Sunday, 12 April 2026

महामना रामस्वरूप वर्मा: तर्क, मानवता और सामाजिक क्रांति के जनपक्षीय स्वप्न

महामना रामस्वरूप वर्मा: तर्क, मानवता और सामाजिक क्रांति के जनपक्षीय स्वप्न

महामना रामस्वरूप वर्मा का मानना है कि जिस व्यक्ति में समानता (समता) की भावना नहीं है, वह सच्चा अच्छा इंसान नहीं हो सकता। समता के बिना सही अर्थों में समाज का निर्माण नहीं होता और जब समाज ही समतामूलक नहीं होगा, तो सच्चा लोकतंत्र (जनराज) भी स्थापित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा है, “जिसमें समता की चाह नहीं, वह बढ़िया इंसान नहीं। समता बिना समाज नहीं, बिन समाज जनराज नहीं।” अर्थात् समता ही अच्छे इंसान, आदर्श समाज और वास्तविक लोकतंत्र की मूल आधारशिला है।


भारतीय सामाजिक न्याय और समतामूलक समाज की स्थापना के इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन को अंधविश्वास, पाखंड और जातिगत असमानता के विरुद्ध संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं अग्रदूतों में 22 अगस्त 1923 को जन्मे और 19 अगस्त 1998 को इस संसार से विदा हुए महामना रामस्वरूप वर्मा का नाम अत्यंत सम्मान और गंभीरता के साथ लिया जाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जनपद के गौरी करन गाँव में एक साधारण कृषक परिवार में जन्मे वर्मा जी ने अपने जीवन के प्रारंभिक चरण से ही यह संकेत दे दिया था कि वे केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित रहने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन के वाहक बनेंगे। उनके पिता वंशगोपाल और माता सुखिया के सान्निध्य में पले-बढ़े इस प्रतिभाशाली युवक ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर तथा आगरा विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की लिखित परीक्षा भी उत्तीर्ण की, किन्तु साक्षात्कार से पूर्व ही यह निर्णय ले लिया कि वे सत्ता-प्रदत्त सुविधा के बजाय संघर्षपूर्ण सामाजिक जीवन को चुनेंगे। 

किसानी-श्रमजीवी चेतना के प्रतिबद्ध स्वर रामस्वरूप वर्मा का संपूर्ण जीवन उस वैज्ञानिक चेतना और मानवतावाद की स्थापना के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिसका सपना महात्मा बुद्ध, संत कबीर, संत रविदास, संत तुकाराम, बसवन्ना, बिरसा मुंडा, जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार, आंबेडकर और मार्क्स ने देखा था। उनके वैचारिक निर्माण में डॉ. आंबेडकर के दो प्रमुख भाषणों ने मील के पत्थर का काम किया। वर्ष 1944 में मद्रास में और फिर 1948 में लखनऊ में बाबासाहेब ने शोषितों का आह्वान किया था कि वे खुद को इस देश के भावी शासक के रूप में देखें। इसी मंत्र को रामस्वरूप वर्मा जी ने अपने जीवन का ध्येय बना लिया। शुरुआती दौर में वे प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया के बेहद करीब रहे। रामस्वरूप वर्मा एक ऐसे युगद्रष्टा नेता थे, जिनका संपूर्ण जीवन अंधविश्वास, कर्मकांड, जातिगत ऊँच-नीच और सामाजिक विषमता के विरुद्ध निरंतर संघर्ष का उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के प्रणेता, मानवतावादी दृष्टि के संवाहक और बहुजन चेतना के जागरणकर्ता थे। उनके चिंतन की जड़ें उस ऐतिहासिक क्षण में देखी जा सकती हैं जब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने यह समझ लिया कि किसी भी समाज की वास्तविक मुक्ति केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के व्यापक रूपांतरण से संभव है।

उनके वैचारिक निर्माण में 1944 और 1948 के वे ऐतिहासिक क्षण निर्णायक सिद्ध हुए, जब भीमराव आंबेडकर ने शोषित समाज को आत्मसम्मान और सत्ता-साझेदारी के लिए प्रेरित किया। इन विचारों ने रामस्वरूप वर्मा के भीतर ऐसी चेतना उत्पन्न की, जिसने उन्हें जीवन भर सामाजिक परिवर्तन के मार्ग पर अग्रसर रखा। प्रारंभिक दौर में वे राम मनोहर लोहिया के निकट सहयोगी रहे और समाजवादी आंदोलन के सक्रिय भागीदार बने। 1957 में उन्होंने कानपुर क्षेत्र से विधायक के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा आरंभ की और 1967 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में बनी उत्तर प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने बिना कोई नया कर लगाए लाभकारी बजट प्रस्तुत कर प्रशासनिक दक्षता और जनपक्षधरता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

यद्यपि समाजवादी धारा के भीतर कार्य करते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ कि केवल राजनीतिक नारे या आंशिक सुधार सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जाति-आधारित भेदभाव और ब्राह्मणवादी संरचना की जड़ता को देखते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाला कि यदि समाज के सांस्कृतिक और वैचारिक आधार में परिवर्तन नहीं किया गया, तो कोई भी राजनीतिक उपलब्धि स्थायी नहीं रह सकती। यही कारण था कि उन्होंने पारंपरिक समाजवादी ढाँचे से स्वयं को अलग करते हुए फुले-आंबेडकरवादी चिंतन को अपने जीवन का आधार बनाया।

