“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
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Golendra Gyan
Tuesday, 21 April 2020
नामवर सिंह (आलोचक आलोक) : गोलेन्द्र पटेल
वर्तमान ‘साहित्य और आलोचना’ के युग पुरुष ‘दूसरी परंपरा की खोज’ कर ‘हिंदी में अपभ्रंश का योग’ जता कर ‘कविता की ज़मीन, ज़मीन की कविता’ को ‘कविता के नए प्रतिमान’ प्रदान करते हैं| आज उनका जाना भले ही एक युग का अंत हो लेकिन जब तक इस ज़माने में अभिव्यक्ति का प्रश्न बना रहेगा तब तक नामवर सिंह भी हमारे बीच मौजूद रहेंगे|
विचार दृष्टि अथवा प्रतिमानों के प्रति प्रतिबद्ध आलोचक उनके बाद शायद ही कोई दूसरा हुआ होगा। युगबोध और भावबोध के बीच समन्वय करने वाले आलोचक नामवर सिंह ‘अच्छे’ या ‘बुरे’ जैसे शब्दों को साहित्य की परिधि से दूर ही रखते हैं। उनके लिए साहित्य की अपनी कुछ रूढ़ियां हैं, कुछ प्रतिमान हैं जिनके आधार पर या तो कोई रचना खरी उतरती है या नहीं। इन सब के बीच नामवर सिंह इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि समकालीन जगत में साहित्य के प्रतिमानों में बदलाव की आवश्यकता है। समय की इस ज़ोर जरूरत के चलते नामवर जी की सफलता भी तभी है जब आज का आलोचक उस दूसरी परंपरा के मध्य में से किसी नई परंपरा का अन्वेषण करे जो अपने युगबोध के साथ तालमेल बैठा पाए।
हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन !
हैं टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा है मन !
हैं टूट रहे दुपहर के स्वर
जाने कैसा लगता जीवन !
केदारनाथ सिंह : चौपाल विशेषांक
कामेश्वर जी की इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि यह अंक उनके न होने के बाद उनको महसूसने के रोमांचक आमंत्रण की तरह है। यूं तो केदारनाथ सिंह पर बातें तब तक होती रहेंगी, जब तक कविता पर बातें होती रहेंगी लेकिन इस अंक में उन्हें और उनकी कविता को समझने की एक बड़ी और व्यापक कोशिश दिखाई पड़ती है। इसमें एक आलेख मेरा भी है।
Monday, 20 April 2020
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहासदृष्टि : सम्प्रदायिक ,जातिवादी / वर्णवादी है या नहीं - गोलेन्द्र पटेल
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औपनिवेशिक काल का यह यह चित्र उस चित्र कुछ ऊपरी हिस्से से मेल खाता है जिसमें आम्बेडकर भी फिरंगी टाई और कोट से शुक्ल की तरह लैस हैं।पहनावे का अंतर सिर्फ इतना है कि आंबेडकर नीचे फूल पेंट पहनते थे और शुक्ल धोती। इसलिए आंबेडकर और शुक्ल दोनों
पर औपनिवेशिक पाश्चात्य चेतना का घर प्रभाव है।उपनिवेशवाद हमारी भलाई के लिए नहीं आया था,अब यह जगजाहिर है।
शुक्ल में प्राच्य जातिवादी साम्प्रदायिक चेतना का भी प्रभाव है।लेकिन इस पर कमोवेश बहस लंबे समय से होती रही है।फिर इसमें नया क्या है?नया है देश काल और उसका प्रोडक्ट।।
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बात चली है तो ध्यान रखिए कि यह सनसनी साहित्य में सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारन्टीन की उपज है। एकेडमिक जगत पाखण्ड और अवसरवाद के लॉक डाउन का शिकार लंबे समय से है। इसलिए नियति के ये दिन आने ही थे।
हिंदी के कुएं में पानी जैसे जैसे कम होता जाएगा,मेढ़क की टर्र टर्र बढ़ती जाएगी।सच तो यह है कि आलोचना और शोध से छत्तीस के आंकड़े रखनेवाले के एकेडमिक कुल का विस्तार लगातार होता रहा और उसको हमारे योग्य आचार्यों ने बेशर्म बढ़ावा दिया।आज उसकी कूट फसल यह पीढ़ी है।
जब शोध और आलोचना के नाम पर घर धुलाई,कार पोछाई,ओझाई और चेलाई ही करवानी है तो उसका सह उत्पाद ऐसा ही होगा।।
हिंदी के शीर्ष आलोचकों ने विश्व ज्ञान को साधा था,तब कुछ दे गए।जो दे गए चाहे शुक्ल-द्विवेदी हों या नामवर-मैनेजर उनकी जड़ें प्राच्य और पश्चिम की ज्ञान और साहित्य परम्परा में सतर्क ढंग से धंसी हुई है।
दुनिया के दो समकालीन मार्क्सवादी आलोचक टेरी ईगलटन और फ्रेडरिक जेमेसन को पढ़िए तो पता चलता है कि वे अपनी परंपरा से कितने जुड़े हैं।
असहमति का साहस और सहमति का विवेक दोनों हमारे आसपास रणनीति के तहत नष्ट किए गए हैं। जातिवादी और कुलीन ब्राह्मण समुदाय को शुक्ल जी पसंद हैं तो यह दोनों का दुर्भाग्य है और इसी कारण दलित को शुक्ल जी से घृणा है तब भी दोनों की बदनसीबी है।
वस्तुतः नवकुल नक्काल की भड़ैती ही उनका साहित्यिक शगल है।एक कहावत है यथा गुरु तथा चेला/मांगे गुड़ दे ढेला।
मुझे तो इस बहस में सनसनी,उत्तेजना,अनपढपन और तथ्यहीनता ही ज्यादा दिख रही है।जिस बहस का मूल ही अनपढपन और अवसरवादी सनसनाहट का शिकार हो उसके अतिरिक्त विस्तार का नतीजा रिक्त ही होगा।
कोरोना महामारी की विकट घड़ी में जिस तरह सत्ता जात धरम की राजनीति से मानवता को घायल कर रही है,उसी का बाई प्रोडक्ट यह उथला एकालाप है।जहाँ देखिए हिंदी के मास्टर और एकेडमिक जगत से परमकुंठा पालने वाले कथित लेखक मच्छर गान गाए जा रहे हैं।न राग न लय, फिर भी प्रलय!!!...
