Sunday, 13 September 2026

लोकतंत्र में हिंदी का लोक और लोक की हिंदी (भाषा, जनचेतना और सामाजिक न्याय की पड़ताल) — गोलेन्द्र पटेल

लोकतंत्र में हिंदी का लोक और लोक की हिंदी
(भाषा, जनचेतना और सामाजिक न्याय की पड़ताल)

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। यह भारतीय भाषिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण संवैधानिक घटना थी। किंतु राष्ट्रीय हिंदी दिवस को केवल हिंदी की स्तुति, समारोह और औपचारिक संकल्पों तक सीमित कर देना हिंदी के वास्तविक अर्थ को छोटा करना होगा। यह दिन भाषा के बहाने मनुष्य, समाज, लोकतंत्र, ज्ञान, सत्ता, रोजगार और सामाजिक न्याय के प्रश्नों से मुठभेड़ का अवसर है। यह संवैधानिक तथ्य भी स्मरणीय है कि हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं, ‘संघ की राजभाषा’ का स्थान प्राप्त है। भारत की कोई संवैधानिक राष्ट्रभाषा नहीं है। यह अंतर भारतीय बहुलता और संघीय लोकतंत्र की आत्मा को समझने की कुंजी है। हिंदी का इतिहास किसी एक दिन या संस्था से आरंभ नहीं होता। उसकी जड़ें लोकजीवन, बोलियों, यात्राओं, बाजारों, खेतों, श्रम, लोकगीतों और संतवाणी में गहरी हैं। विद्यापति का उद्घोष “देसिल बअना सब जन मिट्ठा” अपनी धरती और अपने लोगों से निकली भाषा की आत्मीयता को व्यक्त करता है। भाषा की पहली शक्ति उसके राजकीय पद में नहीं, उसके लोक-संबंध में होती है। कबीर ने इसी लोकधर्मी प्रवाह को कहा, “भाखा बहता नीर।” उनके लिए भाषा पांडित्य की बंद चौहद्दी नहीं, जीवन तक पहुँचने वाला बहता जल थी। “संस्कृत है कूप जल” वाला उनका रूपक ज्ञान के सामाजिक चरित्र पर भी प्रश्न उठाता है। कबीर की भाषा स्वयं अनेक स्रोतों के मेल से बनी थी; उसमें संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, लोकभाषाओं के साथ फारसी-अरबी प्रभाव भी दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि जीवित भाषा किसी एक जाति, धर्म या सांस्कृतिक सीमा में बंद नहीं रहती।

तुलसीदास का कथन “का भाषा का संसकृत, प्रेम चाहिए सांच” भाषा के मूल्य को उसके मानवीय आशय से जोड़ता है। भाषा अपने आप में ऊँची या नीची नहीं होती; उसकी सार्थकता उसके संप्रेषण, संवेदना और जीवन-संबंध में है। इसलिए हिंदी को संस्कृत या किसी अन्य भारतीय भाषा के विरोध में खड़ा करना उसके स्वभाव को समझना नहीं है। हिंदी की शक्ति उसकी ग्रहणशीलता में है; वह संस्कृत से भी सीखती है, लोकभाषाओं से भी, उर्दू-फारसी से भी और आधुनिक समय में अंग्रेजी सहित दूसरी भाषाओं से भी। भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।/ बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।” आधुनिक हिंदी चेतना का महत्त्वपूर्ण आधार है। अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित करना मनुष्य को अपने परिवेश और अनुभव से जोड़ता है। किंतु बहुभाषी भारत में ‘निज भाषा’ का अर्थ केवल हिंदी नहीं हो सकता। प्रत्येक मातृभाषा अपने समुदाय की स्मृति, अस्मिता और संवेदना की वाहक है। इसलिए हिंदी का विस्तार तभी स्वस्थ होगा जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं को विस्थापित करने के बजाय उनके बीच संवाद का सेतु बने।

