:::::::::::::::::::::;;;;::::::::::::::::::;:::::
औपनिवेशिक काल का यह यह चित्र उस चित्र कुछ ऊपरी हिस्से से मेल खाता है जिसमें आम्बेडकर भी फिरंगी टाई और कोट से शुक्ल की तरह लैस हैं।पहनावे का अंतर सिर्फ इतना है कि आंबेडकर नीचे फूल पेंट पहनते थे और शुक्ल धोती। इसलिए आंबेडकर और शुक्ल दोनों
पर औपनिवेशिक पाश्चात्य चेतना का घर प्रभाव है।उपनिवेशवाद हमारी भलाई के लिए नहीं आया था,अब यह जगजाहिर है।
शुक्ल में प्राच्य जातिवादी साम्प्रदायिक चेतना का भी प्रभाव है।लेकिन इस पर कमोवेश बहस लंबे समय से होती रही है।फिर इसमें नया क्या है?नया है देश काल और उसका प्रोडक्ट।।
----------
बात चली है तो ध्यान रखिए कि यह सनसनी साहित्य में सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारन्टीन की उपज है। एकेडमिक जगत पाखण्ड और अवसरवाद के लॉक डाउन का शिकार लंबे समय से है। इसलिए नियति के ये दिन आने ही थे।
हिंदी के कुएं में पानी जैसे जैसे कम होता जाएगा,मेढ़क की टर्र टर्र बढ़ती जाएगी।सच तो यह है कि आलोचना और शोध से छत्तीस के आंकड़े रखनेवाले के एकेडमिक कुल का विस्तार लगातार होता रहा और उसको हमारे योग्य आचार्यों ने बेशर्म बढ़ावा दिया।आज उसकी कूट फसल यह पीढ़ी है।
जब शोध और आलोचना के नाम पर घर धुलाई,कार पोछाई,ओझाई और चेलाई ही करवानी है तो उसका सह उत्पाद ऐसा ही होगा।।
हिंदी के शीर्ष आलोचकों ने विश्व ज्ञान को साधा था,तब कुछ दे गए।जो दे गए चाहे शुक्ल-द्विवेदी हों या नामवर-मैनेजर उनकी जड़ें प्राच्य और पश्चिम की ज्ञान और साहित्य परम्परा में सतर्क ढंग से धंसी हुई है।
दुनिया के दो समकालीन मार्क्सवादी आलोचक टेरी ईगलटन और फ्रेडरिक जेमेसन को पढ़िए तो पता चलता है कि वे अपनी परंपरा से कितने जुड़े हैं।
असहमति का साहस और सहमति का विवेक दोनों हमारे आसपास रणनीति के तहत नष्ट किए गए हैं। जातिवादी और कुलीन ब्राह्मण समुदाय को शुक्ल जी पसंद हैं तो यह दोनों का दुर्भाग्य है और इसी कारण दलित को शुक्ल जी से घृणा है तब भी दोनों की बदनसीबी है।
वस्तुतः नवकुल नक्काल की भड़ैती ही उनका साहित्यिक शगल है।एक कहावत है यथा गुरु तथा चेला/मांगे गुड़ दे ढेला।
मुझे तो इस बहस में सनसनी,उत्तेजना,अनपढपन और तथ्यहीनता ही ज्यादा दिख रही है।जिस बहस का मूल ही अनपढपन और अवसरवादी सनसनाहट का शिकार हो उसके अतिरिक्त विस्तार का नतीजा रिक्त ही होगा।
कोरोना महामारी की विकट घड़ी में जिस तरह सत्ता जात धरम की राजनीति से मानवता को घायल कर रही है,उसी का बाई प्रोडक्ट यह उथला एकालाप है।जहाँ देखिए हिंदी के मास्टर और एकेडमिक जगत से परमकुंठा पालने वाले कथित लेखक मच्छर गान गाए जा रहे हैं।न राग न लय, फिर भी प्रलय!!!...
