Saturday, 15 August 2026

बहुजन मुक्ति का प्रश्न: जातिगत विखंडन से बौद्धिक एकता तक || अर्जक कवि गोलेन्द्र पटेल

बहुजन मुक्ति का प्रश्न: जातिगत विखंडन से बौद्धिक एकता तक
मनुवादी, सामंती, ब्राह्मणवादी और हर प्रकार की सामाजिक वर्चस्ववादी व्यवस्था ने सदियों से आर्थिक रूप से कमजोर, शैक्षणिक रूप से वंचित और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों का शोषण किया है। यह इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान में भी अनेक रूपों में दिखाई देता है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि अक्षम्य अत्याचार,  असमानता और शोषण के बावजूद SC, ST और OBC समाज के भीतर व्यापक सामाजिक चेतना, संगठन और प्रतिरोध अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है मानो समाज नींद में नहीं, बल्कि अपनी सामूहिक चेतना खोकर निष्क्रियता की स्थिति में पहुँच गया है। बहुजन समाज को इस निष्क्रियता से बाहर निकलकर शिक्षा, संगठन, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संघर्ष के माध्यम से अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी। बहुजन मुक्ति किसी एक जाति की नहीं, बल्कि सभी वंचितों की सामूहिक चेतना, एकता और न्यायपूर्ण संघर्ष से संभव होती है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता है, जब जातिगत वर्चस्व, सामंती मानसिकता और सामाजिक भेदभाव के कारण किसी SC, ST या OBC समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा या हत्या की खबर सामने न आती हो। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता और जातिगत वर्चस्व की गंभीर समस्या को उजागर करती है।

सबसे अधिक विचारणीय और चिंताजनक बात यह है कि कुर्मी समाज के लोगों पर भी लगातार हिंसा और हमले की घटनाएँ सामने आती हैं, लेकिन समाज के नाम पर नेतृत्व करने वाले अनेक नेता इन सवालों पर अपेक्षित गंभीरता, एकजुटता और सक्रियता नहीं दिखाते। जब बहुजन समाज के किसी व्यक्ति पर अत्याचार होता है, तब जाति, क्षेत्र और राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय की आवाज़ बुलंद करना आवश्यक है। बहुजन मुक्ति का अर्थ केवल अपनी जाति की चिंता करना नहीं, बल्कि हर शोषित, वंचित और पीड़ित मनुष्य के सम्मान, सुरक्षा और न्याय के लिए खड़ा होना है। इसलिए नेतृत्व का दायित्व आत्ममुग्धता नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संगठन, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष को मजबूत करना है। मुझे तो कुर्मियों पर दया आती है! मनुवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने OBC समाज में सबसे अधिक कुर्मियों को उपजातियों में बाँटकर उन्हें अपनी पूँछ बना रखा है। कुर्मियों को अपने यादव-कुशवाहा भाइयों से सीखना चाहिए कि एकता क्या होती है! कुर्मी समाज की स्थिति पर विचार करते हुए चिंता होती है कि व्यापक बहुजन समाज को जातिगत और उपजातिगत विभाजनों में बाँटने वाली सामाजिक संरचनाओं ने उसकी सामूहिक शक्ति को लंबे समय से कमजोर किया है। किसी भी वर्चस्ववादी व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि वह शोषित और वंचित समुदायों को आपस में विभाजित रखे, ताकि वे अपने साझा हितों और अधिकारों के लिए एकजुट होकर आवाज़ न उठा सकें।

कुर्मी समाज को अपने इतिहास, श्रम और सामाजिक योगदान की चेतना के साथ अपने भीतर की उपजातिगत दूरियों को कम करना चाहिए। साथ ही यादव, कुशवाहा और अन्य OBC तथा बहुजन समुदायों से भी यह सीखने की आवश्यकता है कि सामाजिक एकता, संगठन और साझा अधिकारों के लिए सामूहिक चेतना कितनी महत्वपूर्ण होती है। बहुजन एकता किसी एक जाति की श्रेष्ठता पर नहीं, बल्कि समानता, पारस्परिक सम्मान, संवैधानिक अधिकार और साझा संघर्ष पर आधारित होती है। इसलिए आवश्यकता किसी समुदाय को नीचा दिखाने की नहीं, बल्कि सभी बहुजन समुदायों को विभाजनकारी मानसिकता से ऊपर उठाकर एक-दूसरे का सहयोगी बनाने की है। SC, ST, OBC एकता ज़िंदाबाद! बहुजन समाज की वास्तविक एकता केवल नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा और संगठन से मजबूत होती है। जब तक जाति के नाम पर समाज को बाँटने वाले स्वार्थी नेतृत्व और संकीर्ण मानसिकता में बदलाव नहीं आता, और जब तक बहुजन समाज अपने अधिकारों, इतिहास तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति बौद्धिक रूप से जागरूक नहीं होता, तब तक सामाजिक परिवर्तन अधूरा रहता है। वर्चस्ववादी और शोषणकारी सामाजिक संरचनाएँ तभी कमजोर होती हैं, जब बहुजन समाज विभाजन से ऊपर उठकर समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के लिए संगठित होता है। शिक्षित बनें, संगठित हों, संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष करें—बहुजन एकता ज़िंदाबाद!

बहुजन समाज ने लंबे समय से अपने बौद्धिक चिंतकों, अर्जक कवियों, लेखकों और विचारकों को वह महत्व नहीं दिया है, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं। उसने अपने समाज के सृजनशील और वैचारिक नेतृत्व की अपेक्षा नेताओं, राजनेताओं, सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को अधिक महत्व दिया है। यही असंतुलन बहुजन समाज की वैचारिक प्रगति के मार्ग में एक बड़ी बाधा बनता है। बहुजन मुक्ति केवल सत्ता में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने से संभव नहीं होती; इसके लिए सामाजिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, वैचारिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की समझ भी आवश्यक होती है। जब तक बहुजन समाज अपने अर्जक कवियों, लेखकों, चिंतकों और ज्ञान-सृजकों को सम्मान और महत्व नहीं देता, तब तक उसकी मुक्ति का संघर्ष अधूरा रहता है। जातिगत नेतृत्व समाज को संगठित कर सकता है, लेकिन बौद्धिक चेतना समाज को दिशा देती है। इसलिए बहुजन समाज को राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ अपने बौद्धिक और सांस्कृतिक नेतृत्व को भी मजबूत करना होगा। बहुजन मुक्ति का स्थायी आधार सत्ता नहीं, बल्कि जागरूक, शिक्षित, संगठित और वैज्ञानिक चेतना से संपन्न समाज है।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन अर्जक कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

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