दूसरे वरिष्ठ के सशक्त प्रतिरोधी कनिष्ठ हैं| ऐसे कनिष्ठ हैं कि अभी दो दिन शोध में आए हुआ है, और मुझे नहीं लगता कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास को ठीक से पढ़ा भी है, लेकिन करें क्या कि प्रासंगिकता के लिए शुक्ल जी से ही टकरा गए|
साहित्य की भूमिका' में ऐसे नये शोध ,आलोचना,विमर्श के मार्ग मिलते हैं... मैं हिन्दी के विद्वानों को इस पर अपने विचार रखने के लिये आमन्त्रित करता हूँ।
फेसबुक पर शुक्ल जी पर अब कुछ लिखना उमड़ते उदधि में कागज की नाव तैराने जैसा हो गया है,पर वादा किया था, सो जाति के प्रश्न पर भी अपनी बात रखूंगा |
दूसरे वे भारतीय रसवाद के गहरे असर में थे|रसवाद आस्वाद को महत्व देता है |आस्वादन के लिए 'सहृदय'होना अनिवार्य है |सहृदयता की भी शर्त वही 'शिक्षित जनता 'पूरी करती थी |इसीलिए जातिव्यवस्था( चिंतामणि भाग-4)जैसा विचारोत्तेजक निबंध लिखने वाले शुक्ल जी लोक की 'प्रकृति भावधारा' की ताकत को समझते हुए (द्वितीय उत्थान :काव्यखंड) भी पुराणवादी शिक्षित जनता की पूंछ नहीं छोड़ पाते|
शुक्ल जी ने जो कवियों की जाति का जरूर से जरूर उल्लेख किया है यह उन्हें साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में शिवसिंह सेंगर के यहां से मिलता है |जो लोग यह समझते हैं कि शुक्ल जी का इतिहास मौलिक है, वे कुछ नहीं जानते|शुक्ल जी ने इतिहास लेखन का पैटर्न ग्रियर्सन,मिश्रबंधु और बंग्ला के इतिहास लेखक दिनेशचंद सेन से लिया, शोध पूरा का पूरा मिश्रबंधुओं के विनोद व सभा की रिपोर्ट से लिया, हां आलोचना दृष्टि में मौलिकता है|कवि परिचय लिखते लिखते शुक्ल जी जो मूल्यवान टिप्पणियां करते चलते हैं यह आदत 'शिवसिंह सरोज' में मुसलसल मौजूद है, भले सरोजकार का बोध शुक्ल जी के स्तर का नहीं है |
उन्हें जातिवादी कहते समय यह भी ध्यान देना चाहिए कि मिश्रबंधु और शुक्ल जी का इतिहास दोनों नवजागरण की ही उपज हैं, नवजागरण ऊपरी तौर पर जाति वगैरह का खण्डन करता है, पर उसके झंडाबरदार चूंकि ऊंची जातियों से आये थे, सो उनके दृष्टिपथ में वर्णवाद का घुसना स्वाभाविक था, जो शुक्ल जी के साथ भी हुआ|यही कारण है कि शुक्ल जी की दृष्टि उलझी हुई नजर आती है |उनके भक्त और आलोचक दोनों अपनी सुविधानुसार कोटेशन तलाश सकते हैं |मेरे विचार से सांप्रदायिक नहीं थे,और जहां हुए हैं, वहां औपनिवेशिक दृष्टि का शिकार होने के नाते हुए हैं |वे अपनी समझ में जातिवादी नहीं हैं पर संस्कार,परंपरा और अपने द्वारा बनाई गयी साहित्य की मान्यताओं की फँसरी के जहां जहां शिकार होते हैं जातिवादी या कहें वर्णवादी हो उठते हैं|
कुछ उदाहरण देता हूँ। ऐसे उदाहरण बहुतेरे है।
-- भूषण को लेकर उनका वक्तव्य
उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।"
--हिंदू जाति के प्रतिनिधित्व कर्ता के रुप में
शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।"
-- "वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"
--कबीर के बारे में
कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।"
--सूरदास को लेकर
"इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।"
आखिर कोई बतायेगा ये किस प्रकार की इतिहास दृष्टि है।मैं तो उनकी इस किताब को "विसंगतियों का इतिहास" कहना पसन्द करूँगा। जो ज्यादा उपयुक्त है।अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि उस समय की परिस्थिति कुछ और थी। तो ठीक है इस समय और परिस्थिति अब बदल चुकी है,और इनकी यह किताब भी अप्रसांगिक साबित हो चुकी है। हाँ ये कर सकते हैं कि इसे "मरे हुई लाश" के तरीके उपयोग किया जा सकता है। जो ज्यादा उपयुक्त है।
