Wednesday, 12 August 2026

जनपद चंदौली पर केंद्रित दो कविताएँ: गोलेन्द्र पटेल

चंदौली पर केंद्रित दो कविताएँ: गोलेन्द्र पटेल 
1).
चंदौलीगान

जय-जय चंदौली धरती, काशी का पूर्वी द्वार। 
धान-कटोरा भारत का, जन-जन का श्रृंगार॥
गंगा, कर्मनाशा बहतीं, चंद्रप्रभा मुस्काय। 
हरित वनों की गोद में, प्रकृति सुधा बरसाय॥
राजदरी-देवदरी की, झर-झर निर्मल धार। 
नौगढ़ पर्वत गूँज उठे, सुन वन का गुंजार॥
प्राचीन काशी की महिमा, तेरे कण-कण वास। 
इतिहासों की गाथाएँ, करतीं तेरा प्रकाश॥
बुद्ध-जैन-सनातन धारा, मिलकर गाएँ गीत। 
सह-अस्तित्व की संस्कृति से, जग में बनी पुनीत॥
रामगढ़ की पुण्य धरा पर, कीनाराम महान। 
लोकधर्म की ज्योति जली, बढ़ा मानव सम्मान॥
हेतमपुर का किला सुनाता, बीते युग की बात। 
अतीत और वर्तमान का, यहाँ अनोखा नात॥
माँ काली की शक्ति यहाँ है, लतीफ शाह की शान। 
मंदिर, मस्जिद, मठ, दरगाहें, बढ़ाएँ प्रेम विधान॥
खेत-खलिहान महकें प्रतिदिन, श्रम का हो सत्कार। 
अन्न उगाता किसान यहाँ का, धरती का आधार॥
लोकगीत की मधुर तान में, ऋतुओं का उत्सव। 
माटी से जुड़ा जीवन गाता, श्रम-सौंदर्य वैभव॥
वर्ष उन्नीस सौ सत्तानवे में, पाया जिला स्वरूप। 
विकास-पथ पर बढ़ता जाए, लेकर नव प्रतिरूप॥
ग्राम-ग्राम में जागे आशा, नगर करें विस्तार। 
शिक्षा, सेवा, श्रम और संस्कृति, हों जन-जन के द्वार॥
पूर्व में बिहार सुशोभित, पश्चिम काशी धाम। 
उत्तर गाज़ीपुर का सान्निध्य, दक्षिण सोनभद्र नाम॥
भारत की आत्मा का यह, अनुपम एक प्रतीक। 
जहाँ प्रकृति-संस्कृति संग-संग, रचतीं जीवन-लीक॥
जय-जय चंदौली धरती, गौरव गान अपार। 
धान-कटोरा भारत का, काशी का पूर्वी द्वार॥
जय चंदौली! जय चंदौली! जन-जन का अभिमान। 
श्रम-संस्कृति-इतिहास-प्रकृति, तेरी अमर पहचान॥
★★★

2).
चंद्रप्रभा के तट से चंदौली

विंध्य-कैमूर की गोद में, चट्टानों का संसार
नौगढ़-चकिया की घाटियाँ, हरित धरा शृंगार 
दक्षिणी अंचल वनमय, पथरीली हरियाली
निर्झर गाते शैल-शिखर, मनहर छवि मतवाली।

राजदरी-देवदरी झरें, चंद्रप्रभा के तीर
औरवाटांड़ गिरता नभ से, जलधारा गंभीर
कर्मनाशा-चंद्रप्रभा, जीवन के आधार
बाँध, सरोवर, गाँव मिल, रचते नव संसार।

धान-बान की हरितिमा, धरती का वरदान
जल-जंगल से साँस ले, चंदौली की जान
छठ-घाटों पर लोकमन, श्रद्धा से भरपूर
कजरी, बिरहा, सोहरें, संस्कृति के नूर।

दाल-भात, चटनी, अचार, सत्तू, बाटी-चोखा।
ठेकुआ, फरा, रसियाव, मिट्टी का स्वाद अनोखा॥
चौपालों की आत्मीयता, गमछा, खेत, किसान
श्रम-संस्कृति की सरलता, इसकी सच्ची शान।

सागौन-महुआ-तेंदुए, वन्य धरोहर साथ
हरियाली पर्यावरण की, जीवनमय सौगात
झरने, जंगल, धान और, लोक-हृदय की थाति
प्रकृति-संस्कृति संगम ही, चंदौली की जाति।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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कैमूर की गोद में बसा चंदौली, #चंद्रप्रभा के कल-कल झरनों, #राजदरी_देवदरी की मनोहारी जलधाराओं और #नौगढ़ के घने जंगलों से सजा प्रकृति का अनुपम उपहार है।