निराला की कविता ‘सच है’ में हिंदी के हित और जनता के ज्ञान का संबंध सामने आता है। उनके यहाँ हिंदी का प्रश्न जनता से अलग नहीं है। यही कसौटी आज भी प्रासंगिक है। यदि हिंदी दिवस पर समारोह होते रहें, पुरस्कार दिए जाते रहें और भाषण होते रहें, लेकिन किसान अपने अधिकारों से अनजान रहे, मजदूर कानून न समझ सके और विद्यार्थी उच्चस्तरीय ज्ञान तक सहज पहुँच न बना सके, तो हिंदी का गौरव अधूरा रहेगा। रघुवीर सहाय की कविता ‘हिंदी’ इसी उत्सवी वातावरण में असुविधाजनक प्रश्न खड़ा करती है। उनकी पंक्ति “हिंदी का प्रश्न अब हिंदी का प्रश्न नहीं रह गया” भाषा के भीतर छिपे सत्ता और वर्ग के प्रश्न को सामने लाती है। भाषा की लड़ाई तब खोखली हो जाती है जब उसके नाम पर बोलने वाले लोग जनता से दूर होकर अपने संस्थागत हितों की रक्षा करने लगते हैं। हिंदी को यदि वास्तव में लोकतांत्रिक बनना है तो केवल अंग्रेजी के स्थान पर बैठना पर्याप्त नहीं; उसे ज्ञान, सत्ता और अवसर के केंद्रीकरण को भी चुनौती देनी होगी। इसी संदर्भ में राही मासूम रज़ा की टिप्पणी “भाषा की लड़ाई दरअसल नफ़े-नुकसान की लड़ाई है।” भाषा और रोजगार के संबंध को उजागर करती है। भाषा का प्रश्न अक्सर शिक्षा, नौकरी, अवसर और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न भी होता है। इसलिए हिंदी को विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, न्यायालयों, प्रशासन, चिकित्सा, तकनीक और आधुनिक शोध की सक्षम भाषा बनाना होगा। केवल अनुवाद नहीं, हिंदी में मौलिक ज्ञान-उत्पादन आवश्यक है।

दिनकर ने कहा था, “भाषा की खानें दो हैं। एक पुस्तकों में, दूसरी जनता की जबान पर।” पुस्तकें भाषा को परंपरा और ज्ञान देती हैं, जनता उसे जीवन और नवीनता देती है। साहित्य को इन दोनों के बीच जीवंत संवाद स्थापित करना होता है। दूसरी ओर थॉमस ग्रे का कथन “ज़माने की भाषा कभी भी काव्य की भाषा नहीं होती है।” याद दिलाता है कि कविता केवल तत्कालीन बोलचाल की प्रतिलिपि नहीं होती; वह भाषा को नया अर्थ, लय और संवेदना भी देती है। फिर भी उसकी ऊर्जा अंततः जीवन से ही आती है। शमशेर बहादुर सिंह की पंक्ति “हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू” भारतीय भाषिक संस्कृति की साझी विरासत की ओर संकेत करती है। हिंदी और उर्दू को केवल दो धार्मिक समुदायों की भाषाओं के रूप में देखना उनके लंबे सह-अस्तित्व और पारस्परिक आदान-प्रदान को नकारना है। भाषा की कोई धार्मिक जाति नहीं होती। शब्द मनुष्य की सामूहिक यात्रा से जन्म लेते हैं। केदारनाथ सिंह की पुकार, “ओ मेरी भाषा / मैं लौटता हूँ तुम में” मातृभाषा में लौटने की स्मृति और आत्मीयता का अनुभव है। यह लौटना केवल शब्दों में नहीं, बचपन, लोक और अपने लोगों में लौटना है। मनुष्य अनेक भाषाएँ सीख सकता है, लेकिन मातृभाषा उसके सबसे गहरे भावलोक से जुड़ी रहती है। इसलिए मातृभाषा का सम्मान बहुभाषिकता के विरोध में नहीं, उसके पक्ष में है।

