[तस्वीर साभार: फेसबुक]
सोनम वांगचुक के लड़ाई खाली एगो आदमी, एगो इलाका कऽ कवनो राजनीतिक दल के लड़ाई नइखे। ई लड़ाई पढ़ाई पर भरोसा, लोकतंत्र में बातचीत आ जनता के हक के बचावे खातिर बा। ऊ कहत बाड़ें कि अगर पढ़ाई में ईमानदारी, योग्यता आ पारदर्शिता ना रही, त सबसे बेसी नुकसान ओह लाखन लइका-लइकी के होई जे अपना मेहनत के भरोसे जिनगी बदले के सपना देखत बा। पेपर लीक, नकल आ परीक्षा में धांधली खाली सरकारी कमी ना ह, ई गरीब किसान, मजूर, रिक्शा चलावे वाला, छोट दुकानदार जइसन लोगन के ओह आस पर चोट ह, जवन आस लेके ऊ अपना बेटा-बेटी के पढ़ावेला। पढ़ाई तबहिए बराबरी के राह बन सकेला, जब सभे के एके जइसन मौका मिले आ सफलता के आधार खाली मेहनत आ काबिलियत होखे। सोनम वांगचुक के आंदोलन ई भी याद दिलावेला कि लोकतंत्र के जान बातचीत में बसल बा, चुप्पी में ना। असहमति हो सकेला, बाकिर आवाज के अनसुना कर देहल लोकतंत्र खातिर ठीक नइखे। असली लोकतंत्र ऊ ह, जहाँ सवाल सुने के, समझे के आ जवाब देवे के हिम्मत होखे। आज जरूरत खाली सोनम वांगचुक के साथ देवे के नइखे, बलुक ओह सोच के साथ खड़ा होखे के बा, जे पढ़ाई के न्याय, बराबरी आ समाज बदले के सबसे मजबूत जरिया मानेला। अगर लोगन के पढ़ाई पर से भरोसा उठ गइल, त गरीब परिवारन के सपना आ लोकतंत्र दुनो कमजोर पड़ जइहें। एही से सोनम वांगचुक के संदेश साफ बा देश के भविष्य खाली नारा से ना बची, बल्कि ईमानदार पढ़ाई, जवाबदेह शासन आ जागरूक नागरिक से बची। एहिए में लोकतंत्र के असली ताकत बसल बा। "मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर" जंतर-मंतर पर जनहित खातिर लड़त-जूझत जनचेतना के समर्पित बा।
मौन के विरुद्ध मद्धिम सुर : गोलेन्द्र पटेल
1). ज्ञान के उपवास
हिमगिरि के अँचरा सँ, उठल एक अरदास।
पढ़ई बाँचल रहय कहे, सोनम के विश्वास।
रिकसा, खेत, मजूर घर, सबकर एके आस।
मेहनत लिखी तकदीर हो, ना धन के निवास।
लीकल परचा फोरि दे, टूटल लाखन नेह।
रोवत बिटिया, रोवत पूत, सूखत भीतर सेह।
भूख न पेटे मात्र के, भूख भरोसा होय।
विद्या-माई रोवत फिरै, सुनय न कोऊ कोय।
कितबन में उजियार बा, साँच करै पहचान।
झूठ कमाई हारिहै, जीतिहै विद्यान।
जाति-पाँति सब दूर कर, देहु बराबर मान।
मेहनत के फल पाइहैं, गाँव-नगर इंसान।
जियत रहय विश्वास ई, बुझै न ज्ञानक जोत।
लोक कहय शिक्षा बची, तब बचिहैं सब ओत।
2). आखर के आस
किसनवा के बेटवा कहै पढ़ि बनब इंजीनियर।
रिकसा खींचे बाप कहै बिटिया बन अफसर।
दूकनिया के नन्हक लाल, देखै सपन अपार।
गुरु-गिरिहा के नेह पर, टिकले संसार।
जे दिन बिकिहैं प्रश्न सब, बिकिहैं सब सम्मान।
ओहि दिन रोई जायिहै, भारत के पहचान।
आखर मंदिर ढहि गइल, टूटल जन विश्वास।
तबहुँ चिरैयाँ गीत गवै आइत नयका भोरास।
परचा लीके रोपि के, फल ना होय महान।
ईमाने के खेत में, उपजै साँच किसान।
बालक मन में दीप धर, सीखै सोच-विचार।
रटला से ना होइहैं, जीवन के उद्धार।
लोक-जुबानी गूँज उठे राखऽ शिक्षा लाज।
न्याय-धरम के राह पर, चलै देश समाज।
3). लोकतंत्र के खामोसी
जंतर-मंतर धूप में, सूखत देह अकुलाय।
लोकतंतर के कान पर, मौनक ताला छाय।
कागज रोवे, किताब रोय, रोवय बालक आस।
लीकल परचा लूटि ले, मेहनत के विश्वास।
हिमगिरि से उठल पुकार, पहुँचल गंगा तीर।
साँच बचावऽ, ज्ञान बचावऽ, जागऽ देश अधीर।
राज-दुअरिया भीतरे, सन्नाटा के राज।
बाहर जनमन पूछतै कब सुनब आवाज?