#धान_का_कटोरा_हरियाली_का_संसार — #चंदौली।

#झरनों_की_रुनझुन_जंगलों_की_शान — #चंदौली।

#कैमूर_की_गोद_चंद्रप्रभा_की_धार — #चंदौली_बेमिसाल।

#प्रकृति_जहाँ_मुस्काए_वही_चंदौली_कहलाए।

#राजदरी_देवदरी_की_छटा — #चंदौली_की_पहचान।

#धान_के_खेतों_से_लोकगीतों_तक — #चंदौली_की_अपनी_बात।

#भोजपुरी_संस्कृति #किसान_की_शान — #चंदौली_की_पहचान।

#वन_जल_खेत_और_लोक — #चंदौली_का_अनुपम_संगम।

#माटी_की_महक #झरनों_की_तान — यही है अपना #चंदौली_महान।

#प्रकृति_का_वैभव #संस्कृति_की_मिठास — #चंदौली_पूर्वांचल_की_खास।


#बाटी_चोखा के पारंपरिक स्वाद, #भोजपुरी_लोकगीतों की मिठास, खेतों की हरितिमा और आत्मीय लोकजीवन से सजा यह जनपद #प्रकृति, #कृषि और #लोकसंस्कृति का जीवंत संगम है।


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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

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Tuesday, 11 August 2026

निहत्थे संघर्ष का घोष : चुनार के जनयोद्धा—‘तू ज़माना बदल’ || यदुनाथ सिंह पटेल कौन थे?

निहत्थे संघर्ष का घोष : चुनार के जनयोद्धा—‘तू ज़माना बदल’

इतिहास की असली पहचान केवल उन चेहरों से नहीं होती जो सत्ता के शिखर पर दिखाई देते हैं। उसकी गहरी स्मृति उन लोगों से बनती है, जिन्होंने अपने समय की पीड़ा को निजी नियति मानकर स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे बदलने का संकल्प लिया। मिर्जापुर की चुनार विधानसभा की राजनीतिक स्मृति में यदुनाथ सिंह पटेल ऐसा ही एक नाम है—एक जनप्रिय नेता, जिसके पास परिवर्तन का सपना था, जनता का विश्वास था और संघर्ष का रास्ता था। हथियार नहीं थे, सत्ता की स्थायी छतरी नहीं थी; था तो केवल जनसरोकार, संगठन और वह अदम्य विश्वास—“तू ज़माना बदल।” नरायनपुर विकासखंड के नियामतपुर कला गांव की मिट्टी से निकले यदुनाथ सिंह पटेल का सार्वजनिक जीवन उस ग्रामीण भारत की कथा है, जहाँ खेत, किसान, अभाव, असमानता और आकांक्षा राजनीति के जीवंत प्रश्न हुआ करते थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान छात्र आंदोलनों से उनका जुड़ना उनके जीवन की निर्णायक घटना बनी। विज्ञान के विद्यार्थी से छात्र-नेता और फिर जननेता बनने की यह यात्रा बताती है कि उनके लिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति की सीढ़ी नहीं थी; वह सामाजिक यथार्थ को समझने और उससे टकराने की दृष्टि भी थी। विश्वविद्यालय के परिसर में विकसित हुई उनकी राजनीतिक चेतना धीरे-धीरे गांव और खेत तक पहुँची। विज्ञान वर्ग के छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में संगठन और नेतृत्व का जो अनुभव उन्होंने अर्जित किया, वह आगे चलकर व्यापक जनसंपर्क और चुनावी राजनीति में दिखाई पड़ा। गरीबी और सामाजिक विषमता को उन्होंने दूर से नहीं देखा था। यही कारण था कि उनके भीतर का विद्यार्थी-विद्रोह धीरे-धीरे किसान और आम आदमी के पक्ष में खड़ी जनप्रतिबद्धता में बदलता गया। चुनावी राजनीति में उनका पहला कदम सहज विजय का नहीं, संघर्ष और पराजय का था। मुगलसराय क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ना और हारना उनके लिए रुक जाने का कारण नहीं बना। वे अपने गृह क्षेत्र चुनार लौटे और जनता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की। चौधरी चरण सिंह की किसान-केन्द्रित राजनीति से निकटता ने उनके विचारों को ग्रामीण भारत के प्रश्नों से और गहराई से जोड़ा। आगे चलकर चुनार उनकी राजनीतिक कर्मभूमि बना।

