इन दिनों
आँखें बंद होने पर
तथागत बुद्ध नज़र आ रहे हैं
और खुली होने पर
कबीर
मैं भाषा में ही नहीं
भूमि पर भी ऐसे मनुष्यों की तलाश में हूँ
जिनकी कथाएँ
मेरी अपनी जीवनगाथा-सी लगें
जिनसे मिलकर ऐसा बोध हो
मानो वे मेरे लिए
जीवित बोधिवृक्ष हों!
महराजगंज की मिट्टी में
एक दिन
एक बच्चा जन्म लेता है
किसान के घर
उस गाँव में
जहाँ सुबह
सूरज से पहले
हल जागता है
और शाम
मजदूर की हथेली पर
थककर सोती है
वही बच्चा
आगे चलकर
शब्दों का यात्री बनता है।
गाँव की पगडंडी
उनकी पहली पाठशाला है
खेत
पहला विश्वविद्यालय
मिट्टी
पहली किताब
और श्रम
पहला शिक्षक
उन्होंने
जीवन को
दूर से नहीं पढ़ा
उसे
अपने आसपास घटते देखा
किसान के माथे पर
गाँव की गलियों में
जल की कमी में
बदलते रिश्तों में
और उन आँखों में
जो कम साधनों के बावजूद
बड़े सपने देखती थीं।
फिर
गाँव की सीमा से बाहर
शिक्षा की यात्रा शुरू होती है
राजकीय इंटर कॉलेज गोरखपुर
जहाँ किताबें
उनके सामने
एक नई दुनिया खोलती हैं
फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय
समाजशास्त्र की पढ़ाई में
वे समाज को
सिर्फ विषय नहीं
जीवित मनुष्य की तरह
पढ़ते हैं।
वे समझते हैं
गाँव
सिर्फ खेत और खलिहान नहीं है
वहाँ इतिहास है
वर्ग है
जाति है
श्रम है
परंपरा है
परिवर्तन है
और सबसे बढ़कर
मनुष्य है।
फिर उनकी यात्रा
दिल्ली की ओर मुड़ती है
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
जहाँ गाँव से आया
एक जिज्ञासु मन
देश और दुनिया के
बड़े सवालों के सामने
खड़ा होता है
वहाँ वे
सिनेमा को भी
सिर्फ मनोरंजन की तरह नहीं देखते।
वे पूछते हैं
परदे पर
कौन दिखाई देता है?
कौन छूट जाता है?
किसकी कहानी
किसकी आवाज़ में कही जाती है?
इसी तलाश में
वे शोध करते हैं
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’ पर।
सिनेमा से समाज तक
समाज से मनुष्य तक
मनुष्य से उसकी स्मृति तक
उनकी दृष्टि
लगातार विस्तृत होती जाती है।
फिर
उनकी शोध-यात्रा
गाँव की ओर लौटती है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
यह केवल
एक शोध-विषय नहीं
यह उस दुनिया में
फिर से लौटना है
जहाँ से उनकी यात्रा
शुरू हुई थी
जिस गाँव को
उन्होंने बचपन में
जिया था
उसी गाँव को
वे अब
समाजशास्त्र की पैनी दृष्टि से
पढ़ते हैं।
वे देखते हैं
समय बदलता है
रास्ते बदलते हैं
रिश्ते बदलते हैं
गाँव बदलता है
लेकिन
श्रम की गंध
अब भी वही है
किसान की चिंता
अब भी वही है
मनुष्य की
बेहतर जीवन की आकांक्षा
अब भी वही है।
शिक्षा से निकला यह युवक
फिर जीवन की ओर लौटता है
अब हाथ में
सिर्फ डिग्रियाँ नहीं हैं
अनुभव है
दृष्टि है
समाज की समझ है
और उन लोगों के प्रति
एक गहरी जिम्मेदारी है
जिनके बीच से
वे आए हैं
फिर जीवन
उन्हें प्रशासन की ओर ले जाता है।
वे
उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में आते हैं
लेकिन
सरकारी पद
उनके भीतर के गाँव को
नहीं मिटाता
कुर्सी बदलती है
दृष्टि नहीं
पद बदलता है
पक्ष नहीं
वे व्यवस्था के भीतर आते हैं
लेकिन व्यवस्था के
सिर्फ अधिकारी नहीं बनते
वे उसके भीतर
मनुष्य को खोजते रहते हैं।