अब वर्तमान में एक नई इतिहास दृष्टि, एक नई सोच की तहत सहित्योइतिहास की रचना की जानी चाहिए! आप कह सकते हैं कि किताबें बहुत सारी लिखी गई है। लेकिन मैं फिर से कहूँगा कि जो भी इतिहास लिखी गई है आज तक वह सिर्फ इनकी ही विचारों का पिष्टपेषण किया गया है। उसमें उनका कोई मौलिक विचार या, स्वतन्त्र तरीका नही है सोचने का, वह इन्ही के माध्यम से अपनी बातों को शुरू करते हैं।अंत तक इन्ही का खंडन-मण्डन करते चले जाते हैं। आज तक सारे सहित्योइतिहास के रचनाकारों ने यही किया। जिनके कारण ही उनकी ये किताब आज तक अपनी अस्तित्व बनाई हुई है। अगर वो एक नई तरीके से सोचते तो आज ये "आउटडेटेड" किताब पढ़ने की आवस्यकता नही होती।
कुछ बयान सुनवाता हूँ आपको! जो पहले ही इनके सामने हथियार डाल देते हैं। बिल्कुल नतमस्तक हो जातें है।
-- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ..... फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है।
ऐसे बहुतेरे कथन आपको मिल जायेगा। आप ढूंढ सकते हैं। चतुर्वेदी जी से लेकर बच्चन तक, रामविलास से लेकर नामवर जी तक। बहरहाल इसका एकमात्र कारण है इनके विचारों से ही "खण्डन-मण्डन" की शुरआत करना।
--"आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।"
कौन सी गुरु गम्भीरता कौन --हाँ
---आदिकाल के साथ शुद्ध और अशुद्ध साहित्य के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---भक्तिकाल जो जनवादी चेतना का उभार था उसके साथ ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---रीतिकाल में श्लीलता-अश्लीलता के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---छायावाद के साथ रहस्यवाद के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
छायावाद के बाद बालें प्रकरण पर कुछ भी कहना बेईमानी होगी चाहे वह गद्य विधा हो या पद्य का।
इनके इतिहास की जो किताबों है। उसका दूसरा संस्करण 1940 है। तो निश्चित है। उसके बाद की इतिहास इसमें कम मिलने वाली है।मुमकिन ही नही है।यानि कि करीबन 60 वर्षों का इतिहास गायब, फिर भी इतना ज्यादा प्रासंगिक होना! कितना आश्चर्यजनक है न! मैं आखरी बात कहना चाहूँगा की यह किताब "आउटडेटेड" हो चुकी है। आपको इसे जिस खोह-कंदरा में डालना हो डालें, लेकिन अकेडमिक दुनिया से इसे बाहर करें।
क्योंकि यह मेरे समकालीन नही ठहरता। समकालीन का अर्थ प्रसांगिकता से लें!इस प्रकार, भले ही रैदास और कबीर मध्यकाल के कवि ठहरते हैं। और दुष्यन्त कुमार और राजेश जोशी आधुनिक काल के लेकिन अगर कबीर के विचार हमारे लिए प्रसांगिक है तो भले ही वह मध्यकाल के हों लेकिन वह "मुझे" मेरे समकाल नज़र आते हैं। और अगर राजेश जोशी का विचार पुरातनपंथी है। तो भले ही वह आधुनिक काल के कवि हैं लेकिन वो मेरे लिए समकालीन नही है और अप्रसांगिक भी।
उसी प्रकार कुल-मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि रामचंद्र शुक्ल की जो इतिहास की किताब है वो "आउटडेटेड" हो चुकी है।
पिछले दो दशकों में हिन्दी साहित्य में हुए पाँच उल्लेखनीय/महत्वपूर्ण/श्रेष्ठ शोधकार्य : भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभागों में हुए शोधकार्य का नाम बताइये, जिन्हें आज और आने वाले समय में हिन्दी पाठकों,विद्यार्थियों,शोधार्थियों के समक्ष प्रतिमान के रूप में पेश किये जा सकें।
बात जरा अगम्भीर लगे तो भी।
अब मूल बात कि क्या आप में से कोई किसी ऐसे व्यक्ति का नाम बता सकता है जो शुक्ल का इतिहास पढ़कर साम्प्रदायिक या जातिवादी हुआ हो?.....