विनोद कुमार शुक्ल की पंक्ति “मैं किसी भी भाषा का / अपमान नहीं करूँगा।” हिंदी-प्रेम की नैतिक कसौटी प्रस्तुत करती है। अपनी भाषा से प्रेम यदि दूसरी भाषा के प्रति घृणा पैदा करता है, तो वह भाषिक आत्मविश्वास नहीं, अहंकार है। यू. आर. अनंतमूर्ति का विचार भी इसी उदारता को पुष्ट करता है, “अन्य भाषा की निंदा-तिरस्कार करना पसंद नहीं है।” अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम करते हुए दूसरी भाषाओं का सम्मान करना ही बहुभाषी भारत की लोकतांत्रिक चेतना है। प्रो. सदानंद शाही की ‘आज फिर हिंदी दिवस है’ हिंदी को प्रेम, ज्ञान, विज्ञान और सम्मान की भाषा बनाने की आकांक्षा व्यक्त करती है। किंतु उनकी ही कविता ‘भाषा के नाख़ून’ चेताती है कि भाषा के भीतर भी हिंसा उग सकती है। जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग, क्षेत्रीय श्रेष्ठताबोध और घृणा के ‘नाख़ून’ भाषा को संवाद से हिंसा की ओर ले जा सकते हैं। इसलिए हिंदी की रक्षा केवल हिंदी बोलने से नहीं, हिंदी के भीतर मनुष्यता की रक्षा करने से होगी। गाँधी का भाषा-विचार भी जनता और स्वराज के संबंध से जुड़ा था। उनका कथन “हिंदी को हम राष्ट्रभाषा मानते हैं।”अपने ऐतिहासिक संदर्भ में व्यापक जन-संपर्क की भाषा के पक्ष में उनकी आकांक्षा को व्यक्त करता है। उनके दूसरे विचार में यह प्रश्न और स्पष्ट है कि यदि स्वराज केवल अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का हो तो अंग्रेजी की प्रधानता स्वाभाविक होगी, लेकिन यदि स्वराज करोड़ों गरीब, निरक्षर, दलित और अंत्यज लोगों का है तो जनभाषा का प्रश्न केंद्रीय हो जाता है। गाँधी की चिंता भाषा की श्रेष्ठता से अधिक सत्ता और जनता की दूरी को लेकर थी। उनका यह कथन भी महत्त्वपूर्ण है, “विदेशी भाषा सुवर्णमय होने पर भी उपयोगी नहीं हो सकती। हमारी भाषा तृणवत् हो, तो उसे स्वर्णमय बनाना चाहिए।” आज इसे अंग्रेजी-विरोध के रूप में नहीं, भारतीय भाषाओं को सक्षम बनाने के आह्वान के रूप में पढ़ना चाहिए। अंग्रेजी आधुनिक वैश्विक ज्ञान की महत्त्वपूर्ण भाषा है; उसका ज्ञान किसी भारतीय भाषा से विश्वासघात नहीं। आवश्यकता भाषाओं के संघर्ष की नहीं, भाषिक लोकतंत्र की है।

डॉ. आंबेडकर का कथन “हिंदी को ऊँची-से-ऊँची शिक्षा का माध्यम होना चाहिये।” ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में पढ़ा जाना चाहिए। उच्च शिक्षा यदि किसी सीमित भाषिक अभिजन के नियंत्रण में रहे तो सामाजिक लोकतंत्र अधूरा रह जाता है। किंतु भारत की बहुभाषिक संरचना में ज्ञान का लोकतंत्रीकरण बहुभाषिक होना चाहिए, ताकि दलित, आदिवासी, पिछड़े, स्त्री और ग्रामीण समाज सहित सभी समुदायों को अपनी भाषिक पृष्ठभूमि के कारण अवसर से वंचित न होना पड़े। जाकिर हुसैन ने हिंदी को वह धागा माना जो “विभिन्न मातृभाषाओं रूपी फूलों” को पिरो सके। यह हिंदी की श्रेष्ठ भूमिका का सुंदर रूपक है। हिंदी को धागा बनने की आवश्यकता है, अकेला फूल बनने की नहीं। टैगोर का विचार “हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करना चाहिये जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिये महात्माजी ने हमसे आग्रह किया, वह हिंदी है।” ऐतिहासिक संदर्भ में हिंदी की व्यापक संपर्क-भूमिका की ओर संकेत करता है। किंतु भारत की एकता का अर्थ भाषिक एकरूपता नहीं हो सकता। सुमित्रानंदन पंत ने हिंदी को “कुंजी” कहा, “मैं कुंजी कहता हिंदी को, खुलता जिससे सामूहिक मन।/क्षेत्रवृत्ति से उठकर ही हम, कर सकते जन राष्ट्र संगठन।।” हिंदी विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद की कुंजी हो सकती है, लेकिन भारत में अनेक भाषाएँ अनेक सांस्कृतिक द्वार खोलती हैं।

