उन्हें थोड़ा और कठोर बना दिया था। उसने आगे बढ़कर कहा, “बाबू…”
परशुराम ने उसकी ओर देखा और बिना एक पल रुके कहा, “हम नहीं जानते तुम्हें।”
यह वाक्य किसी पत्थर की तरह गिरा। भीड़ में सन्नाटा छा गया। मांडव कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसने दुर्वासा की ओर देखा, “भइया…”
दुर्वासा ने हँसते हुए कहा, “कहाँ से सीखकर आया है यह नाटक? कौन भेजा है तुम्हें?”
“मैं मांडव हूँ…”
“नहीं, तू कोई बहरूपिया है। हमारा भाई मर गया था।”
यह केवल इनकार नहीं था, यह एक योजनाबद्ध अस्वीकार था, क्योंकि अगर वे उसे स्वीकार करते,
तो उसे हिस्सा देना पड़ता। ज़मीन, जायदाद; इन सबके सामने खून का रिश्ता छोटा पड़ गया था।
गाँव के बुज़ुर्ग आगे आए, “परशुराम, पहचानो इसे… यह तुम्हारा ही बेटा है…” परशुराम ने कड़क आवाज़ में कहा, “हमको अपने ख़ून की पहचान है। यह हमारा खून नहीं है।”
यह सुनकर सत्यार्थनी का चेहरा तमतमा उठा,
“बाबू! ख़ून की पहचान तब नहीं हुई, जब हम लोग मार खाते थे? तब नहीं दिखा कि हम आपके बच्चे हैं?” उसकी आवाज़ में वर्षों का जमा हुआ आक्रोश था। परशुराम चुप रहा, लेकिन उसकी चुप्पी में स्वीकार नहीं, ज़िद थी। मांडव अब समझ चुका था, यह घर अब भी वही है, जहाँ सच की कोई जगह नहीं।उसने कोई विवाद नहीं किया। वह वहीं आँगन के किनारे बैठ गया। सारंगी उठाई और फिर से बजाने लगा, लेकिन इस बार धुन बदल गई थी। अब उसमें केवल दुःख नहीं था, एक स्वीकार भी था, एक विरक्ति भी!
कुछ दिनों तक मांडव गाँव में रहा। वह लोगों से मिलता, पुरानी बातें करता और रात में सारंगी बजाकर अपनी कहानी गाता। गाँव के बुज़ुर्ग उसके पास बैठते, उसके हाथ का बना खाना याद करते। “मांडव बचपन से ही रसोइया था…”
“कैसा स्वाद बनाता था…”
उसकी उदारता, उसका स्वभाव; सबकी यादें धीरे-धीरे लौट रही थीं। लेकिन घर के भीतर वही दूरी बनी रही।केवल दो लोग थे, जिन्होंने उसे बिना शर्त स्वीकार किया— सत्यार्थनी और वह औरत, जिसे परशुराम ने रख रखा था। वह औरत भी उसे पहचान गई थी, क्योंकि उसने उसे बचपन में देखा था। विडंबना यह थी कि जो संबंध समाज की नजर में “अवैध” था, वही सबसे सच्चा साबित हो रहा था।
मैं, जो इस पूरी कथा का साक्षी हूँ, मांडव को समझना चाहता था। उसकी आँखों में जो अनुभव था, वह केवल सुना नहीं जा सकता था, उसे जानना पड़ता था। मैंने गाँव के लोगों से पूछा, “मांडव कहाँ-कहाँ रहा? क्या-क्या किया?”
लेकिन किसी के पास पूरी कहानी नहीं थी। सबके पास कुछ टुकड़े थे, किसी के पास बचपन, किसी के पास उसकी रसोई, किसी के पास उसका जोगी रूप। आख़िरकार, मुझे एक आदमी मिला, जो कुछ समय तक मांडव के साथ रहा था। उसने कहा, “तुम सच जानना चाहते हो?”
मैंने कहा,
“हाँ…”
उसने लंबी साँस ली और फिर धीरे-धीरे बताने लगा। “जब मांडव लखनऊ में था, तब वह केवल रिक्शा नहीं चलाता था। वह लोगों को पढ़ते हुए देखता था। उसे अक्षरों से प्रेम हो गया था…” मैं चुपचाप सुनता रहा। “फिर जब वह इलाहाबाद गया, तो उसे लगा कि जीवन बदल सकता है… लेकिन जेल ने उसे तोड़ दिया…”
“और वह लड़की?” मैंने पूछा।
वह थोड़ा झिझका,
फिर बोला,
“हाँ… वह उससे बहुत प्रेम करता था…
शादी भी की थी…”
“फिर?”