दूसरे वरिष्ठ के सशक्त प्रतिरोधी कनिष्ठ हैं| ऐसे कनिष्ठ हैं कि अभी दो दिन शोध में आए हुआ है, और मुझे नहीं लगता कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास को ठीक से पढ़ा भी है, लेकिन करें क्या कि प्रासंगिकता के लिए शुक्ल जी से ही टकरा गए|
साहित्य की भूमिका' में ऐसे नये शोध ,आलोचना,विमर्श के मार्ग मिलते हैं... मैं हिन्दी के विद्वानों को इस पर अपने विचार रखने के लिये आमन्त्रित करता हूँ।
फेसबुक पर शुक्ल जी पर अब कुछ लिखना उमड़ते उदधि में कागज की नाव तैराने जैसा हो गया है,पर वादा किया था, सो जाति के प्रश्न पर भी अपनी बात रखूंगा |
दूसरे वे भारतीय रसवाद के गहरे असर में थे|रसवाद आस्वाद को महत्व देता है |आस्वादन के लिए 'सहृदय'होना अनिवार्य है |सहृदयता की भी शर्त वही 'शिक्षित जनता 'पूरी करती थी |इसीलिए जातिव्यवस्था( चिंतामणि भाग-4)जैसा विचारोत्तेजक निबंध लिखने वाले शुक्ल जी लोक की 'प्रकृति भावधारा' की ताकत को समझते हुए (द्वितीय उत्थान :काव्यखंड) भी पुराणवादी शिक्षित जनता की पूंछ नहीं छोड़ पाते|
शुक्ल जी ने जो कवियों की जाति का जरूर से जरूर उल्लेख किया है यह उन्हें साहित्येतिहास लेखन की परंपरा में शिवसिंह सेंगर के यहां से मिलता है |जो लोग यह समझते हैं कि शुक्ल जी का इतिहास मौलिक है, वे कुछ नहीं जानते|शुक्ल जी ने इतिहास लेखन का पैटर्न ग्रियर्सन,मिश्रबंधु और बंग्ला के इतिहास लेखक दिनेशचंद सेन से लिया, शोध पूरा का पूरा मिश्रबंधुओं के विनोद व सभा की रिपोर्ट से लिया, हां आलोचना दृष्टि में मौलिकता है|कवि परिचय लिखते लिखते शुक्ल जी जो मूल्यवान टिप्पणियां करते चलते हैं यह आदत 'शिवसिंह सरोज' में मुसलसल मौजूद है, भले सरोजकार का बोध शुक्ल जी के स्तर का नहीं है |
उन्हें जातिवादी कहते समय यह भी ध्यान देना चाहिए कि मिश्रबंधु और शुक्ल जी का इतिहास दोनों नवजागरण की ही उपज हैं, नवजागरण ऊपरी तौर पर जाति वगैरह का खण्डन करता है, पर उसके झंडाबरदार चूंकि ऊंची जातियों से आये थे, सो उनके दृष्टिपथ में वर्णवाद का घुसना स्वाभाविक था, जो शुक्ल जी के साथ भी हुआ|यही कारण है कि शुक्ल जी की दृष्टि उलझी हुई नजर आती है |उनके भक्त और आलोचक दोनों अपनी सुविधानुसार कोटेशन तलाश सकते हैं |मेरे विचार से सांप्रदायिक नहीं थे,और जहां हुए हैं, वहां औपनिवेशिक दृष्टि का शिकार होने के नाते हुए हैं |वे अपनी समझ में जातिवादी नहीं हैं पर संस्कार,परंपरा और अपने द्वारा बनाई गयी साहित्य की मान्यताओं की फँसरी के जहां जहां शिकार होते हैं जातिवादी या कहें वर्णवादी हो उठते हैं|
कुछ उदाहरण देता हूँ। ऐसे उदाहरण बहुतेरे है।
-- भूषण को लेकर उनका वक्तव्य
उनके प्रति भक्ति और सम्मान की प्रतिष्ठा हिंदू जनता के हृदय में उस समय भी थी और आगे भी बराबर बनी रही या बढ़ती गई।"
--हिंदू जाति के प्रतिनिधित्व कर्ता के रुप में
शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का वर्णनों को कोई कवियों की झूठी ख़ुशामद नहीं कह सकता।"
-- "वे हिंदू जाति के प्रतिनिधि कवि हैं।"
--कबीर के बारे में
कबीर ने अपनी झाड़-फटकार के द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों की कट्टरता को दूर करने का जो प्रयास किया। वह अधिकतर चिढ़ाने वाला सिद्ध हुआ, हृदय को स्पर्श करने वाला नहीं।"
--सूरदास को लेकर
"इस परम्परा में मुसलमान कवि हुए हैं। केवल एक हिन्दू मिला है।"
आखिर कोई बतायेगा ये किस प्रकार की इतिहास दृष्टि है।मैं तो उनकी इस किताब को "विसंगतियों का इतिहास" कहना पसन्द करूँगा। जो ज्यादा उपयुक्त है।अगर आप यह कहना चाह रहे हैं कि उस समय की परिस्थिति कुछ और थी। तो ठीक है इस समय और परिस्थिति अब बदल चुकी है,और इनकी यह किताब भी अप्रसांगिक साबित हो चुकी है। हाँ ये कर सकते हैं कि इसे "मरे हुई लाश" के तरीके उपयोग किया जा सकता है। जो ज्यादा उपयुक्त है।
