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Golendra Gyan

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Saturday, 3 October 2026

‘पटेल’ : सत्ता में उपस्थित, साहित्य में अनुपस्थित

‘पटेल’ : सत्ता में उपस्थित, साहित्य में अनुपस्थित

जब ‘पटेल’ मूलतः एक प्रशासनिक पद था, तो यह जातिसूचक शब्द कब और कैसे बन गया? ‘पटेल’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘पट्टकिल’ (paṭṭakila) से मानी जाती है, जिसका संबंध राजकीय भूमि के पट्टेदार, भू-धारक तथा ग्राम-प्रशासन से जुड़े पदाधिकारी से था। भाषाई रूपांतरण के क्रम में यह प्राकृत के ‘पट्टइल’ (paṭṭaïlla) से होते हुए विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित हुआ और आगे चलकर गुजराती में ‘पटेल’ तथा मराठी में ‘पाटिल/पाटील’ के रूप में प्रचलित हुआ। ऐतिहासिक संदर्भों में ‘पटेल’ ग्राम-प्रधान अथवा ग्राम-स्तरीय राजस्व एवं प्रशासनिक दायित्व निभाने वाले व्यक्ति की पदवी रहा है। कालांतर में यही पदवी उपाधि, फिर पारिवारिक उपनाम और अनेक संदर्भों में सामुदायिक पहचान का सूचक बन गई। यहीं से प्रश्न उठता है; जो शब्द कभी ग्राम-प्रशासन में एक भूमिका का परिचायक था, वह आज जाति की पहचान का पर्याय कैसे बन गया? आधुनिक भारत में ‘पटेल’ उपनाम से सर्वाधिक चर्चित ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में सरदार वल्लभभाई पटेल (1875–1950) का नाम प्रमुख है। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री रहे तथा भारतीय रियासतों के एकीकरण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। तो, प्रिय पुरखे सरदार पटेल जी, सवाल केवल यह नहीं कि ‘पटेल’ कौन है; सवाल यह भी है कि ‘पटेल’ को हमने क्या बना दिया है?

प्रिय पुरखे सरदार वल्लभभाई पटेल जी!

हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रमों में ‘पटेल’ उपनाम वाला कोई साहित्यकार शामिल नहीं है। TGT, PGT और Assistant Professor जैसी भर्ती परीक्षाओं की गाइडों में भी ‘पटेल’ उपनाम वाले किसी कवि-लेखक का उल्लेख नहीं है।

विडंबना देखिए—इस देश में ‘पटेल’ उपनाम के साथ संसद भवन तक पहुँचना, विश्वविद्यालयों के साहित्यिक पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं की गाइडों तक पहुँचने से कहीं अधिक आसान है।

‘पटेल’ सरनेम धारण करने वाले साहित्यकारों का पाठ्यक्रमों में शामिल न होने की यह केवल मेरी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है; अन्य ओबीसी समुदायों के सरनेम से जुड़े अनेक रचनाकारों के संदर्भ में भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है। मैं यह बात किसी के प्रति शिकायत या विरोध के भाव से नहीं, बल्कि साहित्य की व्यापकता, प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण स्मृति की चिंता के साथ कह रहा हूँ। साहित्य तभी सचमुच लोक का साहित्य बनता है, जब उसमें समाज के विविध समुदायों, अनुभवों और आवाज़ों के लिए जगह हो।

बहरहाल, पढ़े-लिखे और जागरूक लोगों का एक बड़ा वर्ग जातिसूचक सरनेम से दूरी बना रहा है। संभव है, मेरे बाद ‘पटेल’ सरनेम धारण करने वाली पीढ़ी ही विरल हो जाए। तब शायद साहित्य के पन्नों पर ‘पटेल’ केवल एक जातिसूचक पहचान नहीं, बल्कि एक साहित्यिक स्मृति बनकर रह जाए।

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टिप्पणीकार : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक/ B.Ed., दो बार UGC NET पास, UPTET पास, संस्कृत में डबल डिप्लोमाधारी, पूर्व शिक्षार्थी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
संपर्क सूत्र :-
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
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कवि : गोलेन्द्र पटेल Golendra Gyan | बहुजन साहित्य, हिंदी कविता और सामाजिक न्याय #GolendraPatel #GolendraGyan #बहुजन_साहित्य #हिंदी_कवि


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