-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल!
Saturday, 18 April 2020
हिंदी आलोचना के अमर आचार्य【हिंदी आलोचना के भगवान 】 : आचार्य रामचंद्र शुक्ल
कुछ उदाहरण देता हूँ। ऐसे उदाहरण बहुतेरे है।
-- भूषण को लेकर उनका वक्तव्य
उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।"
--हिंदू जाति के प्रतिनिधित्व कर्ता के रुप में
शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।"
-- "वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"
--कबीर के बारे में
कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।"
--सूरदास को लेकर
"इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।"
आखिर कोई बतायेगा ये किस प्रकार की इतिहास दृष्टि है।मैं तो उनकी इस किताब को "विसंगतियों का इतिहास" कहना पसन्द करूँगा। जो ज्यादा उपयुक्त है।अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि उस समय की परिस्थिति कुछ और थी। तो ठीक है इस समय और परिस्थिति अब बदल चुकी है,और इनकी यह किताब भी अप्रसांगिक साबित हो चुकी है। हाँ ये कर सकते हैं कि इसे "मरे हुई लाश" के तरीके उपयोग किया जा सकता है। जो ज्यादा उपयुक्त है।
अब वर्तमान में एक नई इतिहास दृष्टि, एक नई सोच की तहत सहित्योइतिहास की रचना की जानी चाहिए! आप कह सकते हैं कि किताबें बहुत सारी लिखी गई है। लेकिन मैं फिर से कहूँगा कि जो भी इतिहास लिखी गई है आज तक वह सिर्फ इनकी ही विचारों का पिष्टपेषण किया गया है। उसमें उनका कोई मौलिक विचार या, स्वतन्त्र तरीका नही है सोचने का, वह इन्ही के माध्यम से अपनी बातों को शुरू करते हैं।अंत तक इन्ही का खंडन-मण्डन करते चले जाते हैं। आज तक सारे सहित्योइतिहास के रचनाकारों ने यही किया। जिनके कारण ही उनकी ये किताब आज तक अपनी अस्तित्व बनाई हुई है। अगर वो एक नई तरीके से सोचते तो आज ये "आउटडेटेड" किताब पढ़ने की आवस्यकता नही होती।
कुछ बयान सुनवाता हूँ आपको! जो पहले ही इनके सामने हथियार डाल देते हैं। बिल्कुल नतमस्तक हो जातें है।
-- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ..... फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है।
ऐसे बहुतेरे कथन आपको मिल जायेगा। आप ढूंढ सकते हैं। चतुर्वेदी जी से लेकर बच्चन तक, रामविलास से लेकर नामवर जी तक। बहरहाल इसका एकमात्र कारण है इनके विचारों से ही "खण्डन-मण्डन" की शुरआत करना।
--"आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।"
कौन सी गुरु गम्भीरता कौन --हाँ
---आदिकाल के साथ शुद्ध और अशुद्ध साहित्य के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---भक्तिकाल जो जनवादी चेतना का उभार था उसके साथ ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---रीतिकाल में श्लीलता-अश्लीलता के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---छायावाद के साथ रहस्यवाद के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
छायावाद के बाद बालें प्रकरण पर कुछ भी कहना बेईमानी होगी चाहे वह गद्य विधा हो या पद्य का।
इनके इतिहास की जो किताबों है। उसका दूसरा संस्करण 1940 है। तो निश्चित है। उसके बाद की इतिहास इसमें कम मिलने वाली है।मुमकिन ही नही है।यानि कि करीबन 60 वर्षों का इतिहास गायब, फिर भी इतना ज्यादा प्रासंगिक होना! कितना आश्चर्यजनक है न! मैं आखरी बात कहना चाहूँगा की यह किताब "आउटडेटेड" हो चुकी है। आपको इसे जिस खोह-कंदरा में डालना हो डालें, लेकिन अकेडमिक दुनिया से इसे बाहर करें।