1980 में मिली विजय केवल एक चुनावी सफलता नहीं थी; वह एक संघर्षशील ग्रामीण युवक के जननेता में रूपांतरण की सार्वजनिक स्वीकृति थी। इसके बाद 1980 और 1985 में लोकदल तथा 1989 और 1991 में जनता दल के प्रत्याशी के रूप में लगातार चार बार विधानसभा पहुँचना उनके व्यापक जनाधार का प्रमाण बना। चुनार की राजनीति को विशिष्ट जनाधार और किसान-केन्द्रित तेवर देने वाली उस पीढ़ी में यदुनाथ सिंह पटेल की अपनी अलग पहचान बनी। चार बार विधायक बनना उनके जीवन की सबसे दिखाई देने वाली उपलब्धि थी, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत को केवल चुनावी आंकड़ों में समेट देना उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनकी असली शक्ति जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता थी। वे राजनीति को पद प्राप्त करने की कला के बजाय सार्वजनिक उत्तरदायित्व मानते थे। सादगी उनके व्यक्तित्व का आभूषण नहीं, जीवन-पद्धति थी; ईमानदारी कोई चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि आचरण का आधार थी। उनकी लोकप्रियता का एक चर्चित प्रसंग 1991 के नामांकन जुलूस से जुड़ा है, जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किए जाने का उल्लेख मिलता है। किसी जननेता की लोकप्रियता का अंतिम प्रमाण कोई रिकॉर्ड नहीं हो सकता, फिर भी यह घटना उस दौर में उनके पीछे उमड़ी जनऊर्जा और संगठनात्मक क्षमता की एक झलक अवश्य देती है। उनकी राजनीति में भीड़ केवल संख्या नहीं थी; वह विश्वास का सामाजिक रूप थी। किन्तु लोकतांत्रिक राजनीति की राह केवल विजय-पर्वों से नहीं बनती। 1993 में चुनार से पराजय, उसके बाद बदलते राजनीतिक मंचों पर संघर्ष और चुनावी उतार-चढ़ाव उनके जीवन का हिस्सा बने। 1996 में जनता दल (सेक्युलर) से राजनीतिक सक्रियता, पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा की सभा का आयोजन, 2002 में राजगढ़ से चुनाव और 2007 में राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी के रूप में चुनार से अंतिम चुनाव—ये पड़ाव बताते हैं कि राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन से उनका संवाद बना रहा।

उनकी राजनीति में संगठन की भूमिका भी उल्लेखनीय थी। वे केवल मंच पर भाषण देने वाले नेता नहीं थे; लोगों को जोड़ने, राजनीतिक ऊर्जा को संगठित करने और जनसमर्थन को संघर्ष में बदलने की क्षमता उनके व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण पक्ष थी। इसी कारण उनके राजनीतिक जीवन को समझने के लिए चुनावी परिणामों से अधिक उस सामाजिक परिवेश को पढ़ना आवश्यक है, जिसमें एक ग्रामीण नेता अपने क्षेत्र के लोगों के बीच विश्वास अर्जित करता है। यदुनाथ सिंह पटेल का व्यक्तित्व उस दौर की ग्रामीण राजनीति की एक विशिष्ट परंपरा से जुड़ता है—जहाँ विधायक का अर्थ केवल विधानसभा में बैठने वाला प्रतिनिधि नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर लोगों के सुख-दुःख में सहभागी होने वाला व्यक्ति भी था। किसान, गरीब, ग्रामीण समाज और वंचित तबकों के प्रश्न उनके राजनीतिक सरोकारों के केंद्र में रहे। इसीलिए उनका नाम चुनार की राजनीतिक स्मृति में केवल एक निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील जननेता के रूप में दर्ज हुआ। उनके जीवन का सबसे अर्थवान प्रतीक शायद कोई चुनावी जीत नहीं, बल्कि उनका छोटा-सा वाक्य है—“तू ज़माना बदल।” यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा। इसमें ‘ज़माना’ केवल समय नहीं है; वह उन परिस्थितियों का नाम है जो मनुष्य को विवश, असमान और असहाय बनाती हैं। और इसमें प्रयुक्त ‘तू’ किसी भीड़ को संबोधित करने वाला अस्पष्ट संबोधन नहीं, बल्कि व्यक्ति की चेतना को सीधे झकझोरने वाला शब्द है। संदेश साफ है—परिवर्तन की प्रतीक्षा मत करो; परिवर्तन का आरंभ स्वयं से करो। व्यवस्था को कोसने के बजाय उसे बदलने की जिम्मेदारी स्वीकार करो। इसी अर्थ में यदुनाथ सिंह पटेल की राजनीति को ‘निहत्थी क्रांति’ कहा जा सकता है। उनकी शक्ति हिंसा में नहीं, लोकतांत्रिक संघर्ष में थी; भय पैदा करने में नहीं, विश्वास अर्जित करने में थी; व्यक्तिगत वैभव में नहीं, सार्वजनिक सादगी में थी। उनकी क्रांति का हथियार विचार था, उसका मैदान समाज था और उसकी ताकत जनता का विश्वास।