कृष्ण कल्पित की ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ हिंदी के नाम पर होने वाले संस्थागत आयोजनों, पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार-व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करती है। उसका सवाल “कहाँ खो गया प्रतिरोध!” हिंदी के उत्सवी विमर्श के बीच वास्तविक जनसरोकार की तलाश है। किसी भाषा की विडंबना तब बढ़ती है जब उसके नाम पर संस्थाएँ बहुत हों, पर जनता की पीड़ा और अन्याय के विरुद्ध बोलने का साहस कम होता जाए। विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता उसकी भव्यता से अधिक हिंदी में उपलब्ध शिक्षा, शोध, विज्ञान और लोकतांत्रिक ज्ञान-संसाधनों से तय होगी। पंकज चौधरी की कविता ‘हिंदी कविता के द्विजवादी प्रदेश में आपका प्रवेश दंडनीय है’ साहित्य की संस्थागत संरचना और सामाजिक प्रतिनिधित्व पर प्रश्न उठाती है। कौन लिखता है, कौन छपता है, किसे मंच और सम्मान मिलता है तथा किसके अनुभव को सार्वभौमिक माना जाता है; ये साहित्यिक ही नहीं, सामाजिक लोकतंत्र के प्रश्न हैं। किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी, स्त्री, पिछड़े, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित समुदाय केवल साहित्य के विषय न रहें; वे रचनाकार, संपादक, आलोचक, अध्यापक और निर्णायक भी बनें। साहित्यिक प्रतिष्ठा किसी वंशानुगत अधिकार का नाम नहीं हो सकती।

हिंदी की बड़ी शक्ति उसकी बोलियाँ हैं। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी, मैथिली, मगही और अनेक लोकभाषिक रूपों ने हिंदी के संसार को समृद्ध किया है। हिंदी को अपनी बोलियों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। अपनी जड़ों को काटकर कोई भाषा स्थायी रूप से बड़ी नहीं हो सकती। इसी तरह शुद्धतावाद भी हिंदी के लिए उपयोगी नहीं। किसी शब्द की श्रेष्ठता उसके स्रोत से नहीं, उसके अर्थ, उपयोग और जीवन-संबंध से तय होती है। आज डिजिटल युग हिंदी के सामने नई संभावनाएँ खोल रहा है। इंटरनेट, डिजिटल पत्रकारिता, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में हिंदी की उपस्थिति बढ़ रही है। किंतु केवल उपयोगकर्ताओं की संख्या पर्याप्त नहीं। हिंदी को वैज्ञानिक संसाधनों, शोध-सामग्री, मुक्त शैक्षिक सामग्री, तकनीकी अवसंरचना और उच्चस्तरीय डिजिटल ज्ञान की भाषा बनना होगा। विज्ञान की भाषा बनने का अर्थ केवल वैज्ञानिक शब्दों का हिंदीकरण नहीं, बल्कि हिंदी में वैज्ञानिक चिंतन और मौलिक ज्ञान-उत्पादन की क्षमता विकसित करना है। इसी तरह कानून और प्रशासन की भाषा नागरिक को भयभीत करने के बजाय उसे अपने अधिकार समझने में सक्षम बनाए।