क्योंकि यह मेरे समकालीन नही ठहरता। समकालीन का अर्थ प्रसांगिकता से लें!इस प्रकार, भले ही रैदास और कबीर मध्यकाल के कवि ठहरते हैं। और दुष्यन्त कुमार और राजेश जोशी आधुनिक काल के लेकिन अगर कबीर के विचार हमारे लिए प्रसांगिक है तो भले ही वह मध्यकाल के हों लेकिन वह "मुझे" मेरे समकाल नज़र आते हैं। और अगर राजेश जोशी का विचार पुरातनपंथी है। तो भले ही वह आधुनिक काल के कवि हैं लेकिन वो मेरे लिए समकालीन नही है और अप्रसांगिक भी।
उसी प्रकार कुल-मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि रामचंद्र शुक्ल की जो इतिहास की किताब है वो "आउटडेटेड" हो चुकी है।
लंबे समय से भारतीय समाज की सामाजिक-संरचना जिस ढांचे में चलती आई है वह ढांचा ब्राह्मणवाद/मनुवाद का ढांचा है। गोपेश्वर सिंह ने लिखा है मनुवाद/ब्राह्मणवाद का रूप हमेशा से एक जैसा नहीं रहा है। उसने जितना बाहरी दबाओं से खुद को बदला है उतना ही अपने भीतरी संवादों से भी। जिस तरह का सामाजिक-ढांचा 3-4शताब्दी में था वैसा ही शंकराचार्य के समय में नहीं रहा। शंकराचार्य के समय का ढांचा रामानंद और भक्त कवियों के यहां बदले हुए रूप में दिखाई देता है। उसी ब्राह्मणवादी/मनुवादी समाज व्यवस्था से निकले विवेकानंद और गांधी अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद आधुनिक ख़यालों के व्यक्ति हैं। प्रेमचंद,निराला,प्रसाद और रामचन्द्र शुक्ल जिस भावभूमि पर खड़े होकर विचार कर रहे थे आज का लेखक उससे आगे खड़ा होकर बात करता है। शुक्ल की कविता सम्बन्धी बहुतेरी मान्यताओं को मुक्तिबोध ने अपने लेखन के द्वारा खारिज किया है। 'अंधेरे में' कविता और 'एक साहित्यिक की डायरी' और 'नई कविता का आत्मसंघर्ष और अन्य निबंध' नामक किताब इस सम्बन्ध में पर्याप्त मदद करेगी। रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना के मान और मूल्य को नामवर जी ने छायावादी संस्कार कहा है। 'कविता के नए प्रतिमान' किताब देखी जा सकती है। उन संस्कारों से मुक्त हुए बिना कविता के नए प्रतिमान तय नहीं किये जा सकते ऐसी उनकी मान्यता है। उससे आगे भी एक पूरी परम्परा है जो इसी तरह संवाद करते हुए आगे बढ़ी है।
एजेंडे के तहत किसी का विकल्प नहीं तलाशा जा सकता। विकल्प अपनी सभ्यता और संस्कृति से संवाद करते हुए ही विकसित होते हैं। विचार की दुनिया में दाख़िल-खारिज नहीं चलती। संवाद चलता है। संवाद करते हुए आगे बढ़ने की प्रवृत्ति हमेशा से प्रगतिशील मानी गई है।
इस विकासक्रम को आप दुनियाभर में हुई क्रांतियों के साथ भी जोड़कर देख सकते हैं। रेनेसॉ हो,आधुनिकता हो, दुनियाभर की तमाम औद्योगिक क्रांतियां हों,फ्रांस की राज्यक्रांति हो या रूस की बोल्शेविक कोई भी अचानक नहीं घटित हुई हैं। उनके पीछे एक लंबा वैचारिक संघर्ष और संवाद रहा है।
घोषणाएं तानाशाहों की निशानी हुआ करती हैं। जब हम इस देश के जड़ विचारों से लड़ रहे हैं तो हमें नए हथियार तलाशने की जरूरत है। नफरत का जवाब और नफरत नहीं है। झूठ को झूठ से नहीं पराजित किया जा सकता।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास पर जब विचार-विमर्श , आरोप -प्रत्यारोप, आलोचनाएँ हो ही रहीं हैं, तो कुछ विचार-विमर्श इसपर भी हो कि - आचार्य शुक्ल के इतिहास में कितनी ऐसी नई अन्तरदृष्टियाँ हैं, जिनकों लेकर नये-नये शोध , नये-नये विचार विमर्श और आलोचनाओं के मार्ग प्रशस्त होते हैं । मुझे तो आचार्य शुक्ल से ज़्यादा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की 'हिन्दी
साहित्य की भूमिका' में ऐसे नये शोध ,आलोचना,विमर्श के मार्ग मिलते हैं... मैं हिन्दी के विद्वानों को इस पर अपने विचार रखने के लिये आमन्त्रित करता हूँ।
(आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली, भाग -4, पृ.-२०२)
स्त्री विमर्श का अर्थ "वामा- विलाप" नहीं है ...