मौन अगर सिंहासनन, बनि जावै पहचान।
सूखि जाई लोकतंत्र, रोवै हिन्दुस्तान।
संवादे से जीत है, बैर न देई फल।
बात सुनै जब राज तब, हरसै जन-आँचल।
लोकभाखा कहि उठी खोलऽ मन के द्वार।
साँच, करुणा, न्याय से, उजियारै संसार।
4). अकेल्ला मनई कब्बो अकेल्ला नइखे
अकेल्ला चलि राह पर, लागै जइसे एक।
पाछे लाखन नेह के, जगमग करत विवेक।
हाथ खाली हो सकैं, मनवा रहे अडिगाय।
साँचे के संग चलत जे, ऊ कब हारि न जाय।
गिरि-पहाड़ से गाम तक, गूँजै ओकर बोल।
बिटिया, किसान, मजूर सब, जोड़ैं अपना मोल।
दीया जरै अँधियार में, काँपत रहै लुआर।
एक किरिन से फूटि पड़ै, भोरक अपरंपार।
एक जनम के सत्य से, जागै लाखन प्रान।
बूँद-बूँद मिलि धार बनै, बदले सगर जहान।
संग चले विश्वास जब, टूटै भय के जाल।
छोटक पग से बनि उठै, जन-आंदोलन चाल।
लोक कहै मुसकाइ के, मत मानऽ खुद अकेल।
साँच संगतिया बनि रहै, जन-जन तोहर मेल।
5). आखर के भरोसा
गाम-गिरांव के बाट पर, जगल पढ़ाई आस।
रिकसा, हल अउ खेत से, उठल नयन विश्वास।
माय कहय पढ़ बेटवा, बदलिहे दिन-भाग।
बाबू पोंछैं पसीनवा, मन में नयका राग।
लीकल परचा, झूठ धन, काटै सपना-मूल।
मेहनत वाली जिनगिया, काहे झेले शूल।
एक मनई डटल अइँठ, आखर खातिर आज।
ओकर भूख न पेट के, ज्ञान-धरम के लाज।
साँच परीक्षा बचि रहै, तब बचिहैं अरमान।
गरीबन के अँगना खिलै, पढ़ल-लिखल बिहान।
बोलऽ, सुनऽ, समझऽ सबै, टूटै मन के फाट।
संवादन के सेतु पर, मिलै जनम के ठाठ।
लोक कहै मिलि एक सुर, राखऽ विद्या मान।
आखर बचिहैं तभिएँ बची, धरती अउ इंसान।
6). जागऽ रे जनमन
सुतल परल जन-चेतना, बजल न अंतर-घंट।
आखर रोवत दुआर पर, टूटत सपना-कंठ।
हाट-बजार चकाचकैं, बिकत नयन-उजियार।
साँच दबावल जाय है, झूठ करै व्यापार।
लइका पूछै गुरु सों, कइसन होई राह?
मेहनत जीतै कि फेर धन, लिखिहै सबके चाह?
