एक दोस्त का आख़िरी पत्र
यह अंतर्मन की शुद्धतम पुकार है—
मेरे प्रिय मित्र!
यदि कभी मेरी किसी बात, व्यवहार या अनजानी भूल से तुम्हारे हृदय को ठेस पहुँची हो, तो उदार मन से मुझे क्षमा कर देना। मेरी सच्ची प्रार्थना है कि तुम्हारे जीवन के समस्त दुःख मेरे हिस्से आ जाएँ और मेरे हिस्से का समस्त सुख तुम्हारी झोली में भर जाए।
तुम जहाँ भी रहो, सदा आनंदित रहो, उल्लास से भरे रहो, अपने स्वप्नों और साहस के साथ आगे बढ़ते रहो। जीवन की किसी भी घड़ी में निराशा को अपने पास मत ठहरने देना, मत उदास होना।
और हाँ, मेरे लिए कभी मत रोना—
क्योंकि मैं देह से अधिक स्मृति हूँ, और स्मृति से भी अधिक एक रचनात्मक स्पंदन।
मुझे समय की धूल में नहीं, शब्दों की रोशनी में सँभाल कर रखना।
मुझे भाषा और कला के हवाले कर देना—
वहीं मैं जीवित रहूँगा, शांत, मुक्त और उज्ज्वल।
प्रिय साथी,
यह पत्र लिखते समय शब्द काँप रहे हैं, पर मन अद्भुत रूप से शांत है—जैसे कोई उदास मौसम स्वयं बोल उठे।
आज उसी मौसम ने मुझसे कहा—
कि मैं उस कली के लिए कार्तिक का बादल था,
जो तपते सूरज के प्रकोप से कुम्हला रही थी;
जिसे वसंत के स्वागत में एक प्रेम-पुष्प बनना था।
यदि कभी तुम्हें मेरी उपस्थिति में शीतलता मिली हो,
यदि मेरे शब्दों ने तुम्हारी थकान पर हल्की-सी छाया रखी हो,
तो समझ लेना—मैं उसी बादल की क्षणिक छाया था।
बादल ठहरते नहीं, वे केवल बरस कर आगे बढ़ जाते हैं।
इस उदास मौसम ने मुझसे यह भी कहा—
कि हम स्मृतियों के उजड़े हुए चमन हैं।
हमारी आँखों में जो चमकता हुआ मोती है,
वह दो फूलों का रोना है—
एक तुम, एक मैं।
लेकिन प्रिय, रोना ही अंत नहीं होता।
कुछ प्रेम खिलने के लिए नहीं,
स्मृति बनने के लिए जन्म लेते हैं।
कुछ साथियाँ जीवन-पथ पर हाथ थामने नहीं,
आत्मा को दिशा देने आते हैं।
यदि मेरी किसी भूल से तुम्हारा मन आहत हुआ हो,
तो उसे भी इस मौसम की धूल समझकर क्षमा कर देना।
तुम्हें हँसते देखना ही मेरी अंतिम इच्छा है।
तुम जहाँ भी रहो, तुम्हारा वसंत तुम्हें अवश्य मिले—
तुम प्रेम-पुष्प बनो, पूर्ण, प्रस्फुटित, सुगंधित।
मेरे लिए मत रुकना, मत रोना।
मैं कोई विरह का बोझ नहीं,
मैं केवल एक रचनात्मक स्मृति हूँ—
मुझे शब्दों के हवाले कर देना,
कला की शांत शरण में छोड़ देना।
जब कभी कार्तिक का बादल घिर आए,
या आँखों में कोई मोती चमक उठे—
समझ लेना, वह मैं नहीं,
हमारे प्रेम का शुद्धतम अंश है
जो तुम्हें आशीष देने आया है।
अंतिम प्रणाम सहित,
तुम्हारा
— गोलेन्द्र पटेल
चंदौली, उत्तर प्रदेश।

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