मेरा कहना था - " छोटे भाई इतना समय नहीं है कि केवल फेसबुक मेंटेन कर पाऊं | पोस्ट लिखना, तर्क- वितर्क करना और आजकल कुतर्क भी करना, फिर गोष्ठी बैठाकर एक- एक कमेन्ट पर विमर्श करना और उसके बाद कैसे "चापलूसी विधा" को आगे बढ़ाएं - इस पर अनुसंधान करना, माफ़ी चाहूंगी इतनी क्षमता मेरी नहीं है | मेरे लिए फेसबुक का अर्थ बस इतना है कि समय मिला तो देख लिया | कभी कुछ थोड़ा रोचक लगा तो डाल दिया | या फिर कभी मन न लगा तो ...बस इतना ही |
विस्तार में नहीं जाउंगी ...लेकिन दृष्टान्त हमारे पुरोधाओं को समझने के लिए काफ़ी है | ये है तो विवेकानंद का साक्षात्कार, जिन पर अभी मैं लेख लिख रही थी | ये उस युग के विचारकों के मानसिक धरातल को और स्त्री सम्बन्धी दृष्टि को समझने के लिए बहुत आवश्यक है जिसमें आचार्य शुक्ल बड़े हुए थे | हो सकता है ये स्थापना साहित्य में न हो लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि ये सत्य ही नहीं है | इसके बाद भी आपत्तिजनक विपत्ति आ जाए तो एक बार दिनकर के लेखों को पढ़ लेंगे | इतनी विनती के साथ साक्षात्कार -
“ और इसलिए आपका विचार है कि हमलोगों में नारी की असमानता पूर्णतया बौद्ध मत के कारण है ?”
“जहाँ वह है निश्चय ही ऐसा है स्वामी जी ने कहा, “ पर हमें यूरोपीय आलोचना की अचानक आयी हुई बाढ़ और उसके कारण अपने में उत्पन्न हुई अंतर की भावना के वशीभूत होकर अपनी नारियों की असमानता के विचार को स्वीकार करने में अत्यधिक शीघ्रता नहीं करनी चाहिए | परिस्थतियों ने हमारे लिए अनेक शताब्दियों से नारी की रक्षा की आवश्यकता को अनिवार्य बनाया है | हमारे इस रिवाज का कारण इस तथ्य में है, नारी की हीनता में नहीं |”
“कदापि नहीं” , स्वामी जी ने कहा, “ पर हमारा हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल शिक्षा का प्रचार कर देने तक ही सीमित है | हमें नारियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना चाहिए, जहाँ वे अपनी समस्या को अपने ढंग से स्वयं सुलझा सकें | उनके लिए यह काम न कोई कर सकता है और न किसी को करना ही चाहिए | और हमारी भारतीय नारियाँ संसार की अन्य किन्हीं भी नारियों की भांति इसे करने की क्षमता रखती है |”
“वह केवल धर्म के क्षय से आया |”
स्वामी जी ने कहा, “प्रत्येक आन्दोलन अपने कुछ असाधारण लक्षणों के कारण विजय प्राप्त करता है , और जब वह गिरता है, तो यही गर्व का विषय उसकी दुर्बलता का मुख्य तत्व बन जाता है | भगवान् बुद्ध, मनुष्यों में महानतम, अद्भुत संगठनकर्ता थे, और उन्होंने इस साधन से संसार को विजित किया | पर उनका धर्म भिक्षुओं का धर्म था| इसलिए इसका बुरा प्रभाव यह पड़ा कि स्वयं भिक्षुक का वेश ही आदर का पात्र हो गया | उन्होंने पहली बार धर्म- स्थानों पर सामूहिक जीवन का भी आरम्भ किया और उससे नारियों को अनिवार्यत: नरों से हीन बना दिया; क्योंकि महा भिक्षुणियाँ कुछ विशिष्ट भिक्षुओं की सलाह के बिना कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकती थीं | इससे उनके तात्कालिक उद्देश्य, धर्म की दृढ़ता, की तो पूर्ति हो गयी; पर आप देखते हैं कि उसके जो दूरगत परिणाम निकले, वही शोचनीय हुए |”
“निश्चय ही है ; पर उसमें नर और नारी के बीच कोई भेद नहीं किया गया है | आपको याद होगा कि राजा जनक की सभा में याज्ञवल्कय से किस प्रकार प्रश्न पूछे गए थे ? उनकी मुख्य प्रश्न करने वाली थी, वाचक्नवी, वाग्मी कन्या – ब्रह्मवादिनी, जैसा उन दिनों कहा जाता था | वह कहती है, “ मेरे प्रश्न एक कुशल धनुर्धर के हाथ में दो चमकदार तीरों के समान हैं |” उसके नारी होने की चर्चा भी नहीं की गयी है | और फिर क्या वनों में स्थित हमारे पुरातन विश्वविद्यालयों में लड़कों और लड़कियों की समानता से अधिक पूर्ण कुछ और हो सकता है | हमारे संस्कृत नाटकों को पढ़िए, शकुंतला की कहानी पढ़िए और देखिए कि क्या टेनीसन की ‘प्रिंसेज’ हमें कुछ सिखा सकती है ?”