“समाज ने उसे रहने नहीं दिया…”
उसकी आवाज़ में एक थकान थी, जैसे वह भी उस कहानी का हिस्सा रहा हो।
“और चित्रकूट?”
“वहाँ वह खुद को भूलने गया था…
या शायद खुद को खोजने…”
मैंने पूछा,
“क्या उसे सच में सिद्धि मिली?”
वह मुस्कराया,
“अगर दुःख को समझ लेना सिद्धि है,
तो हाँ… उसे मिली।”
मांडव से जब मैंने खुद पूछा,
“आपने इतना सब कैसे सहा?”
वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला,
“सहन नहीं किया… बस जीता रहा…”
उसके इस उत्तर में एक गहरी सादगी थी। फिर उसने एक और बात कही, जो शायद उसकी पूरी यात्रा का सार थी, “जब कोई अपना नहीं रहता, तो आदमी खुद का हो जाता है…”
इसी बीच, सत्यार्थनी का जीवन अपने अंतिम मोड़ पर पहुँच रहा था। उसकी कहानी मांडव से कम पीड़ादायक नहीं थी, शायद उससे भी ज़्यादा। पहले पति की मृत्यु ने उसे विधवा बना दिया, एक जवान उम्र में। फिर समाज ने उसे दूसरा विवाह करने पर मजबूर किया, एक ऐसे आदमी से, जो शराबी था, नशेड़ी था। उससे उसे चार बच्चे हुए, तीन बेटियाँ, एक बेटा। वह दिन-रात मेहनत करती, बच्चों को पालने के लिए। उसकी आँखों में अब भी वही थकान थी, जो बचपन में थी। बस फर्क इतना था कि अब वह थकान स्थायी हो चुकी थी। उसने अपनी बेटियों की शादी की, किसी तरह, उधार लेकर, मेहनत करके। लेकिन किस्मत ने वहाँ भी साथ नहीं दिया। बड़ा दामाद एक ट्रक दुर्घटना में मर गया। बेटी गर्भवती थी और अचानक विधवा हो गई।
दूसरे दामाद ने किसी और औरत को रख लिया। दोनों बेटियाँ मायके लौट आईं। सत्यार्थनी फिर से उसी चक्र में फँस गई, जहाँ वह बचपन में थी। बस अब वह खुद माँ थी।
एक दिन, अचानक, वह छत से गिर गई। लोग कहते हैं कि पैर फिसल गया। कुछ कहते हैं कि चक्कर आया। लेकिन सच्चाई क्या थी, कोई नहीं जानता। अस्पताल ले जाते समय, रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी देह सगड़ी पर रखी थी और सगड़ी सड़क पर चल रही थी। उसकी बेटियाँ रो रही थीं, ऐसे जैसे दुनिया खत्म हो गई हो। बड़ी बेटी रोते-रोते बेहोश हो गई और उसका पति, वह कहीं किनारे बैठकर शराब पी रहा था। दोपहर में उसकी चिता नहीं जली, रात में जली। जैसे उसका जीवन भी अँधेरे में बीता था, वैसे ही उसका अंत भी अँधेरे में हुआ।
तेरहवीं के कुछ महीनों बाद; उसका पति एक और औरत को घर ले आया और उसकी बेटियाँ, वे भी घर छोड़कर चली गईं। अपने-अपने प्रेमियों के साथ। शायद उन्होंने वही रास्ता चुना, जो उन्हें सबसे कम दर्द देता था। वे कभी-कभी मांडव को फोन करतीं, रोतीं, अपनी कहानी सुनातीं। मांडव चुपचाप सुनता और फिर धीरे से कहता,
“हिम्मत रखो…”, लेकिन वह जानता था, यह शब्द पर्याप्त नहीं हैं।
एक दिन, मांडव ने मुझसे पूछा, “तुम पढ़े-लिखे हो… बताओ, मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”
मैं चुप रहा।
उसने फिर कहा, “हर दिन कितनी सत्यार्थनियाँ मरती हैं… कोई उन्हें बचाता क्यों नहीं?”
