Saturday, 31 January 2026

मंडल कमीशन से लेकर UGC बिल 2026 तक की राजनीतिक चुप्पियों का सामाजिक विश्लेषण : गोलेन्द्र पटेल

दान नहीं, अधिकार चाहिए

विश्वविद्यालय, बहुजन और लोकतंत्र की असहज परीक्षा :

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि अन्याय होता है, बल्कि यह है कि अन्याय के समय सबसे अधिक शोर वही करते हैं जिन्हें समानता से सबसे ज़्यादा भय है। उच्च शिक्षा संस्थानों में समता स्थापित करने के उद्देश्य से लाए गए नए नियामक प्रावधानों पर उठे विवाद ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि हमारे समाज में ज्ञान, सत्ता और विशेषाधिकार के पुराने गठजोड़ अब भी कितने मज़बूत हैं।

विश्वविद्यालय केवल इमारतें नहीं होते—वे भविष्य की प्रयोगशालाएँ होते हैं। यहाँ तय होता है कि आने वाली पीढ़ियाँ किस तरह का समाज रचेंगी। जब ऐसे संस्थानों में जाति, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव को समाप्त करने की बात होती है, तो उसे “खतरा” बताकर रोका जाना दरअसल लोकतंत्र की आत्मा पर अविश्वास है।

राजनीतिक मौन और वैचारिक संकट :
इस पूरे विमर्श में सबसे अधिक बेचैन करने वाली बात तथाकथित सामाजिक न्याय के राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी है। जिन आवाज़ों से संघर्ष की अपेक्षा थी, वे या तो अस्पष्ट हैं या सुविधाजनक मौन में डूबी हुई। यह मौन किसी एक निर्णय पर नहीं, बल्कि एक लंबे वैचारिक पलायन पर मुहर लगाता है—जहाँ प्रतिनिधित्व सत्ता में बदलते ही उत्तरदायित्व से कट जाता है।

इसके उलट, कुछ सीमित लेकिन स्पष्ट स्वर ऐसे भी हैं जो बिना लाग-लपेट के यह कहने का साहस रखते हैं कि शिक्षा में समता कोई रियायत नहीं, संवैधानिक अधिकार है। ये स्वर संख्या में भले कम हों, पर लोकतांत्रिक नैतिकता के लिए उनकी मौजूदगी निर्णायक है।

दान-दक्षिणा की संस्कृति बनाम नागरिक चेतना :
भारतीय समाज में सदियों से एक मानसिकता विकसित की गई—कि वंचित वर्ग अधिकार नहीं माँगे, बल्कि कृपा की प्रतीक्षा करे। यही वह संस्कृति है जो दान को पुण्य और अधिकार की माँग को उद्दंडता बताती है। जब तक यह मनोवृत्ति बनी रहेगी, तब तक सामाजिक असमानता नए-नए रूपों में लौटती रहेगी।

आज ज़रूरत इस बात की है कि नागरिक स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या सम्मान दान से मिलता है या बराबरी से? क्या शिक्षा पर कुछ लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार हो सकता है? और क्या संविधान केवल किताबों में पढ़ने की वस्तु है या व्यवहार में लागू करने की जिम्मेदारी?

समता से डर क्यों? :
यदि किसी नियमन से वास्तव में किसी का अधिकार नहीं छिनता, बल्कि वंचित तबकों को सुरक्षा मिलती है, तो उसका विरोध क्यों? इस प्रश्न का उत्तर कानून की भाषा में नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान में छिपा है। असल डर प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि विशेषाधिकार के खत्म होने से है। वह विशेषाधिकार, जो सदियों से कुछ समूहों को बिना जवाबदेही के लाभ देता रहा है।

इतिहास गवाह है—जब भी समानता की कोई ठोस पहल हुई, उसे “समाज टूट जाएगा”, “मेधा खत्म हो जाएगी” या “संस्कृति खतरे में है” जैसे नारों से रोका गया। मंडल आयोग से लेकर आज तक, तर्क बदलते रहे हैं, लेकिन भय वही रहा है।

समाधान का रास्ता :
इस टकराव का समाधान टकराव में नहीं, बल्कि स्पष्टता में है।
स्पष्टता—कि समता किसी के खिलाफ नहीं, सबके लिए है।
स्पष्टता—कि कानून का उद्देश्य बदला नहीं जा सकता, केवल उसका दुरुपयोग रोका जा सकता है
और स्पष्टता—कि लोकतंत्र में अंतिम सत्ता जनता की चेतना होती है, न कि कुछ प्रभावशाली वर्गों की असहमति।