राजेश पटेल की पुस्तक ‘एक निहत्थी क्रांति—तू ज़माना बदल’ इसी जीवन-संघर्ष को स्मृति और दस्तावेज के बीच रखती है। किसी व्यक्ति की जीवनी तब अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जब उसके माध्यम से एक पूरा समय पढ़ा जा सके। यदुनाथ सिंह पटेल का जीवन भी ऐसी ही एक खिड़की है—जिससे उत्तर भारत की ग्रामीण राजनीति, किसान चेतना, छात्र आंदोलनों, लोकतांत्रिक संघर्ष और बदलते राजनीतिक परिदृश्य को देखा जा सकता है। समय ने उनकी सक्रिय राजनीति को पीछे छोड़ दिया। स्वास्थ्य ने उनके सार्वजनिक जीवन की गति को धीमा किया और अंततः वे राजनीतिक सक्रियता से दूर होते गए। किंतु किसी जननेता की वास्तविक विदाई उसके पद से नहीं, उसकी जनस्मृति से तय होती है। यदुनाथ सिंह पटेल इस कसौटी पर आज भी उपस्थित हैं। चुनार और मिर्जापुर में उनका नाम सम्मान से लिया जाना इस बात का संकेत है कि जनता कभी-कभी चुनावी परिणामों से परे जाकर भी अपने नेताओं का मूल्यांकन करती है।

उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई विधानसभा की सदस्यता, कोई राजनीतिक पद या कोई चुनावी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन की सादगी और संघर्ष की नैतिकता है। उन्होंने यह विश्वास जीवित रखा कि राजनीति यदि जनता से अपना रिश्ता न तोड़े, तो वह परिवर्तन की शक्ति बन सकती है। आज जब राजनीति के अर्थ पर लगातार बहस होती है—जब सत्ता और सेवा, पद और उत्तरदायित्व, लोकप्रियता और जनविश्वास के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है—तब यदुनाथ सिंह पटेल की स्मृति एक नैतिक प्रश्न की तरह सामने आती है। क्या राजनीति का लक्ष्य सत्ता है या समाज? क्या नेतृत्व का अर्थ पद है या जनता के प्रति उत्तरदायित्व? क्या समय को केवल सहना है, या उसे बदलने का साहस भी करना है? यदुनाथ सिंह पटेल का पूरा जीवन इन प्रश्नों का मौन उत्तर है। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका वह छोटा-सा वाक्य आज भी समय की दीवार पर लिखा हुआ प्रतीत होता है। वह स्मृति नहीं, चुनौती है; नारा नहीं, जीवन-दर्शन है; किसी एक नेता की निजी उक्ति नहीं, हर उस मनुष्य के लिए आह्वान है जो अन्याय को देखकर चुप रहने से इनकार करता है— तू ज़माना बदल।
★★★
टिप्पणीकार: गोलेन्द्र पटेल (
पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/अर्जक कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
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ईमेल : corojivi@gmail.com


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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Saturday, 8 August 2026

विश्व मूलनिवासी दिवस : अस्मिता से अधिकार तक || गोलेंद्र पटेल

विश्व मूलनिवासी दिवस : अस्मिता से अधिकार तक


9 अगस्त विश्व मूलनिवासी समुदायों की अस्मिता, संस्कृति, भाषा, परंपरा, पारंपरिक ज्ञान और मानवाधिकारों के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का दिन है। यह महज कैलेंडर पर अंकित एक दिवस नहीं, बल्कि उन समुदायों के इतिहास और अस्तित्व को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने पीढ़ियों से प्रकृति के साथ सहजीवन की ऐसी जीवन-पद्धतियाँ विकसित की हैं, जिनमें जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति के आधार हैं। उनकी लोकभाषाएँ, लोककलाएँ, स्मृतियाँ, रीति-रिवाज, सामुदायिक ज्ञान और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि मानव सभ्यता की साझा धरोहर हैं। इस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी है। 9 अगस्त 1982 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के Working Group on Indigenous Populations की पहली बैठक हुई थी। मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों और उनकी विशिष्ट परिस्थितियों को वैश्विक स्तर पर रेखांकित करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव 49/214 के माध्यम से प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World’s Indigenous Peoples के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इस पहल का उद्देश्य मूलनिवासी लोगों के मानवाधिकारों, सांस्कृतिक विशिष्टता, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और उनके सामने उपस्थित चुनौतियों के प्रति विश्व समुदाय को जागरूक करना तथा उनकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए सहयोग को बढ़ाना था। मूलनिवासी अस्मिता का प्रश्न केवल पहचान का प्रश्न नहीं, बल्कि अधिकार और न्याय का प्रश्न भी है। किसी समुदाय की पहचान तभी सुरक्षित रह सकती है, जब उसकी भाषा जीवित रहे, उसकी संस्कृति को सम्मान मिले, उसके पारंपरिक ज्ञान को मूल्यवान माना जाए और उसे शिक्षा, आजीविका, प्रतिनिधित्व तथा निर्णय-प्रक्रिया में समान अवसर प्राप्त हों। इसलिए 9 अगस्त का संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रह सकता; इसे सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के व्यापक प्रश्न से जोड़ना आवश्यक है। पहचान सम्मान की अधिकारी है, संस्कृति संरक्षण की अधिकारी है और अधिकार किसी सत्ता की कृपा नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा का आधार हैं। मूलनिवासी समाज का सम्मान किसी दूसरे समाज के अपमान पर आधारित नहीं हो सकता। अस्मिता का अर्थ अलगाव नहीं, आत्मसम्मान है; स्वाभिमान का अर्थ द्वेष नहीं, बराबरी है। इसलिए इस दिवस की सार्थकता तभी है, जब सांस्कृतिक विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, सह-अस्तित्व की शक्ति माना जाए। अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए दूसरे की पहचान का सम्मान करना ही लोकतांत्रिक और मानवीय समाज की पहचान है। मूलनिवासी अधिकारों की आवाज किसी जाति, धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन सभी प्रकार के भेदभाव और असमानता के विरुद्ध होनी चाहिए जो मनुष्य की गरिमा को जन्म, वंश, जाति या सामाजिक स्थिति के आधार पर विभाजित करते हैं।

