“गोलेन्द्र ज्ञान” हिंदी का एक वैचारिक, साहित्यिक और सामाजिक मंच है, जहाँ बहुजन साहित्य, सामाजिक न्याय, मानवता, समता, शिक्षा, संस्कृति, कविता, आलोचना और जनचिंतन से जुड़े मौलिक लेख प्रकाशित किए जाते हैं। यह ब्लॉग भारतीय समाज, लोकसंस्कृति, बहुजन चिंतन, साहित्यिक विमर्श तथा मानवीय मूल्यों को सरल, शोधपरक और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करता है। यहाँ कविता, कहानी, निबंध, समीक्षा, दर्शन, इतिहास और समकालीन विचारों पर नियमित सामग्री उपलब्ध है।
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Golendra Gyan
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Wednesday, 26 August 2020
युवा कवि संदीप तिवारी की कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ { सम्मान : रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार 2020}
१.
साइकिल
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दोनों पैंडल पिता के पाँव हैं
टायर पिता के जूते
मुठिया उनके हाथ
कैरियर उनका झोला
हर रोज जाती है
उन्हें लेकर
लाती है लादकर
गाते हुए लहराते हुए
बिना किसी हेडलाइट के भी
घुप्प अँधेरे में
चीन्ह लेती है अपनी राह
मुड़ती है घर की ओर
हर रात पिता को
घर तक छोड़कर
फिर खुद सोती है साइकिल
भूखी दीवार से सटकर
साइकिल
जो पिता की अभिन्न साथी है
किसी पेट्रोलपंप तक नहीं जाती
कोई पेट्रोल नहीं पीती
जिसका अक्षय ईधन
छिपा है पिता के पाँव में
१७ फरवरी ,२०२०
२.
इलाहाबाद
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जो इलाहाबाद छोड़के गया है
वह प्रयागराज नहीं लौटेगा
लौटेगा तो
इलाहाबाद लौटेगा
प्रयागराज एक ट्रेन का नाम था
अब प्रयागराज एक जंक्शन का नाम हो जाएगा
अब टिकट पर नहीं लिखा मिलेगा इलाहाबाद
अब टिकट में उतनी महक भी नहीं बची रहेगी
प्लेटफार्म पर गड़े पीले बोर्ड
जिसको देखने भर से आ जाती थी जान में जान
उस पर लिखा एक प्यारा सा शब्द
अब मिटा दिया जाएगा
कहीं पर कुछ भी लिख दिया जाए
कुछ भी तोड़ फोड़ दिया जाए
पर दुःखी मत होना
सुबेरे जब ट्रेन पहुँचेगी प्रयागराज जंक्शन
बगल बैठा मुसाफ़िर उठाएगा
और बढ़ जाएगा इतना कहते हुए
जग जा भाई आ गया इलाहाबाद
★★★
३.
विदा के वक़्त
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झोले में सब सामान समेटा जा चुका होता है
फिर भी बार-बार लगता है
कहीं कुछ छूट सा गया
जैसे रह गया हो कुछ कहीं कोने में
विदाई के वक़्त
छूट जाती हैं बहुत सी चीजें
सबकुछ समेटकर भी
एक झोले में नहीं भरा जा सकता
कोई परचून की दुकान नहीं है विदाई का घर
परचून की दुकान से नहीं होता है कोई विदा
अमूमन बहुत तेज़ी से पहन लेता हूँ जूते
पर कभी-कभी
जान बूझ कर करता हूँ देर
दोनों हाथों को लहराकर
झाड़ता जाता हूँ जूते की धूल
मोजे को कई-कई बार करता हूँ सीधा
विदाई के वक़्त
बहुत समय लग जाता है
जूते को पहनकर खड़े होने में
चोरों की तरह
नज़र चुरानी पड़ती है
और जल्दी से उतर जानी पड़ती हैं सीढियाँ
बहुत घातक होता है
विदाई के वक़्त मुड़ के देखना
सड़क पर पहुँचते-पहुँचते
भर जाती हैं आँखे
डर लगता है
कि कहीं छलक न जाएं
सामने न देखकर
कनखियों से देखता हूँ अगल-बगल
ठेले पर लदी सब्जियाँ
और सुंदर लगने लगती हैं
बच्चे जहाज की तरह भागते हैं
मन उथल पुथल में होता है
और उन पर गाड़ियाँ हॉर्न बजाते हुए सरपट निकल जाती हैं
बहुत अच्छी कविताएँ। बिना भाषा को अनावश्यक रूप से दुरूह बनाए और बिना वायवीय बिंबों के सरल और सार्थक। संदीप को हार्दिक शुभकामनाएँ।
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