“सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।/जाके हिरदै सांच है, ताके हिरदै आप॥” अर्थात् कबीर के अनुसार सत्य ही मनुष्य का सर्वोच्च तप है और झूठ सबसे बड़ा पाप, क्योंकि सच्चे हृदय में ही ईश्वर का वास होता है। इसी भाव को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी प्रतिध्वनित करते हुए 'बाणभट्ट की आत्मकथा' में लिखा कि “सत्य के लिए किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’’ क्योंकि सत्य ही मनुष्य की सबसे बड़ी आध्यात्मिक और मानवीय शक्ति है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में संत कबीर निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी धारा के प्रमुख प्रवर्तक, धर्म-सुधारक और लोक-जागरण के महान चेतक हैं। उन्होंने अद्वैतवाद, सूफी प्रेमतत्त्व, हठयोग तथा वैष्णव भक्ति का समन्वय करते हुए सामाजिक आडंबर, जातिगत अहंकार और कर्मकांड का तीखा प्रतिरोध किया। शुक्ल जी कबीर की प्रखर प्रतिभा, तीक्ष्ण व्यंग्य, उलटबांसियों और कुछ अत्यंत मर्मस्पर्शी रूपकों की प्रशंसा करते हैं, किंतु तुलसी, सूर और जायसी की रसात्मक तथा कलात्मक परंपरा की तुलना में उनकी काव्य-सृष्टि को अपेक्षाकृत कम साहित्यिक और अधिक उपदेशप्रधान मानते हैं। उनके अनुसार कबीर की वाणी में भक्तिरस की सरसता सीमित है, भाषा कहीं-कहीं अव्यवस्थित तथा शैली फुटकल दोहों और पदों पर आधारित है; इसलिए वे कबीर को महान सामाजिक चेतना से संपन्न संत तो स्वीकार करते हैं, परंतु पूर्ण अर्थों में महाकवि नहीं मानते। इसके विपरीत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को बहुआयामी, क्रांतिकारी और गहन मानवतावादी व्यक्तित्व के रूप में देखा। द्विवेदी जी की दृष्टि में कबीर केवल संत या समाज-सुधारक नहीं, बल्कि अद्वितीय कवि, दार्शनिक और सांस्कृतिक समन्वयवादी थे। उन्होंने कबीर की भाषा, व्यंग्य-शक्ति और आध्यात्मिक चेतना को हिंदी साहित्य की अनुपम उपलब्धि मानते हुए उन्हें भारतीय चिंतन-परंपरा का स्वाभाविक और विराट विकास सिद्ध किया। इस प्रकार जहाँ शुक्ल जी की दृष्टि तुलसी-केंद्रित साहित्यिक आदर्शवाद से प्रभावित होकर अपेक्षाकृत सीमित प्रतीत होती है, वहीं द्विवेदी जी की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी दृष्टि कबीर के समग्र व्यक्तित्व को अधिक व्यापक और न्यायपूर्ण ढंग से उद्घाटित करती है।
मुझको संत कबीर की अँगुली पकड़ाने वाले लेखक हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी। अर्थात् मेरे लिए संत कबीर तक पहुँचने का प्रथम वैचारिक सेतु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी रहे। सन् 2018 में कबीर की ओर मेरी वैचारिक यात्रा का आरंभ उन्हीं की प्रसिद्ध कृति कबीर से हुआ, जिसे हिंदी साहित्य में कबीर-विमर्श की आधारशिला माना जाता है। द्विवेदी जी ने कबीर को केवल कवि, समाज-सुधारक अथवा सर्वधर्म-समन्वयकारी व्यक्तित्व के रूप में नहीं देखा, बल्कि मूलतः एक ऐसे भक्त और धर्मगुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया, जिनके अन्य सभी रूप उनकी भक्ति-साधना की अभिव्यक्तियाँ मात्र हैं। उन्होंने कबीर के बहुआयामी व्यक्तित्व, निर्गुण भक्ति, नाथपंथ और सहजमार्ग से उनके संबंध, उलटबाँसियों की आध्यात्मिक गहनता तथा उनके अक्खड़, निर्भीक और मस्तमौला स्वभाव का अत्यंत संतुलित एवं समग्र विश्लेषण किया। द्विवेदी जी किसी भी संकीर्ण वैचारिक घेरे में कबीर को बाँधने के विरोधी थे। उनकी दृष्टि में कबीर ऐसे स्वतंत्र चेतना-संपन्न संत थे, जो हिंदू होकर भी मात्र हिंदू नहीं थे और मुसलमान होकर भी केवल मुसलमान नहीं थे। उन्होंने कबीर की भाषा-सामर्थ्य को “वाणी का डिक्टेटर” कहकर उसकी अद्वितीय अभिव्यक्ति-शक्ति को रेखांकित किया तथा यह स्थापित किया कि कबीर की वाणी में आध्यात्मिक साहस, सामाजिक प्रतिरोध और मानवीय करुणा का अप्रतिम समन्वय विद्यमान है। इसी कारण द्विवेदी जी की व्याख्या कबीर को एकांगी दृष्टियों से मुक्त कर समग्र भक्त-दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करती है और आज भी कबीर-आलोचना की सबसे विश्वसनीय तथा प्रभावशाली आधारभूमि मानी जाती है।