आज सबसे बड़ी चुनौती सांस्कृतिक विरासत को केवल स्मृति में सुरक्षित रखने की नहीं, बल्कि उसे जीवंत रखने की है। मातृभाषाओं के संरक्षण, लोकइतिहास के दस्तावेजीकरण, पारंपरिक ज्ञान के सम्मान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं की सक्रिय भागीदारी और महिलाओं के अनुभव तथा नेतृत्व को महत्व दिए बिना कोई भी सांस्कृतिक संरक्षण अधूरा रहेगा। जिस समाज की भाषा कमजोर पड़ती है, उसकी सामूहिक स्मृति भी क्षीण होने लगती है; और जब स्मृति मिटती है, तब अस्मिता पर संकट गहराता है। इसलिए शिक्षा और चेतना मूलनिवासी समाज के सशक्तीकरण के सबसे प्रभावी माध्यम हैं। वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की थीम “Honouring Indigenous Midwives: Safeguarding Life and Well-being” रखी है। यह विषय मूलनिवासी समुदायों में पीढ़ियों से चली आ रही दाई-परंपरा और पारंपरिक ज्ञान को सम्मान देता है तथा मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य की सुरक्षा में मूलनिवासी दाइयों की भूमिका को रेखांकित करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मूलनिवासी ज्ञान केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए उपयोगी मानवीय ज्ञान-संपदा है। अतः 9 अगस्त को केवल बधाई और शुभकामनाओं तक सीमित कर देना इस दिवस की आत्मा को छोटा करना होगा। यह आत्मचिंतन, जागरूकता, शिक्षा, संगठन और अधिकार-चेतना का अवसर है। हमें अपनी भाषाओं, संस्कृतियों, इतिहास और पारंपरिक ज्ञान को बचाने के साथ-साथ प्रकृति और संसाधनों के संरक्षण के लिए भी सजग होना होगा। लोकतांत्रिक मूल्यों के भीतर समानता, न्याय और सम्मान की आवाज को मजबूत करना होगा। अंततः मूलनिवासी समाज का सम्मान केवल किसी एक समुदाय का सम्मान नहीं है; यह मानव विविधता, प्रकृति, श्रम, संस्कृति और साझा सभ्यता के सम्मान का प्रश्न है। जब कोई समाज अपनी जड़ों को पहचानते हुए समानता और मानवता की ओर बढ़ता है, तभी उसकी अस्मिता अधिकार में और उसका अधिकार गरिमा में बदलता है। 9 अगस्त हमें इसी यात्रा का स्मरण कराता है—अस्मिता से अधिकार की ओर, अधिकार से सम्मान की ओर और सम्मान से समान मानवता की ओर।
जय जोहार।
जय मानवता।
जय समानता।
★★★

★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

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Tuesday, 4 August 2026

जीवन में अकेलापन ज़रूरी है

चर्चित युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की दो कविताएँ:—
1).
अकेलापन : दर्शन की पहली कक्षा

समय सापेक्ष सच!
मैं एकांत प्रिय जन हूँ
दिल और दिमाग़ से दुखबोध ने कहा 
कि मैं दिशा, दृष्टि, दर्शन और दृष्टिकोण का जंक्शन हूँ
मेरे लिए 
अकेलापन
कोई खाली कमरा नहीं
जहाँ मनुष्य टूटता है
यह वह शून्य है
जहाँ शोर से थका हुआ मन
अपने ही प्रश्नों के सामने
निःशब्द खड़ा हो जाता है