राष्ट्रीय हिंदी दिवस इसलिए आत्ममुग्धता का नहीं, आत्मालोचन का दिन होना चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि कितने लोग हिंदी बोलते हैं; प्रश्न यह है कि हिंदी कितने लोगों को अवसर देती है। क्या किसान अपने अधिकार समझ सकता है? क्या मजदूर श्रम-कानून पढ़ सकता है? क्या हिंदी माध्यम का विद्यार्थी विश्वस्तरीय विज्ञान तक पहुँच सकता है? क्या वंचित समुदाय अपनी आवाज़ स्वयं दर्ज कर सकते हैं? क्या हिंदी सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हिंदी के विकास की वास्तविक कसौटी हैं। हिंदी को केवल राजभाषा बने रहना पर्याप्त नहीं; उसे जनभाषा, ज्ञानभाषा, विज्ञानभाषा, न्यायभाषा और लोकतंत्र की भाषा बनना होगा। राजभाषा का संबंध प्रशासन से है, जनभाषा का संबंध जीवन से। भाषा केवल संचार नहीं, आत्मसम्मान और नागरिक भागीदारी का माध्यम भी है। हिंदी की सबसे बड़ी उपलब्धि तब होगी जब सरकारी भाषा और जनता की भाषा के बीच की दूरी घटेगी। हिंदी को अपनी महानता सिद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं से श्रेष्ठ होने का दावा करने की आवश्यकता नहीं। महान भाषा वह है जो प्रश्न पूछ सके, अन्याय के विरुद्ध खड़ी हो सके, प्रेम व्यक्त कर सके, विज्ञान समझ सके, श्रम का सम्मान कर सके और वंचित मनुष्य को समान अधिकार वाला नागरिक माने। हिंदी की शक्ति उसकी संख्या के साथ-साथ उसकी बहुलता में है। उसमें लोक की मिठास, बोलियों की विविधता, हिंदी-उर्दू की साझी विरासत, भारतीय भाषाओं की स्मृति और आधुनिक विज्ञान की तार्किकता एक साथ संवाद कर सकती है।

विद्यापति से कबीर, तुलसी से भारतेंदु, निराला से रघुवीर सहाय, शमशेर से केदारनाथ सिंह, गांधी से आंबेडकर और समकालीन जनपक्षधर स्वरों तक हिंदी की यात्रा एकरंगी नहीं रही। यह लोक, संघर्ष, स्मृति, प्रेम, प्रतिरोध, असहमति और संवाद से निर्मित हुई है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यही बहुलता है। इसलिए हिंदी दिवस का संकल्प केवल हिंदी बोलने का नहीं, हिंदी को अधिक मानवीय, लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक, समावेशी और जनपक्षधर बनाने का होना चाहिए। हम हिंदी को दूसरी भाषाओं के विरुद्ध खड़ा न करें और उसके भीतर जाति, धर्म, लिंग, वर्ग तथा क्षेत्रीय श्रेष्ठताबोध के ‘नाख़ून’ न उगने दें। हम हिंदी में ज्ञान पैदा करें, प्रश्न पूछें, विज्ञान समझें, अपने अधिकार जानें और अपने समय की सच्चाइयों से मुठभेड़ करें। भाषा की असली प्रतिष्ठा उसके राजकीय दर्जे में नहीं, उसके जनसंबंध में होती है; उसकी वास्तविक शक्ति शब्दकोश में नहीं, बोलने वालों के आत्मविश्वास में होती है; उसका गौरव सम्मेलनों की भव्यता में नहीं, उस अंतिम मनुष्य की आवाज़ में होता है जिसे बोलने का अवसर अब तक नहीं मिला। हिंदी तभी सचमुच बड़ी भाषा होगी जब उसमें बड़ा मन होगा और वह भारत को एकरूप बनाकर नहीं, उसकी बहुरूपता को साथ लेकर जोड़ेगी। वह सत्ता की चापलूस नहीं, जनता की साथी; विभाजन की दीवार नहीं, संवाद का पुल; ज्ञान पर पहरा नहीं, ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम बने। राष्ट्रीय हिंदी दिवस पर इससे बड़ी कामना क्या हो सकती है कि हिंदी सत्ता की ऊँची दीवारों से उतरकर फिर उसी लोक में लौटे, जहाँ से उसकी सबसे गहरी आवाज़ आती है उस लोक में, जहाँ मनुष्य अपनी भाषा में हँसता है, रोता है, प्रेम करता है, श्रम करता है, प्रश्न पूछता है, अन्याय का प्रतिरोध करता है और बेहतर संसार का सपना देखता है। हिंदी की जय तभी सार्थक है, जब उसमें मनुष्य की जय हो।
★★★
टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कवि

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