किन्तु भारतीय समाज और साहित्य की बहुजन परंपरा में कबीर को केवल भक्त कवि के रूप में नहीं, बल्कि जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, धार्मिक पाखंड और पुरोहितवादी सत्ता के विरुद्ध एक महान विद्रोही चेतना के रूप में देखा जाता है। दलित, बहुजन और अंबेडकरवादी चिंतकों की दृष्टि में कबीर उस श्रमण-परंपरा के उत्तराधिकारी हैं, जिसने मनुष्य की गरिमा, श्रम की प्रतिष्ठा, अनुभव-आधारित ज्ञान और सामाजिक समानता को धर्म का वास्तविक आधार माना। उनकी निर्गुण भक्ति मूर्तिपूजा, वेद-पुराण आधारित आध्यात्मिक एकाधिकार और जातिगत ऊँच-नीच के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध है, जो शोषित समुदायों को प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अधिकार प्रदान करती है। “जाति न पूछो साधु की” जैसी उनकी उद्घोषणा मनुष्यता और ज्ञान को जन्माधारित श्रेष्ठता से ऊपर स्थापित करती है। यही कारण है कि बौद्ध-श्रमण परंपरा में कबीर को बहुजन मुक्ति-चेतना का अग्रदूत माना गया। अनेक चिंतक बुद्ध, कबीर और आंबेडकर को समानता, तर्कशीलता और सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक श्रृंखला के रूप में देखते हैं, जहाँ बुद्ध ने सामाजिक-आध्यात्मिक विद्रोह की नींव रखी, कबीर ने मध्यकाल में उसे लोकभाषा और निर्भीक वाणी प्रदान की और आंबेडकर ने उसे आधुनिक राजनीतिक तथा संवैधानिक संघर्ष का स्वरूप दिया। धर्मवीर जैसे विचारकों ने कबीर को दलित-बहुजन परंपरा का केंद्रीय स्तंभ मानते हुए उन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों धार्मिक रूढ़ियों से अलग स्वतंत्र जनचेतना का प्रतिनिधि बताया, जबकि कंवल भारती ने कबीर और आंबेडकर के ब्राह्मणवाद-विरोध तथा वंचितों के पक्षधर मानवीय दृष्टिकोण की समानताओं को रेखांकित किया। कबीर की वाणी में पंडित और मौलवी दोनों की आलोचना, कर्मकांड का निषेध तथा “ना हिंदू, ना मुसलमान” जैसी उद्घोषणाएँ उन्हें किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान से परे सार्वभौमिक मानवीय विद्रोह का प्रतीक बनाती हैं। बौद्ध धम्म के साथ भी उनकी वैचारिक निकटता स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि दोनों परंपराएँ तर्क, अनुभव, समानता और अंधविश्वास-विरोध पर बल देती हैं। यद्यपि कबीर स्वयं किसी संगठित धर्म के अनुयायी नहीं थे, फिर भी उनकी चेतना श्रमण, सिद्ध, सहज और लोकधर्मी परंपराओं के गहरे प्रभाव से निर्मित प्रतीत होती है। ‘मगहर’ का बौद्ध परंपरा से जुड़ा शब्दार्थ भी इस विमर्श को और अर्थपूर्ण बनाता है। पालि साहित्य की कुछ व्याख्याओं में ‘मगहर’ शब्द को ‘बौद्धों का गाँव’ अथवा बौद्ध चेतना से जुड़े स्थल के रूप में देखा गया है, जहाँ ‘मग’ का संबंध बौद्ध समुदाय या मग/बर्मा की बौद्ध परंपरा से तथा ‘हर’ का अर्थ गाँव या बस्ती से जोड़ा जाता है। संत कबीर का अपने अंतिम दिनों में मगहर जाना और वहीं निर्वाण प्राप्त करना इस स्थल को विशेष आध्यात्मिक एवं वैचारिक महत्त्व प्रदान करता है। यह भी उल्लेखनीय है कि मगहर, सारनाथ से अधिक दूर नहीं है, जहाँ गौतम बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। इसलिए अनेक बहुजन और श्रमण चिंतक कबीर के मगहर-गमन को केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी रूढ़ियों और मोक्ष-संबंधी अंधविश्वासों के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक उद्घोषणा के रूप में भी देखते हैं। ‘मगहर’ शब्द की ध्वनि और तुकांत—जैसे हर, नैहर, पीहर और शहर—भी लोकभाषा में इसकी सांस्कृतिक आत्मीयता को और गहरा करते हैं। इस प्रकार बहुजन, अंबेडकरवादी और मूलनिवासी विमर्श में कबीर केवल संत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय मुक्ति और वैचारिक प्रतिरोध की एक जीवित परंपरा हैं, जिनकी वाणी आज भी जाति-विरोधी संघर्षों और लोकतांत्रिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करती है।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता


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