इस देश में
जब एक नक्सली भरत तिवारी
पुलिस पर बंदूक तानकर
भगत सिंह या चंद्रशेखर आज़ाद हो सकता है
तो एक लक्ष्मण जैसा भाई राहुल चौधरी
अपने भाई का बदला लेकर
सुभाष चंद्र बोस या उधम सिंह
क्यों नहीं हो सकता?
सवाल किसी हत्या को सही ठहराने का नहीं
सवाल उस दोहरे मापदंड का है
जहाँ हिंसा के अलग-अलग चेहरों के लिए
अलग-अलग शब्द गढ़े जाते हैं।
सुप्रिया की हत्या हुई
सवाल खड़ा रहा
हेमंत का लहू बहा
सवाल खड़ा रहा
कर्तव्य मारा गया
सवाल खड़ा रहा
अरुण की साँस रुकी
सवाल खड़ा रहा
केसपाल की हत्या हुई
सवाल खड़ा रहा।
कालीशंकर चला गया
प्रदीप चला गया
आदेश की भी साँस थम गई
मगर हर बार
एक ही सवाल
फाइलों के नीचे दबा रहा
हत्यारों पर NSA कहाँ था?
न्याय का वह कठोर हाथ
तब कहाँ था?
और जब
पुरानी रंजिश की आग में
एक और हत्या का आरोप सामने आया
तो कानून की पूरी ताकत
एक परिवार के दरवाजे पर आ गई
मैं हत्या का समर्थन नहीं करता
क्योंकि हत्या
न्याय का विकल्प नहीं है
पर मैं यह भी पूछता हूँ
न्याय समय पर क्यों नहीं मिलता?
शिकायत की आवाज
कब तक दीवारों से टकराती है?
कानून की आँख
हर नागरिक के लिए
एक जैसी क्यों नहीं होती?
यदि अपराध हुआ है
कानून अपना काम करे
मगर कानून
प्रतिशोध का दूसरा नाम न बने।
दोषी को सजा मिले
निर्दोष न कुचला जाए
आरोप हो तो निष्पक्ष जाँच हो
सत्ता का डंडा
जाति देखकर न उठे
और न जाति देखकर झुके
क्यों किसी की हत्या पर
सन्नाटा लंबा होता है
और किसी दूसरी घटना पर
राज्य की पूरी शक्ति
तुरंत जाग जाती है?
क्यों किसी परिवार का दर्द
समाचार बनकर रह जाता है
और किसी परिवार पर
कानूनी धाराओं की आँधी टूट पड़ती है?
यही तो सवाल है
दोहरा मापदंड बंद करो!
पटेल हो, चौधरी हो, यादव हो, तिवारी हो
या कोई और नाम
खून का रंग एक है
संविधान का अधिकार एक है
न्याय का तराजू एक होना चाहिए
किसी राहुल को
नायक बनाकर हत्या का महिमामंडन मत करो
लेकिन किसी राहुल को
न्याय से वंचित करके
हिंसा की राह पर धकेलने वाली
व्यवस्था से भी सवाल करो।
क्योंकि
जब न्याय देर करता है
तो समाज में
अविश्वास जन्म लेता है
और जब कानून
समान नहीं दिखता
तो व्यवस्था की नींव
कमजोर होती है
हमें बदला नहीं
न्याय चाहिए
हमें हिंसा नहीं
निष्पक्ष कानून चाहिए।
हमें किसी जाति के लिए
विशेष कृपा नहीं
हर नागरिक के लिए समान अधिकार चाहिए
और सत्ता से हमारा प्रश्न
आज भी वही है
कितने घर उजड़ेंगे
तब तुम्हें आँकड़े दिखाई देंगे?
कितने परिवार रोएँगे
तब तुम्हें न्याय याद आएगा?
कितनी बार कानून
अलग-अलग तराजुओं में तौला जाएगा?
अब सवाल दबेगा नहीं
अब आवाज रुकेगी नहीं
दोहरा मापदंड बंद करो!
कानून को निष्पक्ष करो!
न्याय को समान करो!
पटेल समाज पूछता है
हमारा न्याय कहाँ है?
कुर्मी समाज पूछता है
हमारे अधिकार कहाँ हैं?
और संविधान पूछता है
क्या न्याय सबके लिए बराबर है?
उत्तर देना होगा
क्योंकि लोकतंत्र में
किसी की हत्या का बदला
दूसरी हत्या नहीं होती
लोकतंत्र का असली उत्तर
निष्पक्ष न्याय होता है
दोहरा मापदंड बंद करो
न्याय का तराजू बराबर करो
मानव-मानव एकसमान।
★★★
रचनाकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com
***
हेमंत पटेल (वाराणसी),
कर्तव्य पटेल (बदायूं),
अरुण पटेल (प्रयागराज),
केसपाल पटेल (फतेहपुर),
कालीशंकर उत्तम पटेल (जहानाबाद),
सुप्रिया पटेल (अयोध्या),
अंशिका वर्मा (सुल्तानपुर),
प्रदीप पटेल (मिर्जापुर),
आदेश चौधरी (गोरखपुर)… इत्यादि की हत्या पर मौन कौन थे?
शेष बातें निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है:-

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