शायद इसी कारण
उनकी रचनाओं में
फाइलों के साथ
खेत भी आता है
कार्यालय के साथ
गाँव भी
शहर के साथ
नदी भी
और शासन के साथ
वह आदमी भी
जो हर व्यवस्था के केंद्र में
होना चाहिए।
गाँव से निकला जनपक्षधर्मी शब्द
अब राजपथ पर है
लेकिन
उसके पैरों में
अब भी पगडंडी की धूल है
उसकी आँखों में
अब भी खेत का आकाश है
उसकी स्मृति में
अब भी किसान का घर है
और उसके सृजन में
अब भी
मिट्टी की आवाज़ है
यही यात्रा
उन्हें कवि बनाती है
गाँव से विश्वविद्यालय तक
विश्वविद्यालय से शोध तक
शोध से प्रशासन तक
और प्रशासन से
फिर मनुष्य तक।
यात्रा पूरी नहीं होती
वह कविता बन जाती है
वे युग संवेदना लिखते हैं
तो लगता है
जैसे कोई नदी
अपने भीतर का इतिहास
कह रही हो
वे नदी को
सिर्फ बहता हुआ जल नहीं देखते
उसमें वे
मनुष्य का चेहरा देखते हैं
सभ्यता की स्मृति देखते हैं
गाँव की साँस देखते हैं
किसान की उम्मीद देखते हैं
और विस्थापित आदमी की
चुप्पी सुनते हैं
इसलिए
उनका पहला विश्वास
शायद यही है
‘नदियाँ बहती रहेंगी’।
यह केवल
नदी के पक्ष में कहा गया वाक्य नहीं है
यह जीवन के पक्ष में
उनका विश्वास है
वे जानते हैं
नदी को बाँधना आसान है
लेकिन
उसकी स्मृति को बाँधना कठिन
जमीन को घेरना आसान है
लेकिन
मिट्टी की गंध को
किसी कागज़ पर कैद करना कठिन
मनुष्य को विस्थापित करना आसान है
लेकिन
उसकी जड़ों को
उसके भीतर से निकाल देना
इतना आसान नहीं।
वे पूछते हैं,
“कुँवरवर्ती कैसे बहे?”
जब रास्ते
पहले ही बाँट दिए गए हों
जब किनारों पर
बाजार के पहरे हों
जब नदी से पूछा जाए
कि वह किसकी है
तब नदी
अपनी तरह
कैसे बहे?
यह प्रश्न
केवल नदी का प्रश्न नहीं है
यह उस किसान का प्रश्न है
जिसके खेत तक
पानी नहीं पहुँचता।
यह उस मजदूर का प्रश्न है
जिसके हाथों से
शहर बनता है
लेकिन शहर में
उसका अपना घर नहीं होता
यह उस स्त्री का प्रश्न है
जो रोज
जल, जंगल और जमीन के बीच
अपना जीवन ढोती है
यह उस आदमी का प्रश्न है
जो अपने ही देश में
हाशिए पर खड़ा होकर
केंद्र को देखता है।
वे जानते हैं
नदी को बचाना
सिर्फ पानी बचाना नहीं है
नदी बचती है
तो मछुआरे की नाव बचती है
किसान का खेत बचता है
गाँव की स्मृति बचती है
बच्चे का भविष्य बचता है
इसीलिए
जब वे कहते हैं,
“नदियाँ ही राह बताएँगी”
तो यह
सिर्फ एक काव्य-पंक्ति नहीं रहती।
यह समय के सामने
एक भरोसा बन जाती है
जब रास्ते बंद हों
तब नदी
रास्ता बनाती है
जब व्यवस्था
पत्थर की तरह ठहर जाए
तब नदी
चलना सिखाती है
जब मनुष्य
मनुष्य से दूर कर दिया जाए
तब नदी
दो किनारों के बीच
पुल बनती है।
वे शायद जानते हैं
सभ्यताएँ
सड़कें बनाकर नहीं
रिश्ते बचाकर
टिकती हैं
और नदी से आगे
वे हमें
नदी की तलाश में ले जाते हैं
‘नदी की तलाश में’
केवल पर्यावरण की चिंता नहीं है
यह उस मनुष्य की तलाश भी है
जो विकास के शोर में
कहीं पीछे छूट गया है।
वे पूछते हैं
क्या नदी केवल
मानचित्र पर बची रहेगी?
क्या जंगल
केवल सरकारी रिपोर्ट में
हरा रहेगा?
क्या मिट्टी
सिर्फ जमीन का दूसरा नाम है?
क्या विकास
उस घर का नाम है
जिसे बनाते-बनाते
हजारों घर उजड़ जाएँ?