दूसरी बात 'विरोध के लिए भी अध्ययन उतना ही मजबूत होना चाहिए और हम सब अभी निर्माण की स्थिति में हैं |
तीसरी बात यदि मेरा स्वपन आदरणीय डॉ. शिव प्रसाद सिंह के 'नीला चाँद' की तरह लिखने का है और यदि यह मैं पूरा नहीं कर पायी तो मुझे कोई हक नहीं कि वामा-विलाप के नाम पर पुरुषों को सर पकड़कर और छाती पीटकर गाली देने लग जाऊं | हाँ हमारे लिए रास्ते कुछ ज्यादा कठिन हैं मैं मानती हूँ | हिम्मत भी बढ़ानी ही होगी |
प्लाखानोव बाद में कम्युनिस्ट विरोधी हो गये थे।छात्र जीवन में स्टडी सेंटर में बताया गया था कि तब भी लेनिन मार्क्सवाद को ठीक से समझने के लिए उनकी की किताब बताते थे।संग्रह और त्याग का विवेक नहीं है तो साहित्य और बौद्धिकता से बाहर चले जाइये।पंसारी की या पकौड़े की दुकान खोलिये अथवा किसी पार्टी का झंडा ढोइ...
इस सम्बंध में मेरा मानना है कि केवल शुक्ल जी के इतिहास को ही क्यों इतिहास के संग्रहालय में डाल देनी चाहिए! मैं तो कहता हूँ कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले लिखे गए सारे इतिहास के कृतियों को इतिहास के संग्रहालय में डाल दिये जायें। प्रत्येक पीढ़ी को अपना इतिहास स्वयं लिखना और पढ़ना चाहिए। तभी इतिहास का अध्ययन हमारे किसी काम आएगा। वरना पढ़कर केवल स्नातक-स्नातकोत्तर की परीक्षाओं को पास करने के लिए तो शुक्ल जी का इतिहास भी काफी है।...
आलोचक प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री
राजनीति, साहित्य और समाज-सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री (2.5.1929 - 17.4.2005 ) की ख्याति एक कुशल वक्ता और आदर्श शिक्षक की भी है. वे भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं. ‘कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबंध’, ‘तुलसी के हिय हेरि’, ‘अनंत पथ के यात्री : धर्मवीर भारती’, ‘अनुचिन्तन’, ‘कुछ चंदन की कुछ कपूर की’, ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य के कुछ विशिष्ट पक्ष’, ‘भक्ति और शरणागति’ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियां हैं. उनकी कृतियों का संग्रह ‘विष्णुकान्त शास्त्री : चुनी हुई रचनाएं’( 2 खंड ) प्रकाशित है जिसके प्रथम खण्ड में आलोचनात्मक निबंध हैं. इसमें क्रमश: कालिदास, कबीर, सूर, तुलसी, भारतेन्दु, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, दिनकर और सर्वेश्वर का मूल्यांकन किया गया है. चार निबंधों का विवेच्य विषय है- काव्य का वाचिक संप्रेषण, आधुनिक हिन्दी कविता और छंद, गीत और नवगीत तथा बांग्लादेश की संग्रामी कविता.
कबीर और तुलसी की तुलना करते हुए उन्होंने जो लिखा हैं उससे उनकी दक्षिणपंथी वैचारिक दृढ़ता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है, “मैं यह तो मानता हूं कि प्राचीन कवियों और उनकी कृतियों को आधुनिक दृष्टियों की कसौटी पर भी कसना चाहिए, इससे उनके नए पहलू उजागर होते हैं, किन्तु ऐसा करते समय उनकी मूलभूत निष्ठा को विस्मृत कर देना उचित नहीं है. ऐसा हुआ तो हम अंतरंग की उपेक्षा कर बहिरंग को ही प्राधान्य दे देंगे. आखिर इसपर तो विचार करना ही चाहिए कि कबीर और तुलसी बुनियादी तौर पर क्या थे? क्या उनकी पहली पहचान समाज सुधारक, लोकनायक आदि की हो सकती है? सच्चाई यही है कि कबीर और तुलसी दोनो मूलत: भक्त थे. दोनो परम तत्व से अपना संबंध निष्काम प्रेम के द्वारा जोड़ना चाहते थे. दोनों की वास्तविक निकटता या दूरी इसी मुद्दे के ऊपर प्रकट किए गए उनके भावों, विचारों से तै की जा सकती है. मेरा नम्र निवेदन है कि इस क्षेत्र में दोनो में अस्सी प्रतिशत से भी अधिक साम्य है.” ( तुलसी के हिय हेरि, पृष्ठ -253)
शास्त्री जी की आलोचना का फलक विस्तृत है. उनकी जीवन- दृष्टि और इसीलिए आलोचना- दृष्टि भी बहुत कुछ तुलसी की जीवन-दृष्टि और काव्यादर्श से प्रेरित और प्रभावित सी लगती है. उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नंददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और रामस्वरूप चतुर्वेदी पर विस्तार से लिखा है. इनपर लिखते हुए शास्त्री जी ने इनसे अपनी सहमतियों और असहमतियों- दोनो को पूरी ईमानदारी से व्यक्त किया है.