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, लेकिन एक गहरा सवाल था।
मैंने बहुत सोचा, लेकिन मेरे पास कोई उत्तर नहीं था, क्योंकि यह प्रश्न केवल एक कहानी का नहीं था—
यह पूरे समाज का प्रश्न था।
★
4).
मांडव का प्रश्न हवा में तैरता नहीं था, वह भीतर उतरता था, जैसे कोई नुकीली चीज़ धीरे-धीरे दिल में धँसती चली जाए।
“तुम पढ़े-लिखे हो… बताओ, मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”
उसने यह सवाल यूँ ही नहीं पूछा था। यह प्रश्न उसके जीवन के हर मोड़ से होकर निकला था, माँ की मृत्यु, बहन का संघर्ष, अपने प्रेम का टूटना और उन असंख्य स्त्रियों का दुःख, जिन्हें उसने रास्तों, शहरों, जंगलों और गाँवों में देखा था।
मैं चुप था! मेरे पास शब्द थे किताबों के, सिद्धांतों के, विचारों के। लेकिन उसके प्रश्न के सामने वे सब हल्के लग रहे थे। मैंने उससे पूछा, “तुम्हें क्या लगता है?”
वह मुस्कराया, एक थकी हुई, लेकिन गहरी मुस्कान। “मुझे लगता है कि समस्या बाहर से ज़्यादा भीतर है…”
“कैसे?”
“जब आदमी औरत को इंसान नहीं समझता, तो कोई कानून, कोई समाज, कुछ नहीं बदल सकता…”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक अजीब दृढ़ता थी।
“हमारे घर में क्या हुआ?
माँ क्यों मरी?
दीदी क्यों मरी?
क्योंकि वे औरत थीं…
और उन्हें इंसान नहीं समझा गया…”
मैंने उसकी ओर देखा, वह अब जोगी नहीं लग रहा था, वह एक विचारक लग रहा था। गाँव में उसके आने के बाद कई दिन बीत चुके थे। लोग अब उसे “मांडव बाबा” कहने लगे थे। कुछ श्रद्धा से, कुछ जिज्ञासा से और कुछ केवल तमाशा देखने के लिए। वह रोज़ शाम को चौपाल के पास बैठता, सारंगी बजाता और अपनी कहानी के टुकड़े गाता। उसकी धुनों में अब केवल दुःख नहीं था, एक चेतावनी भी थी। लोग सुनते, कुछ समझते, कुछ नहीं।
परशुराम और दुर्वासा अब भी उसे स्वीकार नहीं कर रहे थे। लेकिन एक बदलाव आया था, अब वे खुलकर विरोध भी नहीं करते थे। शायद उन्हें डर था कि कहीं सच पूरी तरह सामने न आ जाए या शायद उन्हें भीतर से कहीं यह एहसास होने लगा था कि जिसे वे नकार रहे हैं, वह सचमुच उनका ही हिस्सा है। एक दिन, मांडव ने अचानक कहा, “मैं यहाँ ज़्यादा दिन नहीं रुकूँगा…”
मैंने पूछा,
“क्यों?”
वह बोला,
“यहाँ मेरा कुछ नहीं है…”
“पर तुम्हारी ज़मीन… तुम्हारा हक…”
वह हँस पड़ा,
“हक?
जिस घर ने मुझे बचपन में नहीं अपनाया,
उससे मैं अब क्या माँगूँ?”
उसकी हँसी में कोई कटुता नहीं थी, बस एक गहरी थकान थी।
“मैंने बहुत जगहें देखी हैं…
हर जगह एक ही कहानी है…
बस चेहरे बदल जाते हैं…”
मैंने कहा,
“फिर भी… कुछ तो बदल सकता है…”
वह कुछ देर चुप रहा,
फिर बोला,
“बदलाव तब आएगा,
जब लोग अपने घर से शुरू करेंगे…”
उसी दौरान, उसकी भांजियों का फोन आया। वे रो रही थीं, अपने जीवन की नई परेशानियाँ बता रही थीं, मांडव चुपचाप सुनता रहा। फिर उसने धीरे से कहा,
“डरना मत…
अपनी जिंदगी ख़ुद जीना…”
फोन कट गया।
उसने मेरी ओर देखा,
“देखो, ये लड़कियाँ भाग गईं…
लोग कहेंगे गलत किया…
पर मैं कहता हूँ,
उन्होंने जीने की कोशिश की…”
मैंने पहली बार उसकी आँखों में एक चमक देखी, जैसे वह दुःख के बीच भी जीवन की संभावना देख पा रहा हो। कुछ दिनों बाद, उसने एक और निर्णय लिया, वह विवाह करेगा। गाँव में यह ख़बर फैल गई, “मांडव बाबा शादी करेंगे!” लोग हैरान थे। एक जोगी, एक साधु, वह शादी क्यों करेगा?