हिमगिरि से उठल पुकार, गूँजल देस-दुआर।
पढ़ई बचा, विश्वास बचा, बोलै बारंबार।
जागत जन से जागिहै, लोकतंत्र के प्रान।
मिलि-जुलि राखऽ ज्ञान पर, अटूट भरोसा-थान।
द्वेष न बोवऽ खेत में, बोवऽ नेह विचार।
साँच-करुणा के जल बिना, सूखै हर संसार।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनुआ आज।
विद्या, श्रम अउ न्याय से, सजिहै देस समाज।
7). समता के मशाल
मजदूरन के हथवा में, धरती के इतिहास।
दलित, किसान, बहुजनन के, अँखियन जीवत आस।
बाबा के किताब कहै पढ़, संगठित, संघर्ष।
मेहनत के अधिकार बिना, सूखै जन के हर्ष।
मारकस के सुर बोलतैं श्रम के देहु सम्मान।
रोटी, विद्या, मान बराबर, एही साँच विधान।
जाति-जंजीर टूटि पड़ै, टूटै लोभक राज।
आखर बनि हथियार तब, जगमग होय समाज।
जाति अउ पूँजी मिलि जदि, करैं जनम पर चोट।
समता, श्रम अउ ज्ञान से, टूटै अन्याय-कोट।
विद्या सबके हक रहे, ई धरती के नेम।
ऊँच-नीच के भेद बिन, चमकै जन के प्रेम।
लोकभाखा गावत कहै उठऽ मनई निर्भीक।
समता, बंधुता, न्याय से, लिखऽ नयका इतिहास-लीक।
8). बिटिया के आखर
माय कहय जा बिटिया, पढ़ि लिखि छूअऽ गगन।
टूटैं दे अब बंधन सब, खुलैं नयका भवन।
घूँघट, देहरी, डर-डगर, रोके कतना बेर।
आखर बनि पंखवा उठल, उड़ि गइल अँधेर।
रिकसा वाली माय के, अँखियन बसल उजास।
हमर लइकी अफसर बनै, ई हौ जिनगी आस।
पढ़ई नारी के हक हउ, दान न काहू केर।
समता के ई जोतिया, उजियारै घर-डेर।
बिटिया पढ़ली त गाँव के, खुलिहैं लाखे द्वार।
ज्ञान-जोत से मिटि जइहैं, भय, बंधन, अँधियार।
आधा गगन नापे बिना, पूरा कहाँ समाज?
नारी संग बराबर चले, तबे खिले सुराज।
लोकभाखा कहि उठी, बेटी धरती मान।
ओकर सपना बाँचि के, बाँचै हिन्दुस्तान।
9). जिंदा रहऽ लड़ाई खातिर
आँधी झकझोरै डारि, जड़ मत छोड़ऽ मीत।
जियत रहब त देखबें, फिनु उगिहैं नव प्रीत।
सूखल देह भले रहै, हिम्मत रहै अडिगाय।
दीया जइसन लोरि में, जोति न कबहुँ बुझाय।
इतिहासन के पन्नवा, साँसन से लिखलाय।
सपना जिन्दा राखिहऽ, तबे भोर मुस्काय।
अँधियरा लाखन घेरि ले, मन न हारऽ आज।
धरती माँ के कोख में, पलत नया समाज।
जीवन सबसे मूल धन, राखऽ एकर मान।
जियत रहब त जीतिहैं, साँच-नेह अभियान।
संवादन के राह से, बदलै जग के चाल।
क्रोध नय, धीरज बने, जन-मन के ढाल।
लोक कहै संघर्ष के, एही साँच विधान।
जिंदा रहि के जीतिहऽ, राखऽ आपन प्रान।
10). आखर जीतिहैं
बर्फीला पहाड़ सों, उठल जनक आवाज।
गाम-नगर सब पूछतैं कब मिलिहै सुराज?
विद्या मंदिर रोवतै, टूटत जन विश्वास।
साँच परीक्षा माँगतै, भारत के हर साँस।
दलित, किसान, मजदूर सब, जोरल एके डोर।
बिटिया, लइका, गुरु कहैं खोलऽ न्यायक भोर।
एक अकेल्ला दीप सों, लाखन बाती जाग।
साँच, समता, नेह के, फइलल दूर सुहाग।
जाति-धरम के भेद से, ऊँच न होई देस।
मेहनत, विद्या, न्याय से, खिलिहैं नयका केस।
लोकतंत्र तब फूलिहै, जब सुनि लेई बात।
जनमन के विश्वास से, बनिहै नयकी जात।
लोकभाखा असीस दे रहऽ अडिग इंसान।
आखर, श्रम अउ सत्य से, अमर रहै पहिचान।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता


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