दूर्गंध सूँघने
समय
सड़े
समय के पास
चुपचाप
बंजर खेत में।
सड़ चुके हैं
कुछ सड़ रहे हैं
कुछ गाँव में मरें हैं
कुछ सगड़ी पर लदे आ रहे हैं
समयानुसार
सड़े
समय के पास
हम-आप
चेत में।।
हरे-भरे
फ़सल के बीच
मेंड़ पर
एक चतुर चिड़िया आयी
जो
लक्ष्य के पेड़ पर
चोंच में
कुछ दबा दनादन
आ-जा रही हैं
किसी सोच में
इधर उधर
ताक झाँक कर
कवि की ओर देख रही है
तरह तरह के घास
हवा के झोंके चूम-
झूम रहे हैं
घूम रहे हैं
खड़े खड़े
हो
एकदम मग्न
यहाँ तक की
एक दो नग्न
भी हैं।
गेहूँ दो बिता के हैं
तीसी तरुणी तरु
कि बात न पूछो
एकाएक एक
सुगंध सूँघ
दिल दे दी
चिड़िया को।
श्वास!
द्वंद्व युद्ध में
हताश
मन!
विजय का ख़ास
अस्त्र उल्लास
उम्मीद की किरण हैं
एत में।।
काव्य सृजन के समय
समीर संग निर्भय
देख रहा हूँ
सुबह से शाम तक
स्मृतियों के आकृतियाँ
आकाशगंगा के रेत में।
-गोलेन्द्र पटेल
रचना : 19-01-2020


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