मैंने उससे पूछा,
“तुम सच में शादी करना चाहते हो?”
उसने कहा,
“हाँ…
मैं भागते-भागते थक गया हूँ…”
“किससे?”
“खुद से…”
उसकी होने वाली पत्नी एक दिव्यांग लड़की थी, गूँगी, बहरी और पहले से एक बार विवाहिता। समाज के लिए वह “अयोग्य” थी, लेकिन मांडव के लिए वह एक इंसान थी। उसने मुझसे पूछा, “क्या मुझे उससे शादी करनी चाहिए?”
मैंने बिना झिझक कहा,
“हाँ…”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम उसके लिए एक सहारा बन सकते हो…
और वह तुम्हारे लिए एक घर…”
वह चुप रहा,
फिर धीरे से बोला,
“ठीक है…”
शादी सादगी से हुई। कोई बड़ा आयोजन नहीं, कोई शोर-शराबा नहीं। बस कुछ लोग, कुछ गवाह और दो जीवन, जो एक-दूसरे का सहारा बनने जा रहे थे।
शादी के बाद, गाँव की बूढ़ी औरतें कहने लगीं, “सत्यार्थनी का भाई सच में संत है…”
मांडव अब अपने घर में था, एक छोटे से घर में,
जहाँ शांति थी। वह अपनी पत्नी की सेवा करता,
उसे समझता, उसकी दुनिया में ख़ुद को ढालता। लोग कहते, “देखो, कैसे ख़्याल रखता है…”
और मैं सोचता,
शायद यही असली साधना है। समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। परशुराम बूढ़ा हो चुका था। दुर्वासा अब भी वही था, बस उसकी क्रूरता में अब एक थकान जुड़ गई थी। उदयन अपनी सड़कों पर था, कभी आता, कभी चला जाता। मांडव अपने छोटे-से संसार में था,
जहाँ उसे अंततः कुछ शांति मिली थी। लेकिन सत्यार्थनी, वह अब केवल एक स्मृति थी। एक ऐसी स्मृति, जो हर बार एक प्रश्न बनकर लौटती थी।
एक शाम, मैं मांडव के साथ बैठा था। सूरज डूब रहा था, आसमान लाल हो रहा था। उसने सारंगी उठाई
और एक धीमी धुन बजाने लगा। फिर उसने कहा, “तुम्हें पता है, ‘सत्यार्थिन’ का मतलब क्या होता है?”
मैंने कहा,
“जो सत्य की खोज में हो…”
वह मुस्कराया,
“हाँ…
पर कभी-कभी सत्य बहुत दर्दनाक होता है…”
“फिर भी?”
“फिर भी उसे जानना जरूरी है…”
उसने सारंगी की धुन तेज कर दी और गाने लगा,
“सत्य की राह कठिन बहुत है,
चलना है तो चलना होगा…
झूठ के साए से बाहर आकर,
ख़ुद को खुद से मिलना होगा…”
मैं उसे सुनता रहा। उसकी आवाज़ में अब कोई शिकायत नहीं थी, बस एक स्वीकार था। रात गहरा गई थी। गाँव में सन्नाटा था। मैं घर लौट रहा था, लेकिन मेरे भीतर एक हलचल थी। मांडव का प्रश्न अब भी मेरे साथ था, “मेरी बहन जैसी औरतों को कैसे बचाया जाए?”
शायद इसका उत्तर किसी एक के पास नहीं है।
शायद यह उत्तर हमें मिलकर खोजना होगा,
अपने घरों में,
अपने व्यवहार में,
अपने विचारों में,
क्योंकि जब तक घर नहीं बदलेंगे,
समाज नहीं बदलेगा,
और जब तक समाज नहीं बदलेगा,
सत्यार्थनियाँ यूँ ही मरती रहेंगी।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि यह केवल एक कहानी नहीं है। यह एक आईना है, जिसमें हम सब अपना चेहरा देख सकते हैं। प्रश्न यह है, क्या हम देखने की हिम्मत रखते हैं?
★★★
कहानीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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