डॉ. रामचंद्र तिवारी ने उनकी आलोचना की विशेषताओं को बड़े व्यवस्थित ढंग से रेखाँकित किया है. वे लिखते हैं, “ शास्त्री जी के आलोचना-कर्म की पहली सामान्य विशेषता यह है कि वे आलोच्य विषय से सम्बद्ध समस्त ज्ञातव्य तथ्यों को सामने रखकर पूरी तैयारी के साथ आलोचना-कर्म में प्रवृत्त होते हैं. इसे उन्होंने अपनी पूर्णता-ग्रंथि कहा है. इस ग्रंथि के चलते उनकी आलोचना में अनुशीलन के तत्व भी संश्लिष्ट हो गए हैं. पंत, दिनकर, महादेवी और सर्वेश्वर की आलोचनाएं अपवाद हैं. संदर्भ- गर्भत्व इन आलोचनाओं में भी है किन्तु वह विविध संदर्भ –स्रोतों से नीत न होकर लेखक के आलोचक व्यक्तित्व में रचा- बसा और उसका सहज अविभाज्य अंग बनकर सामने आया है. दूसरी विशेषता यह है कि शास्त्री जी का पूरा लेखन संतुलित है. न तो उन्होंने किसी को एकतरफा खारिज किया है न आसमान पर चढ़ाया है. आलोच्य कवि या आलोचक की सीमाओं का उल्लेख भी बड़ी विनम्रता के साथ किया है. उनके वैष्णव संस्कार आलोचना में ज्ञात- अज्ञात रूप में सक्रिय रहे हैं. किन्तु विशेष बात यह कि निर्णय के स्तर पर उनकी विनम्रता ने कहीं कोई समझौता नहीं किया है. निराला की भक्तिकाव्य संबंधी रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल की आलोचनाओं को उद्धृत करने के बाद लेखक ने अपना निर्णय इन शब्दों में दिया है, “ मैं इन मतों को मार्क्सवादी आलोचना की स्थूलता और विफलता का उदाहरण मानता हूँ.” इससे लेखक की आस्थामूलक दृढ़ता का अनुमान लगाया जा सकता है. शास्त्री जी की आलोचना की तीसरी विषेषता है, निरंतर सक्रिय बुद्धि और हृदय की सहभागिता. यदि बुद्धि आलोच्य विषय के चयन, विश्लेषण, तुलनात्मक परीक्षण और निष्कर्ष –बिन्दु तक पहुंचने की दिशा में सक्रिय रहती है तो हृदय उसके साथ सहभाव बनाए रखकर आलोच्य विषय में अंतर्भूत, कोमल कठोर भाव –स्थितियों को धारण करने वाले मर्मक्षणों के उद्घाटन में प्रवृत्त. कहा जा सकता है कि शास्त्री जी की आलोचना में पुरुष और प्रकृति दोनो का स्वर समान भाव से मुखरित है. उनमें समरसता है, प्रतिद्वन्द्विता नहीं. हृदय से अनुप्रेरित होकर ही उनकी बुद्दि आलोचना-कर्म में प्रवृत्त हुई है. यह और बात है कि वह भी उनके अंतरतम में संचित संस्कारों से अनुप्राणित है. शास्त्री जी की आलोचना की चौथी विशेषता यह है कि परंपरा और शास्त्र का आधार लेते हुए भी न तो वह परंपराग्रस्त हैं, न शास्त्रबद्ध. उनका विश्वास, परंपरा की पुनर्व्याख्या में है. इसलिए पुराने कवियों की आलोचना करते समय भी उन्होंने आधुनिक मानसिकता वाले पाठकों का ध्यान रखा है. ( विष्णुकान्त शास्त्री अमृत महोत्सव : अभिनंदन ग्रंथ, खण्ड-3, पृष्ठ 119)
शास्त्री जी अपने व्यवहार और आचरण में भी अत्यंत सौम्य और उदार थे किन्तु वैचारिक दृढ़ता में संघ की विचारधारा के प्रति पूर्ण आस्थावान. 1992 ईं में तथाकथित बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय कार सेवक के रूप में प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री भी अपनी टोली के साथ अयोध्या पहुंचे थे.
शास्त्री जी बहुत उच्च कोटि के शिक्षक थे. राजनीति में रहते हुए भी उनके भीतर राजनीति के छल-प्रपंच, झूठ-फरेब आदि अवगुण नहीं थे. राज्य- सभा के सदस्य रहते हुए अनेक बार वे दिल्ली से कोलकाता हवाई अड्डे पर आते और वहाँ से सीधे विश्वविद्यालय में अपनी कक्षा में होते. विरोधी विचारधारा के लोगों से भी मैंने अनेकश: उनकी प्रशंसा सुनी है. ‘राम जी की कृपा से’ कहकर वे अपने प्रत्येक कार्य ‘राम’ पर छोड़ देते थे और स्वयं को निमित्त मात्र मानते थे.
फिलहाल, संस्मरण शास्त्री जी की रचना- धर्मिता की केन्द्रीय विधा है. उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी. अपने विरोधी विचारधारा के कवि नागार्जुन की भी दर्जनों कविताएं उन्हें याद थी.
शास्त्री जी का निधन 17 अप्रैल 2005 को ट्रेन में हृदयगति रुक जाने से हो गया था. हम उनकी पुण्यतिथि पर समाज के लिए किए गए उनके योगदान का स्मरण करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं...





