Wednesday, 3 June 2026

कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

कुर्मी समाज! कब तक दूसरों का इतिहास लिखोगे, अपना इतिहास कब रचोगे?

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में यदि किसी समाज ने सबसे अधिक श्रम किया, सबसे अधिक उत्पादन किया, सबसे अधिक संगठन खड़े किए, सबसे अधिक संघर्ष किए और फिर भी अपनी वास्तविक शक्ति के अनुरूप स्थान प्राप्त नहीं किया, तो उनमें कुर्मी समाज प्रमुख है।

यह लेख किसी दल के पक्ष या विपक्ष का लेख नहीं है। यह कुर्मी समाज के आत्ममंथन का लेख है। यह प्रशंसा का नहीं, चेतना का लेख है। यह ताली बजाने का नहीं, आईना दिखाने का लेख है।

आज कुर्मी समाज को सबसे पहले अपने आप से एक प्रश्न पूछना चाहिए—

क्या हम सचमुच उतने शक्तिशाली हैं, जितना हम स्वयं को समझते हैं?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो फिर हमारी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति हमारी जनसंख्या और योगदान के अनुपात में क्यों नहीं है?

नेताओं की लंबी सूची, लेकिन समाज की छोटी उपलब्धियाँ

कुर्मी समाज के पास नेताओं की कमी कभी नहीं रही।

बिहार में नीतीश कुमार जैसे नेता हुए, जिन्होंने वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में शासन किया।

गुजरात में केशुभाई पटेल, आनंदीबेन पटेल, भूपेंद्र पटेल जैसे मुख्यमंत्री हुए।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने।

उत्तर प्रदेश में बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. सोनेलाल पटेल, अनुप्रिया पटेल, पल्लवी पटेल, जंग बहादुर पटेल, राम लखन वर्मा, बरखू राम वर्मा, राम पूजन पटेल, लालजी वर्मा, राम प्रसाद चौधरी, केसरी देवी पटेल, आर. के. पटेल, नंदलाल पटेल, रामसेवक पटेल, हीरामणि पटेल, रामदेव पटेल, सुखदेव वर्मा, दीपक पटेल, राजेंद्र प्रसाद चौधरी, अरविंद चौधरी, संग्राम सिंह वर्मा, संतोष गंगवार, पंकज चौधरी जैसे अनेक नाम राजनीति में दिखाई देते हैं। इनमें कुछ स्मृति शेष चुके हैं।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश के कुर्मी विधायकों में प्रमुख नामों में शामिल हैं राजेंद्र चौधरी, कविंद्र चौधरी, पटेल दयाराम चौधरी, गंगवार, सत सिंह, संत सिंह, वीरेंद्र चौधरी, राजेंद्र वर्मा, रुधौली, फरेंदा, कप्तानगंज, मुंगरा, बादशाहपुर, सुल्तानपुर, बस्ती, महाराजगंज, जौनपुर, पीलीभीत सदर, भोगनीपुर, मिनगा, गौरा, उतराला, अविनाश चंद्र द्विवेदी, आरके पटेल, संजय गंगवार, शैलेंद्र सिंह गंगवार, सकेंद्र प्रताप, राकेश कुमार वर्मा, पल्लवी पटेल, पूजा सरोज, रागिनी सोनकर, लालजी वर्मा, स्वतंत्र देव सिंह, ओम प्रकाश सिंह, पंकज चौधरी, संतोष गंगवार जैसे नेताओं से जुड़े क्षेत्रों के विधायक तथा अन्य कई कुर्मी/पटेल/चौधरी/वर्मा/गंगवार उपनाम वाले विधायक जो कुल संख्या को 40-43 तक ले जाते हैं और वर्तमान में यूपी से कुर्मी समुदाय के सांसदों में समाजवादी पार्टी से रामप्रसाद चौधरी (बस्ती), उत्कर्ष वर्मा (लखीमपुर खीरी), नरेश चंद्र उत्तम पटेल (फतेहपुर), लालजी वर्मा (अंबेडकर नगर), राम शिरोमणि वर्मा (श्रावस्ती), शिवपाल सिंह पटेल (प्रतापगढ़), कृष्णा देवी पटेल (बांदा); भाजपा से पंकज चौधरी (महाराजगंज) और अन्य कुर्मी/पटेल चेहरे जैसे कुछ क्षेत्रीय नाम; तथा अपना दल (सोनेलाल) से अनुप्रिया पटेल (मिर्जापुर) शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 11 के आसपास कुर्मी सांसदों की संख्या को पूरा करते हैं।

