Saturday, 15 August 2026

कुर्मी एकता : उपजातियों से ऊपर उठने का समय || अर्जक कवि गोलेन्द्र पटेल

कुर्मी एकता : उपजातियों से ऊपर उठने का समय


“जब जनता एक हो जाती है, तब उसके सामने क्रूर से क्रूर शासन भी नहीं टिक सकता। अतः जात-पांत के ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सब एक हो जाइए।” और “आज हमें ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए, तभी हम एक उन्नत देश की कल्पना कर सकते हैं।” लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के इन विचारों पर कुर्मी समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि इन शब्दों में केवल राष्ट्र की एकता का संदेश नहीं, बल्कि सामाजिक बिखराव से बाहर निकलने की प्रेरणा भी निहित है। निःसंदेह सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय एकता के महानायक हैं। उन्होंने 562 रियासतों को भारत में एकीकृत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और बिखरी हुई राजनीतिक शक्तियों को एक राष्ट्र की भावना से जोड़ने का असाधारण कार्य किया। इसलिए कुर्मी समाज के सामने आज एक आत्ममंथन का प्रश्न खड़ा होता है। जिस महापुरुष को हम अपना महानायक मानते हैं, उनकी एकता की भावना को हम अपने सामाजिक जीवन में कितना उतारते हैं?

यह उपजातियों से ऊपर उठने का समय है। कुर्मी समाज की अनेक उपजातियाँ अपने-अपने नाम, क्षेत्र, परंपरा और स्थानीय पहचान रखती हैं। इन विविधताओं का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन विविधता तब दुर्बलता बन जाती है, जब वह आपसी श्रेष्ठता, दूरी और भेदभाव का आधार बन जाती है। यदि 500 से अधिक उपजातीय पहचानों में बँटा समाज एक-दूसरे को छोटा-बड़ा मानता रहता है, तो उसकी सामूहिक सामाजिक और राजनीतिक शक्ति स्वाभाविक रूप से कमजोर होती है। नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन संघर्ष, आकांक्षाएँ और भविष्य की चुनौतियाँ अनेक स्तरों पर साझा हैं। कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि कोई भी उपजाति अकेले इतनी बड़ी नहीं होती कि वह अपने प्रत्येक सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्न का समाधान कर सके। सामूहिक शक्ति संगठन से पैदा होती है और संगठन समानता की भावना से मजबूत होता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सी उपजाति बड़ी है और कौन-सी छोटी; सवाल यह होना चाहिए कि पूरा कुर्मी समाज कितना शिक्षित, संगठित, जागरूक, आत्मनिर्भर और न्यायप्रिय बन रहा है।

बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के कथन—“मेरे लिए मेरे व्यक्तिगत हितों से ज्यादा महत्वपूर्ण राष्ट्र हित हैं, किंतु यदि दलितों के हित और राष्ट्र-हित के बीच कोई टकराव की स्थिति आएगी, तो मैं दलितों के हित को वरीयता दूँगा।”—का प्रसंग भी यहाँ महत्त्वपूर्ण है। यह विचार हमें बताता है कि व्यापक हित की कल्पना करते समय अपने समुदाय के कमजोर और वंचित लोगों के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुर्मी एकता का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना या चुनावी शक्ति बनना नहीं है; इसका अर्थ समाज के भीतर शिक्षा, सम्मान, अवसर, समानता और न्याय को मजबूत करना भी है। कुर्मी एकता का अर्थ किसी दूसरी जाति के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। सच्ची एकता किसी के प्रति घृणा पर नहीं, बल्कि अपने समाज के भीतर समानता और पारस्परिक सहयोग पर खड़ी होती है। कुर्मी समाज यदि वास्तव में अपने महापुरुषों का सम्मान करना चाहता है, तो उसे उनके विचारों को केवल जयंतियों, मूर्तियों और नारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। विचारों का सम्मान तभी सार्थक होता है, जब वे सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनते हैं।

इसलिए उपजातीय अहंकार से ऊपर उठना होगा। विवाह, खान-पान, सामाजिक संबंध, संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे क्षेत्रों में संकीर्ण उपजातीय मानसिकता पर पुनर्विचार करना होगा। योग्य व्यक्ति को केवल उसकी उपजाति देखकर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, ईमानदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता और सामूहिक हित के प्रति उसके योगदान के आधार पर सम्मान देना होगा। तभी एक व्यापक और मजबूत कुर्मी चेतना विकसित हो सकती है। कुर्मी समाज के युवाओं की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। नई पीढ़ी यदि पुराने उपजातीय पूर्वाग्रहों को ढोती रहेगी, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी विभाजन को विरासत में पाएँगी। लेकिन यदि युवा शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और पारस्परिक सहयोग को अपना आधार बनाते हैं, तो वे समाज की दिशा बदल सकते हैं। सोशल मीडिया और आधुनिक संचार के युग में उपजातीय दीवारों को और मजबूत करने के बजाय व्यापक संवाद और सामाजिक एकता का माध्यम बनाया जाना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि कुर्मी समाज अपने भीतर यह भावना विकसित करे; उपजाति हमारी स्थानीय पहचान हो सकती है, लेकिन हमारी सामूहिक पहचान हमें बाँटने का साधन नहीं बननी चाहिए। हम अलग-अलग उपनामों और परंपराओं के साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बन सकते हैं। हम अपनी विविधता को बचाते हुए अपनी सामाजिक एकता को मजबूत कर सकते हैं।

रियासतों को जोड़ने वाले सरदार पटेल से यदि वास्तव में प्रेरणा लेनी है, तो पहले अपने भीतर खड़ी उपजातीय दीवारों को पहचानना होगा। संख्या तभी शक्ति बनती है, जब संख्या संगठन में बदलती है; संगठन तभी शक्ति बनता है, जब उसमें समानता होती है; और समानता तभी स्थायी होती है, जब उसमें शिक्षा, विवेक, न्याय और भाईचारा होता है। अब समय आ गया है कि कुर्मी समाज पूछे कि हम 500 से अधिक उपजातीय नामों में बँटे रहकर अपनी शक्ति को खंडित करते रहेंगे या अपनी विविध पहचानों का सम्मान करते हुए एक व्यापक कुर्मी एकता का निर्माण करेंगे? यदि सरदार पटेल ने सैकड़ों रियासतों को एक भारत की भावना में जोड़ने का साहस दिखाया, तो कुर्मी समाज भी अपनी उपजातीय दूरियों को कम करके एक मजबूत, शिक्षित, संगठित और न्यायप्रिय समाज का निर्माण कर सकता है। उपजातियाँ रहें, लेकिन उपजातीय विभाजन न रहे। पहचानें रहें, लेकिन पहचान के नाम पर भेदभाव न रहे। विविधता रहे, लेकिन मन में दूरी न रहे। कुर्मी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी संख्या में नहीं, उसकी एकता, शिक्षा, संगठन और सामाजिक चेतना में निहित है। वैसे, यदि आप अपने समाज के राष्ट्रसंत तुकाराम, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज और महामना रामस्वरूप वर्मा जी के विचारों को आत्मसात करेंगे, तो संकीर्ण जातीय बंधनों से मुक्त होकर समानता, विवेक, मानवता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक उदार, प्रगतिशील और संवेदनशील नागरिक के रूप में विकसित होंगे।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन अर्जक कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com

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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

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