1 जून 1968 को उन्होंने ‘अर्जक संघ’ की स्थापना कर सामाजिक क्रांति को संगठित रूप दिया। यह संगठन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि श्रम, तर्क और मानवता पर आधारित वैकल्पिक सामाजिक दृष्टि का घोष था। ‘अर्जक’ की अवधारणा के माध्यम से उन्होंने समाज को उत्पादनकारी और अप्रोडक्टिव वर्गों में विभाजित कर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि सम्मान का आधार श्रम होना चाहिए, न कि जन्म। 1969 में ‘अर्जक’ नामक पत्र का प्रकाशन इस वैचारिक अभियान को व्यापक जनसमूह तक पहुँचाने का माध्यम बना। आगे चलकर 7 अगस्त 1972 को उन्होंने अपने समकालीन सहयोगियों के साथ ‘शोषित समाज दल’ का गठन किया, जिसका उद्देश्य बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना था।

रामस्वरूप वर्मा का संघर्ष केवल वैचारिक स्तर तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सामाजिक व्यवहार में भी परिवर्तन की पहल की। उन्होंने विवाह, शोक और अन्य संस्कारों में व्याप्त आडंबरों को समाप्त कर सरल, वैज्ञानिक और समानतामूलक पद्धतियों को प्रोत्साहित किया। उनका यह प्रयास समाज में व्याप्त पुरोहितवादी वर्चस्व को चुनौती देने का एक व्यावहारिक माध्यम बना। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि समाज की प्रगति के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक सोच आवश्यक है, न कि धार्मिक आडंबर।

उनकी वैचारिक दृढ़ता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण वह संघर्ष है, जिसमें उन्होंने प्रतिबंधित किए गए आंबेडकर साहित्य की बहाली के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और उसे सफलतापूर्वक पुनः स्थापित कराया। यह केवल एक साहित्यिक विजय नहीं थी, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। उनके नेतृत्व में अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने सामाजिक असमानता को पोषित करने वाली मान्यताओं के विरुद्ध प्रतिरोध दर्ज किया, जिसने व्यापक बहुजन चेतना को जागृत किया।

रामस्वरूप वर्मा एक प्रखर लेखक भी थे। 1984 से 1993 के बीच प्रकाशित उनकी अनेक कृतियाँ—जैसे ‘मानववादी प्रश्नोत्तरी’ (1984), ‘अछूतों की समस्या और समाधान’ (1984), ‘क्रांति क्यों और कैसे?’ (1989), ‘मनुस्मृति: राष्ट्र का कलंक’ (1990) और ‘निरादर कैसे मिटे?’ (1993)—उनकी वैचारिक स्पष्टता और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं। इन रचनाओं ने बहुजन समाज को एक सशक्त वैचारिक आधार प्रदान किया और सामाजिक न्याय की दिशा में संघर्ष को नई ऊर्जा दी। उत्तर भारत की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में उन्हें वैचारिक क्रांति का पुरोधा और ‘सियासत का कबीर’ माना जाता है। 

रामस्वरूप वर्मा का जीवन यह भी सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वह है जो अपने सिद्धांतों से समझौता न करे। उन्होंने सत्ता के आकर्षण, पद के प्रलोभन और व्यक्तिगत लाभ के अवसरों को ठुकराते हुए अपने विचारों के प्रति निष्ठा बनाए रखी। उनका यह आचरण आज के राजनीतिक परिदृश्य में और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है, जहाँ सिद्धांतों की अपेक्षा अवसरवादिता अधिक दिखाई देती है। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का साक्ष्य है कि वे केवल विचारक नहीं, बल्कि उन विचारों को व्यवहार में उतारने वाले कर्मशील नेता थे। उन्होंने सत्ता, पद और व्यक्तिगत लाभ के सभी प्रलोभनों से स्वयं को दूर रखते हुए सादगीपूर्ण जीवन जिया और अंतिम समय तक समाज के लिए सक्रिय रहे। 19 अगस्त 1998 को उनके परिनिर्वाण के साथ एक युग का अंत अवश्य हुआ, किन्तु उनके विचार आज भी सामाजिक परिवर्तन की राह को आलोकित कर रहे हैं।

आज के समय में, जब समाज पुनः अंधविश्वास, विभाजन और असमानता की चुनौतियों से जूझ रहा है, रामस्वरूप वर्मा का जीवन और चिंतन एक प्रेरणास्रोत के रूप में सामने आता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वास्तविक क्रांति केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के जागरण, तर्कशीलता के विकास और मानवता की स्थापना से संभव है। यही कारण है कि वे भारतीय इतिहास में एक ऐसे विचारपुरुष के रूप में स्थापित होते हैं, जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ और अधिक गहराती जाती है।

लेखक: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/मूलनिवासी बहुजन किसान कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


No comments:

Post a Comment

महामना रामस्वरूप वर्मा: तर्क, मानवता और सामाजिक क्रांति के जनपक्षीय स्वप्न

महामना रामस्वरूप वर्मा: तर्क, मानवता और सामाजिक क्रांति के जनपक्षीय स्वप्न महामना रामस्वरूप वर्मा का मानना है कि जिस व्यक्ति में समानता (सम...