मध्य प्रदेश में भीम सिंह पटेल, बुद्धसेन पटेल, विद्यावती पटेल जैसे नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई।

संगठनात्मक क्षेत्र में इंजीनियर बलिहारी पटेल, चौधरी विकास पटेल, डॉ. आर.एस. पटेल जैसे नाम भी संघर्ष की पहचान बने।

लेकिन एक प्रश्न आज भी खड़ा है, इतने नेताओं के बावजूद समाज कहाँ है?

क्या केवल नेताओं का बड़ा होना ही समाज का बड़ा होना है?

यदि ऐसा होता तो आज कुर्मी समाज देश का सबसे संगठित, सबसे प्रभावशाली और सबसे निर्णायक समाज होता।

सच्चाई यह है कि नेताओं की सफलता और समाज की सफलता दो अलग-अलग बातें हैं।

सबसे बड़ी बीमारी, व्यक्ति पूजा

कुर्मी समाज की सबसे बड़ी समस्या बाहरी नहीं, आंतरिक है।

हम व्यक्ति को समाज से बड़ा बना देते हैं।

कोई नेता मंत्री बन गया, तो हम उसे अपनी उपलब्धि मान लेते हैं।

कोई सांसद बन गया, तो हम खुश हो जाते हैं।

कोई मुख्यमंत्री बन गया, तो हम समझ लेते हैं कि समाज का उद्धार हो गया।

लेकिन क्या कभी हमने यह हिसाब लगाया कि इन सबके बावजूद समाज की सामूहिक ताकत कितनी बढ़ी?

कितने विश्वविद्यालय बने?

कितने बड़े विद्यालय बने?

कितने शोध संस्थान बने?

कितने राष्ट्रीय समाचार पत्र बने?

कितने बड़े उद्योगपति पैदा हुए?

कितने राष्ट्रीय विचारक तैयार हुए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर कमजोर है, तो हमें अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

वोट हमारा, एजेंडा किसी और का

यह कटु सत्य है कि कुर्मी समाज ने अनेक दलों को ताकत दी।

कभी समाजवादी राजनीति को।

कभी बहुजन राजनीति को।

कभी कांग्रेस को।

कभी भाजपा को।

लेकिन हर दल में कुर्मी समाज ने दूसरों के एजेंडे को आगे बढ़ाया, अपना स्वतंत्र सामाजिक एजेंडा बहुत कम बनाया।

आज भी अधिकांश लोग किसी दल की पहचान से स्वयं को परिभाषित करते हैं, समाज की पहचान से नहीं।

यही कारण है कि चुनाव समाप्त होते ही समाज फिर वही पुराना प्रश्न पूछता है, "हमें क्या मिला?"

केवल जातीय गौरव नहीं, सामाजिक क्रांति चाहिए

कुर्मी समाज को यह समझना होगा कि केवल जातीय गौरव के नारे समाज को आगे नहीं बढ़ाते।

यदि केवल गौरव से समाज आगे बढ़ते, तो इतिहास में कोई भी समुदाय पिछड़ा नहीं रहता।

समाज को आगे बढ़ाती है—

शिक्षा।

संगठन।

आर्थिक शक्ति।

वैचारिक स्पष्टता।

अनुशासन।

दीर्घकालिक रणनीति।

और इन क्षेत्रों में अभी बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. सोनेलाल पटेल का अधूरा प्रश्न

जब डॉ. सोनेलाल पटेल ने पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया था, तब वह केवल चुनावी टिकट का प्रश्न नहीं था।

वह सम्मान, प्रतिनिधित्व और सामाजिक शक्ति का प्रश्न था।

आज भी वह प्रश्न जीवित है।

लेकिन दुखद यह है कि समाज उस प्रश्न को आंदोलन में बदलने के बजाय अक्सर व्यक्तियों और दलों की बहस में उलझ जाता है।

यदुनाथ सिंह पटेल की विरासत

स्मृति शेष बाबू यदुनाथ सिंह पटेल जैसे नेताओं की चर्चा केवल इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वे विधायक थे।