जब रिश्तों की आवाज़ें
और समाज की तालियाँ
धीरे-धीरे
पीछे छूट जाती हैं
तब मनुष्य
पहली बार
ख़ुद से मिलता है
बिना परिचय
बिना भूमिका
बिना मुखौटे।

अकेलापन
मज़बूरी नहीं
एक अनुशासन है
चेतना का
यहीं
जीवन
अपने जैविक खोल को
चीरकर बाहर आता है
और मनुष्य
सोचने लगता है
कि वह केवल जी रहा है
या जीने का अर्थ भी जानता है

यहाँ प्रश्न जन्म लेते हैं
मैं कौन हूँ?
मेरा समाज क्या है?
और यह संसार
किसके लिए रचा गया है?
इन प्रश्नों का कोई उत्सव नहीं
कोई त्वरित उत्तर नहीं
बस
लंबी चुप्पियाँ हैं
जो धीरे-धीरे
दर्शन में बदल जाती हैं।

अकेलापन
न तो बीमारी है
न पराजय
यह वह गुरुकुल है
जहाँ मनुष्य
अपने भीतर
चेतना का पाठ पढ़ता है
यहीं
वह भीड़ से ऊपर उठकर
विचार करने वाला
असहमति करने वाला
और अर्थ खोजने वाला
मनुष्य बनता है।

दर्शन
किसी सभा में नहीं जन्मता
वह पैदा होता है
उस सामाजिक एकांत में
जहाँ मनुष्य
अपने होने की
पूरी जिम्मेदारी
स्वयं उठाता है

इसलिए
अकेलापन
समस्या नहीं
एक शिक्षक है
जो मनुष्य को
शांत
सार्थक
और
दार्शनिक बना देता है।
★★★
2).

अकेलापन: अंतर्यात्रा का आलोक

कहते हैं—
जब शब्द थक जाते हैं
तब मौन बोलता है
जब सारे रास्ते लौट जाते हैं
तब भीतर का पथ खुलता है
और जब मनुष्य सचमुच अकेला होता है
तभी वह अपने सबसे निकट होता है...

अकेला हूँ, मगर सुनसान बिल्कुल भी नहीं हूँ
मेरे भीतर अनगिनत संवाद अब भी जी रहे हैं
भीड़ जितनी दूर करती जा रही पहचान मेरी
उतने गहरे सत्य मुझमें दीप बनकर जी रहे हैं

चल रहा हूँ
धूप, वर्षा, शूल, पथरीली डगर में
मैं अकेला हूँ
मगर अपने ही विस्तृत समुंदर में।

जब सभी आवाज़ें थककर लौट जाती हैं
साँझ अपनी देह पर चुप्पी सजाती है
एक खिड़की मन के भीतर खुल ही जाती है
जहाँ न कोई प्रश्न छोटा, न कोई उत्तर बड़ा।

वहीं बैठा हुआ मैं अपने ही चेहरे से मिलता हूँ
अपने ही आँसुओं में अपना ही आकाश सिलता हूँ।

अकेला हूँ
मगर यह हार की पहचान कब है
यह तो मेरी चेतना का मौन अभिनंदन सब है
जो नहीं मिलता किसी उत्सव, किसी बाज़ार में
वह अकेलेपन की गहराई का ही धन सब है।

भीड़ ने मुझको बहुत समझाना चाहा
हँसने, गाने और बहलाना चाहा
मैंने देखा— 
चेहरे सारे मुस्कुराते थे
लेकिन भीतर अपने-अपने शून्य ढोते थे।

मैंने तब जाना
सबसे कठिन सफ़र भीतर की ओर जाता है
जिसे जगत तन्हाई कहता है
वही मनुष्य को अपने घर ले जाता है।

अकेलापन अभिशाप नहीं
यह प्रश्नों का प्रथम विद्यालय है
यहीं विचार जन्म लेते हैं
यहीं मनुष्य अपने होने का अर्थ पढ़ता है।

रात गहरी है
मगर रातों से रिश्ता पुराना है
एक तारा रोज़ मेरे द्वार पर चुपचाप आना है।

मैं उसी की लौ से अपने स्वप्न लिखता हूँ
टूटे हुए दिनों में भी नई सुबह का नाम लिखता हूँ।

यदि सभी दीप बुझ जाएँ
तो आँखें दीप बन जाएँ
यदि सभी स्वर सो जाएँ
तो धड़कन गीत बन जाए।

अकेला हूँ
मगर संसार मुझमें साँस लेता है
हर अधूरी प्रार्थना का स्वर मुझी में चेतता है
मौन मेरा शत्रु नहीं
वह मेरा प्रथम सहचर है
जिसकी उँगली थामकर मन सत्य की ओर बढ़ता है।