आज ज़रूरत है शिक्षित, संगठित और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने की। न उन्माद से, न अपमान से—बल्कि तथ्यों, मूल्यों और नैतिक साहस के साथ।

अंत में

यह समय दान माँगने का नहीं, अधिकार समझने का है।
यह समय चुप रहने का नहीं, प्रश्न करने का है
और यह समय किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा का है।

यदि विश्वविद्यालय समता के पक्ष में खड़े नहीं हो पाए, तो वे ज्ञान के नहीं, वर्चस्व के केंद्र बनकर रह जाएंगे और यदि समाज ने इसे समय रहते नहीं समझा, तो इतिहास एक बार फिर वही प्रश्न पूछेगा—
जब बराबरी की बात आई थी, तब आप किस ओर खड़े थे?

NFS का हल :

विश्वविद्यालयों में “NFS” (Not Found Suitable) अब चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि बहिष्करण की रणनीति बन चुकी है। आरक्षित पदों पर योग्य अभ्यर्थियों के रहते बार-बार NFS किया जाना किसी अकादमिक असफलता का नहीं, बल्कि संरचनात्मक जातिवाद का प्रमाण है। विडंबना यह है कि जहाँ अनारक्षित पदों पर ‘सूटेबल’ आसानी से मिल जाते हैं, वहीं वही पात्रता OBC-SC-ST के लिए अचानक अयोग्य घोषित कर दी जाती है।

चयन समितियों में प्रतिनिधित्व का अभाव इस अन्याय को और गहरा करता है। जब आरक्षित वर्गों के साक्षात्कार अनारक्षित वर्ग के प्रभुत्व वाली समितियाँ लेती हैं, तो निष्पक्षता एक भ्रम बन जाती है। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर स्तर पर OBC, SC और ST की हिस्सेदारी आबादी के अनुपात से बहुत नीचे है और अधिकांश पद आज भी खाली पड़े हैं।

NFS को बिना ठोस कारण के लागू करना अकादमिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जवाबदेही-विहीन सत्ता का दुरुपयोग है। यदि अभ्यर्थी न्यूनतम पात्रता पूरी करता है, तो उसे ‘अयोग्य’ ठहराने का स्पष्ट, लिखित और जाँच-योग्य आधार होना चाहिए। अन्यथा यह संवैधानिक समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।

नेतृत्व और प्रतिनिधित्व रोकने के लिए नियमों का नया जाल—जैसे विभागाध्यक्ष बनने के लिए केवल प्रोफेसर की शर्त—उसी मानसिकता का विस्तार है जो बहुजन समाज को निर्णय-स्थलों से दूर रखना चाहती है। यह लड़ाई नौकरी भर की नहीं, सम्मान, बराबरी और प्रतिनिधित्व की है।

अब समय है कि विश्वविद्यालय व्यवस्था इस साज़िश से बाहर आए। NFS नहीं, न्याय चाहिए—भीख नहीं, संवैधानिक हक चाहिए। समानता कोई अनुकंपा नहीं, हमारा मौलिक अधिकार है।

उपर्युक्त गंभीर समस्याओं से निजात पाने का एक तरीक़ा यह है कि ओपन सीटों के साक्षात्कार हेतु गठित चयन समितियों में OBC, SC और ST वर्गों के प्रोफेसरों की न्यूनतम 50 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अर्थात् चयन प्रक्रिया में सभी सामाजिक वर्गों का समुचित और संतुलित प्रतिनिधित्व अनिवार्य हो।

OBC विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल OBC प्रोफेसर ही सम्मिलित हों; उसमें एक भी General श्रेणी का प्रोफेसर न हो। इसी प्रकार SC–ST विद्यार्थियों के साक्षात्कार में केवल SC–ST प्रोफेसर ही बैठें और General विद्यार्थियों के साक्षात्कार में General श्रेणी के प्रोफेसर ही हों। जब तक अनारक्षित वर्ग के प्रोफेसर आरक्षित वर्ग के पदों के लिए साक्षात्कार लेते रहेंगे, तब तक NFS की समस्या बनी रहेगी।★★★

रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (NET पास पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/ बहुजन मंडलवादी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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