उनकी चर्चा इसलिए होनी चाहिए कि उन्होंने स्वाभिमान की राजनीति का संदेश दिया।

जिस समाज में स्वाभिमान मर जाता है, वहाँ संख्या भी बेकार हो जाती है और जिस समाज में स्वाभिमान जीवित रहता है, वहाँ छोटी संख्या भी इतिहास बदल देती है।

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट

कुर्मी समाज का सबसे बड़ा संकट प्रतिनिधित्व की कमी नहीं है।

सबसे बड़ा संकट है, सामूहिक दृष्टि का अभाव। हर क्षेत्र में व्यक्ति हैं, लेकिन सामूहिक परियोजना नहीं है। हर जिले में नेता हैं, लेकिन राष्ट्रीय दृष्टि नहीं है। हर चुनाव में सक्रियता है, लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक कार्यक्रम नहीं है।

अब क्या करना होगा?

कुर्मी समाज को अगले 25 वर्षों का कार्यक्रम बनाना होगा। सैकड़ों छात्रावास बनाने होंगे। हजारों मेधावी छात्रों को सहायता देनी होगी। पुस्तकालय स्थापित करने होंगे। शोध संस्थान बनाने होंगे। सामाजिक इतिहास लिखना होगा। अपने महापुरुषों पर शोध कराना होगा।

युवाओं को प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता की ओर ले जाना होगा।

राजनीति को अंतिम लक्ष्य नहीं, साधन मानना होगा।

अंतिम चेतावनी

इतिहास किसी समाज को बार-बार अवसर नहीं देता। जो समाज समय रहते नहीं जागते, वे दूसरों की राजनीति का स्थायी ईंधन बन जाते हैं।

आज कुर्मी समाज एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है नारों का, भावनाओं का, चुनावी उत्साह का।

दूसरा रास्ता है शिक्षा, संगठन, विचार और स्वाभिमान का।

पहला रास्ता भीड़ बनाता है।

दूसरा रास्ता इतिहास बनाता है।

निर्णय कुर्मी समाज को करना है।

क्या वह केवल वोट बैंक बना रहेगा?

क्या वह केवल दूसरों की रैलियाँ भरता रहेगा?

क्या वह केवल नेताओं की जय-जयकार करता रहेगा?

या फिर वह ज्ञान, संगठन, संघर्ष और आत्मसम्मान के आधार पर नई सामाजिक क्रांति का निर्माण करेगा?

याद रखो,

जिस दिन कुर्मी समाज ने अपनी संख्या को संगठन में, संगठन को विचार में और विचार को सामाजिक शक्ति में बदल दिया, उस दिन भारतीय राजनीति का नक्शा बदल जाएगा और उस दिन इतिहास यह नहीं पूछेगा कि कुर्मी समाज के कितने मंत्री थे।

इतिहास यह लिखेगा कि कुर्मी समाज ने एक नई सामाजिक चेतना को जन्म दिया था।

टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक सह सामाजिक कार्यकर्ता)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


#कुर्मी_समाज_की_एकता, #स्वाभिमान, #जागरूकता, #सामाजिक_न्याय, #शिक्षा, #नेतृत्व_और_राजनीतिक #KurmiSamaj #कुर्मी_समाज #Kurmi #कुर्मी #KurmiPower #KurmiUnity #KurmiPride #KurmiKshatriya #Patel #Patidar #KurmiCommunity #कुर्मी_क्षत्रिय #KurmiVanshi #KurmiAwareness #KurmiYuva #KurmiYouth
कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कविता #बहुजन_कविता #संतकबीर #कबीरदास #अद्यतनकबीर #आज_का_कबीर #दलित_साहित्य #आदिवासी_साहित्य #मूलनिवासी_साहित्य #बौद्ध_साहित्य #kabirdas #प्रगतिशील_साहित्य #गोलेन्द्रवाद #Golendrism #गोलेंद्रवाद #गोलेन्द्र_की_कविता

No comments:

Post a Comment

अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व — गोलेन्द्र पटेल

जीवनकाल: 1953 से 2007 संघर्षकाल: 1978 से 2007 अपराधी, विद्रोही या लोकनायक? : प्रतिरोध, लोकविश्वास और ददुआ का मिथकीय व्यक्तित्व भारतीय समाज क...