2).
" ओ मेरे भावी हृदय सुन..."
दे रहा हूँ रौशनी मैं जल रहा हूँ दीप होकर
प्राण मेरे हैं तुम्हारे खो रहा हूँ मीत होकर
स्मरण होता तुम्हें हो नाम मेरा गर कभी जो
धन्य होकर ही रहूँगा आस मेरी है अभी तो
मैं अकेला फिऱ रहा हूँ जोगि बन नदियों किनारे
हूँ खड़ा मैं राह तकता आस में केवल तुम्हारे
प्राण मुझमें शेष जब तक देखता हूँ राह तेरी
हलचलें मुझमें अभी हैं कह रही है आह मेरी
रेत ज्यों तन हो गया है प्रीत बनकर रह गया हूँ
मैं दिवस को पार करके रात्रि के संग आ गया हूँ
हूँ अकेला तो हुआ क्या काल से मैं लड़ पड़ा हूँ
आ रही है सांध्य बेला मैं अकेला ही खड़ा हूँ
रात्रि का भय नहीं मुझे है और न भय रात्रिचर का
जिस तरह मैं जी रहा हूँ भय नहीं मुझको मरण का
हाँ, रार मैंने ठान ली है गांठ मैंने बाँध ली है
ले करों में प्राण फ़िरता मृत्यु मैंने मान ली है
भय मुझे बस एक ही है वो मेरे संग रो रहा है
अस्त होने को हुआ मैं क्या मुझे वो खो रहा है
कल जहां तुम ख़ोजते थे मैं वहीं पर आ गया हूँ
देख लो खुलकर प्रणय को मैं दिखाने आ गया हूँ
मैं धरा को निज पगों से नापता फ़िरता चला हूँ
देख ली मैंने कसक है मैं यहाँ जलता रहा हूँ
अन्य के होंगे चरण वे जो यहाँ आकर थमे हैं
हो गए पाषाण सम जो जो यहाँ आकर बँधे हैं
मैं नदी के वेग सा हूँ हाँ, सदा बहता चला हूँ
धार के शाश्वत क्रमों में हो लहर लहरा चला हूँ
उस नदी का छोर पाकर हर क़दम बढ़ता गया हूँ
क्या ग़लत और क्या सही है छोड़ सब चलता गया हूँ
चल रही हों आँधियाँ भी मेघ गर्जन कर रहे हों
पूर्ण क्षमता से स्वयं को वो उपस्थित कर रहे हों
ढक लिया हो पूर्ण नभ को स्याह छाया ने भले ही
कांपती धरती धमा-धम सिंधु के पैरों तले ही
आ रही हो यामिनी भी निज प्रबलता साथ लेकर
भर रही हुंकार स्वयम में तीव्र मद का नाद लेकर
हस्तियों के पद चलन से धमधमाती यह धरा हो
मच रहा कंपन जगत में सिंह गर्जन कर रहा हो
क्रुद्ध निज में हो समय भी देखकर परिधान सारा
अंत होने को हुआ अब नियति का व्यवधान सारा
मिल रहा हो शून्य में सब मौन धारा बह रही हो
और नीरव छा रहा हो जीव की रुकती गति हो
किन्तु फ़िर भी तन तना है शक्ति से पूरा गुंथा हूँ
इस तरह कुछ और भी हो झेल लूँगा मैं खड़ा हूँ
और मेरे हृदय मणि में श्रोत अक्षय बह रहा है
द्वन्द्व करता मैं चलूँगा निज सभी से कह रहा है
पांव मेरे नहीं थमेंगे मार्ग पर बढ़ते चलेंगे
तू गरजता ही भले हो ये गरजते भी चलेंगे
सांस का क्रम नहीं रुकेगा न रुकेगी गति हृदय की
आत्म मेरा कह रहा है हार होगी ही समय की
वर्ष कितने बीत जाएं शूल कितने ही सताएं
शोध मेरा शेष जब तक क्यों बंधूँ नित फ़ाश आएं
ओ मेरे भावी हृदय सुन हो जहाँ तुम मैं नहीं हूँ
किन्तु मैं आ ही गया हूँ तुम जहाँ थे मैं वहीं हूँ
एक अंतर शेष हमारे है उपस्थित मध्य होकर
कर रहा व्याकुल मुझे है सालता है मर्म होकर
©अभिषेक कुमार वर्मा
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