समय नदी था बहता आया
मैं तट की चुप रेत नहीं था
हर लहरों ने नाम मिटाया
फिर भी अपना खेत नहीं था
मैंने पगडंडी से पूछा,
“कितने पाँव गुज़रते होंगे?”
वह बोली, “जो लौट न पाएँ
वे ही मुझमें ठहरते होंगे।”

बूढ़ा बरगद हँसकर बोला,
“छाया देना धर्म वृक्ष का
फल मिल जाए या न मिले पर
सूख न जाए मर्म वृक्ष का।”
तब से मैंने सीख लिया है,
अपनी जड़ में जल भरना है
दुनिया चाहे फूल चुने या
मुझको केवल वृक्ष बनना है।

सूरज हर दिन नया निकलता
फिर भी अग्नि वही रहती है
देह बदलती रहती लेकिन
भीतर की ऋतु नहीं बहती है
जो भी मेरे साथ चला था
उसको अपनी राह मिली है
मैंने किसी हाथ को रोका?
इतनी कब परवाह मिली है!

रिश्ते यदि पंछी हैं तो फिर
उनको नभ का मान रहने दो
प्रेम अगर सचमुच निर्मल है
उसको निर्बन्ध उड़ने दो
मैंने बंधन कम ही बाँधे
मन को खुला गगन सौंपा है
जिसने मुझको छोड़ दिया
वह अपने भीतर ही रोपा है।

अब मैं कोई प्रश्न नहीं हूँ
उत्तर भी घोषित न करूँगा
जीवन जितना खोल सकेगा
उतना ही उद्घाटित करूँगा
शब्द नहीं हैं मेरे हथियार
शब्द धधकते हुए अंगारे
इनसे पहले खुद को गढ़ना
फिर जग से करना संवाद रे।

यदि इतिहास अँधेरा लिख दे
मैं भविष्य की स्याही बनूँगा
यदि कोई स्वर मौन पड़े तो
उसका पहला गायक बनूँगा
अकेलापन पथ का काँटा नहीं
यात्रा का पहला अनुशासन है
जो अपने भीतर दीप जलाए
वही मनुष्य स्वयं का दर्शन है।

धूल पड़ी थी मेज़ किनारे
एक पुरानी डायरी पर
कुछ अक्षर आधे जाग रहे थे
कुछ सोए थे अंतिम स्वर पर
मैंने उनको हाथ लगाया
जैसे कोई बीज जगाता
सूखी मिट्टी की नस-नस में
फिर से हरियाली भर जाता।

कितनी बातें लिखी न जातीं
फिर भी भीतर जीवित रहतीं
नदियाँ पहले मन में बहतीं
फिर धरती पर राहें कहतीं
मैंने देखा—
रचना केवल कागज़ भर नहीं होती
पहले जीवन गलता है
तब कोई पंक्ति जन्म लेती।

कुम्हारों के चाक सरीखा
दिन भर मन घूमता रहता
टूटे घड़ों की किरचों से भी
नया आकार निकलता रहता
हथेली की कठोर रेखाएँ
भाग्य नहीं, परिश्रम लिखतीं
पसीने की बूँदें अक्सर
पत्थर की भाषा भी पढ़तीं।

मैंने अपने घाव सहेजे
ज्यों लोहार सँभाले भट्ठी
दर्द पिघलकर ढलता देखा
नव औज़ारों की आकृति
अब मैं रोने नहीं बैठता
आँसू का उपयोग बदलता
जिस बूँद से दृष्टि धुँधलाती
उसी बूँद से शब्द सँवरता।

कल जो टूटा, वही कलम है
कल जो बिखरा, वही कथन है
जिसे समय ने मौन समझा
वह आने वाले कल का वचन है
मैं अपने श्रम का साक्षी हूँ
फल का कोई मोह नहीं
जो भीतर आकार बना ले
उससे बड़ा विजयोत्सव नहीं।

वह भी अपने हिस्से भर की
धूप हथेली पर रखती है
हँसते चेहरे की तह के नीचे
एक चुप्पी भी तो रखती है
दिनभर घर की साँस सँभाले
सबकी थाली, सबकी बातें
संध्या होते, अपने भीतर
कौन सुने उसके जज़्बातें?

मैं भी शब्दों का मज़दूर हूँ
चेहरों के बाज़ार से लौटा
जिसको सबने सफल कहा था
वह भीतर से कितना टूटा
वह चूड़ी की खनक बचाती
मैं स्वर की लय थामे रहता
दोनों अपने-अपने हिस्से
एक अधूरा मौसम सहते।

वह तकिए में सिर रखती है
नींद मगर आँखों तक कब है?
मैं काग़ज़ पर झुक जाता हूँ
उत्तर फिर भी हाथ न अब है
किसने किसको कम समझा है?
दर्द न स्त्री का, न नर का
पीड़ा का कोई लिंग नहीं है
रंग वही हर अंतःस्वर का।

यदि वह रोती घर भी रोता
यदि मैं चुप हूँ दिन भी चुप है
एक-दूजे की धड़कन में ही
जीवन का संगीत रूप है
चलो किसी निर्णय पर न आएँ
कौन अधिक या कौन अकेला
प्रेम तभी संपूर्ण बनेगा
जब दोनों का बँटे झमेला।

तुम अपनी निस्तब्धता लाना
मैं अपना अव्यक्त कथन लाऊँ
दो अधूरे स्वर मिल जाएँ
शायद पूरा जीवन गाऊँ
किसको लेकर कौन चला है?
किसको यहीं ठहरना होगा?
जन्म किसी की मुट्ठी में कब,
मृत्यु किसी से डरना होगा?