उनकी दृष्टि में
पर्यावरण
पेड़-पौधों का विषय भर नहीं है।
वह मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न है
जल है, तो जीवन है
जंगल है, तो साँस है
मिट्टी है, तो अन्न है
और मनुष्य है, तो इन सबका अर्थ है।
वे श्रम को
दूर से नहीं देखते
श्रम
उनकी कविता में
पसीने की तरह आता है
किसान की हथेली पर
मजदूर के कंधे पर
रिक्शे के पहिए में
ईंट ढोती स्त्री की देहभाषा में
खेत की मेड़ पर
वे श्रम की कविता पढ़ते हैं।
उन्हें मालूम है
देश
सिर्फ भाषणों से नहीं बनता
देश बनता है
उन हाथों से
जिन पर
अक्सर इतिहास की रोशनी
नहीं पड़ती
वे उन्हीं हाथों की तरफ
अपनी कविता मोड़ते हैं
उनकी दृष्टि
सिर्फ कविता तक सीमित नहीं है।
उन्होंने
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
पर एम.फिल. के माध्यम से
सिनेमा और समाज के रिश्ते को
गहराई से देखा है
उन्होंने
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
पर पीएचडी के माध्यम से
गाँव को
सिर्फ स्मृति नहीं
बल्कि बदलती हुई
सामाजिक संरचना के रूप में पढ़ा है
इसलिए
जब वे गाँव लिखते हैं
तो उसमें
सिर्फ हरियाली नहीं होती
वहाँ
जाति भी होती है
वर्ग भी होता है
श्रम भी होता है
विस्थापन भी होता है
परिवर्तन भी होता है
और संघर्ष भी।
वे गाँव को
रोमांस नहीं बनाते
वे गाँव को
उसकी पूरी जटिलता में
देखते हैं
फिर वे
सिनेमा के सामने बैठते हैं
परदे पर
कहानी चलती है
लोग
हँसते हैं
रोते हैं
तालियाँ बजाते हैं
लेकिन वे
सिर्फ कहानी नहीं देखते
वे देखते हैं
किसकी आवाज़
परदे पर आई?
किसकी आवाज़
काट दी गई?
कौन नायक बना?
कौन भीड़ में
खड़ा रह गया?
किसका सपना
सिनेमा ने अपना लिया?
और किसका जीवन
पर्दे के बाहर
छूट गया?
इसीलिए
उनकी दृष्टि में
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
दरअसल
समाज को पढ़ना भी है
परदा
उनके लिए
आईना है
और आईने में
वे चेहरा ही नहीं
उसके पीछे खड़ी
पूरी व्यवस्था देखते हैं
फिर वे
‘चिलम चौक का बादशाह’
रचते हैं।
एक चौक
कुछ चेहरे
कुछ छोटे-छोटे सपने
कुछ बड़ी-बड़ी आकांक्षाएँ
थोड़ी हँसी
थोड़ी धूल
थोड़ा संघर्ष
और
पूरा जीवन।
वे जानते हैं
इतिहास
सिर्फ राजमहलों में नहीं बनता
इतिहास
चौराहों पर भी बनता है
चाय की दुकानों पर
रिक्शों की घंटियों में
बाजार की आवाज़ों में
मजदूर के पसीने में
और उस आदमी की आँख में
जो रोज
एक बेहतर दिन की उम्मीद लेकर
घर से निकलता है।
उनकी रचनात्मक दुनिया में
कहानी भी है
जीवन की ऐसी छोटी-छोटी कथाएँ
जिनमें बड़ी दुनिया
अपना चेहरा दिखाती है
एक बिवाई
सिर्फ फटी हुई त्वचा नहीं रहती
वह श्रम का इतिहास बन जाती है
एक बूढ़ी आवाज़
सिर्फ आवाज़ नहीं रहती
वह बीते समय की गवाही बन जाती है।
एक बच्चा
सिर्फ बच्चा नहीं रहता
वह आने वाले समय की
सबसे बड़ी संभावना बन जाता है
वे छोटी चीजों में
बड़ी मनुष्यता खोजते हैं
उनकी कविता
अंधविश्वास से सवाल करती है
रूढ़ियों को चुनौती देती है
पाखंड का चेहरा पहचानती है
लेकिन उनका प्रतिरोध
मनुष्य से घृणा नहीं करता
वह मनुष्य को
और अधिक मनुष्य बनाने की
कोशिश करता है
इसीलिए
उनकी कविता में
क्रोध के साथ
करुणा है
प्रतिरोध के साथ
प्रेम है
व्यंग्य के साथ
आत्मीयता है
और संघर्ष के बीच
एक गहरी उम्मीद।
उनकी कविता में
नदी है
पर नदी अकेली नहीं
उसके साथ
मछलियाँ हैं
पेड़ हैं
पक्षी हैं
पहाड़ हैं
किसान हैं
मजदूर हैं
बच्चे हैं
स्त्रियाँ हैं
और वह पूरा लोक है
जिसे सभ्यता
अक्सर अपने विकास की