अब वर्तमान में एक नई इतिहास दृष्टि, एक नई सोच की तहत सहित्योइतिहास की रचना की जानी चाहिए! आप कह सकते हैं कि किताबें बहुत सारी लिखी गई है। लेकिन मैं फिर से कहूँगा कि जो भी इतिहास लिखी गई है आज तक वह सिर्फ इनकी ही विचारों का पिष्टपेषण किया गया है। उसमें उनका कोई मौलिक विचार या, स्वतन्त्र तरीका नही है सोचने का, वह इन्ही के माध्यम से अपनी बातों को शुरू करते हैं।अंत तक इन्ही का खंडन-मण्डन करते चले जाते हैं। आज तक सारे सहित्योइतिहास के रचनाकारों ने यही किया। जिनके कारण ही उनकी ये किताब आज तक अपनी अस्तित्व बनाई हुई है। अगर वो एक नई तरीके से सोचते तो आज ये "आउटडेटेड" किताब पढ़ने की आवस्यकता नही होती।
कुछ बयान सुनवाता हूँ आपको! जो पहले ही इनके सामने हथियार डाल देते हैं। बिल्कुल नतमस्तक हो जातें है।
-- रामचन्द्र शुक्ल से सर्वत्र सहमत होना सम्भव नहीं। ..... फिर भी शुक्ल जी प्रभावित करते हैं। नया लेखक उनसे डरता है, पुराना घबराता है, पंडित सिर हिलाता है।
ऐसे बहुतेरे कथन आपको मिल जायेगा। आप ढूंढ सकते हैं। चतुर्वेदी जी से लेकर बच्चन तक, रामविलास से लेकर नामवर जी तक। बहरहाल इसका एकमात्र कारण है इनके विचारों से ही "खण्डन-मण्डन" की शुरआत करना।
--"आचार्य का विषय प्रतिपादन जैसा गुरु गम्भीर है उसके बीच उनका सूक्ष्म व्यंग्य और तीव्र तथा पैना हो गया है, घनी-बड़ी मूँछों के बीच हल्की मुस्कान की तरह।"
कौन सी गुरु गम्भीरता कौन --हाँ
---आदिकाल के साथ शुद्ध और अशुद्ध साहित्य के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---भक्तिकाल जो जनवादी चेतना का उभार था उसके साथ ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---रीतिकाल में श्लीलता-अश्लीलता के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
---छायावाद के साथ रहस्यवाद के नाम पर ये क्या करते हैं। आपसे छिपा था।
छायावाद के बाद बालें प्रकरण पर कुछ भी कहना बेईमानी होगी चाहे वह गद्य विधा हो या पद्य का।
इनके इतिहास की जो किताबों है। उसका दूसरा संस्करण 1940 है। तो निश्चित है। उसके बाद की इतिहास इसमें कम मिलने वाली है।मुमकिन ही नही है।यानि कि करीबन 60 वर्षों का इतिहास गायब, फिर भी इतना ज्यादा प्रासंगिक होना! कितना आश्चर्यजनक है न! मैं आखरी बात कहना चाहूँगा की यह किताब "आउटडेटेड" हो चुकी है। आपको इसे जिस खोह-कंदरा में डालना हो डालें, लेकिन अकेडमिक दुनिया से इसे बाहर करें।
क्योंकि यह मेरे समकालीन नही ठहरता। समकालीन का अर्थ प्रसांगिकता से लें!इस प्रकार, भले ही रैदास और कबीर मध्यकाल के कवि ठहरते हैं। और दुष्यन्त कुमार और राजेश जोशी आधुनिक काल के लेकिन अगर कबीर के विचार हमारे लिए प्रसांगिक है तो भले ही वह मध्यकाल के हों लेकिन वह "मुझे" मेरे समकाल नज़र आते हैं। और अगर राजेश जोशी का विचार पुरातनपंथी है। तो भले ही वह आधुनिक काल के कवि हैं लेकिन वो मेरे लिए समकालीन नही है और अप्रसांगिक भी।
उसी प्रकार कुल-मिलाकर मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि रामचंद्र शुक्ल की जो इतिहास की किताब है वो "आउटडेटेड" हो चुकी है।
पिछले दो दशकों में हिन्दी साहित्य में हुए पाँच उल्लेखनीय/महत्वपूर्ण/श्रेष्ठ शोधकार्य : भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभागों में हुए शोधकार्य का नाम बताइये, जिन्हें आज और आने वाले समय में हिन्दी पाठकों,विद्यार्थियों,शोधार्थियों के समक्ष प्रतिमान के रूप में पेश किये जा सकें।
बात जरा अगम्भीर लगे तो भी।
अब मूल बात कि क्या आप में से कोई किसी ऐसे व्यक्ति का नाम बता सकता है जो शुक्ल का इतिहास पढ़कर साम्प्रदायिक या जातिवादी हुआ हो?.....
-युवा कवि गोलेन्द्र पटेल!
No comments:
Post a Comment