हम सब अपने-अपने क्षण के
क्षणभंगुर उत्सव के प्रहरी
साँस-साँस की पूँजी लेकर
लौट चलेंगे राह सुनहरी
जिसने पाया, उसने खोया
यही समय का सीधा लेखा
रिक्त हथेली आई जग में
रिक्त हथेली ने ही देखा।

स्त्री हो अथवा पुरुष, अंततः
दुःख का रंग एक ही होता
प्रेम अगर निष्काम न हो तो
मन भीतर ही भीतर रोता
जिसको अपने सत्य मिले हों
वह किससे फिर वैर करेगा?
जो अपने ही घाव समझ ले
वह किसका अपमान करेगा?

जीवन कोई युद्ध नहीं है
जिसमें केवल जीत बची हो
जीवन वह संगीत, जहाँ पर
हर चुप्पी की भी एक ऋचा हो
रोटी जितनी भूख की अपनी
उतनी ही सम्मान की चाह
प्रेम तभी पूरा कहलाए
जब सबको मिल जाए निगाह।

देना ही यदि सीख लिया तो
किसका घर निर्धन रह पाए?
दीप स्वयं जलने का साहस
सैकड़ों दिशाओं तक जाए
मैं अब अपने नाम से आगे
मानव होने का स्वर लिखता
हर चेहरे में अपना चेहरा
हर पीड़ा में अपना दुख दिखता।

यदि मेरी धड़कन से आगे
किसी अपरिचित का मन धड़के
समझूँगा, मेरे होने के
अर्थ समय से बाहर चमके
अकेला आया, अकेला जाऊँ
इतना भर जीवन का फल नहीं
जो अपने भीतर जग को जी ले
उससे बड़ा कोई संबल नहीं।

चलो, न कोई आगे-पीछे
न ऊँचा-नीचा, न अपना-पराया
हाथों में हाथ, हृदय में मानव
यही शिखर है, यही सरमाया
मैं भी तुम हूँ, तुम भी मैं हो
यही सत्य अंतिम उद्घोष है
प्रेम जहाँ निष्काम ठहरता
वहीं मनुष्य का वास्तविक वास है।
★★★
रचनाकार: गोलेन्द्र पटेल (पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।/बहुजन कवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
व्हाट्सएप नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


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#संक्षिप्त_परिचय:-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक : पूर्व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी'।

जन्म : 5 अगस्त, 1999 ई.

जन्मभूमि : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

शिक्षा : बी.ए. (हिंदी प्रतिष्ठा) व एम.ए., बी.एच.यू., हिन्दी से दो बार नेट पास। डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी, आगरा से बीएड। संस्कृत विभाग बी.एच.यू. से दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स। राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से दो वर्षीय संस्कृत डिप्लोमा कोर्स।

भाषा : हिंदी व भोजपुरी।

विधा : कविता, नवगीत, कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास व आलोचना।

माता : श्रीमती उत्तम देवी

पिता : श्री नन्दलाल

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन :

कविताएँ और आलेख -  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप' आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित एवं दर्जन भर से ऊपर संपादित पुस्तकों में रचनाएँ प्रकाशित हैं। पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होंगी।

प्रकाशनाधिन पुस्तक : 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), 'बहुजन महापुरुष और महापुरखिन', 'मेरा दुःख मेरा दीपक है' (कविता संग्रह)

काव्यपाठ : अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठियों में कविता पाठ।

सम्मान : अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं।

संप्रति : मानद महास्थविर, बौद्ध महाविहार खजूरगाँव

संस्थापक : १). ग्राम ज्ञान संस्थान, २). दिव्यांग सेवा संस्थान गोलेन्द्र ज्ञान एवं ३). छत्रपति शाहूजी महाराज सत्यशोधक संस्थान

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

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जनपद चंदौली पर केंद्रित दो कविताएँ: गोलेन्द्र पटेल

चंदौली पर केंद्रित दो कविताएँ: गोलेन्द्र पटेल  1). चंदौलीगान जय-जय चंदौली धरती, काशी का पूर्वी द्वार।  धान-कटोरा भारत का, जन-जन का श्रृंगार॥...