फुटनोट बना देती है।
वे उस फुटनोट को
मुख्य पाठ में ले आते हैं
वे कहते हैं
देखिए
जिसे आप हाशिया कहते हैं
वहीं से
केंद्र की असली कहानी
दिखाई देती है
कभी
बाढ़ आती है
लोग डूबते हैं
घर डूबते हैं
फसल डूबती है
लेकिन
भाषण नहीं डूबता
मंच सुरक्षित रहता है
माइक सुरक्षित रहता है
आश्वासन सुरक्षित रहता है
डूबता है, तो सिर्फ आदमी।
वे इस दृश्य को देखते हैं
और उनकी कविता
व्यंग्य में बदल जाती है
वे जानते हैं
व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना
यह नहीं कि वह
झूठ बोलती है
विडंबना यह है कि
वह झूठ बोलते समय भी
सच का मंच सजाती है
लेकिन
उनकी कविता केवल
व्यवस्था से लड़ती नहीं
वह जीवन को
बचाती भी है
एक पिता और बेटी के बीच
बचा हुआ स्पर्श
एक अजनबी में
जन्म लेती आत्मीयता
एक किसान की आँख में
बचा हुआ विश्वास
एक नदी में
बचा हुआ संगीत
एक बच्चे के हाथ में
खुली हुई किताब।
वे जानते हैं
दुनिया को बदलना है
तो पहले
मनुष्य के भीतर
मनुष्य को बचाना होगा
इसलिए
उनकी आठ दिशाएँ
अलग-अलग नहीं हैं
‘नदियाँ बहती रहेंगी’
जीवन का विश्वास है
‘कुँवरवर्ती कैसे बहे’
व्यवस्था से पूछा गया सवाल है
‘नदियाँ ही राह बताएँगी’
भविष्य पर रखा गया भरोसा है
‘नदी की तलाश में’
प्रकृति और मनुष्य की खोज है
‘प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण’
समाज और सिनेमा के रिश्ते को पढ़ने की दृष्टि है
‘ग्रामीण सामाजिक संरचना में निरन्तरता और परिवर्तन’
गाँव के भीतर बदलती दुनिया की पड़ताल है
‘सिनेमा को पढ़ते हुए’
परदे के पीछे छिपे समाज को देखने की आँख है
और
‘चिलम चौक का बादशाह’
लोकजीवन के छोटे-से चौक में
बड़ी दुनिया खोज लेने की
रचनात्मक क्षमता है।
इन सबके बीच
एक ही धारा बहती है
मानवता की
इसलिए
डॉ. राकेश कबीर को
केवल नदी का कवि कहना
उनकी कविता को छोटा करना है
वे नदी के माध्यम से
मनुष्य को पढ़ते हैं
वे मिट्टी के माध्यम से
इतिहास पढ़ते हैं
वे श्रम के माध्यम से
समाज पढ़ते हैं
वे सिनेमा के माध्यम से
समय पढ़ते हैं
वे गाँव के माध्यम से
भारत पढ़ते हैं
और कविता के माध्यम से
वे पूछते हैं
क्या हम अब भी
मनुष्य हैं?
अगर हैं
तो नदी को
बहने दीजिए
जंगल को
साँस लेने दीजिए
मिट्टी को
अन्न उगाने दीजिए
किसान को
अपने खेत में रहने दीजिए
मजदूर को
अपने श्रम का सम्मान दीजिए
बच्चे को
उसका भविष्य दीजिए
और कविता को
सच बोलने दीजिए।
क्योंकि वे जानते हैं
नदियाँ रुकेंगी
तो सभ्यता सूखेगी
श्रम रुकेगा
तो देश रुकेगा
सवाल रुकेंगे
तो लोकतंत्र रुकेगा
प्रेम रुकेगा
तो मनुष्य रुकेगा
और जिस दिन
मनुष्य रुक जाएगा
उस दिन
कविता के पास
कहने को कुछ नहीं बचेगा
इसलिए
वे नदी के पक्ष में खड़े हैं
और नदी के पक्ष में खड़ा होना
दरअसल
मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है।
उनकी मानवीय दृष्टि
यही कहती है
नदी बचेगी
तो स्मृति बचेगी
मिट्टी बचेगी
तो रोटी बचेगी
श्रम बचेगा
तो समाज बचेगा
प्रेम बचेगा
तो मनुष्य बचेगा
और मनुष्य बचेगा
तो कविता बहती रहेगी
और हमें याद रहेगा
इस धरती पर
अप्रैल में
एक और स्वर ने जन्म लिया है—
राकेश कबीर
अशोक की करुणा
फुले की शिक्षा
आंबेडकर का समता-संकल्प
राहुल का तर्क-विज्ञान
इन धाराओं की स्मृति लिए
वे कहते हैं
मनुष्य ही केंद्र है
समानता ही मंजिल
और संघर्ष ही
परिवर्तन का रास्ता।
★★★
रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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